Saturday, January 15, 2022

रजा की मुराद पर भारी पड़ी मंत्री की मर्जी!

- हेमंत पाल

      फिल्म अभिनेता रजा मुराद भाजपा की राजनीति का शिकार हो गए। गुरुवार को रजा मुराद को भोपाल में स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था। वे अपनी भूमिका को सही साबित करने के लिए सक्रिय भी हुए! लेकिन, वे यह जिम्मेदारी कुछ घंटे ही निभा सके, क्योंकि इस घोषणा के अगले दिन सरकार के नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह ने उनकी नियुक्ति को निरस्त करवा दिया। उन्हें हटाने के पीछे कारण बताया गया कि उन्हें भोपाल की संस्कृति की जानकारी नहीं है! जबकि, देश में पांच बार स्वच्छता का तमगा जीतने वाले इंदौर शहर का ब्रांड एम्बेसडर जिस डॉ पुनीत कुमार द्विवेदी को बनाया गया, वे तो उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के रहने वाले हैं। उन्हें किसी ने न तो सड़क पर देखा और उन्हें इंदौर की संस्कृति के बारे में पता होगा! जबकि, उत्साह से भरे रजा मुराद ने बतौर ब्रांड एम्बेसडर भोपाल में काम भी शुरू कर दिया था। वे कई इलाकों में गए भी थे। लोगों से शहर को अपने घर की तरह स्वच्छ और पॉलिथीन फ्री बनाने का आह्वान भी किया था। लेकिन, सरकार को उनकी नियुक्ति रास नहीं आई। वो सोनागिरी में हुए कार्यक्रम में शामिल भी हुए थे। 
    भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की मानसिकता और कई बार उनके फैसलों पर भारी पड़ जाती है। वे अपने फैसलों को लेकर कितने भी तर्क दें, पर उन्हें इसका खामियाजा जनता की उलाहना झेलकर भोगना पड़ता है! इसके बावजूद उनकी सोच में कोई अंतर नहीं आता। वे कुतर्क देकर अपने फैसले को सही साबित करने की कोशिश जरूर करते हैं, पर उनके तर्क किसी के गले नहीं उतरते! पिछले दिनों हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब को लेकर भाजपा के कुछ नेताओं ने माहौल बनाने की कोशिश की थी। बेवजह उन्हें एक मामले में उलझाने की कोशिश की गई। अब जाने माने अभिनेता रजा मुराद को भोपाल के स्वच्छता ब्रांड एम्बेसडर से ये कुतर्क देकर हटाया गया कि उन्होंने भोपाल  कुछ नहीं किया और उन्हें भोपाल की संस्कृति की जानकारी नहीं है! जबकि, इसके पीछे साफ़-साफ़ दो मामले नजर आते हैं! एक कारण यह कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान एक कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार किया था, दूसरा कारण उनका मुस्लिम होना है। जावेद हबीब के साथ भी यही सब किया था। रजा मुराद के साथ भी वही सब दोहराया गया।    
   फिल्मों में विलेन का किरदार निभाने वाले अभिनेता रजा मुराद को भोपाल नगर निगम स्वच्छता अभियान के 'ब्रांड एंबेसडर' बनाया था। लेकिन, एम्बेसडर बनाए जाने के दूसरे ही दिन प्रदेश के नगरीय विकास मंत्री भूपेंद्र सिंह की नाराजगी भरे निर्देश पर नगर निगम कमिश्नर केवीएस चौधरी ने आदेश निरस्त कर दिया। बताया जा रहा है कि रजा मुराद का झुकाव कांग्रेस की तरफ है। उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान भोपाल में कांग्रेस के एक विधायक के समर्थन में प्रचार किया था। यही वजह है कि भाजपा सरकार के नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेन्द्र सिंह को नगर निगम का ये फैसला रास नहीं आया। उन्हें गुरुवार को बनाया और शुक्रवार को हटा दिया। 
   हटाए जाने के पत्र में कहा गया कि मंत्री (भूपेंद्र सिंह) के संज्ञान में आया है कि नगर निगम भोपाल द्वारा स्वच्छता अभियान के लिए फिल्म कलाकार रजा मुराद को ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। जबकि, ब्रांड एंबेसडर ऐसे व्यक्ति को बनाना जाना चाहिए, जिसने स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो या वो भोपाल की संस्कृति से भली-भांति परिचित हो। इस संबंध में मंत्री द्वारा तत्काल आदेश निरस्त करने एवं किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति जो भोपाल की संस्कृति से भली-भांति परिचित हो या स्वच्छता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो, ऐसे व्यक्ति या संस्था को ब्रांड एंबेसडर बनाने का निर्देश दिया है।
   वास्तव में ये मंत्री भूपेंद्र सिंह का भोपाल के प्रति सकारात्मक सोच नहीं है। दरअसल, ये पार्टी की मुस्लिम विरोधी मानसिकता है, जो सामने आई। जानकारी यह भी मिली कि इस फैसले पर संघ ने आपत्ति ली थी। यही कारण है कि रजा मुराद को हटाया गया। जबकि, इस बारे में रजा मुराद का कहना है कि वे भोपाल शहर से अच्छी तरह वाकिफ हैं। उनके तमाम रिश्तेदार यहां रहते हैं। मुराद ने यह भी कहा, 'मुझसे बड़ा भोपाली कोई नहीं हो सकता। मेरी मां, पत्नी और परिवार के कई अन्य सदस्य भोपाल से हैं। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा यहां के कैम्ब्रिज स्कूल से पूरी की है। मैं शहर, इसकी सड़कों, इसकी विशेष भाषा, चाय, पान, गुटखा से अच्छी तरह वाकिफ हूं। इसलिए यह आरोप कि मैं शहर की संस्कृति को नहीं जानता, इसका कोई आधार नहीं है।'
   रजा मुराद ने मंत्री ने फैसले पर सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि मंत्री ने ब्रांड एंबेसडर ऐसे व्यक्ति को बनाने को कहा है जिसने ‘स्वच्छता’ के क्षेत्र में सराहनीय काम किया हो। मुझे खुद को साबित करने का मौका दिए बगैर वे ये निर्णय कैसे ले सकते हैं कि मैंने कुछ नहीं किया है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने गुरुवार को शहर के चौक इलाके में लोगों से सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग रखने के बारे में बात की। अगर मंत्री मेरी सेवाएं नहीं चाहते तो ऐसा ही होगा, क्योंकि वे मालिक हैं।
    रजा मुराद को स्वच्छता एम्बेसडर पद से हटाने के बाद इस मामले पर प्रदेश की राजनीति भी गरमाने लगी है। कांग्रेस ने शिवराज सरकार पर हमला किया है। कांग्रेस ने प्रदेश की भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मुराद को ब्रांड एंबेसडर की सूची से हटाया जाना सरकार की 'संघी सोच' है। कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा ने ट्वीट करके कहा 'मुराद को ब्रांड एंबेसडर पद से मंत्री भूपेंद्र सिंह ने हटाया, शायद अपराध यह होगा कि वह मुसलमान हैं। संघी सोच किस स्तर की है!' 
     इंदौर नगर निगम के स्वच्छ भारत अभियान के ब्रांड एंबेसडर कुशीनगर जिले के रामकोला विकासखंड के चकिया दुबौली गांव के निवासी डॉ पुनीत कुमार द्विवेदी को बनाया गया है। कुशीनगर तो मध्यप्रदेश में नहीं उत्तर प्रदेश में है। डॉ द्विवेदी शुरू से ही इंदौर नगर निगम के ब्रांड एंबेसडर हैं और 2022 के लिए भी उन्हें 'स्वच्छ इंदौर अभियान' का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया। लेकिन, ये बात इंदौर के शायद ही किसी नागरिक को पता हो! यदि सरकार को भोपाल की संस्कृति को समझने वाले को ही ब्रांड एम्बेसडर बनाना है, तो उसे इंदौर के बारे में सोचना होगा। एक एकेडमिक सोच वाले व्यक्ति को इंदौर नगर निगम ने स्वच्छता अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया है। वे न तो इंदौर में जन्मे हैं न कभी स्वच्छता को लेकर सड़क पर दिखाई दिए! यदि रजा मुराद के नाम से मंत्री को आपत्ति है, तो उन्हें इंदौर के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर के बारे में भी विचार करना चाहिए। वे इंदौर में एक इंस्टीट्यूट्स के निदेशक हैं, पर इंदौर की संस्कृति के जानकार  कदापि नहीं हैं।     
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Tuesday, January 4, 2022

भाजपा के मुकाबले ममता खड़ा करेंगी नया विकल्प!

