Sunday, March 8, 2015

विनोद मेहता : एक जिद्दी पत्रकार का चुपके से चले जाना!

 - हेमंत पाल 

  विनोद मेहता की पत्रकारिता जगत में सफलता को इस एक बात से याद किया जाएगा कि उन्होंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ऐसी पत्रिका (डेबोनियर) से की थी, जिसे लोग छुपाकर पढ़ते थे। क्योंकि, वो पत्रिका खुलेआम पढ़ना सामाजिक रूप से वर्जित था। लेकिन, जब वे इस दुनिया से गए तो उस पत्रिका (आउटलुक) से जुड़े थे, जिसे पढ़ना पाठक के बौद्धिक होने की निशानी है! 
  इन दिनों पत्रकारिता की जो हालत है, उसमें समझौतावादियों की भरमार है। लेकिन, विनोद मेहता उस शख्स का नाम था, जिसने अपने काम में कभी समझौता नहीं किया! उनके बारे में कहा जाता रहा है कि वे जब किसी मीडिया संस्थान से जुड़ते थे, तो ये बात साफ़ कर लेते थे कि संस्थान के मालिक का उनके काम में कोई दखल नहीं होगा! यही कारण है कि उन्होंने जो भी अखबार या पत्रिका की नीवं डाली, उसमें लम्बे समय तक काम नहीं किया! 'आउटलुक' शायद अकेली पत्रिका है, जिसमें विनोद मेहता इतने लम्बे समय तक रहे।   
  विनोद मेहता का जन्म आजादी से पहले 1942 में रावलपिंडी में हुआ था! बचपन लखनऊ में बीता। तीसरी श्रेणी में बीए करने के बाद वे नौकरी की तलाश में इंग्लैंड चले गए। वहां उन्होंने ऐसी फैक्ट्री में काम किया जहां मशीन के सहारे लोहे की छड़ों को काटा जाता था। इंग्लैंड में वे आठ साल रहे और कई तरह के काम भी किए। फिर वे आठ साल इंग्लैंड में रहने के बाद वे बिना किसी मकसद के वापस लखनऊ लौट आए! फिर मुंबई पहुंचे, लेकिन तय नहीं था कि क्या करना है! पत्रकारिता में उनकी कोई रूचि नहीं थी, पर लिखने का लगाव जरूर था। इसी दौरान उन्होंने अभिनेत्री मीना कुमारी की जीवनी लिख डाली! 
  उन दिनों बंबई (अब मुंबई) से एक अंग्रेजी पत्रिका डेबोनियर निकलती थी! जिसकी शुरुआत एक प्रिंटिंग प्रेस संचालक सुशील सोमानी ने की थी! ये वयस्क पत्रिका थी, जिसमें मॉडल्स के अर्धनग्न चित्र छपते थे। सामान्यतः इसे बेडरूम पत्रिका समझा जाता था और लोग इसे छुपाकर पढ़ते थे। पर, 1973 में निकली ये पत्रिका चली नहीं! पत्रिका बंद होने की स्थिति में थी, तभी विनोद मेहता को जानकारी मिली। उन्होंने सुशील सोमानी से संपर्क किया कि मुझे ये पत्रिका सौंप दें, मैं इसे बंद नहीं होने दूंगा। सोमानी ने भी सोचा कि पत्रिका बंद तो करना ही है, ये प्रयोग भी कर लिया जाए! उन्होंने विनोद मेहता को 'डेबोनियर' का एडीटर बना दिया! ये विनोद मेहता का पत्रकारिता में पहला कदम था। उन्होंने 'डेबोनियर' की मूल सामग्री को बरक़रार रखते हुए, उसमें बौद्धिक सामग्री और एक बड़ा इंटरव्यू भी छापना शुरू किया! उन्होंने पत्रिका को जमाने में मेहनत की! 
  उन्होंने साप्ताहिक अखबार 'द संडे आब्जर्वर' को शुरू किया। इसके बाद 'इंडियन पोस्ट' और 'इंडिपेंडेंट' जैसे अखबारों को संभाला। 'पायनियर' के दिल्ली संस्करण की शुरुआत की और इन सबके बाद डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक 'आउटलुक' समेत समूह की दस पत्रिकाओं के संपादन का दायित्व संभाला! 'आउटलुक' का उनका सफर बेहद चमकदार और कामयाब रहा। विनोद मेहता ने इस पत्रिका को हमेशा भीड़ से अलग रखने की कोशिश की और इसमें सफल भी रहे! खबरों की दुनिया में उनके प्रयोग की जद्दोजहद ने कई लोगों को प्रेरित किया। आईपीएल क्रिकेट मैच के फिक्सिंग की खबर हो, अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच टकराव की खबर हो या फिर टूजी-घोटाले से जुड़े राडिया टेप के दस्तावेज को प्रकाशित करने का मामला! इन खबरों को उन्होंने बिना किसी दबाव के छापा! सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार को बेनकाब करने वाली ख़बरों को छापना किसी भी संस्थान के लिए कितना मुश्किल होता होगा? 
  धमाकेदार ख़बरों को छापने के बावजूद विनोद मेहता ने कभी भंडाफोड टाइप की पत्रकारिता नहीं की! 'आउटलुक' में जो भी छपता था, बतौर खबर ही उसका ट्रीटमेंट होता रहा! उन्होंने कभी अपने खबरखोजियों को अकेला नहीं छोड़ा! जैसा कि अमूमन अखबार की दुनिया में होता है! वे हमेशा अपने रिपोर्टर्स के साथ खड़े होते थे। उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ भी कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने जो भी अखबार और पत्रिकाएं शुरू की, वे उनके छोड़ने के बाद नहीं चले! जो इस बात की निशानी है कि उनके अलावा कोई भी उन्हें सफलता से नहीं चला सका! 
  बतौर पत्रकार और संपादक विनोद मेहता का करियर कामयाब रहा! उनके द्वारा संपादित अखबारों और पत्रिकाओं ने अपने अलग कंटेंट से पहचान भी बनाई। लेकिन, इस सफलता के पीछे सिर्फ और सिर्फ उनका संघर्ष और चुनौतियों से जूझने की क्षमता ही थी! विनोद मेहता ने इसका दिलचस्प विवरण अपनी आत्मकथा 'लखनऊ ब्वॉय ए मेमोयार' में किया है। जिसका विस्तार उनकी दूसरी पुस्तर 'एडीटर अनप्लगड' में भी नजर आया है। आज विनोद मेहता  नहीं है, पर लखनऊ का ये जिद्दी पत्रकार बहुत याद आएगा!
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Tuesday, February 10, 2015

