Thursday, January 1, 2015

अलविदा 2014 : 'किक' और 'पीके' से संभला बड़ा परदा!

* हेमंत पाल 
 हिंदी फिल्मों की सफलता के लिहाज से साल 2014 को बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता! कुछ फिल्मों ने जरूर बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया, लेकिन ज्यादातर फिल्में फ्लॉप ही रहीं। बीते साल (2014) करीब 180 फिल्मों में रिलीज हुईं। इनमें से सिर्फ 8-10 फिल्में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकीं। जबकि, सलमान खान की 'किक' और आमिर की 'पीके' ही ऐसी फिल्म रही, जिन्होंने 200 करोड़ का कारोबार किया! 
  'किक' और पीके' के अलावा 2014 में टाइगर श्रॉफ की हीरोपंती, सिद्धार्थ मल्होत्रा की एक विलेन, वरुण धवन की मैं तेरा हीरो, आलिया की 'हाई-वे' चेतन भगत के नॉवेल पर बानी 2-स्टेट्स, सिंघम रिटर्न्स, हॉलीडे, जय हो और बैंग-बैंग ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता दर्ज की! इन फिल्मों ने न केवल लागत वसूली, बल्कि मुनाफा भी जमकर कमाया! 
  लेकिन, कारोबार के नजरिए से देखा जाए तो 2014 साल की पहली छमाही दूसरी के मुकाबले बॉलीवुड के लिए ज्यादा अच्छी थी! दूसरी छमाही में रिलीज होने वाली ज्यादातर फिल्में कुछ खास नहीं कर सकीं। बॉलीवुड बिजनेस पर नजर रखने वाले समीक्षकों ने 2014 को कारोबारी सफलता के हिसाब से 'औसत साल' करार देते हुए कहा कि 2014 की शुरुआत बढ़िया थी, लेकिन अंत में गिरावट आ गई! साल में सबसे ख़राब महीना नवंबर रहा, जो कई सालों बाद आया! नवंबर में 'द शौकीन्स' और 'किल दिल' जैसी कई फिल्में आईं और सभी पिट गईं। 2014 के नवंबर में बॉलीवुड को इतना नुकसान होगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी! यहां तक कि 'एक्शन जैक्सन' जैसी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई! 
    अगस्त मध्य तक करीब 120 फिल्में रिलीज हुईं, जिनकी बदौलत बॉक्स ऑफिस ने 1,400 करोड़ रुपए की कमाई की! साजिद नाडियाडवाला निर्देशित 'किक' तब पैसा कमाने वाली पहली फिल्म थी, जिसने 233 करोड़ रुपए कमाए! 'किक' 2014 की सबसे बड़ी फिल्म  थी, जिसे आमिर की 'पीके' ने पीछे छोड़ा! कारोबार के नजरिए से खस्ताहाल रहे इस साल में बॉक्स ऑफिस के लिए सिर्फ 8-10 फिल्में राहत लेकर आईं! इनमें 'जय हो' (करीब 110 करोड़ रुपए), 'हॉली-डे : ए सोल्जर इज नेवर ऑफ ड्यूटी' (110 करोड़), '2 स्टेट्स' (105 करोड़), 'किक' (200 करोड़ से अधिक), 'बैंग बैंग' (145 करोड़), 'हैप्पी न्यू ईयर' (188 करोड़), 'सिंघम रिट्नर्स' (140 करोड़ रुपए) और 'पीके' (200 करोड़ से ज्यादा) शामिल हैं। 'एक विलेन' (96 करोड़) और 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' (86 करोड़) ने भी बॉलीवुड को थोड़ी राहत दी!
 शाहरुख खान की फिल्म 'हैप्पी न्यू ईयर' ने दीवाली के दिन रिलीज होकर पहले ही दिन 44.97 करोड़ का बिजनेस करके अब तक की लगभग सभी फिल्मों और सुपस्टार्स को पीछे छोड़ा। इससे पहले सलमान खान की ईद पर रिलीज हुई फिल्म 'किक' ने जबरदस्त कमाई करके बड़ी हिट फिल्म का खिताब हांसिल किया, जिसे साल  में 'पीके' पछाड़ा! दिवाली के समय हर किसी की आंखें शाहरुख खान की 'हैप्पी न्यू ईयर' पर ही टिकी हुई थी कि ये फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म का टैग जीत पाती है या नहीं। आखिरकार 'हैप्पी न्यू ईयर' ने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पहले दिन तो रिकॉर्ड तोड़ कमाई की, उसके बाद भी उन्होंने दूसरे व तीसरे दिन भी बॉक्स ऑफिस पर अपनी पकड़ हल्की नहीं पड़ने दी। 