   भाजपा आज जिस स्थिति में है, उसका राजनीतिक विकल्प खोज पाना आसान नहीं है। तीन साल पहले भाजपा जिस धूमकेतु की तरह केंद्र की सत्ता में वापस लौटी थी, पूरा देश चौंक गया था। क्योंकि, अपने पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने ऐसे कोई चमत्कारिक काम नहीं किया था कि मतदाता उन्हें दूसरी बार भी चुनें! लेकिन, मतदाताओं के सामने सबसे बड़ी परेशानी थी, कि सामने कोई सशक्त विकल्प मौजूद नहीं था! दूसरे कार्यकाल में भी भाजपा सरकार के फैसले लोकहित के नहीं कहे जा सकते! पर, अभी भी विकल्प का अभाव है। इसके बावजूद देश के मतदाताओं के सामने अभी भी सशक्त विपक्ष नहीं है, जो भाजपा के सामने मतदाताओं को आकर्षित कर सके। अभी तक कांग्रेस को विपक्ष समझा और माना जाता रहा है, पर वो अब पुरानी बात हो गई। अब एक ऐसा विपक्ष गढ़े जाने की कोशिश शुरू हो गई, जिसमें कांग्रेस को शामिल भी नहीं किया गया। विपक्ष को खड़ा करने की कोशिश कर रही ममता बैनर्जी की कोशिश है कि उनके साथ देश के वे नेता और कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस में जुड़ें, जो भाजपा के सिद्धांतों, विचारधारा और कार्यशैली से न सिर्फ असहमत हैं, बल्कि उसे सत्ता से भी हटाना चाहते हैं। लेकिन, विकल्पहीनता को लेकर परेशान हैं। ममता तृणमूल कांग्रेस को उनके लिए ऐसा मंच बना रही हैं जो कालांतर में चलकर कांग्रेस का विकल्प बन जाए।

- हेमंत पाल 

    पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद ममता बैनर्जी की ताकत जिस तरह बढ़ी, उसने देश में एक सशक्त विपक्ष की आधारशिला भी रख दी। क्योंकि,  ममता बैनर्जी ने एक राज्य के चुनाव में सिर्फ भाजपा को पटखनी ही नहीं दी, देश को ये संदेश भी दिया कि भाजपा को हराना मुश्किल नहीं है! पूरे भाजपा के मुकाबले में ममता बैनर्जी जिस तरह ख़म ठोंककर खड़ी रही और उसे खदेड़ दिया, वो आसान नहीं था! 'अबकी बार 200 पार' का नारा लगाने वाली भाजपा 70 सीटों पर अटक गई! इस जीत ने ममता बैनर्जी को इतना आत्मविश्वास दिया कि वे देशभर में बिखरे विपक्ष को एक करने में जुट गई! उनकी ये मुहिम आसान नहीं है, पर मुश्किल भी नहीं! लेकिन, ममता बैनर्जी की नजरें पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर हैं। इन चुनावों में कांग्रेस की स्थिति का आकलन करने के बाद ही वे अपनी कोशिशों को आगे बढ़ाएंगी। इस मुहिम के पहले चरण में उन्होंने कई चिर असंतुष्ट कांग्रेसियों को अपनी पार्टी तृणमूल से जोड़ा है। वे यह सब तृणमूल के विस्तार के लिए नहीं कर रही, उनकी कोशिश एक अलग विपक्ष खड़ा करने की है। इसमें ममता बैनर्जी की भूमिका क्या होगी, ये स्पष्ट नहीं है! पर, इस सारी राजनीतिक कवायद का कारण एक नई पार्टी खड़ी करना है जिसकी पहचान अलग होगी।   
     विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ममता बैनर्जी के तेवरकुछ अलग ही हैं। वे जिस तरह कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को तृणमूल में शामिल कर रही हैं, उससे लगता है कि वे खुद को ही अगले लोकसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में तैयार खड़ा करने की कोशिश में हैं। जबकि, वास्तव में ममता बैनर्जी तृणमूल को कांग्रेस का विकल्प बनाने की कोशिश ज्यादा करती दिखाई दे रही है। वे कांग्रेस से टूटे क्षेत्रीय दलों को एकजुट करके कांग्रेसी विचारधारा की ऐसी पार्टी बनाना चाहती हैं जो भाजपा के सामने चुनाव में खड़ी हो सके। उनकी ये सारी कवायद 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए हो रही है। शरद पवार, जगन मोहन रेड्डी और चंद्रशेखर राव जैसे पुराने कांग्रेसी नेताओं और अब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सरकारें चला रहे इन नेताओं से उनकी बातचीत होने की भी ख़बरें हैं। लेकिन, उनकी कोशिश यह देखने के बाद शुरू होगी, जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन सामने आएगा। यदि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पंजाब में अपनी सरकार बचा लेती है। उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बना पाती है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहता है, तो ममता बैनर्जी की रणनीति बदल जाएगी। इन नतीजों पर ही बहुत कुछ निर्भर है। अगर नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आए तो ममता की मुहिम ठंडी भी पड़ सकती है। 
    भाजपा का विकल्प गढ़े जाने के अपने अभियान को आगे बढ़ाते हुए ममता बनर्जी गैर-भाजपा दलों के शीर्ष नेताओं से भी मिलने की कोशिश में है। उन्होंने घोषणा की है कि वे शरद पवार और उद्धव ठाकरे से बात करेंगी। पटना जाकर लालू यादव से और फिर एमके स्टालिन, चंद्रशेखर राव, जगनमोहन रेड्डी, नवीन पटनायक, हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों के उन मुख्यमंत्रियों से भी संपर्क करेंगी। रणनीति के मुताबिक, ममता उन नेताओं को इस अभियान से जोड़ना चाहती हैं, जिनकी अपने राज्यों में अच्छी पहचान है। ममता सबसे मेल मुलाकातों के जरिए पूरे देश के गैर-भाजपा खेमें में अपनी स्वीकार्यता स्थापित करेंगी और कांग्रेस के नेताओं को तृणमूल में शामिल कराएंगी। उनकी योजना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा का विकल्प बनाई जाने वाली पार्टी कम से कम 100 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की स्थिति में हो। जहाँ इस पार्टी का जनाधार कमजोर दिखाई देगा, वहां ताकतवर क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन का रास्ता भी खोलकर रखा जाएगा। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के साथ ममता बनर्जी के रिश्ते अच्छे हैं और ये जगजाहिर भी है।  
   ममता की इस मुहिम की शुरुआत कांग्रेस और अन्य दलों के उन नेताओं को जो हाशिए पर हैं, उन्हें तृणमूल कांग्रेस से जोड़कर पार्टी का विस्तार करके की है। ममता ने सबसे पहले पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा के असंतुष्ट नेता रहे यशवंत सिन्हा को तृणमूल कांग्रेस में शामिल किया। इसके बाद जद (यू) के पूर्व राज्यसभा सांसद पवन कुमार वर्मा के साथ कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद, कांग्रेस से बाहर जा चुके हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर को तृणमूल कांग्रेस में शामिल किया। उत्तर प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी ब्राह्मण नेता और पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलापति त्रिपाठी के पौत्र राजेशपति त्रिपाठी और उनके पुत्र पूर्व विधायक ललितेश पति त्रिपाठी भी तृणमूल में शामिल हो गए। जबकि, पूर्वोत्तर में ममता तृणमूल कांग्रेस को एक राजनीतिक ताकत बनाकर कांग्रेस को पीछे करके भाजपा को चुनौती देने के अभियान में बंगाल जीतने के बाद से ही जुटी हैं। इस कड़ी में त्रिपुरा के स्थानीय चुनावों में तृणमूल कांग्रेस पूरे दमखम से उतरी।  
      भाजपा के साथ उसका वैसा ही हिंसक टकराव हो रहा है, जैसा पश्चिम बंगाल में विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले शुरू हुआ था। असम में दिग्गज नेता रहे संतोष मोहन देव की बेटी और महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने पाला बदलकर लोकसभा से इस्तीफा देकर ममता का हाथ थाम लिया। बदले में तत्काल उन्हें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा में भेज दिया गया। गोवा में पूर्व मुख्यमंत्री के कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने का झटका कांग्रेस झेल ही रही थी कि मेघालय में पार्टी के एक दर्जन विधायक पाला बदलकर ममता की पार्टी में शामिल हो गए। इस रणनीति के मुताबिक अगर सबकुछ ठीक रहा, तो 2024 से पहले तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस, जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति मिलकर एक नया राष्ट्रीय दल खड़ा कर सकती है। इसका नाम, झंडा और चुनाव चिन्ह सब कुछ नया होगा। 
    ममता बैनर्जी अपनी पार्टी 'तृणमूल' का विस्तार करने की कोशिश में है। वे चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर निकालकर तृणमूल की उपस्थिति हर राज्य में बनाई जाए। यही कारण है कि उन्होंने पार्टी के दरवाजे हर राज्य के उन असंतुष्ट नेताओं के लिए खोल दिए, जिनकी अपने राज्यों में पहचान है। लेकिन, उनकी अपनी पार्टी में पूछ नहीं बची! उनके पीछे कोई बड़ा जनाधार न हो, पर वे विचारधारा के हिसाब से भाजपा विरोधी हों। पश्चिम बंगाल के आसपास के राज्यों में तो 'तृणमूल' समर्थक और ममता को समझने वाले आसानी से मिल रहे हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, गोवा, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में ममता बनर्जी को 'तृणमूल' का झंडा लेकर चलने वालों की तलाश है। फ़िलहाल बिहार में यशवंत सिन्हा, कीर्ति आजाद और पवन वर्मा यह काम करेंगे। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में कमलापति त्रिपाठी परिवार की प्रतिष्ठा के वाहक राजेशपति और ललितेश पति त्रिपाठी तृणमूल कांग्रेस के रथ को आगे बढ़ाएंगे। हरियाणा में फिलहाल अशोक तंवर अब तृणमूल का काम संभालेंगे। संभव है, कांग्रेस और अन्य दलों के कुछ और नेता 'तृणमूल' से जुड़ जाएं। 
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Monday, January 3, 2022