अराजनीतिकों की जीत के राजनीतिक मायने!

- हेमंत पाल 

   दिल्ली में जो हुआ, शायद अब उसके कसीदे पढ़ने की जरुरत नहीं बची! दंभ के दावों के सामने अराजनीतिक लोगों की 'आम आदमी पार्टी' ने जो प्रदर्शन किया है, उसकी मिसाल नहीं दी जा सकती! बरसों पहले (1989 में) इसी तरह का करिश्मा विश्वनाथ प्रताप सिंह उर्फ़ राजा मांडा ने राजीव गांधी की कांग्रेस को हराकर किया था। तब कांग्रेस को भी कुछ इसी तरह का जनसमर्थन मिला था, जिसे पांच साल बाद 'राजा मांडा' ने उखाड फैंका! अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को धूल चटाकर कुछ ऐसा ही कारनामा किया है!  
  सरकारी नौकरी से अन्ना हज़ारे के साथ समाजसेवा में आए अरविंद केजरीवाल का राजनीति में आना किसी हादसे से कम नहीं रहा! 'जनलोकपाल' की मांग के बहाने अन्ना और किरण बेदी के साथ परिदृश्य में आए केजरीवाल तब अकेले पड़ गए थे, जब असफल आंदोलन के बाद अन्ना रालेगण सिद्धी लौट गए थे! अन्ना आंदोलन के 'थिंक टैंक' माने जाने वाले केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला किया और अक्टूबर 2012 में 'आम आदमी पार्टी' बनाई! 'आप' ने जनता के सरोकारों को चुनाव के मु्द्दे की तरह उठाया और वोट की राजनीति में कदम रखा। अन्ना हजारे इस तरह की किसी पार्टी बनाने के खिलाफ थे! इसी विरोध को लेकर वे अरविंद केजरीवाल से नाराज होकर अलग भी हो गए थे। किन्तु, केजरीवाल के साथियों ने भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के संकल्प के साथ जनता के बीच जाने का फैसला किया, जिसका नतीजा आज सामने है। 
  अपने दूसरे बड़े चुनाव में 'आम आदमी पार्टी' ने दिल्ली की राजनीति में धमाका कर दिया! 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा के चुनाव में पिछली बार 28 सीटें जीतने वाली पार्टी ने इस बार 67 सीटें जीतकर न सिर्फ दिल्ली बल्कि, देश की राजनीति में सभी को चौंका दिया! उनकी इस जीत ने राष्ट्रीय राजनीति की भी दशा और दिशा बदलने का संदेश दे दिया। 'आप' की इस अप्रत्याशित सफलता से कांग्रेस और भाजपा की रातों की नींद हराम हो गई! अहंकार से भरी भाजपा ने दिल्ली चुनाव में राजनीतिक मर्यादा की सीमाओं को जिस तरह लांघा, उसे दिल्लीवालों ने पसंद नहीं किया। नतीजा ये रहा कि आप की 'झाड़ू' ने भाजपा के 'कमल' को झाड़ दिया! 
  इस बात से इंकार नहीं कि केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' दिल्ली के आम लोगों का भरोसा जीतने में पूरी तरह कामयाब रही है। सरकारी भ्रष्टाचार, महंगाई, बिजली, पानी, शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर केजरीवाल की पार्टी के प्रति दिल्ली के मतदाताओं ने जो समर्थन दिखाया, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह किसी पार्टी की नहीं बल्कि आम आदमी की जीत है! लेकिन, अब केजरीवाल को उन वादों को भी पूरा करना है, जिसे लेकर दिल्ली की जनता ने उनमे विश्वास जताया है।  
  देश की जनता भ्रष्टाचार और मंहगाई से बुरी तरह परेशान है। पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा ने लोगों को इससे मुक्त करने का विश्वास दिलाया, पर कोई भी भरोसे पर खरा नहीं उतरा! पिछली बार 8 दिसंबर 2013 को आए चुनावी नतीजों में दिल्ली में 15 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस की सरकार का सूपड़ा साफ कर दिया था। उसे 70 में सिर्फ 8 सीटों पर ही कामयाबी मिली थी। दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी केजरीवाल से हार गई थी। इस बार फिर वही इतिहास दोहराया गया! केंद्र की सत्ता में आसमान फाड़ जीत के साथ काबिज हुई भाजपा को फिर 'आप' ने धूल चटा दी! राजनीतिक मायनों में ये हार किसी सबक से कम नहीं है! 70 में से महज 3 सीटें भाजपा के खाते में गई और 67 पर 'आप' जीती!  
  हार-जीत से अलग अब भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि दिल्ली में 'आप' अपनी सरकार जिस तरह चलाएगी, उससे भाजपा के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी होंगी! 'जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार' जो फैसले लेगी, उससे नया राजनीतिक संकट खड़ा होना तय है। अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सरकार चलाने के साथ जिस तरह के लोकप्रिय फैसले लेंगे, उससे भाजपा शासित सरकारों के सामने नई-नई परेशानी आना पक्का है। शक नहीं कि केजरीवाल जनहितकारी फैसले लेने से नहीं चूकेंगे! उनके अराजनीतिक फैसलों का असर भाजपा की राजनीति पर पड़ना। 
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दिल्ली में क्या इसलिए हारी बीजेपी!

