Monday, October 19, 2020

कोरोना काल में सोशल बिहेवियर को रेखांकित करती किताब

- हेमंत पाल
  इक्कीसवीं सदी का बीसवां साल सदियों का दस्तावेज बन गया है। कोविड 19 के रूप में क महामारी ने दुनियाभर में भारी तबाही मचाई और यह अभी खत्म नहीं हुई है। लोगों की जान पर आई आफत ने मानवीयता और अमानवीयता के कई पहलुओं को उजागर किया तो कुछ दबे या अनछुए रह गए। कई ऐसी घटनाएं इस देशकाल और समाज में घट रही थीं और अभी भी घट रही हैं, जो शायद हमारे लिए अभूतपूर्व थीं और हैं। इसे साहित्य में कितना महसूस किया गया, यह साफ नहीं है, लेकिन कोरोना में हुए इस असाधारण सामाजिक बदलाव को प्रखर पत्रकार अजय बोकिल ने अपने नजरिए से देखा, समझा, परखा और उसका मूल्यांकन किया है।
    यह उनकी पैनी और गहन दृष्टि का ही परिणाम है कि कोरोना लाॅक डाउन और कुछ अनलाॅक के दौरान उनके लिखे लेख देश प्रदेश ( विशेषकर मध्यप्रदेश) इस कालावधि में हुई सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का पत्रकारीय दस्तावेज बन गए हैं। हिंदी पत्रकारिता में संभवत: यह पहली किताब है, जो कोरोना काल में सोशल बिहेवियर को रेखांकित करती है और जिसकी रेंज बहुत व्यापक है। अजय बोकिल विषय रोजमर्रा की जिंदगी से उठाते हैं, लेकिन उसका इतनी गहराई से विश्लेषण करते हैं कि वो आलेख भी एक दस्तावेज बन जाता है। लेखक का मानना है कि कोरोना ने जो हमें जो दंश दिया है, उससे उबरने में समाज और देश को लंबा समय लगेगा।
  दरअसल कोरोना काल महज एक महामारी से उपजा समय नहीं है, जिसने सामाजिक रूप से उथल-पुथल मचाई हो! बल्कि, इसने भारतीय समाज की जीवनशैली और दिनचर्या के साथ-साथ रिश्तों को भी नए सिरे से परिभाषित किया है। लेखक ने विशिष्ट घटनाओं को आधार बनाते हुए किस्सागोई की तरह समकालीन परिस्थितियों को लिखा है। ये अपनी तरह की पहली ऐसी किताब है, जिसमें कल्पना की उड़ान कम, सच्चाई की कड़वाहट और बेबाकी ज्यादा है। मध्यम और निम्न मध्यमवर्ग ने इस कोरोना काल को जिस तरह भोगा है, वो भी कई जगह इस दस्तावेज का हिस्सा बना! खाद्यान्न का संकट, नौकरी गंवाने की पीड़ा, परिवार के घर में कैद हो जाने की बेबसी आदि कई घटनाओं को अजय बोकिल ने जिस शिद्दत से महसूस किया और कागज पर उतारा, वह काबिले तारीफ है। ‘कोरोनाकाल की दंश कथाओं’ में शब्दों के माध्यम से वास्तविक मानवीय पीड़ा का जो दर्द झलकता है, पाठक उससे विलग नहीं रह सकता! क्योंकि, इस महामारी ने हर व्यक्ति, हर समाज, हर वर्ग और हर घर को छुआ है।
   खास बात यह है कि ये किताब सोचकर नहीं लिखी गई और न ही इसके लिखे जाने की कोई पूर्व योजना बनी! यहाँ तक कि इसके विषयों के बारे में भी पहले से कोई विचार किया गया हो, ऐसा नहीं लगता! इस किताब में शामिल सभी लेख दरअसल लेखक अजय बोकिल की नियमित रचनाधर्मिता का परिणाम हैं। यही कारण है कि किताब के अधिकांश लेख तात्कालिक विषयों पर आधारित हैं, लेकिन अजय बोकिल उनकी आत्मा तक पहुंचते हैं। ऐसी ही एक दिलचस्प रचना है ‘हाँ बाबा, रिसर्च के लिए प्रज्ञा चाहिए, ड्रेसकोड नहीं!’ इसे बाबा रामदेव के ‘पतंजलि’ संस्थान के कोरोनाकाल में खोजी गई महामारी की आयुर्वेदिक दवा को आधार बनाकर लिखा गया है। इसमें लेखक ने विवादों के सारे आस्पेक्ट समेटे और विश्लेषित किए हैं। मोदी सरकार द्वारा चीन के खिलाफ उठाए गए कथित सख्त कदमों पर लिखा गया ‘चीन पर डिजीटल स्ट्राइक और हमारा डिजीटल राष्ट्रवाद’ भी बेहद खरी-खरी है। चीनी सेना की भारतीय सीमा पर तैनाती के जवाब में चीन के ऍप्स पर बंदिश लगाने के सरकार के फैसले पर जबरदस्त कटाक्ष है। टिक-टॉक, वीबो पर प्रतिबंध लगाकर ये समझ लेना कि हमने चीन को खदेड़ दिया सरकार की ग़लतफ़हमी ही तो है। ये सिर्फ कॉलम नहीं, सटीक सम्पादकीय है जो पढ़ने वाले के दिमाग पर भी डिजीटल स्ट्राइक करती है। पूरी किताब में बदलते जीवन, समाज और देश के हर पहलू पर बेलाग टिप्पणी की गई है। भविष्य में पत्रकारिता का कोई विद्यार्थी यदि कोरोना काल का कच्चा इतिहास टटोलना चाहे, तो यह किताब उसके काम आ सकती है।
  अजय बोकिल के लेखन की सबसे बड़ी खासियत है, शब्दों के साथ उनका खेलना! शब्द उनकी कलम के आस-पास गरबा करते नजर आते हैं, जो उनकी भाषा समृद्धि का परिचायक भी है। अजय की लेखन शैली में भाषा की शुद्धता, अपनी बात कहने की रोचक शैली और शब्दों का अनंत भंडार है। वे एक ही बात को कई तरह से कहने और समझाने की काबलियत रखते हैं। विषय के मुताबिक लेखन शैली उनकी एक और विशेषता है। एक प्रभावी और किसी हद तक सार्वकालिक पत्रकारीय लेखन के जरूरी है पत्रकार में अपने समय के भीतर और गहरे तक झांकने की अंतदृष्टि। अर्थात वर्तमान के आईने में भविष्य की आहट सुनना। इसके लिए लंबी साधना और कमिटमेंट की जरूरत होती है। यह तभी संभव है, जब पत्रकार अपनी भाषा अर्जित कर ले।
     इस पुस्तक में जाने माने कथाकार, चित्रकार, लेखक प्रभु जोशी की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अजय ‘नईदुनिया’ समाचार पत्र में प्रभु के कनिष्ठ सहयोगी रहे हैं। उन्होंने अजय बोकिल को पत्रकार के रूप में ‘ग्रो’ होते हुए देखा है। प्रभु लिखते हैं- ‘ अजय पत्रकारिता की नर्सरी माने जाने वाले इन्दौर के ‘नईदुनिया’ का एक ऐसा पौधा है, जिसने अब एक तनावर दरख्त़ की वह ऊँचाई हासिल कर ली है, जिसके चलते वह अलग से दिखायी देने लगा है। पत्रकारिता में ऊँचाई का अर्थ मेरे लिए अख़बार की दुनिया में ओहदों से ओहदों पर छलाँग पर छलाँग लगाते हुए, किसी शिखर पर बैठ जाना नहीं है। क्योंकि, मैं पत्रकार को बौद्धिक संसार का, एक निर्भीक नागरिक मानता हूँ जिसमें, ‘आलोचनात्मक विवेक’ को अपने अन्दर एक अभीष्ट की तरह स्थापित करना होता है। उसमें, यह प्रतिभा होती है कि वह, ‘स्तुतियों’ और ‘भर्त्सनाओं’ को एक सिरे से ख़ारिज करता हुआ, अन्तत: ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम हितों’ का पहरेदार बनना ही उसकी प्राथमिक प्रतिज्ञा होती है।
  अजय बोकिल को, मैं उसके अँकुरण के काल से जानता हूँ। वह ‘जीनान्तरित’ नहीं, ‘जीवनान्तरित’ बीज था, इसीलिए वह विवेक और ज्ञान को, अपनी प्रज्ञा के साथ नाथ कर, हमारे ‘समकाल’ पर, ऐसी विवेचनात्मक टिप्पणियाँ लिख कर, इस विस्मृत सच को प्रतिपादित कर पाया कि पत्रकारिता केवल ‘सत्ता का प्रतिपक्ष’ नहीं है। प्रतिपक्ष, तो ‘विरोध और प्रतिरोध’ के लिये एक दलगत निष्ठा के तहत अपनी भूमिका के निर्वाह के लिये बाध्य है। इसलिये अजय का पत्रकारीय लेखन, इस दृष्टि से अधिक निरपेक्ष है। उसके लिखे में दृष्टि किसी भी विचारधारा के समक्ष ‘सार्वदेशीय सत्य’ की अनसुनी या अनदेखी करना नहीं है। बल्कि, एक ‘अधिक मनुष्य’ और ‘अधिक नागरिक’ होकर लिखने की, सच के प्रति ईमानदारी का पर्याय है। उसके लिखे में ‘देश और काल’ बोलता है। हाँ, राष्ट्र भी बोलता है, लेकिन राष्ट्रवाद नहीं बोलता। उसकी एक आँख पीठ में भी है, जो ‘पास्टनेस ऑफ पास्ट’ को देखती है और सामने की सच्चाई को अपनी ही दो आँखों से नहीं बल्कि ‘जन’ की आँखों से देखता है। इसलिए अजय के लिखे में विगत की समझ, आगत को पढ़ने की दृष्टि के साथ, वर्तमान को बहुत वस्तुगत ढंग से देखने की एक सहज और सरल भाषा के उपकरणों की आविष्कृत प्रविधियाँ भी हैं। मुझे उससे बहुत उम्मीदें है कि वह भाषा की स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर की परम्पराओं को आत्मसात करता हुआ, इस विस्मृति के युग में, एक बहुत सकारात्मक पत्रकारिता के प्रतिमानों में अपनी कलम की स्याही से सच के हर संस्करण को उत्कीर्ण करेगा।