लागत के हिसाब से साल की हिट फ़िल्में
* किक - लागत 115 करोड़ कमाई 233 करोड़
* हॉलिडे - लागत 56 करोड़ कमाई 112.65 करोड़
2014​ की लीक से हटकर बनी कुछ फ़िल्में ​
  2014 साल कुछ ऐसी फिल्मों के भी नाम रहा, जो कई मोर्चों पर बॉलीवुड की लोकप्रिय धारा में लीक से हटकर साबित हुईं! इनमें 'हैदर' जैसी साहसिक राजनीतिक फिल्म थी, तो महिलाओं को नए परिवेश में प्रस्तुत करने वाली 'हाईवे' और 'क्वीन' भी! 'हैदर' को सिनेमाई साहस का नमूना भी माना जा सकता है।डायरेक्टर विशाल भारद्वाज की इस फिल्म के एक्टर थे शाहिद कपूर, तब्बू, केके मेनन और इरफान खान। फिल्म शेक्सपीयर के 'हेमलेट' का भारतीय रूपांतरण थी, लेकिन कश्मीर की पृष्ठभूमि के चलते इसका कथानक दिलचस्प था। फिल्म पर ये आरोप भी लगा कि ये कश्मीर में सेना की भूमिका को नकारात्मक तरीके से दिखाती है! लेकिन, सिनेमाई साहस और कथानक के मोर्चे पर विशाल भारद्वाज की इस फिल्म को बड़े पैमाने पर सराहा गया। शानदार अभिनय, चुस्त डायरेक्शन, विहंगम दृश्यों और मजबूत राजनीतिक स्टैंड को सामने रखती यह फिल्म विशाल की और साल की सबसे उम्दा फिल्मों में रही!
  'क्वीन' एक लड़की के आजाद ख्यालों की कहानी है। कंगना रनोट, राजकुमार राव, लीजा हेडन की इस फिल्म के डायरेक्टर थे विकास बहल। उस देश में जहां लड़कियों का चौखट लांघना भी ठीक नहीं समझा जाता, 'क्वीन' एक हिम्मती कहानी थी। ये फिल्म महिलाओं को आजाद परिप्रेक्ष्य में सामने लाती है। यह राजौरी गार्डन से निकली एक महिला के दकियानूसी जालों को साफ करके अपने फैसलों को लेकर आत्मनिर्भर होने की कहानी है। 
 इम्तियाज अली की फिल्म 'हाईवे' को पूरी तरह आलिया भट्ट की फिल्म कहा जा सकता है जिसे रणदीप हुड्डा का सहारा मिला। ये एक अमीर घर की ऐसी लड़की की कहानी है जो अपनी आरामशुदा जिंदगी में जो नहीं कर पाती, वह अपह्त कर लिए जाने के बाद करती है। वह जिंदगी को खुलकर जीती है। एडवेंचर का सपना पूरा करती है, प्यार करती है और उत्पीड़न के बरसों पुराने बोझ को दबा-छिपाकर नहीं रखती! 
    होमी अडजानिया की 'फाइंडिंग फैनी' वैसे तो दीपिका पादुकोण, नसीरुद्दीन शाह, डिंपल कपाड़िया और पंकज कपूर की फिल्म है, लेकिन 'फाइंडिंग फैनी' के रूप में बॉलीवुड को एक सफल मेनस्ट्रीम अंग्रेजी फिल्म मिली है। यह हिंदी में कहानी कहने के परंपरागत तरीके को तोड़ती है और चीजों को संपूर्णता में देखने का आग्रह पैदा करती है। फिल्म अपने क्रूर और परिहास पूर्ण ढंग के नैसर्गिक अंत के लिए भी याद की जाएगी। 'फाइंडिंग फैनी' शहर की कोख से निकले व्यक्तिवाद के खिलाफ और इस व्यक्तिवाद का परचम बने छिछले एकांत के खिलाफ एक बगावत भी है। 
   केतन देसाई की फिल्म 'रंग रसिया' कला की बोल्डनेस और बोल्डनेस की आजादी का प्रतीक रही।  रणदीप हुड्डा और नंदना सेन  फिल्म में पहली बार भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में किसी लीड एक्ट्रेस ने अपना बदन दिखाया! बोल्ड सब्जेक्ट के कारण भी फिल्म विवादों में रही! शायद इसीलिए 2008 में बनी ये फिल्म 2014 में रिलीज हुई। 
  नए विषयों पर फिल्म बनाने के हमेशा पहचाने जाने वाले अमोल गुप्ते ने 'हवा हवाई'  पाने प्रयोग को दोहराया! पार्थो गुप्ते, साकिब सलीम, नेहा जोशी, मकरंद देशपांडे की फिल्म 'हवा हवाई' महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के एक किसान के बेटे की कहानी है। किसान की अचानक मौत हो जाती है तो उसकी पत्नी मजबूरन महानगर मुंबई आ जाती है। बेटा अर्जुन माँ का हाथ बंटाने के लिए एक चायवाले के यहां काम करने लगता है। एक रात उसके परों को एक आसमान मिलता है, जब वह पार्किंग लॉट में स्केटिंग करते बच्चों को और उनके कोच को देखता है। कचरे से स्केटिंग शूज का सजीला पेयर बनाया जाता है जिसका नाम रखा जाता है हवा हवाई! अर्जुन अपनी मेहनत के दम पर स्केटिंग कोच का पहले एकलव्य और फिर अर्जुन बनता है। 
  'सिटी लाइट्स' को भी लीक से हटकर बानी फिल्मों में गिना जा सकता है। हंसल मेहता की इस फिल्म को सजाया था राजकुमार राव, पत्रलेखा और मानव कौल ने! ये कस्बों, गांवों से शहर आने और फिर सपने पूरे करने वालों के सफर की कहानी है। लोग शहर आते हैं इस इस उम्मीद के साथ कि यहां ऊंचाई है तो क्या हुआ, हम भी अपना कद बढ़ा लेंगे! लेकिन, कद बढ़ाने की कोशिश में लोगों के कदम कितनी बार लड़खड़ाते हैं! इन्हीं कोशिशों का एक सिलसिला है 'सिटी लाइट्स।' 
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बॉक्स ऑफिस पर सुपरफ्लॉप रही ये फिल्में
  इस साल भी कुछ फिल्में ऐसी आईं जिनकी कुछ अलग कहानी दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ी! इन फिल्मों को समीक्षकों ने सराहा, लेकिन सिनेमाघरों में दर्शकों को रास नहीं आई! वहीं कुछ फिल्में ऐसी भी आईं जिन्होंने लोगों को जी खोलकर पकाया। नतीजा ये हुआ कि ये फिल्में अपनी लागत का आधा भी नहीं वसूल पाईं। 
साल 2014 की सुपर फ्लॉप फिल्मों पर एक नजर :
* बेवकूफियां : फिल्म का प्लॉट भले ही रोचक था, लेकिन ट्रीटमेंट में कोई दम नहीं था। आयुष्मान खुराना और ऋषि कपूर से लोगों को उम्मीदें बहुत थीं, लेकिन थियेटर के अंदर सभी पर पानी फिर गया! बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने पानी भी नहीं माँगा! इसका बजट था 22 करोड़ और इसकी कमाई थी 12.06 करोड़ रुपए। 
* बॉबी जासूस : इस फिल्म से विद्या बालन के अलावा दर्शकों को भी बहुत उम्मीदें थी। लेकिन, फिल्म की कहानी और बेमेल लीड जोड़ी ने सारा मामला बिगाड़ दिया। अंत से पहले ही दर्शकों को पता चल गया था कि इसका क्लाइमैक्स क्या होगा! फिल्म बनी थी 28 करोड़ में पर कमाई हुई 10.87 करोड़!
* गुलाब गैंग : इस फिल्म को माधुरी दीक्षित का जलवा भी बचा नहीं पाया! दर्शकों को गुलाब गैंग का जोश पसंद नहीं आया। एक से बढ़कर एक डायलॉग्स के जरिए महिला सशक्तिकरण वाली फीलिंग लाने की कोशिश तो की गई, लेकिन घाघरे वाली मोहिनी को डंडे चलाता देख लोग पचा नहीं पाए! 27 करोड़ में बनी इस फिल्म ने कमाए 13.32 करोड़। 
* लेकर हम दीवाना दिल : कमाई के मामले में यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर डिजास्टर साबित हुई। लोगों को यह लव स्टोरी बिल्कुल पसंद नहीं आई। 16 करोड़  फिल्म को मिले मात्र 2.11 करोड़ रुपए। 
* रिवॉल्वर रानी : 'क्वीन' से समीक्षकों की तारीफ़ बटोरने वाली कंगना रनोट की एक्टिंग की तारीफ तो इस फिल्म में भी खूब हुई, लेकिन दर्शकों ने इसे नकार दिया! अलका सिंह के बोल्ड किरदार में लोगों ने उन्हें पसंद किया, फिर भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ठंडी रही। फिल्म अपनी लागत का आधा भी वसूल नहीं कर पाई। 26 करोड़ में बनी इस फिल्म ने सिर्फ 9.44 करोड़ रुपए कमाए। 
* सुपर नानी : इस फिल्म को रेखा की कमबैक फिल्म माना जा रहा था, लेकिन दर्शकों के रिस्पॉन्स के बाद रेखा को भी मायूस कर दिया। अब रेखा को बॉलीवुड में कमबैक के लिए फिर कुछ करना पड़ेगा! फिल्म की कहानी महिला आधारित थी। रेखा ने जमकर मेकअप किया! फिल्म में बिग-बी का मजाक भी फिल्म में बनाया, पर कुछ काम नहीं आया! 'सुपर नानी' बुरी तरह सुपर फ्लॉप रही! 25 करोड़ के बजट वाली ये फिल्म 2.25 करोड़ ही कमा पाई!
* रोर-टाइगर्स ऑफ द सुंदरबन्स : इस फिल्म की तकनीक और प्रेजेंटेशन की काफी तारीफ हुई! लेकिन, फिल्म देखने लोग सिनेमाघरों तक नहीं पहुंचे। लिहाजा फिल्म अपनी लागत का आधा भी नहीं वसूल पाई और बॉक्स ऑफिस पर धराशाही हो गई। फिल्म का बजट था 20 करोड़ पर कमाए 8.81 करोड़ ही!
* राजा नटवरलाल :  फिल्म देखने वाले दर्शक भ्रमित थे कि कहीं वह यह फिल्म पहले भी तो नहीं देख चुके हैं! क्योंकि, फिल्म में इमरान के कपड़ों और हुमैमा मलिक के लो कट ब्लाउज के अलावा कुछ भी खास नहीं था। यह फिल्म दर्शकों को ठगने में कामयाब नहीं रही। 42 करोड़ जैसे बड़े बजट की ये फिल्म कमाई के मामले में छोटी ही रही और 23.94 करोड़ पर सिमट गई!
* क्रीचर (3डी) : देखा जाए तो इस फिल्म की अवधि 45 मिनट से ज्यादा नहीं थी। लेकिन, बिपाशा बसु को हीरोगिरी करते दिखाना था, तो फिल्म को खींचा गया। दर्शकों ने भी फिल्म पर रहम नहीं किया। यही कारण था कि 27 करोड़ में बनी ये फिल्म 16.52 करोड़ की झोली में जमा कर पाई!
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Sunday, July 27, 2014