दिल्ली में बीजेपी की बुरी तरह हार संगठन और सरकार के सोच में कई तरह के सुधार का संकेत दे रही है।
(1) बीजेपी को कोई हरा नहीं सकता, ये मुगालता और अहंकार दूर हो जाना चाहिए। 
(2) नरेंद्र मोदी पूरे के देश के निर्विवाद नेता हैं, ऐसे जुमलों पर गंभीरता से विचार हो! 
(3) लोकसभा चुनाव हारे अरुण जेटली ने दिल्ली में भी पार्टी को हरवा दिया, उन्हें पार्टी में कितनी हैसियत दी जाए?
(4) केंद्र सरकार का प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून क्या सही है? 
(5) बीजेपी के पुराने नेताओं को तवज्जो दी जाए, न कि किरण बेदी जैसे मौका परस्त रिटायर अफसरों को!
(6) पार्टी के हिंदूवादी नेताओं के मुँह के बवासीर का तत्काल इलाज किया जाए!
(7) गैर-बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने की राजनीति बंद हो!
(8) अति-आत्मविश्वास और वाचालता वाले बोलों पर अंकुश लगे!
(9) देश सिर्फ आर्थिक नीतियों और देशाटन से नहीं चलता, इस पर सोचा जाना चाहिए!
(10) विपक्ष से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो और नकारात्मक चुनाव प्रचार बंद हो!

Thursday, January 1, 2015

अलविदा 2014 : 'किक' और 'पीके' से संभला बड़ा परदा!

* हेमंत पाल 
 हिंदी फिल्मों की सफलता के लिहाज से साल 2014 को बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता! कुछ फिल्मों ने जरूर बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया, लेकिन ज्यादातर फिल्में फ्लॉप ही रहीं। बीते साल (2014) करीब 180 फिल्मों में रिलीज हुईं। इनमें से सिर्फ 8-10 फिल्में ही 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर सकीं। जबकि, सलमान खान की 'किक' और आमिर की 'पीके' ही ऐसी फिल्म रही, जिन्होंने 200 करोड़ का कारोबार किया! 
  'किक' और पीके' के अलावा 2014 में टाइगर श्रॉफ की हीरोपंती, सिद्धार्थ मल्होत्रा की एक विलेन, वरुण धवन की मैं तेरा हीरो, आलिया की 'हाई-वे' चेतन भगत के नॉवेल पर बानी 2-स्टेट्स, सिंघम रिटर्न्स, हॉलीडे, जय हो और बैंग-बैंग ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता दर्ज की! इन फिल्मों ने न केवल लागत वसूली, बल्कि मुनाफा भी जमकर कमाया! 
  लेकिन, कारोबार के नजरिए से देखा जाए तो 2014 साल की पहली छमाही दूसरी के मुकाबले बॉलीवुड के लिए ज्यादा अच्छी थी! दूसरी छमाही में रिलीज होने वाली ज्यादातर फिल्में कुछ खास नहीं कर सकीं। बॉलीवुड बिजनेस पर नजर रखने वाले समीक्षकों ने 2014 को कारोबारी सफलता के हिसाब से 'औसत साल' करार देते हुए कहा कि 2014 की शुरुआत बढ़िया थी, लेकिन अंत में गिरावट आ गई! साल में सबसे ख़राब महीना नवंबर रहा, जो कई सालों बाद आया! नवंबर में 'द शौकीन्स' और 'किल दिल' जैसी कई फिल्में आईं और सभी पिट गईं। 2014 के नवंबर में बॉलीवुड को इतना नुकसान होगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी! यहां तक कि 'एक्शन जैक्सन' जैसी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई! 
    अगस्त मध्य तक करीब 120 फिल्में रिलीज हुईं, जिनकी बदौलत बॉक्स ऑफिस ने 1,400 करोड़ रुपए की कमाई की! साजिद नाडियाडवाला निर्देशित 'किक' तब पैसा कमाने वाली पहली फिल्म थी, जिसने 233 करोड़ रुपए कमाए! 'किक' 2014 की सबसे बड़ी फिल्म  थी, जिसे आमिर की 'पीके' ने पीछे छोड़ा! कारोबार के नजरिए से खस्ताहाल रहे इस साल में बॉक्स ऑफिस के लिए सिर्फ 8-10 फिल्में राहत लेकर आईं! इनमें 'जय हो' (करीब 110 करोड़ रुपए), 'हॉली-डे : ए सोल्जर इज नेवर ऑफ ड्यूटी' (110 करोड़), '2 स्टेट्स' (105 करोड़), 'किक' (200 करोड़ से अधिक), 'बैंग बैंग' (145 करोड़), 'हैप्पी न्यू ईयर' (188 करोड़), 'सिंघम रिट्नर्स' (140 करोड़ रुपए) और 'पीके' (200 करोड़ से ज्यादा) शामिल हैं। 'एक विलेन' (96 करोड़) और 'हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया' (86 करोड़) ने भी बॉलीवुड को थोड़ी राहत दी!
 शाहरुख खान की फिल्म 'हैप्पी न्यू ईयर' ने दीवाली के दिन रिलीज होकर पहले ही दिन 44.97 करोड़ का बिजनेस करके अब तक की लगभग सभी फिल्मों और सुपस्टार्स को पीछे छोड़ा। इससे पहले सलमान खान की ईद पर रिलीज हुई फिल्म 'किक' ने जबरदस्त कमाई करके बड़ी हिट फिल्म का खिताब हांसिल किया, जिसे साल  में 'पीके' पछाड़ा! दिवाली के समय हर किसी की आंखें शाहरुख खान की 'हैप्पी न्यू ईयर' पर ही टिकी हुई थी कि ये फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म का टैग जीत पाती है या नहीं। आखिरकार 'हैप्पी न्यू ईयर' ने लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पहले दिन तो रिकॉर्ड तोड़ कमाई की, उसके बाद भी उन्होंने दूसरे व तीसरे दिन भी बॉक्स ऑफिस पर अपनी पकड़ हल्की नहीं पड़ने दी। 