  पुस्तक में संकलित अजय बोकिल के तमाम आलेख भोपाल से प्रकाशित ‘सुबह सवेरे’ में प्रकाशित हुए हैं। इस पत्र के प्रधान संपादक और मप्र के ख्यात पत्रकार उमेश त्रिवेदी ने इस पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में कहा है ‘पत्रकारिता के गोलाकार सपाट दायरों में भी अजय बोकिल हर दिन एक बहुआयामी रचनाधर्मी के रूप में अखबार मे प्रकट होते हैं। उनके पत्रकारीय लेखन में साहित्य की सृजनशीलता, संस्कृति की मर्मज्ञता और विज्ञान की तार्किकता स्पष्ट झलकती है। यह सम्मिश्रण ही उन्हें विशिष्ट बनाता है।‘ उमेश त्रिवेदी ने लिखा है- ‘एक पत्रकार के रूप में अजय बोकिल गुणवत्ता की कसौटियां निर्धारित करते हैं। कोरोना के इस दौर में मानवीय करुणा समेटते हुए अपने पत्रकारीय दायित्वों अंजाम देना आसान काम नहीं है।’
  इस पुस्तक को पढ़ने से अजय बोकिल की पत्रकारीय दृष्टि के साथ साथ उनका विषय वैविध्य और समझ की रेंज विस्मित करती है। शायद ही कोई विषय हो, जिस पर उनकी कलम न चली हो। न सिर्फ चली बल्कि इस रूप में चली है कि मानो वो विषय के विशेषज्ञ हों। अजय पत्रकारिता में मेरे हमसफर रहे हैं, लेकिन दैनिक स्तम्भ लेखक के तौर पर उनका यह रूप मेरे लिए भी नया है। अगर कोरोना काल की बात करें तो समाज, कला, विज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, संस्कृति, फिल्म आदि अनेक क्षेत्रों से विषय उठाकर उन्होंने उसका अपनी दृष्टि और पैमाने पर विश्लेषण किया है। जिसमें रोचकता के साथ साथ तार्किकता भी बनी रहती है। जिसका आनंद सामान्य और बुद्धिजीवी पाठक समान रूप से ले सकता है। वो अपनी हर बात तथ्यों के आधार पर कहते हैं। लेकिन तथ्‍य को ही अंतिम सत्य नहीं मानते। बल्कि वो तथ्य के भीतर छिपे सत्य को अनावृत्त करने की सफल कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका में कोविड 19 मृतकों की संख्या 1 लाख होने पर न्यूयाॅर्क टाइम्स का अपना पहला पृष्ठ काला छापना पूरी दुनिया के लिए पत्रकारीय नवाचार था। कोरोना काल में ही कार्टून चरित्र टाॅम एंड जेरी के जन्मदाता जीन डाइच का निधन, शोले के सूरमा भोपाली के देहांत पर अजय बोकिल ने जो अनूठी श्रद्‍धांजलि दी है, वह काॅमेडियन जगदीप के साथ भोपाली जबान पर भी विस्तार से प्रकाश डालती है। एक और महत्वपूर्ण लेख कोरोना से लड़ाई के तरीकों पर है। अजय सवाल उठाते हैं कि कोरोना जैसी वैश्विक महामारियों से तानाशाही बेहतर ढंग से निपट सकती है या लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं। भारत में ‘संपादक के नाम पत्र पुरूष एंथोनी पाराकल’ पर सार्थक टिप्पणी इस किताब में है। पत्रकारों की नई पीढ़ी को तो इस बारे में ज्यादा पता भी नहीं होगा।
  अजय प्रिंट मीडिया के भविष्य, मीडिया की ‘माफियागिरी’, ब्यूटी बाजार में फेयर एंड लवली में से फेयर शब्द हटाने का बाजार का मानसशास्त्र, कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों की विवंचना, कोरोना के साइड इफेक्ट :केरल से सोनागाछी तक अपनी नजर दौड़ाते हैं। ये सभी लेख भी पठनीय है। तेलंगाना में पूर्व प्रधानमंत्री व कांग्रेस नेता पी.वी. नरसिंहराव की जन्मशती पर राज्य की वायएसआर कांग्रेस सरकार द्वारा विज्ञापन जारी करने के राजनीतिक ‍निहितार्थ पर गंभीर टिप्पणी और सवाल हैं। अजय इस बात को खास तौर पर रेखांकित करते हैं कि अब कांग्रेस के इस बड़े नेता को भी दूसरी पार्टी ने हाइजैक कर लिया।
  अजय बोकिल के समूचे पत्रकारीय लेखन का मूल स्वर और सरोकार समाज और मानवता के पक्ष में है। इस मायने में वो उस पत्रकारिता से बहुत दूर है, जहां केवल सत्ता को साधना एकमात्र मकसद रहता है। आज जब कि प‍त्रकारिता में भी ‘इस पार या उस पार’ होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, पूरे मीडिया को खेमे में बांटकर देखा जा रहा है, ऐसे में निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ भाव से समकालीन घटनाक्रमों का आकलन, विश्लेषण बहुत महत्पूर्ण है। लाॅक डाउन के दौरान भूखे प्यास प्रवासी मजदूरों के लिए पारले जी बिस्किट का संजीवनी के रूप में उभरना, सोशल डिस्टेसिंग के चलते घरों में काम वाली बाई और ‘मैडमजी’ के पारंपरिक‍ रिश्तों का बिगड़ना, मध्यप्रदेश में कोरोना काल में सत्ता की छीना झपटी और खुद को प्रदेश का टाइगर सिद्ध करने की राजनीतिक होड़, पैसा कमाने कृष्ण की तरह विदेश गए भारतीयों का कोरोना की मार के चलते ‘सुदामा’ की तरह स्वदेश लौटना, लोअर ‍मिडिल क्लास का दर्द, लाॅक डाउन के दौरान लोगों की साइकिल की तरफ फिर लौटना, सोशल मीडिया में लोगों का मांगकर शुभकामनाएं और सांत्वनाएं बटोरने का अजब चलन, पूरे समाज का विचार शून्यता की और बढ़ने का खतरा, वर्क फ्राॅम होम के कारण बदलता सामाजिक आचार व्यवहार, लाॅक डाउन में सत्यदर्शी पत्रकारिता पर को लाॅक करने की सत्ता की दुष्प्रवृत्ति, कोरोना काल में आम जैसे रसीले फल का सहमा सहमा सा होना, मोदी गमछे को लेकर दो राज्यो में टकराव, उद्योगपति एलन मस्क द्वारा अपने बेटे का अजब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले संख्यात्मक नामकरण का औचित्य, देश में श्रम कानूनों में बदलाव के बाद श्रमिकों की दुर्दशा का जायजा, छत्तीसगढ़ राज्य में गोबर की सरकारी खरीद पर चुटकी, कोरोना काल में चाय की फसल बर्बाद होने के बाद की स्थिति का आकलन, कोरोना जनित नए पांच शब्दों का हिंदी शब्दकोश में शामिल होने से लेकर माफी देने का वास्तविक अधिकार किसे, इस सवाल पर भी गंभीर टिप्पणी पुस्तक में है।
  अजय बोकिल की पत्रकारिता की ताकत यही सम्यक दृष्टि है, जो उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है। आज के दौर में जिम्मेदार और निष्पक्ष पत्रकारिता अब दुर्लभ होती जा रही है। ऐसे में अजय बोकिल जैसे पत्रकारों की लेखनी हिंदी पत्रकारिता के दीप स्तम्भ स्व. राजेन्द्र माथुर की परंपरा को ही आगे बढ़ाने का काम कर रही है। दरअसल यह किताब कोरोना काल की घटनाओं का दस्तावेज ही नहीं , बल्कि तुरत फुरत लिखा गया इतिहास ही है। क्योंकि पूरे देश में लगभग दो माह तक लाॅक डाउन रहना एक अभूतपूर्व देशबंदी थी, जिसके बारे में पहले न को किसी ने सोचा और न ही ऐसा कोई पूर्वानुभव समूचे देश के पास था। ऐसे में पत्रकार की नजर से अपनी आंखों से गुजर रहे इतिहास को जानना समझना अपने आप में अपूर्व अनुभव है।
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Saturday, October 17, 2020