'नमामि गंगे'


    नरेंद्र मोदी की सरकार ने भले ही अपने चुनावी वादों को पहले बजट में शामिल न किया हो, पर गंगा पर सौगातों की बारिश कर दी! कई ऐसी घोषणाएं हैं, जो सही मायनों में गंगा और उसके तट पर बसे शहरों के विकास के लिए मील का पत्थर साबित होंगी। नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी की भी बहुत सी उम्मीदें साकार हुई है! ' नमामि गंगे परियोजना' को मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना के रूप में देखा जा रहा है। केंद्रीय बजट में 2037 करोड़ का प्रावधान इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए किया गया है। इससे समन्वित गंगा संरक्षण मिशन की शुरुआत होगी! इस परियोजना से गंगा समेत उसकी सहायक नदियों सहित कई क्षेत्रों का भी विकास होगा। इससे गंगा की साफ-सफाई में मदद मिलेगी और और गंगा में जहाज परिवहन भी विकसित होगा!
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- हेमंत पाल 

  नरेंद्र मोदी सरकार के पहले बजट में 'नमामि गंगे' के ऐलान में 'नमो' की छाप दिखती है। बजट में नदियों की सफाई से लेकर नदियों को जोड़ने वाले प्रोजेक्ट पर भी फोकस किया गया है। 'नमामि गंगे' नाम से इंटीग्रेटेड गंगा कंजर्वेशन मिशन शुरू करने का ऐलान किया गया है। इसमें एनआरआई से भी मदद लेने का उल्लेख है। बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि 'नमामि गंगे' नाम से इंटीग्रेटेड गंगा कंजर्वेशन मिशन शुरू किया जाएगा। शुरुआती साल के लिए 2037 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। देश की विकास प्रक्रिया में एनआरआई का अहम योगदान रहा है। गंगा नदी के कंजर्वेशन के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में भी एनआरआई कम्युनिटी अहम योगदान दे सकती है। इसलिए गंगा के लिए 'एनआरआई गंगा फंड' बनाया जाएगा, जिससे आर्थिक मदद मिल सके। 
  भाजपा के लिए गंगा का मसला चुनाव अभियान में भी एक बड़ा मुद्दा रहा। वाराणसी से नामांकन करने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था 'न मैं यहां आया हूं और न ही किसी ने मुझे यहां भेजा है, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है'। हिंदू नगरी कहे जाने वाले वाराणसी में बीजेपी ने गंगा के सफाई के मसले पर कैंपेन भी किया था। बजट में केदारनाथ, हरिद्वार, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में रिवर फ्रंट के सौंदर्य और घाटों के विकास के लिए 100 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया गया। जेटली ने कहा कि रिवरफ्रंट और घाट सिर्फ हिस्टोरिकल हैरिटेज ही नहीं हैं, बल्कि इनमें से कई नदियां और घाट पूज्य हैं। लोग इनकी पूजा करते हैं।
  अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में नदियों को जोड़ने के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर बात शुरू हुई थी, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ पाई। अब मोदी सरकार ने इस पर फोकस किया है। जेटली ने बजट में नदियों को जोड़ने वाले प्रोजेक्ट की डिटेल रिपोर्ट की तैयारी के लिए 100 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया।
   इसी साल 24 अप्रैल की दोपहर बाद अपना नामांकन दाखिल करने के लिए बनारस कचहरी के बरामदे में खड़े भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने कहा था कि न मैं यहां आया हूं और न ही किसी ने मुझे यहां भेजा है, यहां तो मुझे गंगा मां ने बुलाया है। यह दृश्य बदला और जनता की इच्छा से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। गंगा को लेकर उनकी वचनबद्धता पर सबको भरोसा था, जिसे अंतत: अमलीजामा भी पहनाया वित्तमंत्री अरुण जेटली के आम बजट में। अब 'नमामि गंगा' नाम से गंगा व उसके तटों के उद्धार को एक नया प्रोजेक्ट शुरू करने का प्रावधान किया गया है। वित्तमंत्री ने इसके लिए बजट में 2037 करोड़ रुपए का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत अहमदाबाद में साबरमती रिवर फ्रन्ट की तर्ज पर उत्तर भारत में गंगा रिवर फ्रन्ट का श्री गणेश किया जाना है। इसमें गंगा जल संरक्षण के साथ ही तटों के संरक्षण व संवर्धन का प्रावधान संभावित है। नदी किनारे पॉथ-वे और पौधरोपण कर इसे समृद्ध क्षेत्र बनाने का भी प्लान इसमें निहित है।
  भारत में कृषि के माध्यम से दौलत का सर्वाधिक उत्पादन करने वाली गंगा बेल्ट को अब कारोबारी नजरिए से भी और समृद्ध किया जाएगा। पूर्व में औने-पौने शुरू की गई जल परिवहन की कवायद को अब व्यवस्थित रूप देते हुए इलाहाबाद से हल्दिया तक गंगा जल परिवहन हेतु बजट में प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त गंगा घाटों के लिए भी 10 करोड़ का बजट प्रावधानित किया गया है। यह संपूर्ण कवायद गंगा रिवर फ्रन्ट को अहमदाबाद के उस साबरमती रिवर फ्रन्ट की तर्ज पर पिरोकर पेश करना है जिसे गुजरात मॉडल के नवरत्‍‌नों में से एक बताकर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं।  
सबसे बड़ी चुनौती 
   गंगा सफाई अभियान की सबसे बड़ी बाधा होगी गंगा में गिरने वाले शहरी और औद्योगिक कचरे को रोकना। यह समस्या सरकार और वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती है। गंगा में प्रतिदिन 2 लाख 90 हजार लीटर कचरा गिरता है। जिससे एक दर्जन बीमारियां पैदा होती हैं। सबसे अधिक कैंसर जैसा खतरनाक रोग भी पैदा होता है। कैंसर के सबसे अधिक मरीज गंगा के बेल्ट से संबंधित हैं। इसके अलावा दूसरी जलजनित बीमारियां हैं। 
  सर्वेक्षणों के अनुसार गंगा में हर रोज 260 मिलियन लीटर रसायनिक कचरा गिराया जाता है, जिसका सीधा संबंध औद्योगिक इकाईयों और रसायनिक कंपनियों से हैं। गंगा के किनारे परमाणु संयत्र, रसायनिक कारखाने और शुगर मिलों के साथ-साथ छोटे बड़े कुटीर और दूसरे उद्योग शामिल हैं। कानपुर का चमड़ा उद्योग गंगा को आंचल करने में सबसे अधिक भूमिका निभाता है। वहीं शुगर मिलों का स्क्रैप इसके लिए और अधिक खतरा बनता जा रहा है। गंगा में गिराए जाने वाले शहरी कचरे का हिस्सा 80 फीसदी होता है। जबकि 15 प्रतिशत औद्योगिक कचरे की भागीदारी होती है। गंगा के किनारे 150 से अधिक बड़े औद्योगिक ईकाइयां स्थापित हैं। 
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इंदौर में अपराध की लहलहाती फसल