फ़िल्मी कथानकों में मानव अधिकारों की झलक

- हेमंत पाल

    सिनेमा वो माध्यम है, जो सिर्फ दर्शकों का मनोरंजन ही नहीं करता, उन्हें कई मसलों को लेकर जागरूक भी करता है। ऐसे मामलों में एक मानव अधिकार भी हैं। कई बार फिल्मों के कथानकों में भी इन अधिकारों का जिक्र इस तरह होता है कि दर्शक उसे आत्मसात कर लेते हैं। अभी तक ऐसी फ़िल्में ज्यादा तो नहीं बनी, पर ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से अभी तक जितनी भी फिल्मों में ऐसे विषयों को उठाया गया, उन्होंने दर्शकों के दिल में अपनी जगह जरूर बनाई। सिनेमा के शुरुआती काल में इस विषय पर बहुत कम फ़िल्में बनी। कुछ फिल्मकारों ने जरूर मानव अधिकार के मुद्दे को परदे पर उतारकर फिल्मों को यथार्थ से जोड़ने की कोशिश की। पर, 80 के दशक में ऐसी फिल्मों को कला फ़िल्म का दर्जा दिया जाने लगा। लेकिन, जो भी फ़िल्में बनी, उनमें मानव जीवन की त्रासदियों और उसके मूल अधिकारों के हनन की कहानी को बेबाकी से परदे पर उतारा गया।  
      हिंदी सिनेमा सामाजिक परंपराओं और सुधारों की आड़ में आम आदमी के अधिकारों का हनन होने का गवाह है और अपने अधिकारों के प्रति समाज को जागरूक करने का पर्याय भी बनता आया है। वी शांताराम, महबूब खान से लेकर श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मणि कौल, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, बुद्धदेव दास गुप्त, प्रकाश झा, सई परांजपे, सुधीर मिश्रा जैसे निर्देशक मानव जीवन की त्रासदियों व उसके मूल अधिकारों के हनन की कहानी को बड़े पर्दे पर लेकर आते रहे हैं। आजादी के सात दशक से ज्यादा समय बाद भी सिनेमा के जरिए मानव अधिकारों के प्रति जागरूक करती ये फिल्में इस बात की गवाह हैं, कि आज भी समाज में मूल अधिकारों को लेकर कैसी लड़ाई चल रही है। इस ज्वलंत सामाजिक मुद्दे को परदे पर दिखाने की पहली कोशिश 1933 में वी शांताराम ने फ़िल्म 'अमर ज्योति' बनाकर शुरू की। इसमें महिलाओं को अधिकारों के मामले में पुरुषों के समकक्ष बताने के मुद्दे को सशक्त ढंग से उठाया था। जबकि, उस समय संवैधानिक रूप से ऐसी कोई व्यवस्था लागू नहीं थी। समाज व्यवस्था भी ऐसी नहीं थी, कि कोई इस समानता के बारे में आवाज उठाए! इसलिए कहा जा सकता है, कि सिनेमा 40 के दशक से ही तत्कालीन परिस्थितियों में मानव अधिकारों की रक्षा को लेकर आवाज उठाता रहा है। 1950 में संविधान बनने के बाद भी एक बड़े हिस्से को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं पता, पर वी शांताराम को इसका अहसास उससे पहले हो गया था। 
      संविधान में प्रावधान है कि हर व्यक्ति को अपनी 'जीविका के उपार्जन की आजादी का अधिकार' मिलना चाहिए। जीविका के इसी अधिकार पर विमल राय ने 1957 में 'दो बीघा जमीन' फिल्म बनाकर एक तरह से संदेश दिया था। फिल्म में अनपढ़ शम्भू अपनी दो बीघा जमीन, जो उसकी जीविका का एकमात्र साधन होता है, उसे साहूकार से बचाना चाहता है! उसका एकमात्र लक्ष्य अपनी जमीन को साहूकार से वापस पाना होता है। सामंतवाद पर चोट करती ये फिल्म जीविका उपार्जन के संविधान प्रदत्त अधिकार और यथार्थ में उसे हासिल करने के संघर्ष का प्रतीक थी। इसके बाद लम्बे अरसे तक इस विषय को अलग-अलग ढंग से उठाया तो गया, पर सारी फ़िल्में फार्मूला बनकर रह गई। फैक्ट्री मालिक और मजदूरों के बीच की खींचतान को कई बार दिखाया गया। 1973 में आई अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की फिल्म 'नमक हराम' और 1975 में आई अमिताभ बच्चन की फिल्म 'दीवार' में भी यही जंग दिखाई गई, पर फिल्म में मानव अधिकार जैसा मुद्दा नहीं उठ सका।    
     इस तरह की फ़िल्में बनाने की परम्परा को बाद में कला फिल्मकारों ने आगे जरूर बढ़ाया, पर वो समीक्षकों और उन सीमित दर्शकों तक सिमटकर रह गया जो ऐसी फ़िल्में पसंद करते थे। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, ऋषिकेश मुखर्जी, प्रकाश झा ने ऐसी कई फ़िल्में बनाई। आक्रोश, निशांत, पार, तमस, गर्म हवा, मम्मो, मैं जिंदा हूँ, दो बीघा जमीन, दुनिया न माने, दो आँखे बारह हाथ, मदर इंडिया, मंडी, बाजार बैंडेट क्वीन, गंगाजल, वॉटर, ब्लैक, और 'मातृभूमि' जैसी फिल्मों में कहीं न कहीं मानव अधिकारों की ही पैरवी की गई थी। यही वे फ़िल्में थीं, जिनके कथानक समय के साथ समाज में आने वाले सुधारों और पुरातन परम्पराओं पर केंद्रित थीं। देखा जाए सबसे पहला अधिकार है ‘जीने का अधिकार!’ इसमें कन्या भ्रूण हत्या, गर्भपात और 'इच्छा मृत्यु' जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़े अधिकार भी शामिल हैं। जागरूकता की सारी कोशिशों के बाद भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी कुरीतियां हैं, जिनकी वहज से कन्या के जन्मते ही उसे खत्म कर दिया जाता था। इस संवेदनशील विषय पर मनीषा झा ने 'मातृभूमि: ए नेशन विदाउट वीमन' फिल्म बनाई जो समाज की इस कड़वी सच्चाई की वीभत्स तरीके से दर्शकों के सामने रखती है। सिर्फ अधिकारों की घोषणा करने से उनकी सार्थकता साबित नहीं होती। 
     श्याम बेनेगल की फिल्म 'हरी-भरी' भी इसी का एक हिस्सा थी, जो यौन जीवन संबधी अधिकारों पर खुलकर बहस छेड़ती है। मधुर भंडाकर जैसे निर्देशक भी 'ट्रैफिक सिग्नल' और 'कॉपोरेट' से ऐसे ज्वलंत मुद्दों को उठाते रहे हैं। 'ट्रैफिक सिग्नल' जहाँ रेड लाइट से जुड़े लोगों के जीवन की परतें खोलती है, वहीं 'कॉर्पोरेट' हाई सोसायटी के बिजनेस के तौर तरीकों में औरत की स्थिति और उसके उपयोग की कहानी बताती है। मदर इंडिया, अशनि संकेत और 'अकालेन संधाने' जैसी फिल्मों में भी यह सच सामने रखा जाता रहा है। ये अधिकारों की वकालात करने के साथ भूख से तड़पते लोगों पर जमींदारों, साहूकारों और राजनीतिक साजिशों की पड़ताल करती है। 
      फिल्म 'शाहिद' मानव अधिकारों की वकालत करने वाले वकील शाहिद आजमी की सच्ची कहानी पर बनी थी, जिसकी हत्या कर दी गई थी। इस फिल्म में राजकुमार राव ने भूमिका निभाई थी। धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकती अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आर्टिकल 15’ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 पर आधारित है। इस फिल्म के लिए अभिनेता आयुष्मान खुराना राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीत चुके हैं। महिलाओं के अधिकारों के हनन पर गहरी चोट करती फिल्म ‘पिंक’ भी समानता के अधिकार की पक्षधर है। अनिरुद्ध राय चौधरी की इस फिल्म में उन महिलाओं की बात की गई, जो शोषण का शिकार होती रहती हैं, पर अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठातीं। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की स्थिति और अधिकारों की बात अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘लिपिस्टक अंडर माय बुर्का’ में भी सच्चाई और ईमानदारी से की गई है। हिंदी सिनेमा ने हमेशा से ही समलैंगिक व्यक्तियों की अहमियत, समाज में उनकी स्वीकार्यता व संघर्षों को दिखाया है। आशय यह रहा कि समाज उन्हें स्वीकार न करे। दीपा मेहता की 'फायर' से लेकर 'मार्गरेटा विद ए स्ट्रा, मनोज वाजपेयी की 'अलीगढ़' जरूर जैसी फिल्मों में इस हक व हकीकत को बेबाकी से दर्शाया गया है।
      एक अपराधी को भी उन अधिकार से अलग नहीं किया जा सकता, जो एक आम आदमी को हासिल है। अपराधियों के जीवन पर 1957 में वी शांताराम ने 'दो आँखे बारह हाथ' के जरिए एक जेलर के 6 कैदियों को सुधारने की कोशिशें बताई थी। इसमें उनके अधिकारों की रक्षा के साथ 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं' जैसे गांधीवादी विचार को भी शामिल किया गया था। बरसों बाद प्रकाश झा ने 'गंगाजल' बनाकर इसी बात को आगे बढ़ाया। अपराधियों को यदि सुरक्षा का अधिकार नहीं दिया जाए, तो हालात कितने खतरनाक हो सकते हैं, यही 'गंगाजल' में दिखाया गया था। यह फिल्म 1980 में बिहार की भागलपुर जेल में हुए 'आँखफोड़ कांड' पर आधारित है। एक और अहम अधिकार है 'धर्म की आजादी का अधिकार।' यह निहायत निजी मामला है। लेकिन, जब धर्मांधता चरम पर होती है, तो मानव अधिकारों की कोई परवाह नहीं करता। फिल्मों ने धर्म से जुड़े अधिकारों पर 1947 अर्थ, मम्मो, गर्म हवा, तमस और 'पिंजर' के जरिए उठाया गया है। अनुराग कश्यप की 'ब्लैक फ्राईडे' मुंबई बम धमाकों पर बनी, तो राहुल ढोलकिया की 'परजानिया' गोधरा कांड के दौरान एक पारसी परिवार की त्रासदी की सच्ची घटना पर है।  
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Sunday, December 26, 2021

