Thursday, October 31, 2019

झाबुआ उपचुनाव में हार से भाजपा ने क्या सबक सीखा!

- हेमंत पाल 

भारतीय जनता पार्टी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उसे चुनावी हार बर्दाश्त नहीं होती! पार्टी के नेताओं में इतना ज्यादा आत्मविश्वास घर कर गया है, कि उन्हें चुनाव की रणनीति बनाते समय इस बात का अहसास ही नहीं होता कि पांसा पलट भी सकता है! इसे अतिआत्मविश्वास के बजाए घमंड कहना ज्यादा ठीक होगा! क्योंकि, पार्टी के नेता कभी रणनीति को मतदाताओं के नजरिए से देखने की कोशिश नहीं करते! बल्कि, मतदाताओं को अपनी रणनीति के मुताबिक ढालने की कोशिश में रहते हैं! झाबुआ विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव इसका सबसे सटीक उदाहरण है! अब, जबकि नतीजा उल्टा पड़ा तो पार्टी बिफर गई! चारों तरफ हार के गुनहगारों की खोज होने लगी और उंगली उठने लगी! जबकि, ये महज  भाजपा उम्मीदवार की नहीं, पार्टी की नीतिगत हार है! पार्टी को पूरे प्रदेश के चुनाव और उपचुनाव के फर्क को भाजपा समझना होगा! ऐसे बहुत से कारण हैं, जिन पर पार्टी को नए सिरे से सोचना होगा!        
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   झाबुआ उपचुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के बाद पार्टी में इन दिनों घमासान मचा है! भाजपा ने जिस तरह ये उपचुनाव लड़ा, वो रणनीति ही गलत थी! मुद्दे की बात ये कि भाजपा ने स्थानीयता को पूरी तरह भुला दिया! झाबुआ वो इलाका है, जहाँ कि आबादी का 80% हिस्सा आदिवासी है! लेकिन, भाजपा के नेता कश्मीर, पाकिस्तान, सर्जिकल स्ट्राइक जैसी भारी भरकम बात करते दिखाई दिए! इसके अलावा उन्होंने कमलनाथ सरकार पर किसानों की कर्ज माफ़ी के लिए कोसने में कमी नहीं की! ये पूरी रणनीति भाजपा पर भारी पड़ गई! क्योंकि, कांग्रेस ने भाजपा उम्मीदवार भानु भूरिया के परिजनों की कर्ज माफ़ी के दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए! भाजपा नेताओं की बयानबाजी भी उनके गले पड़ गई! विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता गोपाल भार्गव के उस बयान की खासी प्रतिक्रिया हुई जब उन्होंने कहा था कि यदि कांग्रेस जीती तो पाकिस्तान के प्रतिनिधि की जीत मानी जाएगी! नतीजे आने के बाद उनके पास अब क्या जवाब होगा? इस हार के लिए अब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान, संभागीय संगठन मंत्री जयपाल सिंह चावड़ा के साथ चुनाव संचालक कृष्णमुरारी मोघे को जिम्मेदार माना जा रहा है! देखा जाए तो इसमें कुछ गलत नहीं है! कहीं न कहीं ये सभी इस हार के लिए जिम्मेदार तो हैं!       
   भाजपा की हार के बाद वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा ने कहा कि पार्टी में आतंरिक संवाद की कमी है। संगठन को इस हार के लिए आत्मनिरीक्षण करना चाहिए! सरकार से हटने के बाद के हालत को अभी पार्टी आत्मसात नहीं कर पाई है। सीधी से भाजपा के विधायक केदारनाथ शुक्ल ने भी झाबुआ के नतीजे आने के बाद इसे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की असफलता बताते हुए उन्हें हटाने की मांग की! रघुनंदन शर्मा ने कहा कि प्रदेश भाजपा में संवाद की कमी है। झाबुआ उपचुनाव के बारे में वरिष्ठ नेताओं से सलाह-मशविरा नहीं किया गया। संवाद के अंतर को कम किया जाना चाहिए। संवाद में कमी, संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी है। विधायक केदारनाथ शुक्ल ने कहा कि मुझे लगता है पार्टी के प्रबंधन में भी कमी आई है। खराब चुनाव परिणाम पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की विफलता और खराब प्रदर्शन है। केद्रीय नेतृत्व को उन्हें तुरंत पद से हटा देना चाहिए। अब पार्टी शुक्ल से उनके बयान पर पूछताछ करेगी, पर जो मूल समस्या है, उस पर शायद कान न धरे! 