लागत के हिसाब से साल की हिट फ़िल्में
* किक - लागत 115 करोड़ कमाई 233 करोड़
* हॉलिडे - लागत 56 करोड़ कमाई 112.65 करोड़
2014​ की लीक से हटकर बनी कुछ फ़िल्में ​
  2014 साल कुछ ऐसी फिल्मों के भी नाम रहा, जो कई मोर्चों पर बॉलीवुड की लोकप्रिय धारा में लीक से हटकर साबित हुईं! इनमें 'हैदर' जैसी साहसिक राजनीतिक फिल्म थी, तो महिलाओं को नए परिवेश में प्रस्तुत करने वाली 'हाईवे' और 'क्वीन' भी! 'हैदर' को सिनेमाई साहस का नमूना भी माना जा सकता है।डायरेक्टर विशाल भारद्वाज की इस फिल्म के एक्टर थे शाहिद कपूर, तब्बू, केके मेनन और इरफान खान। फिल्म शेक्सपीयर के 'हेमलेट' का भारतीय रूपांतरण थी, लेकिन कश्मीर की पृष्ठभूमि के चलते इसका कथानक दिलचस्प था। फिल्म पर ये आरोप भी लगा कि ये कश्मीर में सेना की भूमिका को नकारात्मक तरीके से दिखाती है! लेकिन, सिनेमाई साहस और कथानक के मोर्चे पर विशाल भारद्वाज की इस फिल्म को बड़े पैमाने पर सराहा गया। शानदार अभिनय, चुस्त डायरेक्शन, विहंगम दृश्यों और मजबूत राजनीतिक स्टैंड को सामने रखती यह फिल्म विशाल की और साल की सबसे उम्दा फिल्मों में रही!
  'क्वीन' एक लड़की के आजाद ख्यालों की कहानी है। कंगना रनोट, राजकुमार राव, लीजा हेडन की इस फिल्म के डायरेक्टर थे विकास बहल। उस देश में जहां लड़कियों का चौखट लांघना भी ठीक नहीं समझा जाता, 'क्वीन' एक हिम्मती कहानी थी। ये फिल्म महिलाओं को आजाद परिप्रेक्ष्य में सामने लाती है। यह राजौरी गार्डन से निकली एक महिला के दकियानूसी जालों को साफ करके अपने फैसलों को लेकर आत्मनिर्भर होने की कहानी है। 
 इम्तियाज अली की फिल्म 'हाईवे' को पूरी तरह आलिया भट्ट की फिल्म कहा जा सकता है जिसे रणदीप हुड्डा का सहारा मिला। ये एक अमीर घर की ऐसी लड़की की कहानी है जो अपनी आरामशुदा जिंदगी में जो नहीं कर पाती, वह अपह्त कर लिए जाने के बाद करती है। वह जिंदगी को खुलकर जीती है। एडवेंचर का सपना पूरा करती है, प्यार करती है और उत्पीड़न के बरसों पुराने बोझ को दबा-छिपाकर नहीं रखती! 
    होमी अडजानिया की 'फाइंडिंग फैनी' वैसे तो दीपिका पादुकोण, नसीरुद्दीन शाह, डिंपल कपाड़िया और पंकज कपूर की फिल्म है, लेकिन 'फाइंडिंग फैनी' के रूप में बॉलीवुड को एक सफल मेनस्ट्रीम अंग्रेजी फिल्म मिली है। यह हिंदी में कहानी कहने के परंपरागत तरीके को तोड़ती है और चीजों को संपूर्णता में देखने का आग्रह पैदा करती है। फिल्म अपने क्रूर और परिहास पूर्ण ढंग के नैसर्गिक अंत के लिए भी याद की जाएगी। 'फाइंडिंग फैनी' शहर की कोख से निकले व्यक्तिवाद के खिलाफ और इस व्यक्तिवाद का परचम बने छिछले एकांत के खिलाफ एक बगावत भी है। 
   केतन देसाई की फिल्म 'रंग रसिया' कला की बोल्डनेस और बोल्डनेस की आजादी का प्रतीक रही।  रणदीप हुड्डा और नंदना सेन  फिल्म में पहली बार भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में किसी लीड एक्ट्रेस ने अपना बदन दिखाया! बोल्ड सब्जेक्ट के कारण भी फिल्म विवादों में रही! शायद इसीलिए 2008 में बनी ये फिल्म 2014 में रिलीज हुई। 
  नए विषयों पर फिल्म बनाने के हमेशा पहचाने जाने वाले अमोल गुप्ते ने 'हवा हवाई'  पाने प्रयोग को दोहराया! पार्थो गुप्ते, साकिब सलीम, नेहा जोशी, मकरंद देशपांडे की फिल्म 'हवा हवाई' महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के एक किसान के बेटे की कहानी है। किसान की अचानक मौत हो जाती है तो उसकी पत्नी मजबूरन महानगर मुंबई आ जाती है। बेटा अर्जुन माँ का हाथ बंटाने के लिए एक चायवाले के यहां काम करने लगता है। एक रात उसके परों को एक आसमान मिलता है, जब वह पार्किंग लॉट में स्केटिंग करते बच्चों को और उनके कोच को देखता है। कचरे से स्केटिंग शूज का सजीला पेयर बनाया जाता है जिसका नाम रखा जाता है हवा हवाई! अर्जुन अपनी मेहनत के दम पर स्केटिंग कोच का पहले एकलव्य और फिर अर्जुन बनता है। 