* हेमंत पाल 

   नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार अपराध में इंदौर का स्थान देश में दूसरा है। इंदौर में अपराध की दर (809.9) है। सबसे ज्यादा अपराध दर (834.3) कोयंबटूर की है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि यह दर देश के 53 प्रमुख शहरों में दर्ज हुए अपराधों की तुलना में सामने आई है। प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपराध दर (598) है। 2011 और 2012 की रिपोर्ट में कोच्चि की अपराध दर देश में सबसे ज्यादा थी, जबकि इस बार कोच्चि प्रथम पांच की सूची से भी बाहर हो गया है। इंदौर की अपराध दर 2011 में देश में चौथे नंबर पर थी, जबकि पिछले दो साल से लगातार दूसरे नंबर पर है। प्रतिशत की बात करें तो 53 शहरों में दर्ज अपराधों में 3.2 प्रतिशत अपराध अकेले इंदौर में दर्ज हुए हैं। 
हर जुर्म में बाजी मार रहा है इंदौर
  मध्यप्रदेश जहां बलात्कार के मामले में देश में अव्वल है, वहीं प्रदेश में इंदौर अपराध के हर वर्ग में दूसरे प्रमुख शहरों से आगे है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसी आरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में बलात्कार के सर्वाधिक मामले में मध्यप्रदेश में दर्ज हुए हैं। कुल अपराध के मामले में महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर है। भोपाल में जहां 11274 अपराध दर्ज हुए वहीं इंदौैर में यह संख्या 17551 है। ग्वालियर (7886) व जबलपुर (6996) काफी पीछे है। 2012 में इंदौर में 16512 अपराध दर्ज हुए।
महिला-बच्चों के अपराध की स्थिति
  इंदौर में महिला व बच्चों से अपराध की स्थिति में भी इंदौर की भयावह स्थिति है। रिपोर्ट के मुताबिक महिला के खिलाफ अपराध के इंदौर में 940 मामले दर्ज किए गए। इस श्रेणी में भोपाल में 878, ग्वालियर में 848 व जबलपुर में 559 केस दर्ज हुए। बच्चों से संबंधित अपराध की इंदौर में संख्या 583 है। ग्वालियर में 275, भोपाल में 178 व जबलपुर में 237 केस दर्ज हुए है।
हत्या, बलात्कार, अपहरण में आगे
   एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक इंदौर प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों से लगभग हर तरह के अपराध में सबसे आगे है। आंकड़े के मुताबिक, हत्या, बलात्कार व अपहरण जैसे सभी गंभीर मामलों में इंदौर राजधानी भोपाल के साथ ही अन्य प्रमुख शहरों से काफी आगे है। 
खुदकुशी करते युवा 
  इंदौर में आत्महत्या व सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों की स्थिति भयावह है। दोनों वर्गो में मौतों प्रदेश में सबसे ज्यादा इंदौर में ही रही है। आत्महत्या के आंकड़े बताते है कि इंदौर में मौत को गले लगाने वालों में सबसे ज्यादा 15 से 29 वर्ष उम्र आयु वर्ग के युवा है। आंकड़े बताते हैं, 2013 में इंदौर में आत्महत्या के 540 मामले हुए जो प्रदेश के सभी शहरों से अधिक है। 2012 में इंदौर में 434 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए हैं जबकि भोपाल में 384, ग्वालियर में 211 व जबलपुर में 304 आत्महत्याएं हुई है। इंदौर में आत्महत्या करने वाले 540 में से 284 मृतक 15-29 आयु वर्ग से है। इसमें पुरुष 156 व महिलाएं 128 है। 14 साल तक की उम्र वर्ग में 20 है जिसमें से 5 पुरुष व 15 महिलाएं है। 30 से 44 आयु वर्ग में 154 है जिसमें 111 पुरुष और 43 महिलाएं है।