परदे की कास्ट्यूम कला का पूर्णविराम

- हेमंत पाल

   फिल्मों के बारे में एक सामान्य दर्शक की रूचि उस फिल्म के कलाकार, निर्देशक और संगीतकार को जानने से ज्यादा नहीं होती! वास्तव में दर्शक को इससे ज्यादा जानने की जरूरत भी नहीं है। ऐसे में किसी फिल्म के कास्ट्यूम डिज़ाइनर के बारे में उसे जानकारी होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। लेकिन, इस दुरूह पहचान में भी भानु अथैया ने अपनी जगह बनाई! अब, जबकि वे इस दुनिया से बिदा हो गईं, उन्हें याद करने के लिए किसी को दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पड़ा! क्योंकि, 'गाँधी' में कास्ट्यूम डिजाइन करने उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जो पहचान बनाई थी, वो आज भी ताजा है। वे अपने पीछे हिंदी फिल्मों में कॉस्ट्यूम डिजाइन की बहुत बड़ी विरासत छोड़ गई हैं। उन्होंने 'गाँधी' फिल्म के जरिए देश के लिए पहला 'ऑस्कर अवॉर्ड' पाया था। भानु ने हॉलीवुड में भी अपनी कला का जलवा दिखाया और कई विदेशी फिल्मकारों के साथ काम किया। कॉस्टयूम डिजाइनर के तौर पर भानु अथैया ने पाँच दशक के करियर में 100 से भी ज्यादा फिल्मों में योगदान दिया। उनकी आखिरी फिल्म थी आमिर खान की 'लगान' और शाहरुख खान की 'स्वदेस' जिसमें उन्होंने अपनी कला दिखाई थी। भानु ने अपने करियर में गुरुदत्त, राज कपूर, यश चोपड़ा, आशुतोष गोवारिकर, गुलजार से लगाकर आमिर खान की फिल्मों समेत कई बड़े निर्देशकों के साथ काम किया।
    फिल्मों में कास्ट्यूम डिजाइनिंग की अपनी अलग अहमियत होती है। इसमें कल्पना का भी समावेश होता है और कला का भी! कहानी और समयकाल के मुताबिक कलाकारों के लिए कपडे डिजाइन करने की कला ही कास्ट्यूम डिजाइनिंग कहलाती है। भानु ने कई हिंदी फिल्मों में कपड़ों को डिजाइन करके अपनी जगह बनाई थी। उन्हें सबसे पहले 1956 में आई देवआनंद की फिल्म 'सीआइडी' की फिल्म में अपनी कला दिखाने का मौका मिला था। लेकिन, उनको सबसे ज्यादा पहचान मिली रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'गाँधी' से! 1983 में भानु को 'गांधी' के लिए ऑस्कर में 'बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइनर अवॉर्ड' से नवाजा गया था। रिचर्ड एटनबरो ने एक बार कहा था कि मुझे 'गाँधी' बनाने में 17 साल लग गए थे। लेकिन, फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा यानी कास्ट्यूम डिजाइनिंग के लिए भानु अथैया का नाम फाइनल करने में मुझे महज 15 मिनट लगे। उनके आईडिया सुनकर ही मेरे दिमाग ने यह फाइनल कर लिया था कि फिल्म में कॉस्ट्यूम का काम भानु से बेहतर कोई नहीं कर सकता! भानु ने चित्रकारी में गोल्ड मेडेलिस्ट थीं, ये भी एक वजह थी कि रिचर्ड एटनबरो ने उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए चुना था। 
   अथैया ने कोनराड रूक की ‘डेयरिंग सिद्धार्थ’ और कृष्णा शाह की ‘शालीमार’ जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों के अलावा जर्मन शॉर्ट फिल्म ‘द क्वाउड डोर’ के लिए भी काम किया था। उन्हें गुलजार की फिल्म ‘लेकिन’ (1990) और आशुतोष गोविरकर की फिल्म ‘लगान’ (2001) के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। 55वें ऑस्कर अवॉर्ड 11 अप्रैल 1983 को आयोजित हुए थे, जिसमें भानु को ऑस्कर मिला था। इसके करीब 26 साल बाद भारत के किसी व्यक्ति को दूसरा ऑस्कर अवॉर्ड मिला जो म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान लेकर आए थे।
    साल 2012 में भानु अथैया ने ऑस्कर अवॉर्ड की ट्रॉफी 'एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज' को लौटाने की इच्छा व्यक्त की थी! इसके पीछे उनका तर्क था कि इस अनमोल धरोहर की सुरक्षा के लिए उनका परिवार और भारत सरकार सक्षम नहीं हैं। इसलिए ये अवॉर्ड अकादमी के संग्रहालय में ज्यादा सुरक्षित और सुव्यवस्थित रहेगा। वे चाहती थीं कि उनके बाद ऑस्कर की इस ट्रॉफी को लोग देखें! भारत में ऐसे कई अवॉर्ड चोरी हुए हैं। इसलिए भानु चाहती थी कि ये ट्रॉफी हमेशा सुरक्षित रहे! अगर उनकी ये ट्रॉफी ऑस्कर अकादमी के ऑफिस में रखी रहेगी, तो इसे ज़्यादा लोग इसे देख पाएंगे। भानु का कहना था कि मैं कई बार ऑस्कर अकादमी के ऑफिस में गई हूँ। वहाँ मैंने कई लोगों की ट्रॉफी रखी हुई देखी हैं! मुझे बताया गया कि ऑस्कर अवॉर्ड मिलने के बाद कुछ लोगों ने इस ट्राफी की सुरक्षा और सम्मान के लिए इसे अकादमी के ऑफिस को सौंप दिया है।अमेरिकी कॉस्ट्यूम डिजाइनर एडिथ हेड ने भी अपने 8 ऑस्कर ट्रॉफियों को अकादमी में रखवा दिया था! 2010 में अथैया ने कास्ट्यूम डिजाइनिंग पर अपनी किताब 'द आर्ट ऑफ़ कॉस्ट्यूम डिज़ाइन' रिलीज़ की, जिसे हॉर्पर कोलिंस ने प्रकाशित किया था।
   भानु अथैया ने कभी किसी फैशन स्कूल में कॉस्ट्यूट डिजाइन की पढ़ाई नहीं की। उन्होंने महिलाओं की  पत्रिकाओं के लिए फ्रीलांस फैशन इलस्ट्रेटर के रूप में काम किया था। इससे उनकी पहचान बनी और गुरुदत्त ने 1956 में उन्हें 'सीआईडी' से बतौर कॉस्ट्यूम डिजाइनर जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद गुरुदत्त की फिल्म प्यासा (1957), चौदहवीं का चांद (1960) और 'साहिब बीबी और गुलाम' में भी कास्ट्यूम डिजाइनिंग की। इसके अलावा उन्होंने कागज के फूल (1959), वक्त (1965), गाइड (1965), तीसरी मंजिल (1966), पत्थर के सनम (1967), मेरा नाम जोकर (1970), जॉनी मेरा नाम (1970), अनामिका (1973), सत्यम शिवम सुंदरम (1978), कर्ज (1980), राम तेरी गंगा मैली (1985), चांदनी (1989), 1942: अ लव स्टोरी और स्वदेस (2004) जैसी फिल्मों के लिए भी काम किया। 
   भानु का कहना था कि मेरे लिए सिनेमा का काम खुद को अभिव्यक्त करने और मेरी कल्पना को उड़ान देने का एक रास्ता है। यह काम इतनी संपूर्णता लिए हुए होता है, कि मैंने कभी अपना बुटीक खोलने के बारे में भी नहीं सोचा। जबकि, मुझे कई लोगों ने सलाह दी! कई बड़े कलाकार मेरे पास आते थे और फिल्म निर्देशकों से मेरे नाम की सिफारिश करते थे। भानु ने एक साक्षात्कार में बताया था कि नरगिस को मेरे डिजाइनर कपड़े बहुत पसंद थे! उन्होंने कई बार मुझे इसे व्यवसाय बनाने का भी कहा, लेकिन मेरी संतुष्टि फिल्मों के लिए काम करना ही रहा! ऑस्कर जीतने के बाद भानु अथैया ने उस शाम को याद करते हुए कहा था कि 1983 में डोरोथी शिंडलेयर पवेलियन में हो रहे उस समारोह में मेरे साथ कार में फिल्म के लेखक भी थे! उन्होंने तभी कह दिया था कि मुझे लगता है बेस्ट कास्ट्यूम डिजाइन का अवॉर्ड आपको ही मिलेगा! ऑस्कर समारोह में आए दूसरे प्रतियोगी डिज़ाइनर्स का भी यही कहना था कि अवॉर्ड मुझे ही मिलेगा। उत्सुकतावश मैंने पूछा कि आप इतने विश्वास से कैसे कह सकते हैं? इस सवाल पर उन लोगों का जवाब था कि आपकी फिल्म का दायरा बहुत बड़ा है, हम उससे मुकाबला नहीं कर सकेंगे! 
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Monday, October 12, 2020