  'सिटी लाइट्स' को भी लीक से हटकर बानी फिल्मों में गिना जा सकता है। हंसल मेहता की इस फिल्म को सजाया था राजकुमार राव, पत्रलेखा और मानव कौल ने! ये कस्बों, गांवों से शहर आने और फिर सपने पूरे करने वालों के सफर की कहानी है। लोग शहर आते हैं इस इस उम्मीद के साथ कि यहां ऊंचाई है तो क्या हुआ, हम भी अपना कद बढ़ा लेंगे! लेकिन, कद बढ़ाने की कोशिश में लोगों के कदम कितनी बार लड़खड़ाते हैं! इन्हीं कोशिशों का एक सिलसिला है 'सिटी लाइट्स।' 
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बॉक्स ऑफिस पर सुपरफ्लॉप रही ये फिल्में
  इस साल भी कुछ फिल्में ऐसी आईं जिनकी कुछ अलग कहानी दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ी! इन फिल्मों को समीक्षकों ने सराहा, लेकिन सिनेमाघरों में दर्शकों को रास नहीं आई! वहीं कुछ फिल्में ऐसी भी आईं जिन्होंने लोगों को जी खोलकर पकाया। नतीजा ये हुआ कि ये फिल्में अपनी लागत का आधा भी नहीं वसूल पाईं। 
साल 2014 की सुपर फ्लॉप फिल्मों पर एक नजर :
* बेवकूफियां : फिल्म का प्लॉट भले ही रोचक था, लेकिन ट्रीटमेंट में कोई दम नहीं था। आयुष्मान खुराना और ऋषि कपूर से लोगों को उम्मीदें बहुत थीं, लेकिन थियेटर के अंदर सभी पर पानी फिर गया! बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने पानी भी नहीं माँगा! इसका बजट था 22 करोड़ और इसकी कमाई थी 12.06 करोड़ रुपए। 
* बॉबी जासूस : इस फिल्म से विद्या बालन के अलावा दर्शकों को भी बहुत उम्मीदें थी। लेकिन, फिल्म की कहानी और बेमेल लीड जोड़ी ने सारा मामला बिगाड़ दिया। अंत से पहले ही दर्शकों को पता चल गया था कि इसका क्लाइमैक्स क्या होगा! फिल्म बनी थी 28 करोड़ में पर कमाई हुई 10.87 करोड़!
* गुलाब गैंग : इस फिल्म को माधुरी दीक्षित का जलवा भी बचा नहीं पाया! दर्शकों को गुलाब गैंग का जोश पसंद नहीं आया। एक से बढ़कर एक डायलॉग्स के जरिए महिला सशक्तिकरण वाली फीलिंग लाने की कोशिश तो की गई, लेकिन घाघरे वाली मोहिनी को डंडे चलाता देख लोग पचा नहीं पाए! 27 करोड़ में बनी इस फिल्म ने कमाए 13.32 करोड़। 
* लेकर हम दीवाना दिल : कमाई के मामले में यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर डिजास्टर साबित हुई। लोगों को यह लव स्टोरी बिल्कुल पसंद नहीं आई। 16 करोड़  फिल्म को मिले मात्र 2.11 करोड़ रुपए। 
* रिवॉल्वर रानी : 'क्वीन' से समीक्षकों की तारीफ़ बटोरने वाली कंगना रनोट की एक्टिंग की तारीफ तो इस फिल्म में भी खूब हुई, लेकिन दर्शकों ने इसे नकार दिया! अलका सिंह के बोल्ड किरदार में लोगों ने उन्हें पसंद किया, फिर भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ठंडी रही। फिल्म अपनी लागत का आधा भी वसूल नहीं कर पाई। 26 करोड़ में बनी इस फिल्म ने सिर्फ 9.44 करोड़ रुपए कमाए। 
* सुपर नानी : इस फिल्म को रेखा की कमबैक फिल्म माना जा रहा था, लेकिन दर्शकों के रिस्पॉन्स के बाद रेखा को भी मायूस कर दिया। अब रेखा को बॉलीवुड में कमबैक के लिए फिर कुछ करना पड़ेगा! फिल्म की कहानी महिला आधारित थी। रेखा ने जमकर मेकअप किया! फिल्म में बिग-बी का मजाक भी फिल्म में बनाया, पर कुछ काम नहीं आया! 'सुपर नानी' बुरी तरह सुपर फ्लॉप रही! 25 करोड़ के बजट वाली ये फिल्म 2.25 करोड़ ही कमा पाई!
* रोर-टाइगर्स ऑफ द सुंदरबन्स : इस फिल्म की तकनीक और प्रेजेंटेशन की काफी तारीफ हुई! लेकिन, फिल्म देखने लोग सिनेमाघरों तक नहीं पहुंचे। लिहाजा फिल्म अपनी लागत का आधा भी नहीं वसूल पाई और बॉक्स ऑफिस पर धराशाही हो गई। फिल्म का बजट था 20 करोड़ पर कमाए 8.81 करोड़ ही!
* राजा नटवरलाल :  फिल्म देखने वाले दर्शक भ्रमित थे कि कहीं वह यह फिल्म पहले भी तो नहीं देख चुके हैं! क्योंकि, फिल्म में इमरान के कपड़ों और हुमैमा मलिक के लो कट ब्लाउज के अलावा कुछ भी खास नहीं था। यह फिल्म दर्शकों को ठगने में कामयाब नहीं रही। 42 करोड़ जैसे बड़े बजट की ये फिल्म कमाई के मामले में छोटी ही रही और 23.94 करोड़ पर सिमट गई!
* क्रीचर (3डी) : देखा जाए तो इस फिल्म की अवधि 45 मिनट से ज्यादा नहीं थी। लेकिन, बिपाशा बसु को हीरोगिरी करते दिखाना था, तो फिल्म को खींचा गया। दर्शकों ने भी फिल्म पर रहम नहीं किया। यही कारण था कि 27 करोड़ में बनी ये फिल्म 16.52 करोड़ की झोली में जमा कर पाई!
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Sunday, July 27, 2014