अमित शाह : कद से बड़ा पद


*  हेमंत पाल 
  
  भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बनाया जाना महत्वपूर्ण घटना है। इसके अलावा संघ के दो प्रमुख नेताओं को भाजपा में भेजे जाने का महत्व भी समझना आवश्यक है। नितिन गडकरी को छोड़ दें तो भाजपा के इतिहास में अभी तक जितने भी अध्यक्ष हुए उनकी देश में या फिर संगठन के अंदर व्यापक राष्ट्रीय छवि थी। लालकृष्ण आडवाणी जनता के बीच काफी लोकप्रिय रहे। मुरली मनोहर जोशी हमेशा पार्टी का एक चेहरा रहे। कुशाभाऊ ठाकरे का संगठन के अंदर बड़ा कद था। वेंकैया नायडू की भी राष्ट्रीय पहचान बन चुकी थी। थोड़े समय के लिए अध्यक्ष बने जना कृष्णमूर्ति, बंगारू लक्ष्मण भी इसी श्रेणी में आते हैं। गडकरी को भी अध्यक्ष तब बनाया गया, जब पार्टी भारी संकट में थी। अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अपना इस्तीफा औपचारिक तौर पर पार्टी के सुपुर्द कर दिया था।
  अमित शाह का मामला इन सबसे अलग है। उनकी कोई राष्ट्रीय पहचान नहीं रही है। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद उन्हें केंद्रीय पदाधिकारियों की श्रेणी में लाया गया। उसके कई कारण थे, लेकिन कारक केवल मोदी थे। जाहिर है, अगर वह केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के अध्यक्ष बने हैं तो इसके व्यापक आयाम हैं। सामान्य निष्कर्ष यह है कि इस नियुक्ति के जरिए सरकार से संगठन तक मोदीकरण की प्रक्रिया का एक अहम फेज पूरा हो गया।
 संघ को सरकार के साथ ही पार्टी की भी चिंता है और इसी का ध्यान रखने हुए उसने अपने दो नेताओं को भेजा है जिन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिलनी है। यह संतुलन बनाने की कोशिश है। यह बात अलग है कि राम माधव मोदी के विश्वस्त रहे हैं। असली शक्ति भी अध्यक्ष के पास ही होती है। अमित शाह के अध्यक्ष होने का मतलब है मोदी की चाहत के अनुरूप बीजेपी की रीति-नीति निर्धारित होना।
 नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अमित शाह की अपनी कार्यक्षमता है और उसकी बदौलत वह यहां तक आए हैं, पर यह सच उन्हें भी मालूम है कि राष्ट्रीय राजनीति में राजनाथ सिंह उनको अपने आप नहीं लाए! यह मोदी की अनुशंसा थी। अमित शाह गुजरात में उनके सर्वाधिक विश्वसनीय सहयोगियों में रहे हैं और उन पर चल रहे मामलों के मद्देनजर उन्हें प्रदेश मंत्रिमंडल में लेने पर विवाद खड़ा होता। साथ ही जब तक मोदी केंद्रीय नेतृत्व मंडली में नहीं आए थे, भविष्य की रणनीति के अनुसार एक विश्वसनीय व्यक्ति यहां चाहिए था।
 भाजपा आज अपने सहयोगियों के साथ भारी बहुमत से सत्ता में हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। संसदीय लोकतंत्र में जहां पार्टी आधारित व्यवस्था है, वहां व्यवहार में पार्टियों का महत्व सरकार के समानांतर है। संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए पार्टी और सरकार के बीच शक्ति संतुलन अपरिहार्य है।
 नीतियां पार्टी की होती हैं, घोषणा पत्र पार्टी जारी करती है, जबकि वोट पार्टी और उसके उम्मीदवार को मिलता है। लेकिन, निर्णय की सारी शक्तियां सरकार के हाथों केंद्रित हो जाने के कारण पार्टी प्रायः परमुखापेक्षी अवस्था में आ जाती है। अगर अध्यक्ष चिंतनशील हो, आत्मविश्वासी और शक्तिसंपन्न हो तो समय-समय पर सरकार का मार्गदर्शन कर सकता है। सरकार कहीं गलत कर रही है या पार्टी की सोच से परे जा रही है तो वह उसके सामने खड़ा हो सकता है। ऐसे अध्यक्ष के रहते सरकार के मुखिया पार्टी को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
  सरकार की सफलता के लिए, पार्टी की साख और विश्वसनीयता के लिए तथा कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि अध्यक्ष के जरिए सरकार पर पार्टी का नैतिक और व्यावहारिक अंकुश बना रहे। प्रश्न है कि क्या अमित शाह ऐसी भूमिका निभाने में सफल हो सकते हैं, यह उनकी असली परीक्षा है। पार्टी में इस समय ऐसा कोई नेता नहीं दिख रहा था, जो पार्टी की किसी नीति से मतभेद होने पर मोदी के सामने डटकर खड़ा हो सके।
  अमित शाह तो उनके पूरक ही माने जाते हैं। संघ से आए नेता किस तरह पार्टी को वैचारिक आधार पर खड़ा रखेंगे यह देखना होगा! अमित शाह को अपना महत्वपूर्ण दायित्व समझना होगा और नरेंद्र मोदी को भी। अमित शाह की वैचारिक, सांगठनिक और प्रबंधन क्षमता की परख अभी होनी है। पार्टी कहती है कि व्यक्ति से बड़ा दल है और दल से बड़ा देश! तो यहां व्यक्ति मोह से ऊपर उठकर अगर वह काम कर पाते हैं और दल तथा देश को प्रमुखता देते हैं तो यकीनन ऐतिहासिक समय में ऐतिहासिक भूमिका निभा पाएंगे। यह पार्टी आधारित हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए भी अच्छा होगा। नहीं कर पाते हैं तो उनका जो होगा सो तो होगा ही, पार्टी भी 2004 की दुर्दशा को प्राप्त हो सकती है। संघ से आए नेताओं के पास भी गहरी दृष्टि है या नहीं, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।