   दरअसल, पार्टी के नेताओं के अतिआत्मविश्वास का इलाज सिर्फ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को बदलने से नहीं होगा! इलाज तो उन सारे नेताओं का किया जाना चाहिए, जिनके दिमाग से अभी डेढ़ दशक की सत्ता की खुमारी नहीं गई है! उन्हें बदमिजाजी, उटपटांग बयानबाजी और मतदाताओं को कमअक्ल समझने की गलती से उबरना होगा! इस पूरे उपचुनाव में भाजपा के प्रचार अभियान और रणनीति का आकलन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि पार्टी ने कब, कहाँ और क्या गलतियां की है! झाबुआ आदिवासी क्षेत्र जरूर है, पर राजनीतिक जागरूकता के मामले में इसे किसी बड़े शहर के क्षेत्र से कमतर नहीं आँका जा सकता! भाजपा को अपनी हार के आकलन में सिर्फ रणनीति की बात नहीं करना चाहिए, बल्कि नेताओं के भाषण और बाहर से गए नेताओं और  कार्यकर्ताओं की भूमिका को भी परखना चाहिए! इस बात का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए कि क्या उपचुनाव में बाहरी नेताओं और कार्यकर्ताओं को उस क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में हाईजैक करने भेजा जाना चाहिए? क्योंकि, झाबुआ में दो बार हुए उपचुनाव में ये प्रयोग असफल हो चुका है!   
   इस उपचुनाव में हार के बाद भाजपा में बड़े नेताओं का विरोध कुछ ज्यादा ही दिखाई दिया! मुखरता से संगठन की संवादहीनता और सटीक प्रचार में कमी की बात कही जा रही है। राकेश सिंह के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान समेत कई नेताओं पर निशाना साधा जा रहा है। बताते हैं कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इन बातों को गंभीरता से लिया है। ये स्वाभाविक भी है! करीब 28 हजार वोटों की हार कम नहीं होती। शिवराज सिंह के बारे में कहा जा रहा है कि वे अपने आपको 'मामा' कहते हैं। उनका खुद का ये मानना है कि झाबुआ में उनको ख़ास सम्मान की नजर से देखा जाता है। लेकिन, उनका जादू भी झाबुआ में नहीं चला। अब उन्हें भी अपनी अंतरात्मा में झांकने और समझने की जरूरत है कि उनका जादू अब उतर गया! उन्हें अपने भाषणों में अब भांजों, भांजियों की बात नहीं करना चाहिए! उन्हें समझना होगा कि अब वे मुख्यमंत्री नहीं हैं, उनकी बातों में अब वजन भी नहीं रहा!
  भाजपा के लिए झाबुआ सीट को जीतना जरुरी था! क्योंकि, 230 सदस्यों की विधानसभा में सत्ता संतुलन के लिहाज से यह सीट महत्वपूर्ण थी। कमलनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में सरकार चला रही कांग्रेस के पास सदन में 114 विधायक थे। कांग्रेस बहुमत के आंकड़े (116) से दो सीट दूर थी! झाबुआ की जीत से वो कुल सीटों के आधे पर आ गई! 4 निर्दलीय, 2 बहुजन समाज पार्टी और एक समाजवादी पार्टी के विधायक की मदद से वह गठबंधन की सरकार चला रही है। ये बात अलग है कि सरकार पर असुरक्षाबोध का साया था! जब से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी, भाजपा के नेताओं ने कई बार सरकार के तख्तापलट के दावे किए! ये बातें झाबुआ में भी सुनी गई! भाजपा नेता गोपाल भार्गव ने ये तक कहा गया कि चुनाव के बाद कमलनाथ सरकार गिरा दी जाएगी और शिवराज सिंह फिर मुख्यमंत्री बनेंगे! लेकिन, अब सभी नेताओं की जुबान पर लगाम लग गई! हार के बाद पूरी पार्टी में नीम सन्नाटा है! वास्तव में झाबुआ सिर्फ एक उपचुनाव नहीं था! इस जीत ने कांग्रेस के आत्मविश्वास को दोगुना कर दिया और भाजपा के पैरों के नीचे से संभावनाओं की जमीन खींच ली!
  आम तौर पर उपचुनाव पार्टियों की साख के सवाल पर लड़े जाते हैं! लेकिन, झाबुआ का उपचुनाव सत्ता का था! इसीलिए इस उपचुनाव का महत्व ज्यादा था। दोनों पार्टियों ने ताकत लगाने में कोई कमी नहीं छोड़ी! भाजपा के लिए इस एक सीट का महत्व इतना था कि इसे जीतने के लिए उसने आदिवासी इलाके में भी अपने चिर-परिचित राष्ट्रवाद के हथकंडे तक को आजमाने में कसर नहीं छोड़ी! कमलनाथ ने भी कई बार झाबुआ का दौरा किया और क्षेत्रीय विकास के लिए अरबों की योजनाओं की घोषणाएं की। विधानसभा में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा सिर्फ 5 सीट पीछे थी! उसके नेताओं को उम्मीद थी कि वे सरकार को समर्थन दे रहे 7 गैरकांग्रेसी और एकाध किसी कांग्रेसी विधायक को तोड़कर भविष्य में कमलनाथ सरकार को गिरा सकते हैं! संभव है कि ऐसी कोई रणनीति बनी भी होगी! यही कारण था कि उपचुनाव के बाद भाजपा सरकार बनने के शिगूफे छोड़े गए! लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ! न नौ मन तेल हुआ, न राधा नाची! 
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Monday, October 28, 2019