समझ या मुद्दों से दूर हैं, ये गुदगुदाती फिल्में

- हेमंत पाल

   हिंदी सिनेमा के हर दौर में कॉमेडी फिल्में बनती रही हैं। लेकिन, समय के साथ इनका स्टाइल और पैटर्न बदलता रहा। ऐसी फिल्मों की कामयाबी इस बात निर्भर होती है, कि उसे दर्शक अपनी जिंदगी और उसकी उलझनों के कितना करीब पाते हैं। जो फ़िल्में ऐसा कर पाती है, वही दर्शकों का दिल भी जीतती है। 1958 में बनी देश की पहली कॉमेडी फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' को माना जा सकता है। ये एक म्यूजिकल कॉमेडी  फिल्म थी, जिसके गीतों के बोल से भी खूबसूरत हास्य टपकता था। अशोक कुमार ने अपनी गंभीर अभिनेता की छवि को इसी फिल्म से तोड़ा था। इसके बाद समय-समय पर कॉमेडी फिल्में दर्शकों को गुदगुदाती रहीं। लेकिन, समय के साथ कॉमेडी का ट्रेंड बदला और दर्शकों की पसंद भी! 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोर कुमार के साथ उनके दो भाई अशोक कुमार और अनूप कुमार ने भी काम किया था। यह फिल्‍म अपनी शैली की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसके विषय में ही हास्य समाहित था। इस फिल्म के पहले भी फिल्मों में कॉमेडी होती थी, पर पूरी तरह कॉमेडी फिल्में नहीं बनी। यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था, जो सफल रहा! इस फिल्म को कॉमेडी फिल्मों का ट्रेंड सेटर कहा जाता है। इसके बाद 1962 में आई फिल्म ‘हाफ टिकट’ में भी किशोर कुमार की एक्टिंग को लोग आज भी याद करते हैं।
    1968 में आई 'पड़ोसन' का कथानक भी हंसी-मजाक से भरा था। इस फिल्म के हर पात्र ने अपनी सहज कॉमेडी से दर्शकों को हंसने पर मजबूर किया था। इस फिल्म में नायक के पड़ौसी लड़की को प्रभावित करने और उससे प्रेम करने की कोशिश को बेहद चटपटे अंदाज में फिल्माया गया था। गाँव के गेटअप वाले भोले-भाले (सुनील दत्त) का दिल उनकी पड़ोसन बिंदू (सायरा बानो) पर आ जाता है। बिंदू को संगीत का शौक है, उसे संगीत सिखाने मास्टर बने थे महमूद, रोज आते हैं। 'पड़ोसन' का असली मजा किशोर कुमार और महमूद की संगीतमय जुगलबंदी था। किशोर और महमूद की खींचा-तानी 'एक चतुर नार ...' और किशोर के गाए 'मेरे सामने वाली खिड़की में...' की मिठास भुला पाना मुश्किल है। इस फिल्म के गाने ही इसकी सबसे बड़ी खासियत रहे। इसके संगीत में भी शरारत थी, जो आरडी बर्मन की देन था। 
    1972 में आई 'बॉम्बे टू गोवा' अमिताभ बच्चन के अभिनय वाली पहली फिल्म थी। ये फिल्म एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो एक हत्या की गवाह होने के बाद कश्मकश में है। बस में उसकी मुलाकात कंडक्टर अमिताभ बच्चन से होती है। यह एक ऐसी मजेदार सवारी बस होती है, जो भारत के विभिन्न धर्मों और मान्यताओं के लोगों को एक साथ लेकर शुरू होती है। अमिताभ बच्चन के साथ एक रोमांचक सफर और शानदार गानों के साथ यह फिल्म काफी पसंद की गई! ऋषिकेश मुखर्जी की 1975 में आई 'चुपके-चुपके' को सिचुएशनल कॉमेडी की पहली फिल्म माना जा सकता है। इस फिल्म को देखते वक्त तो दर्शक हंसते ही हैं, बाद में भी फिल्म के दृश्य उन्हें गुदगुदाते हैं। फिल्म में धर्मेंद्र का एक नया रूप दिखाई दिया था। प्रो परिमल त्रिपाठी बने धर्मेंद्र अपनी स्टाईल से दर्शकों को हंसाते हैं। फिल्म का हास्य तब चरम पर पहुंचता है, जब अंग्रेजी के प्रो सुकुमार सिन्हा (अमिताभ बच्चन) परिमल त्रिपाठी बनकर जया बच्चन को बॉटनी पढ़ाते हैं। 
    ऋषिकेश मुखर्जी की 1979 की फिल्म 'गोलमाल' को भी बेस्ट कॉमेडी फिल्म माना जाता है। फिल्म की कॉमेडी उस पुरानी पीढ़ी पर है, जो रूढ़ियों और बासी परंपराओं की लकीर पीट रही है। इसमें अमोल पालेकर का ऐसा डबल रोल है, जिसने दर्शकों को हंसाता नहीं, गुदगुदाया भी है। इस फिल्म में अमोल पालेकर ने पहली बार अपनी संजीदा पहचान से बाहर निकलकर कॉमेडी की थी। उन्होंने इस फिल्म में दो किरदार निभाए थे। राम प्रसाद और लक्ष्मण प्रसाद की यह भूमिकाएं अलग ही ढंग से दर्शकों को हंसातीं। सई परांजपे की 1981 में आई 'चश्मे बद्दूर' भी ऐसी फिल्म थी, जिसे आज भी याद किया जाता है। ये फिल्म तीन बेरोजगार लड़कों की कहानी है, जो नौकरी और छोकरी की तलाश में हैं। नायक-नायिका की भूमिका में फारूक शेख और दीप्ति नवल की जोड़ी भी खूब जमी है। इसके साथ ही सई परांजपे की 'कथा' भी अलग तरह की कॉमेडी फिल्म थी। गुलजार जैसे गंभीर फिल्मकार ने भी 1982 में 'अंगूर' बनाकर अपनी नई पहचान से दर्शकों को अवगत कराया था। यह कॉमेडी अंग्रेजी प्ले 'कॉमेडी ऑफ इरर' पर आधारित थी। फिल्म का हास्य दो जुड़वां जोड़ियों के हमशक्ल होने की वजह से गढ़ा गया था। यहां एक जैसे चेहरे वाले दो आदमियों की दो जोड़ियां होती हैं। संजीव कुमार नौकर बने देवेन वर्मा के साथ उसी शहर में पहुंच जाते हैं, जहां पहले से ही संजीव कुमार और देवेन वर्मा की एक जोड़ी पहले से रह रही होती है। 