ये उपचुनाव नहीं, सिंधिया की राजनीतिक प्रतिष्ठा का दांव!

- हेमंत पाल

   मध्यप्रदेश की राजनीति के केंद्र में इन दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया छाए हुए हैं। क्योंकि, ये उनके राजनीतिक जीवन का सबसे प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव है। उनके 19 विश्वस्त साथियों के बहाने उनकी साख दांव पर लगी है। इसे उनकी राजनीति की अग्निपरीक्षा भी माना जा सकता! यदि वे इस परीक्षा में सफल होते हैं, तो उनके लिए भाजपा के नए दरवाजे खुल जाएंगे! पर, यदि ऐसा नहीं होता है, तो उपचुनाव की हार का सारा खामियाजा सिंधिया पर थोपा जाना तय है! ऐसे में उनके साथी भी उनसे कन्नी काट सकते हैं। उपचुनाव की 28 में से 19 सीटें ऐसी हैं, जो सीधे सिंधिया-घराने के प्रभाव में है। भाजपा ने भी इनका दारोमदार पूरी तरह से सिंधिया को सौंप दिया। इन सीटों पर भाजपा की जीत का श्रेय यदि सिंधिया के खाते में दर्ज होगा, तो हार का खामियाजा भी उन्हें झेलना है। उपचुनाव के नतीजे सिर्फ शिवराज सरकार को स्थायित्व नहीं देंगे, सिंधिया की भविष्य की राजनीति के लिए भी ये निर्णायक हैं!       
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   28 विधानसभा सीटों पर मध्यप्रदेश में हो रहे उपचुनाव दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों के बीच की महज सियासी जंग नहीं है। ये उपचुनाव सीधे-सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के फैसले को सही और गलत ठहराने का इम्तिहान है। यदि कारण है कि कांग्रेस ने 'गद्दार' और 'खुद्दार' के नारे को हवा दी है। लेकिन, पलड़ा किस तरह झुकेगा ये कहना मुश्किल हैं, क्योंकि उपचुनाव वाले क्षेत्रों के मतदाता खामोश हैं। वे सबकी सुन तो रहे हैं, पर बोल नहीं रहे! ये उपचुनाव सिंधिया के सियासी फैसले के अलावा भाजपा के लिए भी नाक का सवाल बन गया! क्योंकि, सिंधिया गुट की बगावत ने भाजपा को जो फ़ायदा दिलाया, इस उपचुनाव के नतीजे से उस पर जनता की मुहर लगेगी। कांग्रेस यदि मतदाताओं से सहानुभूति के नाम पर वोट मांग रही है, तो भाजपा और सिंधिया ने कांग्रेस की 15 महीने की सरकार के फैसलों को कटघरे में खड़ा करके अपने पक्ष में वोट देने की अपील की है। मतदाता का एक वोट कई सारे फैसलों को सही और गलत ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।      
    प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है, जब 28 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं! जबकि, सामान्य स्थिति में विधायकों के निधन से सिर्फ 3 सीटें खाली हुई हैं। बाकी की 25 सीटों पर कांग्रेस से बगावत के कारण उपचुनाव के हालात बने! सिंधिया समर्थक 19 विधायकों के साथ 3 और विधायकों ने कांग्रेस से विद्रोह किया था और ये संख्या 22 हो गई थी! बाद में 3 और विधायकों ने बहती गंगा में हाथ धोकर भाजपा का झंडा थाम लिया। कांग्रेस के मुताबिक उनके विधायकों की बगावत में पैसों का लेन-देन बड़ा मुद्दा है। इसमें कितनी सच्चाई है, इसके प्रमाण किसी के पास नहीं है। ये महज आरोप है! पर, आज नहीं तो कल इस पर से परदा जरूर उठेगा कि किस प्रलोभन में 22 विधायकों ने पाला बदला! यदि कोई बड़ा स्वार्थ नहीं था, तो ये बहुत बड़ी बात है कि सिर्फ सिंधिया से प्रतिबद्धता कारण 19 विधायकों ने जनादेश को ठुकराकर उनका साथ दिया! पर, यदि उपचुनाव के बाद विपरीत नतीजे आते हैं और यही प्रतिबद्धता बरक़रार रहती है, तो फिर इसे झुककर सलाम किया जाना चाहिए! अमूमन राजनीति में ऐसा त्याग कभी देखा नहीं गया। 
   उपचुनाव के नतीजे विपरीत रहने पर यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक भविष्य का नुकसान हो सकता हैं, तो नतीजे पक्ष में रहने पर उन्हें भाजपा का बड़ा नेता बनने से भी रोक नहीं सकता! स्पष्ट कहा जा सकता है, कि उपचुनाव से यदि शिवराजसिंह की सरकार को स्थायित्व मिलेगा, तो सिंधिया की राजनीति भी यहीं से नया मोड़ लेगी। उनका राजनीतिक कद, उनकी प्रतिष्ठा, उनकी रणनीति, उनके समर्थक और सिंधिया परिवार का दबदबा सबकुछ उनके 19 समर्थकों की हार-जीत से तय होगा। 28 में से जो 19 सिंधिया समर्थक इस समय मैदान में हैं, उनमें सबसे ज्यादा 16 ग्वालियर-चम्बल संभाग की सीटें हैं! यहाँ चुनाव प्रचार और मुद्दों में सिंधिया ही आगे हैं। ये वो इलाका है, जहाँ 300 सालों से सिंधिया-परिवार का दबदबा है। आजादी के बाद से ही यहाँ 'महल की राजनीति' का सम्मान रहा है! पर, अब ये सबकुछ 16 सीटों पर सिमट गया। शेष 3 सीटें (बदनावर, सांवेर और हाटपिपलिया) मालवा क्षेत्र की है। यदि इसमें से ज्यादातर सीटें उनके समर्थकों ने जीत ली, तो वे भाजपा और मध्यप्रदेश की राजनीति के केंद्र में होंगे और उनके भविष्य की दिशा भी तय हो जाएगी! पर, यदि ऐसा नहीं होता है तो उनका भविष्य मुश्किल में होगा! क्योंकि, जिस तरह के दावे करके वे भाजपा में आए हैं, उन्हें सही साबित करना भी उनकी ही जिम्मेदारी है।    
     भाजपा ने भी उन 19 सीटों का दारोमदार पूरी तरह सिंधिया को सौंप दिया है, जहाँ से उनके समर्थक भाजपा के उम्मीदवार हैं। यदि ज्यादातर उम्मीदवार ये उपचुनाव जीत गए, तो वे सिंधिया का कद इतना बड़ा कर देंगे कि प्रदेश भाजपा के कई नेता उनके सामने बौने नजर आएंगे! ये खतरा भाजपा के वे नेता भी समझ रहे हैं, जिनका राजनीतिक भविष्य सिंधिया समर्थकों की हार-जीत से तय होने वाला है। उन्हें इस बात का भी अच्छी तरह से अहसास है कि संघ और भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं रखेगा! नतीजे यदि सिंधिया के पक्ष में आते हैं, तो वे भाजपा में निर्णायक की भूमिका में नजर आ सकते हैं। पर, यदि संभावनाएं प्रबल हैं, तो खतरे भी उतने ही बड़े हैं। ये चुनौती सिर्फ ज्योतिरादित्य सिंधिया अकेले तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे 'सिंधिया परिवार' की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है।    
   उपचुनाव के पक्षधर नतीजे यदि सिंधिया को केंद्र में मंत्री पद देंगे, तो राज्य की राजनीति में भी वे भाजपा के शीर्ष नेताओं में एक होंगे। क्योंकि, इस बहाने वे ये साबित करने में भी कामयाब होंगे कि राजनीति में पार्टी के अंदर गुट बनाकर चलने के क्या फायदे हैं! लेकिन, नतीजों के विपरीत होने पर राजनीति को लेकर उनके बहुत सारे भ्रम तो टूटेंगे, उनके गुट को भी बंटने से नहीं रोका जा सकेगा! क्योंकि, उपचुनाव हारने वाले पर न तो भाजपा अगले चुनाव में दांव लगाएगी और न सिंधिया का दबाव उनके लिए कोई फ़ायदा दिला सकेगा! इन उपचुनाव में सिंधिया के लिए उनके चार समर्थकों की जीत  सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा वाली है। तुलसी सिलावट (सांवेर), गोविंद राजपूत (सुरखी), इमरती देवी (डबरा) और प्रद्युम्नसिंह तोमर (ग्वालियर) को सिंधिया के सबसे नजदीक समझा जाता है। यदि ये 4 सीटें भाजपा ने सिंधिया के दम पर जीत ली, तो वो एक बड़ा गढ़ फतह कर लेगी! जबकि, कांग्रेस ने इन चारों को हराने पर अपना पूरा ध्यान लगा रखा है! इनमें से तुलसी सिलावट और गोविंद राजपूत के मंत्री पद की अवधि 20 अक्टूबर को ख़त्म हो रही है! यानी उन्हें बिना मंत्री रहे ही  उपचुनाव लड़ना होगा, जो आसान नहीं है। आचार संहिता की बाध्यता के कारण भाजपा चाहकर भी इन्हें दोबारा मंत्री नहीं बना सकती! इन्हीं सारी अड़चनों से सिंधिया समर्थकों को पार पाकर जंग जीतना है!                   
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Saturday, October 10, 2020