परदे के पीछे चलता अंतहीन कोल्डवार!

- हेमंत पाल

   संजय लीला भंसाली की फिल्म 'इंशाअल्लाह' को सलमान खान ने बीच मझधार में छोड़ दिया। जबकि, इस फिल्म की शूटिंग शुरू हो चुकी थी और  नायिका आलिया भट्ट पर फिल्म का एक गीत भी फिल्माया जा चुका था। फिल्म के डिब्बा बंद होने का कारण सलमान और भंसाली के बीच क्रिएटिव दखलंदाजी बताया गया! सलमान कहानी को ही बदलना चाहते थे! वे चाहते थे कि 'इंशाअल्लाह' में प्रेम कहानी का हिस्सा लंबा रखा जाए, जिसके लिए भंसाली तैयार नहीं थे! फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों आपसी और प्रोड्यूसर, डायरेक्टर्स के बीच खींचतान के किस्से कम नहीं हैं! रिश्तों में एक-दूसरे में गुंथी इस दुनिया में मतभेदों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है। कुरेदा जाए तो हर फिल्म में कहीं  ऐसी स्थितियां बनती हैं! कुछ संभल ली जाती हैं, कुछ बिगड़ जाती हैं! लेकिन, जब बड़े कलाकारों या फिल्मकारों के बीच तनातनी होती है, तो वो इंडस्ट्री में खबर बनते देर नहीं लगती! लेकिन, सलमान खान जैसे कुछ ही एक्टर हैं, जिनके साथ कई विवाद जुड़े हैं। ये सितारों के बीच चलने वाला वो कोल्डवार है, जो बाॅलीवुड में बरसों से चला आ रहा है। 
   संजय दत्त की बायोपिक 'संजू' का ट्रेलर देखकर सलमान खान की प्रतिक्रिया थी कि मेरे दोस्त संजू की भूमिका कोई दूसरा अभिनेता कैसे कर सकता है? इस पर सलमान से खौफ खाने वाले रणबीर कपूर ने पलटवार किया कि अभी तक किसी अभिनेता ने अपनी ही बायोपिक मे काम नहीं किया है। सलमान और रणबीर की यह तनातनी भले ही केटरीना के कारण हो, लेकिन यह इकलौता या नया मामला नहीं है। सलमान इससे पहले एश्वर्या को लेकर विवेक ओबेराय और शाहरूख तक से भिड़ चुके हैं। रणबीर के दादा राजकपूर भी ऐसी तनातनी से बच नहीं पाए। वैसे तो राजकपूर का बाॅलीवुड में इतना दबदबा था कि कोई दूसरा कलाकार उनसे पंगा मोल नहीं ले पाता था। लेकिन, जाने-अनजाने में देवआनंद उनसे पंगा ले बैठे थे! कम ही लोग जानते हैं कि सुनील दत्त और नर्गिस की शादी करवाने में देवआनंद का बड़ा हाथ था। यही बात राजकपूर को खल गई और उनके बीच एक अदृश्य तनाव देखा गया था! ये तब तक चला, जब राज कपूर ने देवआनंद की सबसे प्यारी नायिका जीनत अमान को उनसे छिन नहीं लिया। संयोग है कि उसी दिन देव आनंद भी जीनत को लेकर एक बड़ी घोषणा करने वाले थे! दिलीप कुमार का इस त्रिमूर्ति में तो किसी से विवाद नहीं रहा, लेकिन उनकी काॅपी करने वाले राजेन्द्र कुमार उनके मतभेद कायम रहे! इसका कारण था उनकी बीबी और राजेन्द्र कुमार की प्रेमिका सायरा बानो। 
  आपसी खींचतान के इस सिलसिले को राजकुमार ने भी खूब पोषित किया। वे बात-बात पर हर किसी से भिड़ लेते थे और लोगों को कोई मसालेदार किस्सा सुनने को मिल जाता! उनका मानना था कि बाॅलीवुड मे यदि कोई 'कुमार' है तो वह सिर्फ राज कुमार! प्रकाश मेहरा से लेकर फिरोज खान तक उनका कोल्डवार चर्चित रहा है। अमिताभ का तो नाम ही एंग्रीयंग मैन था, इसलिए उनका विवाद कई सितारों से हुआ! इनमें राजेश खन्ना ,धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिंहा तक शामिल हैं। हालांकि, उनकी बेटी कपूर परिवार की बेटी के घर ब्याही है! लेकिन, करिश्मा से अभिषेक की शादी न करवाने से उनके और कपूर परिवार के बीच तनातनी हो गई थी। 
  नायक और नायिकाओं के बीच भी तनातनी के किस्से देखे गए हैं। ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार के साथ भी यह सब हुआ था। मधुबाला और उनके बीच इतना लम्बा विवाद चला कि 'मुगले आजम' के सेट पर दोनों ने बातें करना तक बंद कर दिया था। 'संघर्ष' के सेट पर भी उनकी साधना से भिड़ंत हुई, तो साधना ने फिल्म छोड़ दी थी। इस भूमिका को बाद में वैजयंती माला ने किया! लेकिन, दिलीप कुमार की उनसे भी ठनी थी। 'लीडर' के सेट पर तो दोनो एक-दूसरे से बात तक नहीं करते थे। रितिक रोशन और कंगना के बीच भी विवाद के किस्से भी कम चर्चित नहीं रहे! फिल्म निर्माता -निर्देशकों और कलाकारो के बीच तनातनी के किस्से भी सुने जाते हैं। राहुल रवैल ने धर्मेन्द्र और राजेन्द्र कुमार के लड़कों की पहली फिल्मों को हिट बनाया, लेकिन कई बार फिल्म की क्रेडिट से उनका नाम तक हटाना पडा। लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी, ओपी नैयर तथा शंकर जयकिशन के बीच कोल्डवार को भी भुलाया नहीं गया! 
    ऐसे किस्से सिर्फ अभिनेताओं तक ही सीमित नहीं है। अभिनेत्रियों के बीच भी अकसर छत्तीस का आंकड़ा देखा गया है। बीते जमाने में की नायिकाओं से लेकर आज की नायिकाओं में तनातनी का संबंध देखा गया है। हेमा मालिनी और श्रीदेवी, माधुरी, करीना से लेकर दीपिका और प्रियंका चोपड़ा के बीच कई बार ये माहौल देखा गया! यह खींचतान व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता के चलते तो चलती ही है, कभी-कभी प्रेम संबंधों को लेकर भी पनपने लगती है। अक्षय कुमार को लेकर रवीना टंडन और शिल्पा शेट्टी में तो एयरपोर्ट पर मारपीट का मौका तक आ गया था। 
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Saturday, October 26, 2019

झाबुआ में भाजपा को बाहरी नेताओं की 'मनमानी' ने हरवाया!