Sunday, June 8, 2014

नरेंद्र मोदी : देश की उम्मीदों का शिखर

नरेंद्र मोदी के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी सुकून भरी नहीं है। यहाँ उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जो उम्मीदें उनसे लोगों ने लगा रखी है। मोदी पर पार्टी घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने का भी बड़ा दबाव होगा! वे अटलबिहारी वाजपेयी या कांग्रेस की तरह गठबंधन सरकारों की तरह मजबूरी का बहाना नहीं बना सकेंगे! इस बार भाजपा के चुनाव प्रचार का ध्येय वाक्य था 'अच्छे दिन आने वाले हैं।' इस एक वाक्य में ढेरों उम्मीदें भरी है। मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है इन्हीं उम्मीदों भरे सपनों को साकार करने की है। शायद किसी भी चुनाव के बाद किसी ने देश में बदलाव के इतने सपने नहीं देखे होंगे, जितने इस बार देखे गए! यदि ये सपने टूटते हैं तो भविष्य में भाजपा का कोई नाम लेवा नहीं होगा! नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से दबंग किस्म की राजनीति दिखाई है, उसमें जरा भी गड़बड़ हुई लोग पूछेंगे कि उन अच्छे दिनों का क्या हुआ? मोदी को सबसे ज्यादा आर्थिक मोर्चे पर सफल प्रदर्शन करके दिखाना होगा। इसलिए कि आर्थिक मोर्चे की सफलता से ही सारी सफलताओं तार जुड़े है!
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 - हेमंत पाल 
   देश के 16वें लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत अप्रत्याशित भी है और अभूतपूर्व भी! भाजपा ने अपना पूरा चुनावी कैंपेन विकास के नारे पर केंद्रित रखा और इसका सबूत दिया 'गुजरात का विकास मॉडल।' यही कारण था कि पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में भी विकास की ज़्यादा दावेदारी की। गुजरात में अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए सकारात्मक फैसलों और चुनाव प्रचार से उभरे नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व के आधार पर कहा जा सकता है कि इस समय मोदी जो तय कर देंगे, उसे कोई नकार नहीं पाएगा। इस समय वे देश की उम्मीदों के उत्तुंग शिखर पर विराजमान हैं। 
   सही मायने में इंदिरा गाँधी के बाद वे अकेले नेता हैं, जो अपने दम पर खुद को स्थापित करके पार्टी को सत्ता में लाने में कामयाब हुए हैं। उनकी सफलता को राजीव गाँधी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि राजीव की माँ की हत्या हुई थी और उसी सद्भावना के बल पर वे सत्ता में आए थे! जबकि, नरेंद्र मोदी ने सिर्फ मेहनत के बल पर और देश के लोगों के सामने उम्मीदें जगाकर सत्ता हांसिल की है। मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से की जा सकती है! वह भी 1980 वाली इंदिरा गाँधी नहीं जो हार के बाद आई थीं! बल्कि, 1971 वाली इंदिरा गाँधी से जो लगातार जीतती रही थीं। जिन्होंने 1966 में प्रधानमंत्री बनने के बाद 1967 का चुनाव जीता! भारी विरोध के बाद राष्ट्रपति अपनी मर्ज़ी का बनाया। कांग्रेस पार्टी को तोड़ा और अपनी रणनीति से फिर 1971 का चुनाव जीता! लेकिन, उसके बाद इंदिरा गाँधी राजनीतिक रूप से तानाशाह हो गई थीं! उस घटना को आज 4 दशक से ज्यादा वक़्त बीत चुका है। अब उस तरह की तानाशाही वाली राजनीति देश में संभव नहीं है। 
मंदी से उभरने की चुनौती
  दुनिया में आज आर्थिक हालात ऐसे नहीं है कि किसी देश की आर्थिक स्थिति में नाटकीय बदलाव लाया जा सके! मोदी ने भाजपा के घोषणापत्र में और अपने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि वे देश को 'मैन्यूफैक्चरिंग हब' बनाना चाहते हैं। लेकिन, मैन्यूफैक्चरिंग के लिए तकनीक और निवेश की ज़रूरत होती है! निवेश तब आता है जब निवेशक को यह लगता है कि मैं जो माल बनाऊंगा, वह बिकेगा! मैन्यूफैक्चरिंग भी दो तरह की होती है, प्रिसीज़न मैन्यूफैक्चरिंग और कंज्यूमर गुड्स मैन्यूफैक्चरिंग। प्रिसीज़न मैन्यफैक्चरिंग में यूरोप और अमरीका बहुत आगे हैं और इसके लिए बहुत उच्चस्तर की तकनीक चाहिए होती है, जिसमें भारत पीछे है। कंज्यूमर गुड्स मैन्यूफैक्चरिंग में चीन, वियतनाम, कंबोडिया और थाईलैंड जैसे देश आगे हैं। लेकिन, ऐसी मैन्यूफैक्चरिंग का माल यूरोप के बाज़ारों में खपता है, क्योंकि वो अमीर देश हैं। लेकिन इस समय वहां मंदी है। यूरोप में मंदी के कारण इस समय चीन का माल नहीं ख़रीदा जा रहा है। चीन की कंपनियां भी इस समय कम काम कर पा रही हैं। ऐसे में मोदी भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब कैसे बना पाएंगे?
महंगाई से मुकाबला 
   नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाना है। क्योंकि, 'अच्छे दिनों' का सही मतलब तो देश की जनता ने यही सोचकर लगाया है। किन्तु, सवाल यह है कि महंगाई जिस हाल में है, उसका मोदी कैसे उद्धार करेंगे? महंगाई का सबसे बड़ा कारण डीज़ल-पेट्रोल के दामों पर सरकार का कोई अंकुश न होना है। इनके दाम अन्तराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव से तय होते हैं। इनसे मोदी कैसे पार पाएंगे? महंगाई और विकास को साध कर रखना कुछ ऐसा है, जैसे कोई कलाबाज रस्सी पर चल रहा होता है! महंगाई अगर बढ़ती है तो ब्याज दरों पर कंट्रोल रखना पड़ता है जिससे विकास की दर धीमी हो जाती है और रोजगार घटते जाते हैं। पिछले पांच साल में देश इस जंजाल से निकल नहीं पाया है! निवृतमान वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने विकास दर 6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था! लेकिन, मौजूदा हालत ये है कि विकास दर 5 फीसदी से नीचे बनी है। लेकिन, जनता के लिए विकास के मायने दर नहीं, बल्कि बेरोजगारों को नौकरी मिलना और वेतन बढ़ना है। मोदी सरकार को रोजगार बढ़ाने के लिए नए कदम उठाने होंगे, तभी कुछ बात बनेगी। 
आर्थिक विकास 
   बड़ा सवाल देश की आर्थिक विकास की दर का है. इस समय अर्थव्यवस्था की दर करीब 4.5 प्रतिशत है। इसे मोदी कितना बढ़ा पाएंगे, वो इसे 5 प्रतिशत या ६ प्रतिशत, आख़िर कितना कर पाएंगे! देश की सरकार ने पिछले कुछ सालों में कमाई के मुकाबले अपने खर्चे ज्यादा बढ़ाए हैं। इस बार वित्तीय घाटा जीडीपी के 4.5 फीसदी तक रखने में सरकार ने कामयाबी पाई है। वित्तीय घाटा सरकार की कमाई और खर्चे के बीच का फर्क है। साल 2012-13 में ये 4.9 फीसदी था, जिसे घटाकर 4.5 तक लाया गया! इस बार इसकी वजह रही सरकारी खर्चो को कम करना और स्पैक्ट्रम की बिक्री से पैसे बनाना है। जो रोडमैप तैयार किया गया है, उसके मुताबिक साल 2014-15 में ये घाटा 4.2 फीसदी और 2015-16 में इसे 3.6 फीसदी तक लाया जाना है! यानी नई सरकार का हाथ पहले से ही तंग रहेगा और खर्चे घटाने का दवाब भी उस पर बना रहेगा! 
आयात-निर्यात घाटा
  देश की अर्थव्यवस्था को सुधारना है तो 'करंट एकाउंट डेफिसिट' (यानी आयात-निर्यात घाटा) कम करना होगा। अर्थव्यवस्था के साथ दिक्कत ये है कि आयात हम ज्यादा करते हैं और निर्यात कम! यानी ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं और आते कम हैं। नतीजा होता है रुपए और हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। इसमें सुधार करके ही देश को तरक्की की तरफ बढ़ाया जा सकता है! भारत कच्चा तेल बाहर से मंगाता है, सोना मंगाता है, खाने का तेल और दाल बाहर से मंगाता है और ऐसे में किसी भी सरकार के लिए इस समस्या को सुलझाना आसान नहीं है!
अर्थव्यवस्था 
   मोदी सरकार ये नहीं कह सकती कि मुझे अर्थव्यवस्था बहुत बुरी हालत में मिली है। लेकिन, लोग इंतज़ार के मूड में नहीं लगते! जिस तरह की उम्मीदें लोगों ने लगाई है  मुताबिक वे अपनी समस्याओं से फौरन निजात चाहते हैं। मोदी के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होने जा रही है। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने भी नई सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को अहम चुनौती माना है! मानसून के औसत से कम रहने का अनुमान मौसम विभाग पहले ही दे चुका है. अगर मानसून का मिजाज बिगड़ता है तो नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था के दरकने की होगी! 
भ्रष्टाचार से मुकाबला कैसे?
  लोगो ने चुनाव प्रचार के दौरान मोदी के 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' नारे को सबसे ज्यादा तरजीह दी थी। देश में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना भी है। लेकिन, भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार क्या कदम उठाएगी? सिर्फ कदम उठाना नहीं आम जनता के लिए रोजमर्रा के भ्रष्टाचार जैसे पुलिस या राशन कार्ड बनवाने को कैसे रोक पाएगी? इस पर नकेल नहीं कसी गई, तो 'अच्छे दिनों' के नारे का क्या होगा?
कालाधन पर लगाम कैसे 
  भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में काला धन बड़ा मुद्दा था। भाजपा के समर्थन में बाबा रामदेव ने भी गांव-गांव जाकर बताया कि काला धन आ गया तो हर शख्स करोड़ों का मालिक बन जाएगा! तब ये महज एक चुनावी मुद्दा था, पर अब ये काला धन बड़ा मुद्दा बन चुका है! अब विदेशी बैंकों में कितना काला धन जमा है ये कहना मुश्किल है, लेकिन मोदी-सरकार के लिए कदम उठाना बड़ी चुनौती होगी!
सामाजिक विषमता 
    देश के उद्योगपतियों के पास हजारों करोड़ की संपत्ति है। जबकि, गरीबों के पास दो वक्त का पेट भरने के लिए अनाज भी नहीं! जिस देश में गरीबी रेखा 32 और 28 रुपए के खर्च पर तय होती हो, उस देश में नई सरकार के फैसलों पर सबकी नजर होगी! मोदी के सामने चुनौती होगी कि वे कैसे उद्योगपतियों की तिजोरी में जमा होती रकम गरीब जनता तक पहुंचाएंगे! तत्काल तो मोदी ऐसा कोई चमत्कार कर नहीं पाएंगे! बड़े उद्योगपति हमेशा मोदी की तारीफ करते रहे हैं। वे जानते हैं कि मोदी के राज में गुजरात में उनका फायदा हुआ है, इन्हीं नीतियों के साथ मोदी गरीबों का भला कैसे कर पाएंगे! यदि नहीं कर पाए तो लोगों के सरकार को लेकर देखे गए सपने भी टूट जाएंगे! 
विवादित मुद्दे  
  भाजपा ने 1980 के दशक में अपने शुरुआती दिनों में चंद विवादित मुद्दे उठाए थे! ये मुद्दे हिंदुत्व के एजेंडे से सीधे जुड़े हुए थे! उस समय उनके तीन बड़े मुद्दे थे, अयोध्या में राम मंदिर बनाना, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म करना और देश में एक कॉमन सिविल कोड बनाना! देश में 1996 में जब पहली बार भाजपा की सरकार बनी थी, पर 13 दिनों में ही गिर गई थी! उस समय प्रधानमंत्री बने थे अटलबिहारी वाजपेयी जिन्होंने कहा था कि हम इन तीनों मुद्दों को अभी किनारे पर रख रहे हैं। तब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा था कि हमारी गठबंधन सरकार है, इसलिए जब भाजपा कभी अपने दम पर सत्ता में आएगी, तब हम इन मुद्दों को देखेंगे! या फिर जब सभी गठबंधन दलों की एक राय बनेगी, तब हम इसे दोबारा उठाएंगे! वाजपेयी के ही नेतृत्व में भाजपा 1998 में 13 महीनों के लिए और 1999 में लगभग साढ़े 4 साल तक सत्ता में रही, लेकिन दोनों ही बार उसकी गठबंधन सरकार थी। अब पहली बार भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत से केंद्र में आई है। ऐसा बहुमत पिछले 30 साल में किसी पार्टी को नहीं मिला! सवाल है कि अब क्या भाजपा फिर इन मुद्दों को सामने लाएगी? 
कॉमन सिविल कोड
  देश के करीब 18 करोड़ मुसलमानों में कॉमन सिविल कोड को लेकर संशय बरकरार है! वहीं अनुच्छेद 370 का मामला बहुत पैचीदा है। क़रीब 25 साल से कश्मीर में सेना तैनात है। भारतीय उपमहाद्वीप में अमन न होने के पीछे एक बड़ा कारण कश्मीर का मुद्दा है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच फंसा हुआ है!
राम मंदिर का सवाल  
  तीसरा और सांसे अहम मुद्दा है अयोध्या में राम मंदिर बनाने का! यह मुद्दा राजनीतिक रूप से तो क़रीब समाप्त हो चुका है। लेकिन, संशय बरकरार कि क्या पूर्ण बहुमत लेकर सत्ता में आई भाजपा में पाने मातृ संस्था 'आरएसएस'  मंदिर मुद्दे को किनारे करने का होगा?
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जमीन से उखड़ने लगी, आम आदमियों की पार्टी?