   1983 की फिल्म 'जाने भी दो यारों' राजनीति, मीडिया और नौकरशाही की बुराइयों पर एक सटीक व्यंग्य था। ये कॉमेडी सिनेमा की कालजयी फिल्म रही। इसका 'महाभारत' वाला क्लाइमैक्स हास्य का पिटारा था। फिल्म महज कॉमेडी नहीं थी, इसका हास्य का रंग अलग ही था। बासु चटर्जी को भी सहज हास्य फिल्मों के लिए पहचाना जाता है। उन्होंने छोटी सी बात, हमारी बहू अलका और 'खट्टा-मीठा' जैसी यादगार फ़िल्में बनाई। लेकिन, 'चमेली की शादी' की कहानी पक्के अखाड़े बाज पहलवान चरणदास (अनिल कपूर) और कल्लूमल की बेटी चमेली (अमृता सिंह) के बीच इश्कबाजी की थी। फिल्म के गाने और फिल्मांकन गुदगुदाने वाला था। बासु चटर्जी की 'छोटी-सी बात' को मासूम कॉमेडी फिल्म कहा जाता है। फिल्म की कहानी अमोल पालेकर की है, जो प्यार तो विद्या सिन्हा से करता है लेकिन कभी उसे बता नहीं पाता। फिर उसकी जिंदगी में अशोक कुमार आते हैं, जो उसे अपना प्यार पाने के नुस्खे सिखाते हैं।
    'हेराफेरी' प्रियदर्शन की ऐसी कॉमेड़ी फिल्म थी, जिसने 'बाबूराव आप्टे' की भूमिका से परेश रावल का कद इतना ऊंचा उठा कि कॉमिडी में वह ब्रांड बन गए। इसी फिल्म ने अक्षय कुमार की कॉमिक टाइमिंग से परिचित करवाया। 2000 में परदे पर आई प्रियदर्शन की फिल्म 'हेराफेरी' नए दौर की कॉमेडी को लेकर ट्रेंड सेटर फिल्म कही जा सकती है। इस फिल्म के बाद फिल्मकारों को जैसे कॉमेडी फिल्म बनाने का कोई नुस्खा मिल गया। प्रियदर्शन ने भी इसके बाद इस शैली की कई फिल्में बनाई। फिल्म में अक्षय कुमार, परेश रावल और सुनील शेट्टी मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का हास्य नौसिखए लोगों द्वारा किडनैपिंग का एक अधकचरा प्लान बनाकर पैसे कमाने की मानसिकता से उपजता है। एक क्लासिक 'हेराफेरी' के बाद यहां भी 'हंगामा', 'हलचल', 'गरम मसाला', 'भागमभाग', 'ढोल' और 'दे दना दन' जैसी औसत या खराब फिल्मों की लंबी कतार है। 
   निर्देशक दिबाकर बनर्जी की पहली फिल्म 'खोसला का घोंसला' हिंदी सिनेमा की मॉडर्न क्लासिक कही जाती है। इस फिल्म में सिचुएशनल कॉमेडी है। दर्शकों को लगता है कि फिल्म का कथानक उनकी जिंदगी से कतरनों से गढ़ा गया है। दिबाकर बैनर्जी की यह फिल्म सिनेमा में ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी और सई परांजपे की परंपरा को आगे बढ़ाती है। 1994 में आई 'अंदाज अपना अपना' उस दौर में आई थी, जब कॉमेडी फिल्में लगभग बंद हो गई थीं। राजकुमार संतोषी की यह फिल्म अपने अंदाज और कॉमेडी की परफेक्ट टाइमिंग से दर्शकों को हंसाती है। 2003 में आई फिल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ एक बेहतरीन कॉमेडी फिल्म थी। इस फिल्म में संजय दत्त और अरशद वारसी की एक्टिंग को लोग आज भी याद करते हैं। तीन साल बाद 2006 में इसका सीक्वल 'लगे रहो मुन्नाभाई' भी आया जो खूब चला!
   अनीस बज्मी की 2005 की फिल्म 'नो एंट्री' का हास्य शादी के बाद बनने वाले अफेयर की वजह से शुरू होता है। फिल्म के पात्र अफेयर तो कर लेते हैं, पर उसे सही तरीके से हैंडल न कर पाने की वजह से उनकी हालत बेचारों जैसी हो जाती हैं। 'क्या कूल हैं हम' एक सेक्स कॉमेडी फिल्म थी। इसे पहली सेक्स कॉमेडी फिल्म भी कहा जाता है। फिल्म का हास्य द्विअर्थी संवादों से रचा गया था। फिल्म में द्विअर्थी स्टाईल वाले जो संवाद छुपकर बोले जाते थे, इस फिल्‍म में उनका सरेआम प्रयोग हुआ। फिल्म के कई दृश्य वाकई हास्य पैदा करते हैं। युवाओं के बीच यह फिल्म खूब लोकप्रिय हुई। पंकज पाराशर की 'पीछा करो' एक बेहतरीन हास्य फिल्म थी, लेकिन, वो दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। पंकज आडवाणी की रुकी फिल्म 'उर्फ प्रोफेसर' को कॉमेडी क्लासिक माना जाता है। कमल हासन की पुष्पक, मुम्बई एक्सप्रेस और 'चाची 420' भी पसंद की जाने वाली कॉमेडी   फ़िल्में हैं। 
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निगम-मंडलों में राजनीतिक पुनर्वास के पीछे तीन कारण!