- हेमंत पाल  

   अपनी राजनीतिक जागरूकता और बड़े उलटफेर के कारण झाबुआ हमेशा चर्चा में रहा है। इस बार भी यहाँ वही सब हुआ! झाबुआ उपचुनाव का  नतीजा अप्रत्याशित नहीं रहा। वही हुआ जिसका अनुमान लगाया गया था। वास्तव में ये चुनाव प्रदेश का राजनीतिक शक्ति परीक्षण था, जिसमें कांग्रेस ने बाजी मार ली। भाजपा ने भी जोर आजमाइश में कोई कसर नहीं छोड़ी! पर, कमजोर रणनीति और अतिआत्मविश्वास आदिवासी मतदाताओं के मानस को बदल नहीं सका। इस उपचुनाव से साबित हो गया कि भाजपा यहाँ कभी सीधे मुकाबले में चुनाव नहीं जीत सकती। कृष्णमुरारी मोघे जैसे चुके और थके हुए नेता को चुनाव का दायित्व सौंपा गया! वे खुद चुनाव नहीं जीत सके तो बाहरी सीट पर कैसे चुनाव प्रबंधन करेंगे, ये समझा जा सकता है! संभागीय संगठन मंत्री जयपाल चावड़ा ने भी यहाँ स्थानीय स्तर पर गंभीरता नहीं दिखाई! इस उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के जो भी कारण खोजे जाएं, पर सच यही है कि झाबुआ के मतदाताओं को ये मंजूर नहीं था कि उनका प्रतिनिधि विपक्ष में बैठे! कांतिलाल भूरिया की जीत सिर्फ कांग्रेस उम्मीदवार की जीत नहीं है, बल्कि कमलनाथ सरकार के 10 महीने के कार्यकाल का मूल्यांकन भी है।
   पिछले लोकसभा उपचुनाव में भी यही सब हुआ था। इस बार भी वही कहानी दोहराई गई। भाजपा के लिए परेशानी की बात ये रही कि पूरा दम लगाने के बाद भी मतदाताओं ने भाजपा के वादों पर भरोसा नहीं किया। बार-बार कमलनाथ सरकार गिराने और किसानों की कर्ज माफी न होने का विलाप करने के बावजूद भाजपा की दाल नहीं गली। जबकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह से लगाकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान तक ने अपना प्रभाव दिखाने की कोशिश की, पर खामोश मतदाताओं ने सबक सिखा दिया! वे जानते हैं कि धारा-370, पुलवामा हमला, पाकिस्तान और राष्ट्रवाद के सामने स्थानीय मुद्दे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा नेताओं ने मतदाताओं को ये दर्शाकर प्रभावित करने की भरसक कोशिश की, कि कमलनाथ  सरकार कभी भी गिर सकती है! बेभरोसे के भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी को सामने लाकर भी अपनी बात को वजन देने के प्रयास किए गए! लेकिन, इस सबका आदिवासी मतदाता पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा!
  पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विक्रांत भूरिया को भाजपा उम्मीदवार गुमानसिंह डामोर ने करीब 10 हजार वोट से मात दी थी। लेकिन, 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया को झाबुआ लोकसभा सीट पर 90 हजार वोटों से हार के बावजूद झाबुआ विधानसभा सीट पर 7 हजार 298 वोटों की बढ़त हाँसिल हुई! यही कारण था कि डामोर के सांसद बनने के बाद खाली हुई झाबुआ विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया पर ही दांव खेला है। जबकि, भाजपा ने बेहद कमजोर भानु भूरिया को मैदान में उतारा। दोनों पार्टियों ने झाबुआ में इस बार जीत के लिए जितना दम लगाया, उतनी ताकत पहले कभी दिखाई नही दी।
  भाजपा की करारी हार के पीछे कारणों को खोजा जाए तो कुछ कारण इतने स्पष्ट हैं कि यदि पार्टी उन बातों का ध्यान रखती तो नतीजे को बदला जा सकता था। पहला कारण है, गुमानसिंह डामोर को विधायक पद से इस्तीफ़ा दिलाना! यदि विधानसभा चुनाव में झाबुआ से भाजपा के टिकट पर डामोर जीत गए थे तो उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया जाना था! स्थिति ऐसी भी नहीं थी कि भाजपा के पास उम्मीदवार नहीं था! लेकिन, एक ही उम्मीदवार को दोनों चुनाव नहीं लड़वाए जाना थे! यदि ऐसा हुआ भी तो उन्हें लोकसभा की सीट से इस्तीफ़ा दिलवाना था, न कि विधानसभा की! लोकसभा में तो भाजपा के पास प्रचंड बहुमत है, वहां एक सांसद कम भी हो जाता तो फर्क नहीं पड़ता, पर जहाँ विधानसभा में एक-एक विधायक का महत्व है, तो फिर ये रिस्क नहीं ली जाना थी! प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने से मतदाता का मानस उस पार्टी की तरफ झुकना स्वाभाविक है। 
  दूसरा कारण है, भाजपा उम्मीदवारी के चयन में स्थानीय समीकरणों का ध्यान नहीं रखा गया। कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया के सामने भाजपा ने बहुत कमजोर उम्मीदवार भानु भूरिया को मैदान में उतारा! जबकि, उससे कहीं बेहतर नेता मौजूद थे। भानु भूरिया और उनके पिता बालू भूरिया की छवि झाबुआ क्षेत्र में कैसी है, ये बात किसी से छुपी नहीं! ये जानते हुए भी उसे टिकट दिया गया! यही कारण था कि भाजपा उम्मीदवार अपने गाँव से भी जीत नहीं सके! ये भी सुनने में आया है कि भाजपा के कुछ बड़े नेताओं ने टिकट को लेकर खुले आम सौदेबाजी भी की थी! ऐसे में जिसने मांग पूरी कर दी, उसे टिकट दे दिया गया! इन नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं!
  तीसरा कारण है, स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा! पिछले लोकसभा उपचुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार निर्मला भूरिया अनुकूल माहौल और सारे संसाधनों के मुहैया होने के बावजूद चुनाव हार गई थी! उस चुनाव के दौरान भी भाजपा के कई बड़े नेताओं और उनके मुंहलगे कार्यकर्ताओं ने झाबुआ को हाईजेक कर लिया था। इससे स्थानीय नेता और कार्यकर्ता उपेक्षित हो गए थे! वही सब इस बार भी हुआ! भाजपा के संभागीय संगठन मंत्री जयपाल चावड़ा ने पूरे विधानसभा क्षेत्र के हर सेक्टर का प्रभारी बाहरी कार्यकर्ता को बनाया! उन्होंने ही चुनाव की रणनीति बनाई और स्थानीय कार्यकर्ताओं निर्देश दिए, जो उन्हें रास नहीं आए! चुनावी सभाओं के मंच पर भी बाहरी लोगों का कब्ज़ा हुआ! पार्टी ने सोशल मीडिया के शौक़ीन कई कार्यकर्ताओं को इंदौर से झाबुआ भेज दिया, जिन्होंने कई ऐसी बातें उजागर कर दी, जो नहीं की जाना थी! इससे कांग्रेस को अपनी रणनीति बदलने का मौका मिल गया! 
   चौथा कारण है, ऐसे स्थानीय नेताओं को महत्व दिया जाना जिन्हें पार्टी का प्रदेश नेतृत्व उनके पदों से हटा चुका था! मनोहर सेठिया और शैलेश दुबे दोनों को भाजपा संगठन ने अध्यक्ष पद से हटाया था! ये दोनों ही नेता लम्बे समय से हाशिये पर थे, लेकिन चुनाव प्रबंधन करने वालों ने इन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी! ये भी एक कारण था कि स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हुए और उन्होंने बेमन से काम किया! नारायणपुरा इलाका जिसे भाजपा का गढ़ माना जाता है, वो भी इस बार ढह गया! यदि भाजपा ये चुनाव स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के भरोसे लड़ती, तो संभव है कि नतीजा इसके उलट होता! 
  इस चुनाव में कांग्रेस की चुनावी रणनीति पूरी तरह कारगर रही! बाहर से आए कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने स्थानीय कार्यकर्ताओं से आगे निकलने की कोशिश नहीं की और न उनकी बातों को अनसुना किया। बल्कि, कुछ मामलों में भाजपा के कई स्थानीय पदाधिकारियों को भी कांग्रेस की रणनीति ने फंसा लिया। कांग्रेस ने जो व्यापारी प्रकोष्ठ की एक बैठक बुलाई थी, उसमें कई भाजपा पदाधिकारी भी आए और उन दानों को चुगा, जो डाले गए थे! इन सारे हालात देखकर कहा जा सकता है कि भाजपा को उसके ख़राब चुनाव प्रबंधन, नेताओं के बड़बोले बोल, अतिआत्मविश्वास और बाहर से झाबुआ पहुंचे नेताओं और कार्यकर्ताओं की मनमानी हरवाया!  
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Tuesday, October 22, 2019

'अशुद्ध के खिलाफ युद्ध' कितना कारगर, कितना दिखावटी!