'नमामि गंगे'


    नरेंद्र मोदी की सरकार ने भले ही अपने चुनावी वादों को पहले बजट में शामिल न किया हो, पर गंगा पर सौगातों की बारिश कर दी! कई ऐसी घोषणाएं हैं, जो सही मायनों में गंगा और उसके तट पर बसे शहरों के विकास के लिए मील का पत्थर साबित होंगी। नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी की भी बहुत सी उम्मीदें साकार हुई है! ' नमामि गंगे परियोजना' को मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना के रूप में देखा जा रहा है। केंद्रीय बजट में 2037 करोड़ का प्रावधान इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए किया गया है। इससे समन्वित गंगा संरक्षण मिशन की शुरुआत होगी! इस परियोजना से गंगा समेत उसकी सहायक नदियों सहित कई क्षेत्रों का भी विकास होगा। इससे गंगा की साफ-सफाई में मदद मिलेगी और और गंगा में जहाज परिवहन भी विकसित होगा!
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- हेमंत पाल 

  नरेंद्र मोदी सरकार के पहले बजट में 'नमामि गंगे' के ऐलान में 'नमो' की छाप दिखती है। बजट में नदियों की सफाई से लेकर नदियों को जोड़ने वाले प्रोजेक्ट पर भी फोकस किया गया है। 'नमामि गंगे' नाम से इंटीग्रेटेड गंगा कंजर्वेशन मिशन शुरू करने का ऐलान किया गया है। इसमें एनआरआई से भी मदद लेने का उल्लेख है। बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि 'नमामि गंगे' नाम से इंटीग्रेटेड गंगा कंजर्वेशन मिशन शुरू किया जाएगा। शुरुआती साल के लिए 2037 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। देश की विकास प्रक्रिया में एनआरआई का अहम योगदान रहा है। गंगा नदी के कंजर्वेशन के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने में भी एनआरआई कम्युनिटी अहम योगदान दे सकती है। इसलिए गंगा के लिए 'एनआरआई गंगा फंड' बनाया जाएगा, जिससे आर्थिक मदद मिल सके। 
  भाजपा के लिए गंगा का मसला चुनाव अभियान में भी एक बड़ा मुद्दा रहा। वाराणसी से नामांकन करने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था 'न मैं यहां आया हूं और न ही किसी ने मुझे यहां भेजा है, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है'। हिंदू नगरी कहे जाने वाले वाराणसी में बीजेपी ने गंगा के सफाई के मसले पर कैंपेन भी किया था। बजट में केदारनाथ, हरिद्वार, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में रिवर फ्रंट के सौंदर्य और घाटों के विकास के लिए 100 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया गया। जेटली ने कहा कि रिवरफ्रंट और घाट सिर्फ हिस्टोरिकल हैरिटेज ही नहीं हैं, बल्कि इनमें से कई नदियां और घाट पूज्य हैं। लोग इनकी पूजा करते हैं।
  अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में नदियों को जोड़ने के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर बात शुरू हुई थी, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ पाई। अब मोदी सरकार ने इस पर फोकस किया है। जेटली ने बजट में नदियों को जोड़ने वाले प्रोजेक्ट की डिटेल रिपोर्ट की तैयारी के लिए 100 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया।
   इसी साल 24 अप्रैल की दोपहर बाद अपना नामांकन दाखिल करने के लिए बनारस कचहरी के बरामदे में खड़े भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने कहा था कि न मैं यहां आया हूं और न ही किसी ने मुझे यहां भेजा है, यहां तो मुझे गंगा मां ने बुलाया है। यह दृश्य बदला और जनता की इच्छा से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। गंगा को लेकर उनकी वचनबद्धता पर सबको भरोसा था, जिसे अंतत: अमलीजामा भी पहनाया वित्तमंत्री अरुण जेटली के आम बजट में। अब 'नमामि गंगा' नाम से गंगा व उसके तटों के उद्धार को एक नया प्रोजेक्ट शुरू करने का प्रावधान किया गया है। वित्तमंत्री ने इसके लिए बजट में 2037 करोड़ रुपए का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत अहमदाबाद में साबरमती रिवर फ्रन्ट की तर्ज पर उत्तर भारत में गंगा रिवर फ्रन्ट का श्री गणेश किया जाना है। इसमें गंगा जल संरक्षण के साथ ही तटों के संरक्षण व संवर्धन का प्रावधान संभावित है। नदी किनारे पॉथ-वे और पौधरोपण कर इसे समृद्ध क्षेत्र बनाने का भी प्लान इसमें निहित है।
  भारत में कृषि के माध्यम से दौलत का सर्वाधिक उत्पादन करने वाली गंगा बेल्ट को अब कारोबारी नजरिए से भी और समृद्ध किया जाएगा। पूर्व में औने-पौने शुरू की गई जल परिवहन की कवायद को अब व्यवस्थित रूप देते हुए इलाहाबाद से हल्दिया तक गंगा जल परिवहन हेतु बजट में प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त गंगा घाटों के लिए भी 10 करोड़ का बजट प्रावधानित किया गया है। यह संपूर्ण कवायद गंगा रिवर फ्रन्ट को अहमदाबाद के उस साबरमती रिवर फ्रन्ट की तर्ज पर पिरोकर पेश करना है जिसे गुजरात मॉडल के नवरत्‍‌नों में से एक बताकर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं।  
सबसे बड़ी चुनौती 
   गंगा सफाई अभियान की सबसे बड़ी बाधा होगी गंगा में गिरने वाले शहरी और औद्योगिक कचरे को रोकना। यह समस्या सरकार और वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती है। गंगा में प्रतिदिन 2 लाख 90 हजार लीटर कचरा गिरता है। जिससे एक दर्जन बीमारियां पैदा होती हैं। सबसे अधिक कैंसर जैसा खतरनाक रोग भी पैदा होता है। कैंसर के सबसे अधिक मरीज गंगा के बेल्ट से संबंधित हैं। इसके अलावा दूसरी जलजनित बीमारियां हैं। 
  सर्वेक्षणों के अनुसार गंगा में हर रोज 260 मिलियन लीटर रसायनिक कचरा गिराया जाता है, जिसका सीधा संबंध औद्योगिक इकाईयों और रसायनिक कंपनियों से हैं। गंगा के किनारे परमाणु संयत्र, रसायनिक कारखाने और शुगर मिलों के साथ-साथ छोटे बड़े कुटीर और दूसरे उद्योग शामिल हैं। कानपुर का चमड़ा उद्योग गंगा को आंचल करने में सबसे अधिक भूमिका निभाता है। वहीं शुगर मिलों का स्क्रैप इसके लिए और अधिक खतरा बनता जा रहा है। गंगा में गिराए जाने वाले शहरी कचरे का हिस्सा 80 फीसदी होता है। जबकि 15 प्रतिशत औद्योगिक कचरे की भागीदारी होती है। गंगा के किनारे 150 से अधिक बड़े औद्योगिक ईकाइयां स्थापित हैं। 
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इंदौर में अपराध की लहलहाती फसल