हिंदी सिनेमा के प्रथम पुरुष!

- हेमंत पाल

    यदि आपसे ये पूछा जाए कि हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन नहीं होते तो क्या होता! निश्चित रूप से सवाल सुनकर कोई भी दो पल को ठिठकेगा जरूर! जवाब ये भी हो सकता है, कि वे नहीं होते तो कोई और होता! लेकिन, अमिताभ के होने से सिनेमा में जो पूर्णता आई, उससे कोई कैसे इंकार करेगा!  अमिताभ बच्चन सिनेमा की दुनिया का ऐसा नाम है, जिसके बिना हिंदी फिल्मों का जिक्र अधूरा है। वे बरसों से दर्शकों के दिलों पर राज कर रहे हैं। वे ऐसे कलाकार हैं, जिन्हें तीन पीढ़ियां जानती है। लेकिन, उनके आलोचकों की भी कमी नहीं है! ये स्वाभाविक भी है! क्योंकि, असहमत होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, अमिताभ के अभिनय, काम के प्रति उनके समर्पण और विवादों से दूर रहने की उनकी आदत को लेकर यदि कोई उंगली उठाए तो उसे सही नहीं कहा जा सकता!
      अब अमिताभ कालजयी हो चुके हैं। अपने अभिनय के दम पर उन्होंने अपनी जगह न सिर्फ बनाई, बल्कि उस शीर्ष पर काबिज हैं। वे जहाँ खड़े हैं, उसके आसपास भी कोई दिखाई नहीं देता! वे बीती आधी सदी से शिखर नायक हैं। न सिर्फ देश के हिंदी फिल्मों के दर्शक उन्हें अपना रोल मॉडल मानते हैं, ब्रिटेन, अमेरिका, सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन, मलेशिया और पूरे अफ्रीका में अमिताभ का जलवा है। वे दुनिया के हर उस देश में लोकप्रिय हैं, जहां भारतीय मूल के लोग बसे हैं। जहाँ भी लोग हिंदी फ़िल्में पसंद करते हैं, वहां अमिताभ उन लोगों के दिलों में बसे हैं। लेकिन, उन्होंने ये मुकाम आसानी से नहीं पाया। वे आज अभिनय के जिस शिखर पर हैं, वहां पहुंचने में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे। शुरुआती असफलता के बाद उन्होंने सफलता का स्वाद चखा! लेकिन, फिर असफलताओं का एक ऐसा लम्बा दौर भी आया जिसका सफल काफी हिचकोले भरा था। लेकिन, वे उन थपेड़ों से भी संभल गए और अब लोकप्रियता की उस पायदान पर हैं, जहाँ उनका कोई विकल्प नहीं दिखता! 
      एक्शन का अमिताभ से बचपन से ही रिश्ता रहा है। उनके मुंडन के दिन ही अमिताभ के घर के दरवाजे पर एक सांड आया, जो उन्हें पटखनी देकर चला गया था। उससे उनके सिर में गहरा घाव हो गया और कई टांके लगे थे। अपने जीवन में अमिताभ एयरफोर्स में इंजीनियर बनना चाहते थे! पर, नियति को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने शुरूआती दौर में कोलकाता की एक शिपिंग कंपनी में बतौर एग्जीक्यूटिव काम किया। आज भले ही लोग उनकी गंभीर आवाज़ के दीवाने हैं, कभी इसी आवाज़ की वजह से ऑल इंडिया रेडियो ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया था। लेकिन, उन्होंने कोलकाता में रेडियो अनाउंसर के तौर पर काम किया। अमिताभ अपने संघर्ष के दिनों को आज भी नहीं भूले। उन्होंने कई रातें मुंबई के मरीन ड्राइव के पास की बेंच पर बिताई। वे आज जब उस जगह के आसपास से गुजरते हैं, तो काफी भावुक हो जाते हैं।
   अमिताभ की हिंदी को लेकर अकसर उनकी प्रशंसा की जाती है। निश्चित रूप से ये उनके पिता की साहित्यिक पहचान का ही प्रभाव है। अमिताभ का रिश्ता एक साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से है। पिता की तरह उन्हें भी लिखने-पढ़ने का शौक है। फ़िल्मी दुनिया जैसे दिखावटी माहौल में रहते हुए भी उन्हें साफ़-सुथरी हिंदी बोलना पसंद है। टीवी पर उनके शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में वे जिस तरह की हिंदी का प्रयोग करते हैं, उसे पसंद करने वालों की कमी नहीं। वे अपनी भाषा को लेकर बेहद गंभीर रहते हैं। कभी देखा नहीं गया कि उन्होंने सार्वजनिक रूप दोयम दर्जे की भाषा का प्रयोग किया हो या उनकी किसी बात पर उंगलियां उठी हों! वे हमेशा मानक हिंदी बोलते हैं। उनके शब्दों का उच्चारण अस्पष्ट नहीं होता और न वे खिचड़ी भाषा बोलते हैं। उन्होंने भाषा को स्तरीय और सुसंस्कृत बनाए रखा। वे अपनी फिल्मों के जरिए गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी लेकर जाने में सफल रहे! ऐसे क्षेत्रों में भी लोग उनकी फिल्मों के संवाद बोलते सुनाई दे जाएंगे, जहाँ हिंदी नहीं बोली जाती। 
   शुरू से ही अमिताभ की जिंदगी में उतार-चढाव आते रहे। फिल्मों दुनिया में भी सफलता और असफलता का लम्बा दौर चला! 'सात हिंदुस्तानी' से जो दौर शुरू हुआ, वो हिचकोले खाता रहा! ‘जंजीर’ की सफलता ने उनकी जिंदगी बदल दी! इस फिल्म ने उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ का ख़िताब भी दिया। जिसे अमिताभ ने दीवार, शोले, त्रिशूल, काला पत्थर, अमर अकबर एंथोनी, डॉन, लावारिस और ‘मुकद्दर का सिकंदर’ जैसी मारधाड़ वाली फिल्मों में जमकर भुनाया। लेकिन, फिर वे परदे से एकदम गायब से हो गए। कई फ़िल्में फ्लॉप हुई! किंतु, इसके बाद का समय ऐसा आया जिसने नए अमिताभ को जन्म दिया। आज हमारे सामने परदे की दुनिया का वही प्रथम पुरुष खड़ा है, जिसके जिक्र के बिना हिंदी फिल्म इतिहास का कोई अध्याय पूरा नहीं होता!
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Monday, October 5, 2020