आम आदमी पार्टी (आप) के साथ दिक्कत यह है कि उसका छोटा-सा जीवनकाल उसके अराजनीतिक निर्णयों से ज़्यादा ही भर गया! नए राजनीतिक माहौल में इसे जनता कितना पसंद करेगी, ये कहना मुश्किल है। 'आप' को भी इसे लेकर अब उतना निश्चिंत नहीं रहना चाहिए, जितना वह छः महीने पहले थी। मानहानि मामले में अरविंद केजरीवाल के जमानत न लेकर जेल जाने के फैसले पर तिहाड़ के सामने जनता का उतना हुजूम उमड़ नहीं पड़ा, जितना उन्होंने सोचा था! राजनीतिक कार्रवाई का ये मौक़ा उन्हें हीरो नहीं बना सका! टेलीविज़न चैनलों की वैन्स वहाँ नहीं जमी! वे अखबारों के पहले पन्नों पर भी दिखाई नहीं दिए। दिसंबर-जनवरी के मुकाबले दिल्ली और देश का मौसम आज काफ़ी बदल चुका है! लेकिन, अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी यह भाँपने से चूक गई। 
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  - हेमंत पाल 
  राजनीति में सक्रियता भी उतनी ही जरुरी है, जितनी भविष्य की रणनीति! इसलिए कि जो दल राजनीतिक दल हलचल करता दिखाई न दे वो लोगों की नजरों से उतर जाता है। महज छह महीने पहले बनी 'आम आदमी पार्टी' उर्फ़ आप को निष्क्रिय तो जा सकता, पर उसकी सक्रियता और ऊर्जा निरर्थक राजनीतिक कामों में ज्यादा खर्च हो रही है, जिससे जनता का कोई लेना-देना नहीं! 'आप' के नेता बात-बात में आंदोलन करने पर उतर आते हैं! यहाँ तक कि आंदोलन करने की सनक में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक को गंवाने से नहीं चूकते, लेकिन जनता ये नहीं चाहती! पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों का हश्र इसका सबसे अच्छा नमूना है। कांग्रेस की निष्क्रियता को भी इसी तरह से उपजी पराजय से जोड़कर देखा जा सकता है, जिसने सत्ता के गुरुर में लोगों को हाशिए पर रख दिया था। 
 देश की शांत पड़ी राजनीति के पानी में 'आप' ने पत्थर मारकर हलचल जरूर पैदा कर दी, लेकिन उस हलचल को सकारात्मक तरीके से भुना नहीं पाई। जनता को अपने फैसलों में शामिल करके उन्होंने राजनीति की एक नई परिपाटी को जन्म भी दिया! उन्होंने राजनीति को पार्टी दफ्तरों के बन्द कमरों से बाहर लाकर गली-मोहल्ले की कार्रवाई बना दिया था। नौजवान चेहरों की बहुतायत ने भी ताज़गी और नएपन का अहसास कराया! जनता के उन तबकों में इसका सबसे ज़्यादा स्वागत हुआ, जिनके लिए पिछली सरकार ने सबसे अधिक कल्याणकारी योजनाएँ बनाई थीं। अरविंद केजरीवाल की पिछली सफलता का एक कारण यह भी था कि उनका सामना करने के लिए कोई राजनीतिक संगठन नहीं था! किन्तु, अब हालात बदल चुके हैं और केंद्र में एक ज्यादा मजबूत सरकार आ गई है। 
अभी दौड़ से बाहर नहीं!
 बनारस में नरेंद्र मोदी के सामने मुस्लिम वोटर्स ने भी अरविंद केजरीवाल को हाथों हाथ लिया! संसद में भी चार सदस्यों के साथ पार्टी का पहला क़दम बुरी शुरुआत नहीं कही सकती! दिल्ली में भी वह हर सीट पर दूसरे स्थान पर रही है। इसका मतलब ये लगाया जाना चाहिए कि अभी वह राजनीतिक प्रतियोगिता से बाहर नहीं हुई है! लेकिन, क्या 'आप' में जन आकांक्षाओं को संभालने की समझ और रणनीति है? यह सवाल उससे सहानुभूति रखने वालों के दिमाग में सबसे ज्यादा कौंध रहा है! क्या वह बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का अर्थ और गंभीरता समझ पा रही है? उसके सामने कांग्रेस की तरह हिम्मत और साख गवां चुके शासक नहीं है। आम आदमी पार्टी अब भी संभावनाशील राजनीतिक शक्ति है। उसका भविष्य उसकी कल्पनाशीलता और जीवट पर टिका हुआ है। उसके फैसलों की असामान्यता और अप्रत्याशितता ही अब तक उसे अन्य से अलग करती नजर आई है। इन्हें छोड़े बिना गंभीर राजनीतिक विकल्प का भरोसा बनने की चुनौती अब भी उसके सामने है। 
  जब तक कांग्रेस 'आप' का मुख्य निशाना थी, उसका साथ देने में उनकी दिलचस्पी थी। अब ऐसे हालात नहीं है। शायद यही कारण हैं कि जब लोकसभा चुनाव के बाद 'आप' ने दिल्ली में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से समर्थन माँगा, तो कांग्रेस मुकर गई। भ्रष्टाचार की जगह स्थिरता, अब सबकी जुबान पर है। केंद्र की नई सरकार के किसी नेता को भ्रष्ट ठहराना 'आप' के लिए अभी बहुत मुश्किल होगा। अरविंद केजरीवाल के कई बड़े सहयोगी भी उनका साथ छोड़ चुके है। कांग्रेस की अराजकता और दिशाहीनता के चलते उसे उखाड़ देना मुमकिन था! कांग्रेस सरकार की रक्षा के लिए उसका कोई जनाधार भी मौजूद नहीं था, जैसा कि भाजपा के पास अपनी सरकार की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसा प्रतिबद्ध संगठन है। इस संगठन की दिलचस्पी अपनी सरकार के पाँव जमाने में और  हमलावर मुद्रा में भी है। 
  आम आदमी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती तेजी से बदल रहे राजनीतिक परिदृश्य को ठीक से समझने और उसमें अपनी भूमिका तय करने की है। पर, क्या ऐसा करने के लिए उसके पास पर्याप्त बौद्धिक क्षमता और राजनीतिक समझ है? अब ख़तरा इस बात का भी बढ़ गया है कि अरविंद केजरीवाल को हुड़दंगियों का एक गैरजिम्मेदार नेता घोषित कर दिया जाए! केजरीवाल को अब सक्रियता के साथ उसे बौद्धिक स्थिरता और दृढ़ता का सन्देश भी देना ही होगा। जहाँ तक लोकतंत्र के सम्मान की बात है तो 'आप' अभी भी राजनीतिक दलों की पुरानी संस्कृति का ही अनुकरण करती दिखाई दे रही है! उस पर एक छोटे से उद्दंड गुट का कब्ज़ा है। उसके 'बड़े' कहे जाने वाले नेता भी सड़क छाप राजनीतिक सोच से आगे नहीं बढ़ पाए! इस सबसे उसे निजात पाना होगा!
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मध्यप्रदेश कांग्रेस : कमलनाथ और सिंधिया ने बचाई लाज