हेमंत पाल 

   नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार अपराध में इंदौर का स्थान देश में दूसरा है। इंदौर में अपराध की दर (809.9) है। सबसे ज्यादा अपराध दर (834.3) कोयंबटूर की है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि यह दर देश के 53 प्रमुख शहरों में दर्ज हुए अपराधों की तुलना में सामने आई है। प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपराध दर (598) है। 2011 और 2012 की रिपोर्ट में कोच्चि की अपराध दर देश में सबसे ज्यादा थी, जबकि इस बार कोच्चि प्रथम पांच की सूची से भी बाहर हो गया है। इंदौर की अपराध दर 2011 में देश में चौथे नंबर पर थी, जबकि पिछले दो साल से लगातार दूसरे नंबर पर है। प्रतिशत की बात करें तो 53 शहरों में दर्ज अपराधों में 3.2 प्रतिशत अपराध अकेले इंदौर में दर्ज हुए हैं। 
हर जुर्म में बाजी मार रहा है इंदौर
  मध्यप्रदेश जहां बलात्कार के मामले में देश में अव्वल है, वहीं प्रदेश में इंदौर अपराध के हर वर्ग में दूसरे प्रमुख शहरों से आगे है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसी आरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में बलात्कार के सर्वाधिक मामले में मध्यप्रदेश में दर्ज हुए हैं। कुल अपराध के मामले में महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर है। भोपाल में जहां 11274 अपराध दर्ज हुए वहीं इंदौैर में यह संख्या 17551 है। ग्वालियर (7886) व जबलपुर (6996) काफी पीछे है। 2012 में इंदौर में 16512 अपराध दर्ज हुए।
महिला-बच्चों के अपराध की स्थिति
  इंदौर में महिला व बच्चों से अपराध की स्थिति में भी इंदौर की भयावह स्थिति है। रिपोर्ट के मुताबिक महिला के खिलाफ अपराध के इंदौर में 940 मामले दर्ज किए गए। इस श्रेणी में भोपाल में 878, ग्वालियर में 848 व जबलपुर में 559 केस दर्ज हुए। बच्चों से संबंधित अपराध की इंदौर में संख्या 583 है। ग्वालियर में 275, भोपाल में 178 व जबलपुर में 237 केस दर्ज हुए है।
हत्या, बलात्कार, अपहरण में आगे
   एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक इंदौर प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों से लगभग हर तरह के अपराध में सबसे आगे है। आंकड़े के मुताबिक, हत्या, बलात्कार व अपहरण जैसे सभी गंभीर मामलों में इंदौर राजधानी भोपाल के साथ ही अन्य प्रमुख शहरों से काफी आगे है। 
खुदकुशी करते युवा 
  इंदौर में आत्महत्या व सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों की स्थिति भयावह है। दोनों वर्गो में मौतों प्रदेश में सबसे ज्यादा इंदौर में ही रही है। आत्महत्या के आंकड़े बताते है कि इंदौर में मौत को गले लगाने वालों में सबसे ज्यादा 15 से 29 वर्ष उम्र आयु वर्ग के युवा है। आंकड़े बताते हैं, 2013 में इंदौर में आत्महत्या के 540 मामले हुए जो प्रदेश के सभी शहरों से अधिक है। 2012 में इंदौर में 434 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए हैं जबकि भोपाल में 384, ग्वालियर में 211 व जबलपुर में 304 आत्महत्याएं हुई है। इंदौर में आत्महत्या करने वाले 540 में से 284 मृतक 15-29 आयु वर्ग से है। इसमें पुरुष 156 व महिलाएं 128 है। 14 साल तक की उम्र वर्ग में 20 है जिसमें से 5 पुरुष व 15 महिलाएं है। 30 से 44 आयु वर्ग में 154 है जिसमें 111 पुरुष और 43 महिलाएं है।