तलवार भांजने उतरे दलबदलू और मौकापरस्त चेहरे!

  मध्यप्रदेश में सियासी जंग का माहौल बन गया। हुंकार शुरू हो गई! रणभेदी बज चुकी है। एक तरफ की सेना के ज्यादातर सेनापति घोषित हो गए! दूसरी तरफ के सेनापति घोषित तो नहीं हुए, पर कौन होंगे ये पहले से तय है। बहुत से चेहरे वही हैं, जो कुछ महीने पहले सामने वाली सेना में थे! लेकिन, दोनों ही तरफ के ज्यादातर सेनापतियों की अपनी सेना के प्रति समर्पण की कसमें नहीं खाई जा सकती! पहले उनकी प्रतिबद्धताएं कुछ और थीं, अब और है! लेकिन, जो भी सेनापति अपनी सेना के लिए आगे आकर तलवार भांजेंगे, उनकी जीत इस बात पर भी निर्भर है कि उनके साथी कितना साथ देते हैं। ये सियासती जंग इसलिए महत्वपूर्ण कि जो भी सेना जीत का परचम लहराएगी वही प्रदेश पर राज करेगी। इन दोनों सेनाओं की जंग के बीच एक तीसरी सेना ने भी हथियार तो उठाए, पर उनकी मौजूदगी कोई कमाल कर सकेगी, ऐसा नहीं लगता! 

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- हेमंत पाल 
   
   प्रदेश में उपचुनाव के लिए कांग्रेस ने 28 में से 24 सीटों के उम्मीदवार घोषित कर दिए! बाकी बची 4 सीटें कुछ पेंच होने से रूक गईं! जबकि, भाजपा की 3 सीट छोड़कर 25 उम्मीदवार तय हैं, पर घोषित नहीं! ख़ास बात यह कि दोनों ही पार्टियों में बहुत से उम्मीदवार दलबदलू हैं या मौकापरस्त! ऐसी स्थिति में जब वे मैदान में आएंगे, उन्हें खुले और अंदरूनी दोनों तरफ से विरोध का सामना करना पड़ेगा। दोनों ही पार्टियों को यही चिंता सता रही है! इस स्थिति से बचने के लिए दोनों पार्टियां अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को समझाने और सक्रिय करने की कोशिश में लगी हैं। इसका सबसे बड़ी वजह है कि ये उपचुनाव प्रदेश में सरकार का भविष्य निर्धारित करेंगे! चुनाव के नतीजों से तय होगा कि मध्यप्रदेश में भाजपा की शिवराज सरकार चलती रहेगी या कमलनाथ कांग्रेस के सत्ता-रथ पर सवार होकर फिर लौटेंगे! 
   उपचुनाव की स्थितियों के मुताबिक भाजपा को अपने 28 उम्मीदवारों की घोषणा पहले करना थी! क्योंकि, 25 सीटों पर कौन योग्य है, ये तो पार्टी को विचार ही नहीं करना था! जबकि, कांग्रेस ने चुनाव की घोषणा से पहले ही अधिकांश उम्मीदवार सामने खड़े कर दिए! लेकिन, 15 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में 6 ऐसे चेहरे हैं, जो दल बदलकर उम्मीदवार बने हैं। ये भाजपा या बसपा से कांग्रेस में आए हैं। कांग्रेस की दूसरी सूची में 9 उम्मीदवार घोषित किए गए। इनमें भी तीन ऐसे चेहरे हैं, जो भाजपा से कांग्रेस की नाव में बैठे हैं। कांग्रेस ने 24 में से 9 ऐसे उम्मीदवारों पर दांव लगाया, जिनमें 7 भाजपा से आए हैं और 2 बसपा से! कांग्रेस का कहना है कि हमने इन्हें अपने पार्टी सर्वे में जीतने वाले चेहरे पाया है! कहा नहीं जा सकता कि कांग्रेस ने जिन्हें अपने सर्वे में योग्य पाया है, उन्हें उस क्षेत्र में मतदाता भी योग्य समझें! संभव है कि दल बदलकर चुनाव लड़ने वालों को विरोध का सामना करना पड़े। लेकिन, भाजपा में ऐसे उम्मीदवारों भरमार हैं। वास्तव में ये चुनाव ऐसे चेहरों के बीच होना है,जो या तो दलबदलू हैं या फिर जिन्होंने मौका देखकर पाला बदला है। 
   बसपा के पूर्व विधायक, प्रदेश अध्यक्ष रहे और कुछ महीने पहले कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवार रहे फूलसिंह बरैयां को कांग्रेस ने भांडेर सीट से टिकट दिया है। उनके सामने होंगी कांग्रेस से भाजपा में आने वाली रक्षा सरौनिया! दोनों ही अपनी मूल राजनीतिक विचारधारा से हटकर आमने-सामने हैं।
यही स्थिति करैरा सीट पर हैं, कांग्रेस के टिकट पर प्रागीलाल जाटव को उम्मीदवार बनाया है। वे दो बार बसपा से चुनाव लड़ चुके हैं। यदि भाजपा ने कोई बदलाव नहीं किया तो उनका मुकाबला जसवंत जाटव से होगा, जो सिंधिया टीम का हिस्सा हैं। बमौरी सीट से कांग्रेस ने अपने सर्वे में कन्हैयालाल अग्रवाल को जीतने वाला उम्मीदवार समझा है। जबकि, वे पहले भाजपा में थे और मंत्री भी रहे हैं। उनका मुकाबला महेंद्रसिंह सिसौदिया से होना तय है, जो सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा आए हैं। कांग्रेस ने सांवेर से प्रेमचंद गुड्डू और डबरा से सुरेश राजे को मैदान में उतारा है! ये दोनों ही दलबदलू हैं। डबरा के कांग्रेस उम्मीदवार वास्तव में भाजपा की संभावित उम्मीदवार और मंत्री इमरती देवी के समधी हैं। वे पहले भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके हैं। बाद में इमरती देवी ही उन्हें कांग्रेस में लेकर आई थीं। अंबाह से भाजपा के संभावित उम्मीदवार कमलेश जाटव के सामने कांग्रेस ने जिसे उम्मीदवार बनाया है, वे सत्यप्रकाश सखवार बसपा से कांग्रेस में आए हैं। 
     कांग्रेस की दूसरी सूची में जौरा से पंकज उपाध्याय, सुमावली से अजब कुशवाह, ग्वालियर (पूर्व) से सतीश सिकरवार, पोहरी से हरिवल्लभ शुक्ला, मुंगावली से कन्हैयाराम लोधी, सुरखी से पारूल साहू, मांधाता से उत्तमराज नारायण सिंह, बदनावर से अभिषेक सिंह टिंकू बना और सुवासरा से राकेश पाटीदार को उम्मीदवार बनाया गया। दूसरी सूची में सतीश सिकरवार, अजब कुशवाह एवं पारूल साहू उपचुनाव के लोभ में भाजपा से कांग्रेस में आए हैं। लेकिन, बदनावर से उम्मीदवार बदला जाना तय समझा जा रहा है। क्योंकि, अभिषेक सिंह को कांग्रेस ने अपने सर्वे में भले जिताऊ समझा हो, पर वास्तव में वो अनजाना चेहरा है! 
   विधानसभा की कुल 230 सीटों में भाजपा के 107 विधायक हैं! जबकि, कांग्रेस के 88, चार निर्दलीय, दो बसपा एवं एक विधायक सपा का है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 28 सीटों में से 12 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं। बसपा ने ग्वालियर-चंबल इलाके के 8 उम्मीदवारों की घोषणा सबसे पहले करके अपनी मौजूदगी का अहसास करा दिया था। लेकिन, उत्तरप्रदेश से बाहर बसपा चुनाव के प्रति गंभीर कभी नहीं लगी! वो हमेशा वोट-कटवा पार्टी की तरह मैदान उतरती है। 2018 के मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में बसपा को 5% वोट मिले और उसके 2 उम्मीदवार जीते थे। लेकिन, बसपा को मालवा-निमाड़ इलाके में कोई खास तवज्जो कभी नहीं मिली। इस पार्टी की हमेशा ही कोशिश रही है, कि किसी एक पार्टी को बहुमत न मिले और उसके इक्का-दुक्का विधायक संतुलन की राजनीति की कीमत वसूलें! इस बार 28 सीटों के उपचुनाव में भी ऐसे हालात बन सकते हैं, इसलिए मायावती ने अपनी पार्टी को सक्रिय कर दिया। 
   बहुजन समाज पार्टी ने पहली सूची में ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की आठ सीटों से उम्मीदवारों की घोषणा की। ये वो सीटें हैं, जहाँ से बसपा को हमेशा ही अच्छे वोट मिलते रहे हैं। पार्टी ने जौरा से सोनाराम कुशवाह, मुरैना से रामप्रकाश राजोरिया, मेहगांव से योगेश मेघसिंह नरवरिया, पोहरी से कैलाश कुशवाहा (सभी सामान्य सीट), अंबाह से भानुप्रताप सखवार, गोहद से जसवंत पटवारी, डबरा से संतोष गौड़ और करैरा से राजेन्द्र जाटव (सभी अनुसूचित जाति सीट) को उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया है!  प्रदेश में 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा ने दो सीटें जीती थीं। ये दोनों ही विधायक अपनी राजनीतिक परंपरा के तहत पहले कांग्रेस के साथ थे, बाद में भाजपा के समर्थन में आ गए। 
   बसपा ने दूसरी सूची में मालवा-निमाड़ की 4 सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित किए हैं। इनमें 2 सीटें आरक्षित और 2 सामान्य है। सांवेर (सुरक्षित) से विक्रम सिंह गेहलोत, मांधाता सीट से जितेंद्र वाशिन्दे, सुवासरा से शंकरलाल चौहान और आगर-मालवा (सुरक्षित) सीट से गजेंद्र बंजारिया को उम्मीदवार बनाया है। सांवेर सीट से विक्रम गेहलोत को टिकट देकर बसपा ने मुकाबले को दिलचस्प जरूर बना दिया। उन्हें बलई समाज के वोट काटने के लिए उतारा है। क्योंकि, यहाँ से दोनों प्रमुख उम्मीदवार तुलसी सिलावट और प्रेमचंद गुड्डू खटीक समाज से हैं। लेकिन, यहाँ बलई मतदाता इतने हैं कि वे नतीजा बदल सकते हैं। इस समाज की हमेशा ही टिकट की मांग रही है, पर न तो कांग्रेस ने टिकट दिया और न भाजपा ने! यही कारण रहा कि इस बार समाज ने बसपा के साथ मिलकर दांव लगाया है। वे जीत न सकें, पर कांग्रेस और भाजपा की नाक में दम तो कर ही सकते हैं।  
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Sunday, October 4, 2020