- हेमंत पाल 

  त्यौहार के नजदीक आते ही प्रशासन की सबसे ज्यादा सख्ती दिखाई देती है, नकली मावे और मिठाइयों पर! ऐसा साल में दो या तीन बार ही होता है! लेकिन, त्यौहार के बाद सारी सख्ती नदारद हो जाती है! सरकार किसी भी पार्टी की हो, ये पाखंड बरसों से हो रहा है और आगे भी होता रहेगा! पूरे साल लोग मिलावटी खाद्य पदार्थ खाते रहें, प्रशासन चिंता से निश्चिन्त रहता है! लेकिन, त्यौहार आते ही धरपकड़ का माहौल बन जाता है! पहली बार कमलनाथ सरकार ने मिलावट से मुक्ति को अपने एजेंडे में शामिल किया है। मिलावट की सूचना देने वाले को ईनाम देने का एलान भी किया गया! थोड़ी सख्ती भी नजर आई, पर उतनी नहीं जितनी सिंगल यूज़ प्लास्टिक और पॉलीथिन की थैलियां पकड़ने के लिए की जाती है! इंदौर जैसे बड़े शहर में मिलावटी सामान पकड़ने का ढोंग ज्यादा दिखाई देता है, वास्तव में मिलावट पर सख्ती नहीं हो रही, खानापूर्ति ही ज्यादा हो रही है! 
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  रों के बुजुर्ग अकसर अपने वक़्त के शुद्ध खाने का जिक्र करते रहते हैं! कीमत तो समय के साथ बदलती रहती है, पर शुद्धता को लेकर उनका आकलन सही होता है कि आज हम जो खा रहे हैं, सब अशुद्ध है। ये बात सच भी है। उपयोग की हर चीज में आज मिलावट है। पानी से लगाकर दूध, फल, सब्जी, मिठाई और मसालों तक में किसी न किसी रूप मिलावट है। मुद्दे की बात ये कि किसी भी सरकार ने जीवन से जुड़े इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया! सरकार के खाद्य विभाग ने कभी इसे अपनी प्राथमिकता की सूची में नहीं रखा! इसलिए कि उन्हें ऐसे मामलों की अनदेखी करने की कीमत मिलती रहती है! कमलनाथ सरकार ने मिलावट को लेकर थोड़ी सख्ती की और इसके लिए कुछ नियम-कायदे भी बदले! लेकिन, सरकारी स्तर पर होने वाली लापरवाही पर फिर भी लगाम नहीं लगी! नहीं लगा कि मिलावट पकड़ने वालों ने किसी बड़ी मछली पर नकेल डाली हो! छोटे दुकानदार और हलवाइयों की पकड़-धकड़ ही ज्यादा नजर आ रही है! इसलिए कि बड़ी मछली में जाल डालने पर उनके जाल ही खींचकर ले जाने खतरा रहता है! सरकार ने मिलावट की सूचना देने वाले को 25 हज़ार तक का इनाम की घोषणा की गई! लेकिन, अभी ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि किसी ने सूचना दी हो या उसे इनाम मिला हो! 
   हाल ही में मिलावटी और नकली दूध को लेकर बड़े खुलासे हुए! आंकड़ा सामने आया कि प्रदेश में करीब 48% फीसदी दूध शुद्ध नहीं है! यहाँ तक कि शुद्धता का दावा करने वाले पैकेट वाले दूध में भी अशुद्धि मिली! लेकिन, न तो कहीं कड़ाई दिखाई देती है और न लगता है कि किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई! दूध में डिटर्जेंट पाउडर, यूरिया, स्किम्ड मिल्क पाउडर, कास्टिक सोडा, ग्लूकोज, रिफाइंड तेल, नमक और स्टार्च की मिलावट की जाती है! इससे यह लोगों के सेवन योग्य नहीं रह जाता। भिंड और मुरैना क्षेत्र तो नकली मावे और दूध के गढ़ ही बन गए! यही से त्यौहारी मौसम में नकली मावे की खेप पूरे प्रदेश में भेजी जाती है! लेकिन, जो मावा और उनसे बनी मिठाइयाँ पकड़ी जाती है, वो असल कारोबार का 5% भी नहीं है। इंदौर जैसे बड़े शहर में जहाँ खाने-पीने के शौकीन लोग ज्यादा हैं, नकली और मिलावटी खाद्यान्न बिकता है! भी प्रशासन और संबंधित विभागों की नाक के नीचे! मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है! केमिकल से पके रंगे-पुते फल, गंदे पानी में उपजाई जाने वाली सब्जियाँ भी गंभीर मुद्दा है! लेकिन, प्रशासन के अफसरों और निगमकर्मियों को पॉलीथिन की थैलियां पकड़ने से ही फुर्सत नहीं! 
   इस गौरखधंधे को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर कभी ठोस प्रयास नहीं हुए। यही कारण है कि यह मर्ज गंभीर बीमारी बन चुका है! खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए कड़े कदम तो उठाए रहे हैं! लेकिन, उस पर अमल कितना हो रहा है, ये बड़ी बात है! मुख्यमंत्री कमलनाथ के विचार और प्रयास दोनों नेक हैं। लेकिन, जब तक लोगों का प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक इस धीमे जहर से पूरी तरह मुक्ति पाना संभव नहीं है। खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए कानून है, जिसे 'फूड एंड ड्रग' कहा जाता है। शहरों में इसका दायित्व नगरीय निकायों के पास है और गाँव में फूड इंस्पेक्टर यह काम करते हैं। लेकिन, इस कानून का क्रियान्वन इतना लचर है कि बहुत ही कम मामलों में मिलावट करने वालों को सजा मिल पाती है। दरअसल, ये छोटे दुकानकारों और होटल व्यवसायियों को परेशान करने का हथियार बन गया! यदि सरकार की मंशा ईमानदारी से मिलावट रोकने की है, तो सबसे पहले संबंधित विभाग पर नकेल डालना होगी। इन काली भेड़ों पहचान कर उन्हें रेवड़ से बाहर करना होगा, तभी बात बनेगी! मिलावटी खाद्यान्न पकड़ने की ख़बरें अकसर जोरशोर से प्रचारित की जाती हैं! लेकिन, इन बातों से तो बात नहीं बनेगी! जब तक इन्हें सजा नहीं मिलेगी, मिलावटखोर काबू में नहीं आएंगे! मिलावट रोकने के लिए राज्य सरकार के संबंधित कानूनों में संशोधन की प्रक्रिया शुरू की गई है! कहा जा रहा है कि नए प्रावधानों को और सख्त बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन, ये कब होगा, फिलहाल इसका इंतजार है! 
  महाराष्ट्र सरकार ने तो खाद्य पदार्थों में मिलावट को गैर-जमानती अपराध का कानून बना दिया। दोषी पाए जाए पर इसमें उम्रकैद तक की सजा हो सकेगी। वहाँ की सरकार ने 'खाद्य मिलावट रोधक (महाराष्ट्र संशोधन) विधेयक' पारित करने अपनी मंशा को स्पष्ट कर दिया। ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश में भी करना होगा, जिससे खाद्य सामग्री में मिलावट करने वालों को कड़ी सजा मिल सके। मिलावट रोकने के लिए कानून केंद्र सरकार बनाती है, लेकिन उसका पालन राज्य की एजेंसियों को करवाना होता है। खाद्य विभाग, नगर निगम, पुलिस, एफएसएसएआई के जिम्मे इस कानून के अनुपालन की जिम्मेदारी होती है। लेकिन, इन महकमों में इतना भ्रष्टाचार है, कि अधिकारी कानून का डर दिखाकर वसूली करते हैं। वे सैंपल तो इकट्ठा कर लेते हैं, पर उनकी जांच नहीं करवाते। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि हम  रहे हैं, वो कितना शुद्ध है! यहां तक कि घर में पकने वाले भोजन की भी गुणवत्ता भी संदिग्ध होती है। क्योंकि, जो कुछ बाजार से खरीदा जाता है, उसकी निगरानी की सरकारी व्यवस्‍था लापरवाह और भ्रष्ट है। सरकार यदि खाद्य पदार्थों में मिलावट को काबू करने के अपने प्रण को लक्ष्य तक पहुंचाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले उस भ्रष्ट नौकरशाही पर नकेल डालना होगी, जो इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है!  
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Sunday, October 20, 2019