- हेमंत पाल 
   कांग्रेस को मध्य प्रदेश में किसी चमत्कार की उम्मीद तो नहीं थी, पर इस बात का भरोसा जरूर था कि लोकसभा चुनाव में वे 6 से 8 सीटें जीत जाएंगे! लेकिन, जब नतीजे आए तो मध्यप्रदेश में कांग्रेस को करारी हार झेलना पड़ी। पार्टी के दो ही दिग्गज कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ऐसे रहे, जो पार्टी की लाज बचाने में सफल रहे। इस बात का अंदाजा कांग्रेस को विधानसभा चुनाव के नतीजों से ही हो गया था। इसमें बावजूद पार्टी ने चुनाव के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई। विधानसभा में करारी हार के बाद भी गुटबाजी और अहं कांग्रेस के नेताओं में चरम पर था।  
  उत्तर भारत के अन्य राज्यों की ही तरह मध्य प्रदेश में भी नरेंद्र मोदी और भाजपा की आँधी लहर के सामने कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 12 सीटों पर जीत दर्ज करके अच्छा प्रदर्शन किया था। पार्टी के बड़े नेता दिग्विजय सिंह से लेकर कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया यह भरोसा जताते रहे कि इस बार के नतीजे भी बेहतर ही होंगे, मगर ऐसा नहीं हुआ!  
  प्रदेश की 29 में से 27 संसदीय सीटें भाजपा के खाते में गई। सिर्फ 2 संसदीय सीटें छिंदवाड़ा और गुना कांग्रेस के खाते में गए! छिंदवाड़ा से कमलनाथ जीते, तो गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जीत दर्ज की। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया, राहुल गांधी टीम की मीनाक्षी नटराजन जैसे अपनी सीट नहीं बचा पाए! छिंदवाड़ा से कमलनाथ और गुना से सिंधिया ने एक-एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की है। इस जीत से कांग्रेस को काफी हद तक राहत भी मिली! क्योंकि, हर तरफ से आ रही हार की खबरों के बीच इन दो क्षेत्रों से जीत की खबर आई! 
 भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा चुनाव की शुरुआत से ही कह रहे थे कि गुना और छिंदवाड़ा में ही भाजपा व कांग्रेस के बीच मुकाबला है। उनकी यह बात सही निकली। नतीजे आने के बाद वे कुछ कमी रह जाने की बात स्वीकार रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भाजपा को 27 सीटों पर मिली जीत का श्रेय जनता को देते हुए कहा कि ये विश्वास की जीत है। अब राज्य के साथ पक्षपात नहीं होगा। कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार लगातार राज्य के साथ पक्षपात करती रही अब ऐसा नहीं होगा और राज्य तेजी से प्रगति करेगा। कमलनाथ ने कांग्रेस की हार के कारण जनहित में किए गए कार्य और योजनाओं को जनसामान्य तक नहीं पहुंचाना बताया। उन्होंने कहा कि बीते 10 वर्षो में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने जनसामान्य का जीवन स्तर बदलने के लिए कई योजनाएं चलाईं मगर उनका प्रचार ठीक से नहीं हो सका। पहले विधानसभा चुनाव में और अब लोकसभा चुनाव में मिली पराजय ने कांग्रेस के सामने सवाल खड़े कर दिए हैं कि आने वाले समय में वह राज्य में होने वाले नगरीय निकाय और पंचायतों के चुनाव में मुकाबला कर भी पाएगी या नहीं, ये कहना मुश्किल है। 
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