परदे के कैनवस पर 'यश' की प्रेमकथाएं!  

- हेमंत पाल
     जब से हिंदी फिल्म निर्माण का दौर शुरू हुआ, फ़िल्मकारों ने अपनी पसंद और दर्शकों के मिजाज के मुताबिक फिल्म बनाना शुरू किया। शुरूआती दौर में धर्म आधारित कहानियों पर कई फ़िल्में बनी। उस समय 'रामायण' और 'महाभारत' के प्रसंग ही ऐसे विषय थे, जिन्होंने दर्शकों को सिनेमाघर तक आने के लिए मजबूर किया। लेकिन, धीरे-धीरे प्रेम कहानियां दर्शकों की पहली पसंद बनी। बॉलीवुड में प्रेम कथाओं को पसंद करने वालों का नया दर्शक वर्ग खड़ा हो गया। परदे पर कई खूबसूरत प्रेम कहानियों को जीवंत किया गया। किंतु, बॉलीवुड को यश चोपड़ा नाम का एक ऐसा फ़िल्मकार मिला, जिसने फिल्मों में प्रेम की परिभाषा ही बदल दी! उन्होंने फिल्मों में प्रेम कहानियों को सेलुलॉइड पर उकेरने का नजरिया हमेशा के लिए ही बदल दिया। 
    आजादी के बाद जब धार्मिक फिल्मों से दर्शक उबने लगे तो आजादी की कहानियों को फिल्मों के विषय बनाया। लेकिन, धीरे-धीरे निर्माता, निर्देशकों ने दर्शकों की पसंद के मुताबिक खुद को ढालना शुरू किया और 60 के दशक के आते-आते प्रेम को वरीयता दी जाने लगी! राजकपूर की आरके फिल्म्स, चेतन आनंद और देवआनंद की नवकेतन, रामानंद सागर की सागर आर्ट और यश चोपड़ा की यशराज फिल्म्स ने कुछ ऐसे विषय चुनना शुरू किए, जिसमें उनकी महारथ थी! रोमांस इन सभी का सबसे ज्यादा पसंदीदा विषय था, पर उसके प्रस्तुतीकरण का सबका अपना अंदाज अलग था। इनमें यश चोपड़ा अकेले ऐसे फ़िल्मकार थे, जिन्होंने पारिवारिक पृष्ठभूमि में प्रेम को गढ़ा! लेकिन, बीच में 'दीवार' जैसी एक्शन फिल्म भी बनाई, जो हिंदी फिल्म इतिहास में मील का पत्थर बनी! उन्होंने 'कभी-कभी' में अमिताभ बच्चन को प्रेमी की तरह पेश किया तो 'दीवार' से उसी अमिताभ को 'एंग्री मैन' बना दिया। इस जोड़ी ने ‘कभी कभी’ और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्में भी दी।                
    अपने पांच दशक के करियर में यश चोपड़ा ने परदे पर प्रेम की नई परिभाषा को गढ़ा है। ख़ास बात ये कि उनकी फिल्मों में प्रेम नदी के नैसर्गिक बहाव की तरह बहता दिखाई देता है! कभी ऐसा नहीं हुआ कि फिल्म के किसी प्रेम दृश्य को देखकर नजरें चुराना पड़ी हो! ये उनके निर्देशन का ही कमाल था कि अपने निर्देशन की पहली फिल्म 'दाग' में उन्होंने राजेश खन्ना से हत्या भी करवाई, पर प्रेम के धरातल में उस पात्र को कहीं कमजोर नहीं पड़ने दिया। इसलिए कि वे दर्शकों की नब्ज को अच्छी तरह पहचानते थे। किस दौर में दर्शक को मनोरंजन की कौनसी खुराक चाहिए, ये उन्हें पता था। उनका करियर भाई बीआर चोपड़ा के साथ अलग तरह की फिल्मों के साथ शुरू हुआ था! यश चोपड़ा की पहली सबसे फिल्म ‘वक़्त’ को माना जाता है! 1965 में आई इस फिल्म से ही फिल्मों में मल्टी स्टार का चलन शुरू हुआ। किंतु, उन्हें सिलसिला, चांदनी, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे और 'वीर जारा' जैसी प्रेम में पगी फिल्मों के लिए याद किया जाएगा।
    अपने करियर के शुरूआती दौर में यश चोपड़ा ने पारिवारिक कहानियों में एक्शन को जोड़कर फ़िल्में बनाई! यही कारण है कि 'दीवार' और 'त्रिशूल' पूरी तरह एक्शन फ़िल्में थीं, पर उसे पारिवारिक कहानियों के धागे में पिरोया गया था! दोनों ही फिल्मों में अमिताभ ने ऐसे विद्रोही बेटे का किरदार निभाया जो माँ की ममता से बंधा रहता है। 'त्रिशूल' में एक गाना था 'मोहब्बत बड़े काम की चीज है, ये कुदरत के ईनाम की चीज है!' अमिताभ और शशि कपूर पर इस गाने में प्रेम को बेकार और बेदाम की चीज भी बताया गया था! लेकिन, यश चोपड़ा ज्यादा दिन प्रेम के जादू से अलग नहीं रह सके। उन्होंने ‘चांदनी’ से रोमांटिक फिल्मों की शुरूआत की, तो फिर पीछे नहीं मुड़े! इसके बाद अनिल कपूर और श्रीदेवी को लेकर ‘लम्हे’ में नया प्रयोग भी किया। लेकिन, उनकी प्रेम की पारी में उनके साथी बने शाहरुख़ खान! उनके साथ 1993 में उनका सफर ‘डर’ के साथ शुरू हुआ था। शाहरुख ने एक पागल प्रेमी की ऐसी भूमिका निभाई थी, जिसका आज भी कोई जोड़ नहीं मिलता! 
     यश चोपड़ा ने फिल्म निर्माण में दर्शकों के मूड और वक़्त की नजाकत का भी बहुत ध्यान रखा! यही कारण है कि उनकी फ़िल्में समयकाल से जुड़ी लगती थीं। जब लोगों के बीच अमिताभ बच्चन और रेखा के बीच पनपता प्रेम और जया बच्चन की आपत्ति चर्चा में थी, उन्होंने इन तीनों को लेकर 'सिलसिला बनाई! फिल्म की कहानी इन तीनों की असल जिंदगी से अलग थी, पर रेखा और जया के बीच का तनाव और अमिताभ का दो हिस्सों में बंटा हर दर्शक ने महसूस किया। फिल्म के दो पात्रों के बीच पनपता प्रेम और पति-पत्नी के रिश्तों में बढ़ती उलझन को दर्शकों ने उनकी असल जिंदगी से जोड़कर देखा। लोगों को ये भी लगा कि यह सिर्फ फिल्म के रची गई प्रेम कहानी नहीं, बल्कि दो दिलों के मिलने और बिछुड़ने की असली दास्तान है। विवाहेत्तर रिश्तों पर बनी इस फिल्म में अमिताभ और रेखा की केमिस्ट्री चर्चा में रही। ऐसे में तीसरे कोण पर खड़ी जया को देखकर दर्शकों की आँखें भी गीली हुई! दर्शकों के लिए ये फिल्म नहीं, सच्ची कहानी का फिल्मांकन जैसा था। तब कहा गया था कि इन तीनों को साथ लेकर यश चोपड़ा ही फिल्म बना सकते थे!  
     यश चोपड़ा की आखिरी फिल्म थी ‘जब तक है जान!’ अपने 80वें जन्मदिन के मौके पर 2018 में उन्होंने कहा था कि ये उनकी अंतिम फिल्म है। अब वे फिल्मों से बिदा होकर परिवार के साथ रहेंगे! इस फिल्म के पूरा होने से पहले ही वे काम से तो मुक्त हो गए! लेकिन, परिवार के साथ नहीं रह सके! 21 अक्टूबर, 2012 को प्रेम का ये चितेरा अपनी कूंची साथ लेकर चला गया! 
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Sunday, September 27, 2020