 - हेमंत पाल
    
     कई महीने के लम्बे इंतजार के बाद मुख्यमंत्री ने प्रदेश के निगम, मंडलों और प्राधिकरणों के अध्यक्षों, उपाध्यक्षों और कुछ विकास प्राधिकरणों की घोषणा कर दी। इसमें 25 अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्राधिकरण में तैनाती की गई है। नियुक्तियों की पूरी सूची में सिंधिया समर्थकों की भरमार है, जो स्वाभाविक भी है। क्योंकि, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से विद्रोह किया था, तब उनके साथ भाजपा में आने वालों को सम्मानजनक पद देने का वादा लिया गया था। जो जीते, उन्हें मंत्री बना दिया गया और जो हार गए, उनका राजनीतिक पुनर्वास अब निगम, मंडल के जरिए किया गया है। सिंधिया इसके लिए लम्बे समय से सक्रिय थे और अंततः उन्होंने अपने लोगों को कुर्सियां दिला ही दी। लेकिन, आज घोषित निगम, मंडलों के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों और प्राधिकरण अध्यक्ष के नाम में कुछ नाम चौंकाने वाले हैं। इन नाम की घोषणा से कई भाजपा नेताओं के हाथ के तोते उड़ गए।   
    घोषित की गई इस सूची का एक स्पष्ट संकेत है, कि इसमें तीन तरह के लोगों का ही ध्यान रखा गया। एक तो सिंधिया समर्थकों का, दूसरे नंबर पर वे संगठन मंत्री रहे, जिन्हें पद से हटाया गया था। राजनीतिक पुनर्वास में तीसरे नंबर पर वे लोग रहे, जिन्हें पार्टी के संगठन में जगह नहीं मिल सकी थी। संगठन मंत्रियों के बारे में कहा गया था कि राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश ने शिकायतों के बाद संगठन मंत्रियों को हटाया था। आजकल उनका ठिकाना भोपाल में ही है। इस घटना के बाद इनके पुनर्वास का अंदाजा नहीं था, पर मुख्यमंत्री ने इन्हें निगम, मंडलों और प्राधिकरणों की सूची में शामिल करके सबको चौंका दिया। भाजपा के अंदरखाने की ख़बरें बताती है कि ये सिर्फ मुख्यमंत्री के चाहने से ही हुआ है।  
    निगम-मंडलों में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में आए लोगों को प्राथमिकता दी गई। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने निगम-मंडलों में बहुप्रतीक्षित नियुक्तियों की घोषणा तो कर दी, पर इसने कई मूल भाजपा नेताओं को निराश कर दिया। विधानसभा उपचुनाव में जनता से नकारे गए इमरती देवी, रघुराज कंसाना, गिर्राज दंडोतिया और एंदल सिंह कंसाना को यहाँ उपकृत किया गया है। पिछले साल राज्यसभा चुनावों में हार का सामना करने वाले विनोद गोटिया को भी कुर्सी सौंपी गई। पिछले साल मार्च में सत्ता विद्रोह हुआ था। उसके बाद कोरोनाकाल शुरू हो गया। लेकिन, इस बीच भाजपा की सरकार बनाने के मददगार नेताओं को हाशिए पर रख दिया गया था। लेकिन, ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार अपने समर्थकों के पुनर्वास में लगे रहे। कई बार लगा कि आज या कल में ही घोषणा होगी, पर मसला लगातार टलता रहा। अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकार ने इन पर ध्यान दिया और कुछ को खुश और कुछ को दुखी कर दिया है। 
     पूर्व मंत्री और ज्योतिरादित्य सिंधिया की घनघोर समर्थक इमरती देवी को मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के अध्यक्ष जैसा बड़ा पद दिया गया। एंदल सिंह कंसाना स्टेट एग्रो इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। रघुराज कंसाना मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम के अध्यक्ष होंगे और अजय यादव को उपाध्यक्ष बनाया गया। राज्यसभा चुनाव में हारे विनोद गोटिया को पर्यटन विकास निगम का अध्यक्ष और नरेंद्र सिंह तोमर को उपाध्यक्ष पद दिया गया। कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे गिर्राज दंडोतिया को मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया। जबकि, जसवंत जाटव को राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम का अध्यक्ष का पद दिया गया। 
     जयपाल चावड़ा को इंदौर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है। ध्यान देने वाली बात यह कि जयपाल सिंह चावड़ा इंदौर के नहीं, बल्कि देवास के निवासी हैं! पर, उन्हें इंदौर विकास प्राधिकरण की कुर्सी सौंपी गई। ये नियुक्ति इसलिए भी चौंकाने वाली है कि इंदौर के नेताओं को हाशिए पर रखकर ये नियुक्ति हुई। रणवीर जाटव को संत रविदास मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। पूर्व संगठन मंत्री शैलेंद्र बरुआ अब पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष होंगे और प्रहलाद भारती उपाध्यक्ष। मुन्नालाल गोयल राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम के अध्यक्ष और राजकुमार कुशवाहा को उपाध्यक्ष बनाया गया है। 
    सावन सोनकर को अध्यक्ष राज्य सहकारी अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम और रमेश खटीक को इसी निगम में उपाध्यक्ष बनाया है। जबकि, नागरिक आपूर्ति निगम में उपाध्यक्ष राजेश अग्रवाल को बनाया गया। राजेश अग्रवाल बदनावर के नेता हैं और ये कई बार विधायक का टिकट मांग चुके हैं। लेकिन, इन्हें कभी नहीं मिला। एक बार इन्होंने पार्टी से विद्रोह करके निर्दलीय चुनाव भी लड़ा था। राजवर्धन दत्तीगांव के उपचुनाव के समय उन्हें मुख्यमंत्री समेत कई भाजपा नेताओं ने आश्वस्त किया था कि उन्हें कोई बड़ा पद दिया जाएगा। उसी का नतीजा है कि उन्हें निगम में उपाध्यक्ष बनाया गया।
    सावन सोनकर के नाम का अनुमान किसी को अनुमान नहीं था। वास्तव में उन्हें भी सिंधिया समर्थकों की सूची में शामिल माना जा सकता है। बताते हैं कि सांवेर में तुलसी सिलावट के उपचुनाव में सावन सोनकर और राजेश सोनकर ने उनकी मदद की थी। राजेश सोनकर को तो जिला भाजपा अध्यक्ष बना दिया गया, अब सावन सोनकर को उसी प्रतिबद्धता का इनाम मिला है। इससे स्पष्ट संदेश जाता है, कि भाजपा में पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता से ज्यादा बड़े नेताओं से निकटता फायदा देती है। उपचुनाव हारे सिंधिया जिन समर्थकों को इस सूची में जगह दी गई उनमें राज्य बीज और फार्म विकास निगम में अध्यक्ष बनाए गए मुन्नालाल गोयल भी हैं। राजकुमार कुशवाहा को इसी निगम में उपाध्यक्ष बनाया गया। पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम में रघुराज कंसाना को अध्यक्ष और अजय यादव को उपाध्यक्ष बनाया गया। 
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Friday, December 17, 2021

तांगे के पहियों पर सवार फिल्मों का वो जमाना

- हेमंत पाल

   सिनेमा का स्वरूप सवा सौ साल में पूरी तरह बदल गया। यह बदलाव केवल फिल्मों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। बल्कि, फिल्मों की पृष्ठभूमि और फिल्मों में दिखाए जाने वाले दृश्यों में भी दिखाई देने लगा है। आने-ने के जो साधन पहले की फिल्मों में दिखाई देते थे, वे भी बदल गए। इतने बदले कि दृश्य से ही गायब हो गए। ऐसा ही एक साधन तांगा, जो लम्बे समय तक फिल्मों में कहानी का हिस्सा बना रहा, पर आज कहीं दिखाई नहीं देता। ब्लैक एंड व्हाइट से लगाकर कई हिट रंगीन फिल्मों तक में दर्शकों ने फ़िल्म के कई दृश्यों और गीतों में तांगा देखा होगा! पर, कई सालों से ये अनोखा साधन गायब हो गया। तांगे पर फिल्मों के कई रोमांटिक दृश्य और गाने फिल्माए गए थे। यहाँ तक कि लड़ाई के दृश्यों में भी फिल्मकारों ने तांगे का उपयोग किया, पर आज इसकी जगह कार रेस ने ले ली। कभी फिल्मों की शान रहने वाला तांगा अब परदे के साथ ही सड़कों से भी नदारद हो गया। पहले जब फ़िल्में पेटियों में बंद होकर सिनेमाघर आती थी, तब भी तांगा ही इन्हें लेकर आता रहा, पर आज ये सब नहीं होता!      
      सिनेमा का दौर कोई भी रहा हो, इक्का या तांगा दिखाई दे ही जाता था। ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने में तो तांगा ही आने-जाने का साधन हुआ करता था। फिल्म के परदे के अलावा रियल लाइफ में फिल्मी कलाकारों की दिलचस्पी इक्के की सवारी में देखने को मिलती रही। ज्यादा दिन नहीं हुए जब देश के विभिन्न हिस्सों में इक्को और तांगों का बोलबाला था। उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में अगर इक्के खूब चलते थे, तो पश्चिमी क्षेत्र में सवारी के नाम पर तांगे देखे जा सकते थे। लखनऊ में तांगे और इक्के दोनों का प्रचलन था और मुंबई की विक्टोरिया भी तांगे का ही एक आलीशान रूप था। असल जिंदगी मे भी कभी लखनवी तांगे फिल्म अभिनेताओं को इतने पसंद थे कि जब कभी उनको लखनऊ आने का मौका मिलता, वे उन पर सफर करने का मौका नहीं चूकते। मोतीलाल, कुंदनलाल सहगल, किशोर साहू और प्रेम अदीब जैसे दिग्गज कलाकार लखनऊ आने पर आने-जाने के लिए हमेशा इन इक्कों-तांगों का ही इस्तेमाल करते थे। 
      उस जमाने के प्रसिद्ध कथाकार अमृतलाल नागर इस दिशा में उनके मार्गदर्शक हुआ करते थे। मुंबई प्रवास के दौरान उन्होंने इतने लोगों को अपना प्रियजन बना रखा था, कि जब भी किसी को मौका मिलता, वह नागर जी का सानिध्य पाने लखनऊ पहुंच जाता था। नागरजी भी उसे भांग के गोलों के साथ लखनऊ की गली-कूचों की परिक्रमा कराने में पीछे नहीं रहते! ऐसे मौकों पर नागरजी के सहायक होते थे, संवाद लेखक ब्रजेंद्र गौड़ के बड़े भाई धर्मेंद्र गौड। नागर जी के साथ ही धर्मेंद्र गौड ने भी अपना काफी समय मुंबई में बिताया था और उस जमाने के करीब सभी कलाकारों के साथ व्यक्तिगत दोस्ती थी। उनका फोटो-अल्बम इस बात की गवाही देता था, कि उन्होंने कितनी फिल्मी हस्तियों को तांगे की सवारी कराई। सुनील दत्त ने भी इस परंपरा को दमखम के साथ जारी रखा। वे उत्तर प्रदेश के समारोहों में भाग लेने जाने के पहले आयोजकों को सूचित कर देते थे, कि उनके लिए एक तांगे का इंतजाम किया जाए ताकि वे खाली समय में तांगे की सवारी का लुत्फ उठा सके। तांगे की सवारी का लुत्फ उठाने वालों में पृथ्वीराज कपूर से लेकर चेतन आनंद, देव आनंद, सुचित्रा सेन, माला सिन्हा, संजीव कुमार और शशि कपूर जैसे कलाकार भी शामिल है।