झाबुआ उपचुनाव दोनों पार्टियों के लिए 'अहम्' का मुद्दा!

 - हेमंत पाल

   झाबुआ में चुनाव प्रचार थम गया! उपचुनाव के लिए दोनों प्रमुख प्रतिद्वंदी पार्टियों की सारी कवायद पूरी कर ली! बाकी जो प्रबंधन बचा है, वो आज रात पूरा हो जाएगा! कांग्रेस और भाजपा दोनों ने चुनाव जीतने की कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ी और सारे पैंतरे इस्तेमाल किए। कांग्रेस के कई मंत्रियों ने झाबुआ में डेरा डालकर मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास किए। जबकि, भाजपा ने भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं रखी! लेकिन, स्थिति देखकर कहा नहीं जा सकता कि नतीजे का ऊंट किस करवट बैठेगा! क्योंकि, प्रचार के मुकाबले में दोनों का पलड़ा बराबरी का रहा है। जबकि, उम्मीदवारी में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ज्यादा मजबूत नजर आ रहे हैं! उन्हें प्रदेश में कांग्रेस सरकार होने का भी फ़ायदा मिलेगा! भाजपा का बागी क्या कमाल दिखाएगा, इसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता!
   झाबुआ विधानसभा सीट का अपना अलग राजनीतिक चरित्र है। यह सीट बरसों से कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है और कांतिलाल भूरिया का यहाँ एकछत्र राज रहा! इस सीट पर भाजपा तभी जीती, जब कांग्रेस में बगावत हुई और मुकाबला त्रिकोणीय बना! कभी भी सीधे मुकाबले में भाजपा झाबुआ नहीं जीत सकी! पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव की कहानी भी यही थी! जहाँ तक हार-जीत के अनुमानों का सवाल है, प्रचार की अंतिम स्थिति तक पहुँचते दोनों पार्टियाँ बराबरी पर दिखाई दे रही हैं। शुरुआत में कांग्रेस के प्रचार का जोर ज्यादा लगा, जो प्रचार के आखिरी दौर तक पहुँचते-पहुँचते भाजपा के पक्ष में झुकता हुआ सा लगा! आखिरी दिन के प्रचार में प्रदेश के वर्तमान और पूर्व दोनों दोनों ही मुख्यमंत्री झाबुआ में थे। लेकिन, भाजपा के नेता इस बात को छुपा नहीं पाए कि उनका उम्मीदवार भानु भूरिया अपेक्षाकृत कमजोर है। 
  यह आदिवासी सीट हमेशा ही प्रदेश में अपनी अलग राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराती रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ के मतदाताओं ने भाजपा के दिलीपसिंह भूरिया को चुनाव जिताया! लेकिन, सवा साल बाद उनके निधन से खाली हुई सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया चुनाव जीतकर दिल्ली गए! इस बार सांसद बनने के बाद झाबुआ के विधायक गुमानसिंह डामोर को झाबुआ सीट छोड़ना पड़ी, तो यहाँ उपचुनाव के हालात बने हैं! पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में यहाँ से कांतिलाल भूरिया के बेटे डॉ विक्रांत भूरिया को भाजपा के गुमानसिंह डामोर ने हराया था! लेकिन, कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा पेंच कांग्रेस के बागी उम्मीदवार जेवियर मेढ़ा थे, जिन्हें करीब 36 वोट मिले थे! डॉ विक्रांत की हार का सबसे बड़ा कारण ही वे थे! लेकिन, इस बार कहानी बदल गई! अब जेवियर कांग्रेस के साथ प्रचार में लगे हैं। उधर, उपचुनाव में भानु भूरिया को भाजपा उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में कल्याणसिंह डामोर ने बगावत कर दी। कांग्रेस की जीत इस पर भी टिकी है, कि भाजपा का ये बागी उम्मीदवार कितने वोट काटता है। 
  ख़ास बात ये कि इस पूरे उपचुनाव में हवा बार-बार बदलती दिखाई दी! शुरू में तो कांतिलाल भूरिया की उम्मीदवारी और जेवियर मेढ़ा के उनके साथ होने से कांग्रेस ताकतवर दिखाई दी! करीब दर्जनभर मंत्रियों के प्रचार में आने से भी फर्क पड़ा! मुख्यमंत्री कमलनाथ भी दो बार प्रचार कर आए! दिग्विजय सिंह भी झाबुआ पहुंचे! पर, पूरे उपचुनाव के प्रचार अभियान में ज्योतिरादित्य सिंधिया कहीं दिखाई नहीं दिए! उनके गुट के मंत्रियों ने भी झाबुआ में प्रचार से दूरी बनाए रखी! पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव और इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में धुआंधार प्रचार करने वाले सिंधिया की झाबुआ उपचुनाव से दूरी पर उँगलियाँ भी उठी! जबकि, पहले दौर के प्रचार में भाजपा पिछड़ी थी, पर बाद में उसने अपनी स्थिति सुधार ली! कांग्रेस ने चुनाव जीतने पर कांतिलाल भूरिया को मंत्री बनाने का एलान करके अच्छा पांसा फेंका है, जो असर दिखा सकता है! 
   विधानसभा में अपने आंकड़े सुधारने के लिहाज से झाबुआ उपचुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। कांग्रेस चाहती है कि भाजपा से यह सीट छीनकर अपनी स्थिति को बेहतर कर लिया जाए! वहीँ, भाजपा इस सीट को फिर जीतकर कमलनाथ सरकार को घेरना चाहती है! यदि कांग्रेस हारती है तो किसानों की कर्ज माफ़ी न होने जैसे भाजपा के आरोपों को दम मिलेगा! लेकिन, यदि नतीजे कांग्रेस के पक्ष में रहे तो कमलनाथ सरकार की जमीन ज्यादा मजबूत होगी। कांग्रेस ने जेवियर मेढ़ा को साधकर अपनी एक बड़ी कमजोरी को सुधार लिया! लेकिन, भाजपा के बागी कल्याणसिंह डामोर मैदान में बने रहने से भाजपा परेशानी कम नहीं हुई! कल्याण डामोर को टिकट मिलने का इतना भरोसा था कि चुनाव से पहले ही उन्होंने झाबुआ सीट के सभी पोलिंग बूथ का दौरा कर लिया था! अब देखना है कि उनकी बगावत क्या रंग लाती है! 
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कुछ नया सोचो, तभी फिल्म चलेगी!