अमित शाह : कद से बड़ा पद


*  हेमंत पाल 
  
  भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बनाया जाना महत्वपूर्ण घटना है। इसके अलावा संघ के दो प्रमुख नेताओं को भाजपा में भेजे जाने का महत्व भी समझना आवश्यक है। नितिन गडकरी को छोड़ दें तो भाजपा के इतिहास में अभी तक जितने भी अध्यक्ष हुए उनकी देश में या फिर संगठन के अंदर व्यापक राष्ट्रीय छवि थी। लालकृष्ण आडवाणी जनता के बीच काफी लोकप्रिय रहे। मुरली मनोहर जोशी हमेशा पार्टी का एक चेहरा रहे। कुशाभाऊ ठाकरे का संगठन के अंदर बड़ा कद था। वेंकैया नायडू की भी राष्ट्रीय पहचान बन चुकी थी। थोड़े समय के लिए अध्यक्ष बने जना कृष्णमूर्ति, बंगारू लक्ष्मण भी इसी श्रेणी में आते हैं। गडकरी को भी अध्यक्ष तब बनाया गया, जब पार्टी भारी संकट में थी। अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अपना इस्तीफा औपचारिक तौर पर पार्टी के सुपुर्द कर दिया था।
  अमित शाह का मामला इन सबसे अलग है। उनकी कोई राष्ट्रीय पहचान नहीं रही है। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद उन्हें केंद्रीय पदाधिकारियों की श्रेणी में लाया गया। उसके कई कारण थे, लेकिन कारक केवल मोदी थे। जाहिर है, अगर वह केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के अध्यक्ष बने हैं तो इसके व्यापक आयाम हैं। सामान्य निष्कर्ष यह है कि इस नियुक्ति के जरिए सरकार से संगठन तक मोदीकरण की प्रक्रिया का एक अहम फेज पूरा हो गया।
 संघ को सरकार के साथ ही पार्टी की भी चिंता है और इसी का ध्यान रखने हुए उसने अपने दो नेताओं को भेजा है जिन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिलनी है। यह संतुलन बनाने की कोशिश है। यह बात अलग है कि राम माधव मोदी के विश्वस्त रहे हैं। असली शक्ति भी अध्यक्ष के पास ही होती है। अमित शाह के अध्यक्ष होने का मतलब है मोदी की चाहत के अनुरूप बीजेपी की रीति-नीति निर्धारित होना।
 नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अमित शाह की अपनी कार्यक्षमता है और उसकी बदौलत वह यहां तक आए हैं, पर यह सच उन्हें भी मालूम है कि राष्ट्रीय राजनीति में राजनाथ सिंह उनको अपने आप नहीं लाए! यह मोदी की अनुशंसा थी। अमित शाह गुजरात में उनके सर्वाधिक विश्वसनीय सहयोगियों में रहे हैं और उन पर चल रहे मामलों के मद्देनजर उन्हें प्रदेश मंत्रिमंडल में लेने पर विवाद खड़ा होता। साथ ही जब तक मोदी केंद्रीय नेतृत्व मंडली में नहीं आए थे, भविष्य की रणनीति के अनुसार एक विश्वसनीय व्यक्ति यहां चाहिए था।
 भाजपा आज अपने सहयोगियों के साथ भारी बहुमत से सत्ता में हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। संसदीय लोकतंत्र में जहां पार्टी आधारित व्यवस्था है, वहां व्यवहार में पार्टियों का महत्व सरकार के समानांतर है। संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए पार्टी और सरकार के बीच शक्ति संतुलन अपरिहार्य है।
 नीतियां पार्टी की होती हैं, घोषणा पत्र पार्टी जारी करती है, जबकि वोट पार्टी और उसके उम्मीदवार को मिलता है। लेकिन, निर्णय की सारी शक्तियां सरकार के हाथों केंद्रित हो जाने के कारण पार्टी प्रायः परमुखापेक्षी अवस्था में आ जाती है। अगर अध्यक्ष चिंतनशील हो, आत्मविश्वासी और शक्तिसंपन्न हो तो समय-समय पर सरकार का मार्गदर्शन कर सकता है। सरकार कहीं गलत कर रही है या पार्टी की सोच से परे जा रही है तो वह उसके सामने खड़ा हो सकता है। ऐसे अध्यक्ष के रहते सरकार के मुखिया पार्टी को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
  सरकार की सफलता के लिए, पार्टी की साख और विश्वसनीयता के लिए तथा कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि अध्यक्ष के जरिए सरकार पर पार्टी का नैतिक और व्यावहारिक अंकुश बना रहे। प्रश्न है कि क्या अमित शाह ऐसी भूमिका निभाने में सफल हो सकते हैं, यह उनकी असली परीक्षा है। पार्टी में इस समय ऐसा कोई नेता नहीं दिख रहा था, जो पार्टी की किसी नीति से मतभेद होने पर मोदी के सामने डटकर खड़ा हो सके।
  अमित शाह तो उनके पूरक ही माने जाते हैं। संघ से आए नेता किस तरह पार्टी को वैचारिक आधार पर खड़ा रखेंगे यह देखना होगा! अमित शाह को अपना महत्वपूर्ण दायित्व समझना होगा और नरेंद्र मोदी को भी। अमित शाह की वैचारिक, सांगठनिक और प्रबंधन क्षमता की परख अभी होनी है। पार्टी कहती है कि व्यक्ति से बड़ा दल है और दल से बड़ा देश! तो यहां व्यक्ति मोह से ऊपर उठकर अगर वह काम कर पाते हैं और दल तथा देश को प्रमुखता देते हैं तो यकीनन ऐतिहासिक समय में ऐतिहासिक भूमिका निभा पाएंगे। यह पार्टी आधारित हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए भी अच्छा होगा। नहीं कर पाते हैं तो उनका जो होगा सो तो होगा ही, पार्टी भी 2004 की दुर्दशा को प्राप्त हो सकती है। संघ से आए नेताओं के पास भी गहरी दृष्टि है या नहीं, यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।