     तांगों ने न केवल कलाकारों को ही नहीं घुमाया, बल्कि फि की कहानियों में भी हिस्सेदारी निभाई। बीआर चोपड़ा की कालजयी फिल्म 'नया दौर' इस विषय पर बनी सबसे सशक्त फिल्म थी। इसमें मशीन और इंसान के बीच के मुकाबले में तांगे का ख़ास तौर पर इस्तेमाल किया गया था। इंसान और उसका तांगा मशीनी मोटर गाड़ी को कैसे हराता है, इसका दिलचस्प वाकया ही फिल्म की थीम थी। इसमें दिलीप कुमार ने तांगे वाले की भूमिका को इतने सशक्त तरीके से निभाया था, कि उनके बाद कई कलाकार तांगे वाला बनकर फिल्मों में आने लगे। इनमें राजेन्द्र कुमार से लेकर महमूद तक शामिल रहे। 1972 में आई फिल्म 'तांगे वाला' में राजेन्द्र कुमार ने मुमताज के साथ तांगे पर बैठकर फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाया था। अमिताभ ने 'मर्द' में तांगा क्या चलाया बाद में 'मर्द तांगे वाला' नाम से भी फिल्म बन गई थी। लेकिन, 1975 में आई 'शोले' में बसंती का तांगा खूब चला। फिल्म में हेमा मालिनी तांगा चलाती है और धर्मेन्द्र साइकिल चलाते हुए गीत गाते हैं 'कोई हसीना जब रूठ जाती है तो है, तो और भी हसीन हो जाती है' के जरिए प्रेमिका को मनाने का प्रयास कर रहे हैं। हेमा मालिनी इस रोल में इतनी लोकप्रिय हुई कि उन्हें बसंती नाम से पहचाना जाने लगा। 
      एक जमाना था, जब तांगों पर फिल्माए जाने वाले गीतों ने बहुत लोकप्रियता अर्जित की थी। ओपी नैयर ऐसे संगीतकार थे, जो तांगे और घोड़ों की टॉप पर बने गीतों के कारण अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब हो गए थे। उनके गीतों में 'तुमसा नहीं देखा' और 'फिर वही दिल लाया हूं' के टाइटल गीत आज भी याद किए जाते हैं। इन गीतों को बाद में सलमान खान और आमिर खान की फिल्म 'अंदाज' में ऐ लो जी सनम हम आ गए में दोहराया गया। इसके अलावा ओ पी नैयर ने पिया पिया बोले, ये क्या कर डाला तूने में तांगा गीतों की परम्परा को कायम रखा था। तांगे और बग्घी पर फिल्माए गीतों में वैजयंती माला की 'नया दौर' का जिक्र न हो, तो बात अधूरी लगती है। इस फिल्म में तांगा चलाते हुए दिलीप कुमार को उनके पास बैठी वैजयंती माला 'मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार' गाते हुए अपनी जिंदगी की मनोकामना पूरे होने का अहसास दिलाती हैं। ऐसा ही एक गीत मनोज कुमार व शर्मिला टैगोर पर 'सावन की घटा' में फिल्माया गया था। इस गीत में शर्मिला मनोज कुमार से प्रेम की गाड़ी को हौले हौले चलाने की गुजारिश करती हैं। गीत के बोल थे 'जरा हौले-हौले चलो मोरे साजना हम भी पीछे हैं तुम्हारे' था।
    इसके अलावा 1963 में आई फिल्म 'प्यार का बंधन' में राजकुमार पर फिल्माया गया गीत 'मैं हूं अलबेला तांगेवाला' भी खूब लोकप्रिय हुआ था। 'जीत' में तांगे वाले रणधीर कपूर से मुमताज कहती है 'चल प्रेम नगर जाएगा बतलाओ तांगे वाले।' इसके बाद तांगे की सवारी करते हुए गुलजार ने फिल्म 'परिचय' में बेहतरीन गीत फिल्माया था। इस गीत के बोल भी गुलजार ने ही लिखे थे। इस गीत के बोल नायक की जिंदगी के फलसफे को बयां करते हैं, जिसमें नायक कहता है 'मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना मुझे चलते जाना है।' यह पूरा गीत गुलजार ने तांगे पर ही फिल्माया था। आज फिल्मों से भले ही तांगे गायब हो गए है लेकिन दर्शकों की यादों में यह हमेशा बने रहेंगे।
    फिल्मों में जान फूंकने के लिए कई बार स्टंट्स सीन डाले जाते हैं, ये सीन रोमांचक भी बन जाते हैं। लेकिन, इस वजह से कई बार कलाकारों की जान पर भी बन आती है। ऐसा ही कुछ 'नया दौर' की शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार के साथ हुआ। वे एक सीन में बड़े हादसे का शिकार होने से बचे थे। जब 'नया दौर' की शूटिंग हो रही थी और उसमें तांगे पर सवार होकर मोटरगाड़ी से रेस लगानी थी। इस दौरान दिलीप कुमार के हाथ से घोड़े की लगाम छूट गई! तांगे की रफ्तार भी तेज थी। डायरेक्टर की नजर पड़ी, तो वे चौंक गए। सब दिलीप कुमार की मदद के लिए आगे आए, मगर वे हड़बड़ाए नहीं। उन्होंने सूझबूझ से काम लिया और घोड़े की और झुके और धीरे से मौका पाकर लगाम को पकड़ा लिया, अब तांगा उनके कंट्रोल में था। लेकिन, अब न तांगा बचा और न दिलीप कुमार जैसे जांबाज एक्टर जो विपरीत परिस्थितियों को भांपकर दृश्य को जीवंत बना सकें।  
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Friday, December 10, 2021

सच्चाई से अलग है फिल्मों में गढ़ा इतिहास!