- हेमंत पाल 

  नए सोच के हिंदी सिनेमा में औरत की शख्सियत की वापसी होती दिखाई देती है। नायिका की वापसी और उसके जुझारूपन को दर्शकों ने भी हाथों हाथ लिया। क्योंकि, आज का दर्शक नायिका को शिफॉन साड़ियों की फंतासी से बाहर लाकर यथार्थ की खरोंचों के बीच महसूस करना चाहता है। इस आईने में वह अपने आपको देखना और जानना चाहता है। इन फिल्मों ने लैंगिक बहसों को भी नया मोड़ दिया। समाज और परदे पर पुरुष, स्त्री का शत्रु या उसका प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसका साथी है। वह अपने पुरुष अहंकार और वर्चस्ववाद से मुक्त होकर, स्त्री के मर्म और उसके अधिकारों को समझते हुए नए तरीके से अपना विकास कर रहा है। फिल्मों के इन स्त्री पात्रों के साथ-साथ पुरुषों की सामंती छवियां भी खंडित हुई हैं और अब ये पूरी तरह स्वीकार्य भी हैं।
  याद किया जाए तो कंगना रनौत की फिल्म ‘क्वीन’ ने सबसे पहले स्त्री स्वातंत्र्य और स्त्री अस्मिता से जुड़े पहलुओं को आधारभूत और जरूरी स्तर पर समझने की कोशिश की थी! ये एक आम लड़की के कमजोर होने, बिखरने और फिर संभलने की अनूठी कहानी थी। इसमें फिल्मकार ने रानी के माध्यम से स्त्री की जिजीविषा और संघर्ष का बेहतरीन चित्रण किया था। बधाई हो, बरेली की बरफी और 'शुभमंगल सावधान' जैसी विशुद्ध मनोरंजन, सामाजिक और परिस्थिजन्य स्थितियों से उपजे हास्य की फिल्म है। ख़ास बात ये कि नए दौर की इन फिल्मों में स्त्री पात्रों को बहुत अहमियत दी है। 'तुम्हारी सुलू' का विषय भी बिल्कुल नया है और 'सीक्रेट सुपरस्टार' ने तो स्त्री पात्र को सम्पूर्णता दे दी! 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' तो इन सबसे चार कदम आगे है। 
  बदले दौर की फिल्मों में स्त्री पात्र शर्म और संकोच की कैद से निकलने लगी हैं। वे कथित सभ्रांत समाज से बेपरवाह होकर ठहाके लगाती हैं, चीखती हैं, जोर-जोर से गाती और नाचती हैं! जब तक कि उनका मन नहीं भर जाता। पीकू, पिंक, नीरजा, नील बटे सन्नाटा, डियर ज़िंदगी जैसी फ़िल्में पूरी तरह अभिनेत्रियों के कंधे पर टिकी थी। आमिर ख़ान के अभिनय से सजी फ़िल्म 'दंगल' भी एक तरह से महिला प्रधान फ़िल्म ही थी। श्री देवी ने भी परदे पर अपनी वापसी के साथ 'इंग्लिश विंग्लिश' और 'मॉम' जैसी फिल्मों में काम किया था। इससे पहले भी कई महिला प्रधान फ़िल्में बनी जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस किया।
  अब हिंदी सिनेमा ने दर्शकों की बेचैनी को ठीक से समझा और उसे आवाज दी है। अनुराग कश्यप, दिवाकर बनर्जी, इम्तियाज अली जैसे युवा निर्देशकों और जोया अख्तर, रीमा कागती, किरण राव जैसी सशक्त महिला फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को तीखे तेवर दिए हैं। उसके रंग-ढंग बदले हैं। इनकी स्त्रियां जीने के नए रास्ते और उड़ने को नया आसमान ढूंढ़ रही हैं। दर्शक भी रोते-बिसूरते, हर वक्त अपने दुखड़े सुनाते चरित्रों पर कुछ खास मुग्ध नहीं हो रहा। उसे भी पात्रों के सशक्त व्यक्तित्व की खोज थी, जो अब पूरी हुई लगती है।
  इस वजह से मनोरंजन के अर्थ और पैमाने बदले हैं। सिनेमा ने समझ लिया कि बदला हुआ नया दर्शक केवल लटकों-झटकों से संतुष्ट नहीं होगा! उसे कुछ नया और ठोस देना होगा जो उसे अपने आसपास का वास्तविक सा लगे! यही कुछ वजह है कि आमिर खान जैसे एक्टर और सिनेमा के असली व्यवसायी फिल्मकार को भी अपने किले से बाहर निकलकर 'दंगल'  के बाद 'सीक्रेट सुपरस्टार' जैसी फिल्में बनाने को मजबूर होना पड़ा। अब मारधाड़, गुंडागर्दी, साजिशों और उलझी हुई कहानियों के दिन लद गए! आज के दर्शकों को चाहिए शुद्ध मनोरंजन जो उन्हें तीन घंटे तक सारे तनाव से मुक्त रखे और फिल्म की कहानी उसे अपनी या अपने आसपास की लगे! दर्शकों ने भी सिनेमा के इस बदले और समृद्ध रूप को स्वीकार किया। कुछ ऐसी फिल्में भी बन रही हैं, जिन्होंने सिनेमा और समाज के बने-बनाए ढांचों को बदला है। अब परदे पर वही चल रहा है, जिसमें कुछ नयापन है! प्रेम कहानियां, बदला और पारिवारिक विवाद तो हाशिए पर चले गए!
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Thursday, October 17, 2019