- हेमंत पाल 

   एक इतिहास वो होता है, जो किताबों में दर्ज होता है। जिसकी तथ्यात्मकता पर किसी को कभी संदेह नहीं होता। क्योंकि, कहीं न कहीं उस इतिहास के प्रमाण मौजूद होते हैं। हर देश का अपना इतिहास होता है, उसी तरह हमारे देश का भी सदियों पुराना इतिहास है। हमारे इतिहास में रोचकता का पुट ज्यादा है, क्योंकि यहाँ कई पड़ौसी देशों के शासकों ने घुसपैठ की! हमारे राजाओं से उनकी लम्बी लड़ाइयां हुई और फिर अंग्रेजों के शासनकाल में भी ये इतिहास कुछ अलग तरह से नजर आया। लेकिन, वो इतिहास हमारे उस फ़िल्मी इतिहास से बहुत अलग है, जो परदे पर दिखाया जाता रहा है। इतिहास की एक छोटी सी घटना को फ़िल्मी कथानक बनाकर दर्शकों के सामने परोसा जाता रहा है। फ़िल्मी इतिहास में हमेशा की तरह नायक अजेय रहता है और प्रेम उसके चरित्र का हिस्सा होता है। अभी तक इतिहास को दर्शाने वाली जितनी भी फ़िल्में बनी, सभी वास्तविक इतिहास से बहुत परे रहीं! ऐसी फिल्मों में 'मुग़ले आजम' भी बनी, जिनका इतिहास से कोई वास्ता नहीं रहा! ये पूरी तरह काल्पनिक कथानक था, जिसे दर्शकों ने सच्ची कहानी समझा! दरअसल, इन फिल्मों के कथानकों को दर्शकों की पसंद के अनुसार ढाला जाता रहा है। यही कारण रहा कि कई ऐसी फिल्मों की कहानियों पर उंगली भी उठाई गई, जिनकी ऐतिहासिकता में सत्यता का दावा किया गया था।      
      आजादी से पहले और बाद में बनी ऐतिहासिक फ़िल्में वास्तविकता के कितने करीब होती हैं, इसका कोई दावा नहीं कर सकता। क्योंकि, इन फिल्मों को इतिहास के तथ्यात्मक साक्ष्य के रूप में कभी नहीं देखा गया। इतिहास के जानकारों का कहना है कि ऐतिहासिक फिल्में ज्यादातर किस्सों और किंवदंतियों के आधार पर गढ़ी जाती हैं। इनमें कभी इतिहास की प्रामाणिकता नहीं खोजा जा सकता। दर्शकों को बांधने के लिए लेखक कई स्रोतों से सामग्री जुटाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि फिल्मों में दिखाया जाने वाला इतिहास कभी अधिकृत नहीं होता। फ़िल्मकार फ़िल्मी इतिहास को रोमांटिक बनाकर उसे नॉस्टेल्जिया की तरह पेश करते हैं। सामान्यतः ऐसी फिल्मों में प्रासंगिकता से ज्यादा दर्शकों का ध्यान रखा जाता है। रिश्तों और संबंधों के लिहाज से सबकुछ फिल्मी होता है। इन फिल्मों का सबसे बड़ा आकर्षण होता है भव्य फिल्मांकन, बड़े-बड़े आलिशान सेट और युद्ध के लम्बे दृश्य।  
   इतिहास के फिल्मीकरण के भी दो तरह के पहलू रहे हैं। एक आजादी से पहले वाला, दूसरा आजादी के बाद वाला! आजादी से पहले देश के इतिहास को देखने और दिखाने का नजरिया अलग था। दर्शकों में यह अहसास भरा जाता था, कि हमारा इतिहास गौरवपूर्ण था। फिल्मकारों की यह भावना भी रहती थी, कि ऐसी फ़िल्में अंग्रेजों शासकों के खिलाफ दर्शकों को प्रेरित करें। यही कारण रहा कि कई बार फिल्मकारों को सेंसर से जूझना पड़ता था। सेंसर के दबाव में कई फिल्मों के नाम और गीत बदले गए थे। उस समय राष्ट्रीय भावनाएं भी चरम पर थी। ऐसे में स्वाभाविक है, कि फ़िल्मकारों में भी वही भावनाएं होंगी। आज़ादी से पहले कई ऐसी फ़िल्में बनी जिनका वास्ता इतिहास से रहा। इनमें 'बाबर' के निर्देशक वजाहत मिर्ज़ा थे। कमल रॉय ने 'शहंशाह अकबर' बनाई थी।
    महबूब खान ने 'हुमायूं', एआर कारदार ने 'शहंशाह', जयंत देसाई ने 'तानसेन और 'चन्द्रगुप्त' बनाई थी। इस समय काल में ‘रामशास्त्री’ (1944) भी एक यादगार फिल्म थी। इसमें गजानन जागीरदार ने जज रामशास्त्री की भूमिका निभाई थी। रामशास्त्री ने एक पेशवा को उसके भतीजे की हत्या के जुर्म में  सजा दी थी। इस दौर में हिमांशु राय और देविका रानी की ‘कर्मा’, जेबीएच वाडिया की 'लाल-ए-यमन', देवकी बोस की 'पूरण भगत' और 'मीरा बाई' फ़िल्में भी 1933 में आईं। ये वे फ़िल्में थीं, जिनका कथानक देशी और विदेशी राज परिवारों से संबंधित था। पीसी बरुआ की 'रूप लेखा' में केएल सहगल ने सम्राट अशोक की भूमिका निभाई थी। पसंद की गई कुछ मूक ऐतिहासिक फिल्मों को बाद में बोलती फिल्मों के रूप में भी बनाया गया। 1930 में बनी 'आदिल-ए-जहांगीर' को 1934 में फिर बनाया गया। रोचक बात यह है कि 1955 में जीपी सिप्पी ने इसी कहानी पर प्रदीप कुमार और मीना कुमारी के साथ इस फिर को फिर से बनाया था। 
     देश की आज़ादी से पहले मुंबई, पुणे और कोल्हापुर फिल्म निर्माण के प्रमुख केंद्र थे। मराठी फिल्मकारों ने इन फिल्मों में मराठा इतिहास और समाज के चरित्रों को प्रमुखता दी। मराठी के साथ उन्होंने हिंदी में भी ऐसी फिल्मों का निर्माण किया था। इनमें वी शांताराम, दामले और जयंत देसाई जैसे नाम प्रमुख थे। उन्होंने पेशवाओं, सेनापतियों और राज साम्राज्यों से जुड़े कई व्यक्तियों पर फ़िल्में बनाई। ये वे फ़िल्में थीं, जिनमें अंग्रेजी साम्राज्य में देश की अस्मिता और गौरव के रूप में भी प्रकट होती थीं। इसी समय काल में एआर कारदार ने 'चन्द्रगुप्त' फिल्म बनाई। इस फिल्म में गुल हामिद, सबिता देवी और नज़ीर अहमद खान ने भूमिकाएं निभाई थीं। इसकी सफलता ने एआर कारदार को कोलकाता में स्थापित कर दिया था। केएल सहगल के साथ पहाड़ी सान्याल और प्रेमांकुर एटोर्थी ने 'यहूदी की लड़की' का निर्देशन किया। यह फिल्म एक कश्मीरी के नाटक पर बनी थी। 
    सोहराब मोदी की 1939 में आई फिल्म 'पुकार' की कहानी बादशाह जहांगीर के न्याय पर बनी थी। आजादी से पहले उन्होंने सिकंदर, पृथ्वी वल्लभ, झांसी की रानी, मिर्जा ग़ालिब और 'एक दिन का सुलतान' जैसी फ़िल्में बनाई। उन्होंने भव्य फिल्मों से ऐतिहासिक फिल्मों का ऐसा मानदंड स्थापित किया था, जो मिसाल बन गया। लेकिन, उनकी फिल्मों में भी इतिहास कम और ड्रामा ज्यादा होता था। 'सिकंदर' उनकी सबसे सफल फिल्मों में एक थी। 1953 में बनी 'झांसी की रानी' का निर्देशन भी सोहराब मोदी ने ही किया था। यह फिल्म अंग्रेजी भाषा में भी डब की गई थी, जिसे 1956 में रिलीज किया गया। 1960 में बनी 'मुगले आजम' इस कथानक की सबसे सफल फिल्मों में एक है। यह फिल्म रिलीज तो 1960 में हुई थी, लेकिन इस पर काम 1944 में ही शुरू हो गया था। 
     आज के संदर्भ में ऐतिहासिक फिल्मों को देखा जाए तो आशुतोष गोवारिकर की फिल्म 'पानीपत' में 17वीं शताब्दी में अफगान सेना और मराठों के बीच हुई पानीपत की जंग को दर्शाया गया था। 'तख्त' में भी ऐतिहासिकता का पुट था। जबकि, 'पृथ्वीराज चौहान' अभी आने वाली है। मणिकर्णिका, पद्मावत और 'बाजीराव मस्तानी' फिल्में रिलीज हो चुकी है। 1983 में बनी 'रजिया सुल्तान' का निर्देशन और लेखन कमाल अमरोही ने किया था। महिला सुल्तान के पर आधारित इस फिल्म में उसे एक दास से प्यार हो जाता है, जिसके चलते वह राजपाट खो देती है। इसके बाद 2001 में 'अशोका' बनी। इसमें शाहरुख खान ने सम्राट अशोक का किरदार निभाया था। 2005 में आई 'मंगल पांडे' का कथानक क्रांतिकारी मंगल पांडे की 1857 की क्रांति पर आधारित था। फिल्म में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के भारतीय मूल के सिपाही मंगल पांडे का किरदार आमिर खान ने निभाया था। 
     2008 में आई 'जोधा अकबर' का निर्देशन आशुतोष गोवारिकर ने किया था। इसमें ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय ने मुख्य किरदार निभाए थे। 2015 में बनी 'बाजीराव मस्तानी' की कहानी पेशवा बाजीराव और उसकी दूसरी पत्नी मस्तानी के पर बनी है। संजय लीला भंसाली की इस फिल्म में रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण ने मुख्य किरदार निभाए हैं। 2018 में आई संजय लीला भंसाली की ही 'पद्मावत' को लेकर काफी विवाद हुआ था। शुरू में फिल्म का नाम 'पद्मावती' रखा गया था। फिल्म में दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह और शाहिद कपूर मुख्य किरदार में थे। 2019 में आई 'मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी' में कंगना रनौत ने रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभाया है। यह फिल्म 1857 की क्रांति पर बनी थी। आज़ादी के पहले बनी ऐतिहासिक फिल्मों ने जरूर मनोरंजन के साथ इतिहास से परिचय कराया। लेकिन, ऐसी फ़िल्में महज दर्शकों की संतुष्टि के लिए होती है। वास्तव में तो ये ऐतिहासिक फिल्में सच्ची घटनाओं की काल्पनिक कहानियां कही जा सकती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं! इसलिए फिल्मकारों की सोच और मानसिकता को ध्यान में रखें, तो इन ऐतिहासिक फिल्मों को लेकर होने वाले विवादों की सच्चाई आसानी से समझी जा सकती है। 
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