गोपाल भार्गव के चुनावी भाषण के निहितार्थ समझिए!


झाबुआ में शिवराज सिंह के मुख्यमंत्री बनने की बात कही, इंदौर में पलटे  

- हेमंत पाल

 भाजपा के कुछ नेताओं ने कमलनाथ सरकार गिराने का शिगूफा छोड़कर ख़बरों में छाए रहने का अचूक फार्मूला ढूंढ लिया है! वे जानते हैं कि राजनीति के मंच से बोली गई, ये लाइनों के सुर्खियां बनने में देर नहीं लगती! झाबुआ के विधानसभा उपचुनाव के एक चुनावी मंच से प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा दिवाली के बाद शिवराज चौहान प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे! ऐसे राजनीतिक शिगूफे छोड़ना गलत नहीं है! पर, झाबुआ से इंदौर आते ही गोपाल भार्गव ने पलटा मार दिया! बोले कि चुनाव सभाओं में ऐसा बोलना पड़ता है! ये कोई घोषणा नहीं, चुनावी भाषण था! आशय यह कि भाजपा की न तो कांग्रेस सरकार गिराने की कोई योजना है और न शिवराज सिंह के फिर मुख्यमंत्री बनने की! 
  भाजपा नेता गोपाल भार्गव के लिए ऐसे बयान देना नई बात नहीं है! ये पहली बार नहीं है, जब गोपाल भार्गव ने महज गाल बजाने वाली बयानबाजी की है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को मध्यप्रदेश में ज्यादा सीटें मिलने के बाद भी उन्होंने राज्यपाल से विधानसभा का सत्र जल्द से जल्द बुलाने की मांग की थी, ताकि मोदी लहर में फ्लोर टेस्ट करवाया जा सके! बताते हैं कि पार्टी ने इस मामले को भी गंभीरता से लिया था! वे चुनाव प्रचार में जब पहली बार झाबुआ आए थे, तब भी कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया की जीत को पाकिस्तान की जीत बता आए थे! इस पर झाबुआ कोतवाली में गोपाल भार्गव पर एफआईआर दर्ज की गई थी। 
  लेकिन, इस बार उन्होंने सरकार के गिरने और शिवराज के मुख्यमंत्री बनने की जो बात झाबुआ में बोली, उससे वे कुछ घंटे बाद ही बदल गए! ध्यान देने वाली बात कि जब गोपाल भार्गव ने झाबुआ में शिवराज सिंह के दिवाली बाद राज्याभिषेक की घोषणा की, तब खुद शिवराज सिंह भी मंच पर मौजूद थे। इससे एक बात तो साफ़ हो गई कि बोलने के मामले में गोपाल भार्गव की गंभीरता संदिग्ध है। यदि उन्होंने शिवराज सिंह के दिवाली बाद मुख्यमंत्री बनने की संभावना बताई थी, तो उस पर कायम रहकर तार्किक कारण भी बताना थे। ये आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि शायद गोपाल भार्गव के झाबुआ में दिए इस बयान को पार्टी के दिल्ली दरबार ने ठीक नहीं माना! यदि ऐसा कुछ होता भी है, तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा ये फैसला गोपाल भार्गव तो नहीं करेंगे! भार्गव के बयान के बाद शिवराज सिंह चौहान ने खुद ट्वीट करके कहा कि 'मुझे किसी पद की आकांक्षा नहीं है। मेरा एक ही पद है, जनता के दिलों में रहना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैभवशाली, गौरवशाली भारत के निर्माण के अभियान में पूरी ताकत के साथ जुटे रहना।'
   समझा जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष का ये उत्साह मंगलवार को राजधानी में बदले राजनीतिक माहौल से प्रेरित था। भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा के साथ प्रदेश भाजपा कार्यालय पहुँचे और कहा कि मैं भाजपा में था, भाजपा में हूँ और भाजपा में ही रहूंगा। ये वही विधायक हैं जो कुछ महीने पहले विधानसभा में मत विभाजन के समय कांग्रेस के पाले में चले गए थे! इसके साथ ही प्रदेश में सरकार बदलने की बात फिर से उठकर सामने आ गई। ये सारा मामला विधानसभा में नंबर गेम से जुड़ा है। 230 विधायकों की विधानसभा में किसी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। बहुमत का जादुई आंकड़ा 116 सदस्य है, जबकि कांग्रेस के पास 114 विधायक है। बहुमत से दो कम। इसलिए कांग्रेस ने बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेकर अपनी ताकत को 121 तक बढ़ाया है।
  विधानसभा में 4 निर्दलीय विधायक है, 2 विधायक बसपा से है और एक विधायक समाजवादी पार्टी से! जबकि, भाजपा के पास 109 विधायक थे, जो झाबुआ विधायक गुमानसिंह डामोर के सांसद बनने के बाद घटकर 108 रह गए! कांग्रेस की कोशिश है कि झाबुआ जीतकर विधायकों की संख्या 115 कर ली जाए ताकि सुखद स्थिति बन जाए! गोपाल भार्गव ने ऐसे ही कुछ गणित से मध्यप्रदेश में फिर भाजपा सरकार बनने का फार्मूला बना लिया और झाबुआ में उसे बखान दिया! लेकिन, बाद में उनका पलटना उनकी राजनीतिक उच्श्रृंखलता की निशानी है।
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