बॉलीवुड की बदनामी बीच आयुष्मान के सम्मान के सुखद पल!

- हेमंत पाल

   इन दिनों बाॅलीवुड पर ड्रग्स का खुमार छाया है। अखबार और टीवी चैनल दिन-रात ड्रग्स के ड्रम पीटते नजर आ रहे हैं। बॅालीवुड की ऐसी छबि गढी जा रही है, मानो बॉलीवुड में ड्रग्स के सिवाए और कुछ नहीं है! इन कसैली खबरों के बीच यह खबर राहत देती है, कि 'टाइम' पत्रिका ने विश्व के सौ सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में अभिनेता आयुष्मान खुराना को शामिल किया है। आयुष्मान के साथ इस 'टाइम' सूची में केवल तीन वैश्विक अभिनेता को इस सूची में शामिल किया गया। इनमें संगीत संवेदनाएं सेलेना गोमेज और द वीकेंड हैं, जो पैरासिट बोंग जून हो, फेबे वॉलर-ब्रिज ऑफ फ्लेबाग से दुनियाभर में मशहूर हुए हैं। इनके साथ ब्रिटिश अभिनेत्री माइकेला जेल को भी इस सूची में जगह मिली है। 
  आयुष्मान के चयन की एक खासियत यह भी है कि वे सबसे कम उम्र के भारतीय हैं, जिन्हें इस साल 'टाइम' पत्रिका में जगह मिली। शक्ल-सूरत के लिहाज से आयुष्मान चमकते सितारों की खेप और सेलिब्रिटिज चेहरों से कमतर लगते हैं। लेकिन, फिल्मों में उनकी सफलता का ग्राफ चर्चित चेहरों से ऊपर रहा! उनकी यही खासियत उन्हें बाॅलीवुड के सितारों से अलग पहचान देती है। आयुष्मान ने रियलिटी शो में प्रतियोगी के तौर पर शुरुआत की थी! फिर उन्होंने टीवी शो का संचालन कर अपना करियर बनाया। फिल्मों के परदे पर वे 2012 में 'विकी डोनर' में पहली बार दिखाई दिए! इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दम लगा के हईशा, बरेली की बर्फी, शुभ मंगल सावधान, बधाई हो और 'आर्टिकल 15' जैसी कॉमेडी और सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों से खुद को स्थापित किया।
   आयुष्मान उन सितारों की तरह नहीं हैं, जो बाॅलीवुड के ग्लैमर में खुद को डुबोकर सेलिब्रिटी की तरह व्यवहार करते हैं। निजी जिंदगी में अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष कर रहे हैं। आयुष्मान का लक्ष्य रहा है, कि सिनेमा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जाए। यही कारण है कि सितारों की भीड के बीच उन्हें 'टाइम' ने सम्मान का हक़दार मानकर अपनी प्रतिष्ठित पत्रिका में वह स्थान दिया है जिसके लिए बडे बडे सितारे तरसते हैं। यह क्षण मेरी मान्यताओं और विचारों को पुष्ट करता है। उनका मानना है कि सिनेमा में इतनी शक्ति है कि इसके द्वारा समाज में लोगों के बीच सही मुद्दे उठाकर बदलाव लाया जा सके। आज बाॅलीवुड को ड्रग्स की खदान मानकर उसे कोसने वालों के सामने आयुष्मान एक उदाहरण हैं, जो इस बात को पुष्ट करते हैं, कि सारे कुएं भांग नहीं पड़ी है। पूरा बाॅलीवुड ही ड्रग्स के खुमार में नहीं डूबा। वहां आयुष्मान जैसे अभिनेता भी हैं, जो बॉलीवुड पर छाए धुएँ के छंटने की उम्मीद जगाते हैं।
   बॉलीवुड में चल रही नेपोटिज्म की अंतहीन बहस के बीच अभिनेता आयुष्मान खुराना का 'टाइम' की लिस्ट में शामिल होना किसी मिसाल से कम नहीं! कोई फ़िल्मी पृष्ठभूमि न होते हुए भी उन्होंने बॉलीवुड में अपनी जगह बनाई! प्रतिभाशाली और बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस अभिनेता की ये उपलब्धि अतुलनीय है। तय है कि इस सूची में उनका नाम देखकर कई लोग चौंके भी होंगे। समाज की रूढ़ीवादी सोच बदलने वाली फिल्मों में अभिनय करके पहचाने जाने वाले आयुष्मान का ये एक और कीर्तिमान है। अभिनेता के साथ वे गायक और लेखक भी हैं। उन्होंने अपनी कई फिल्मों में गाने भी गाए हैं। लेकिन, ये मुकाम पाना आसान नहीं था। आयुष्मान ने इसके लिए काफी संघर्ष किया। 
  फिल्मों के अलावा आयुष्मान सामाजिक कार्यों में भी बढ़ चढ़कर कर योगदान करते रहे हैं। यही कारण है कि 'यूनिसेफ़ इंडिया' ने बच्चों के हक एवं अधिकारों को प्रोत्साहन देने के लिए उन्हें सेलिब्रिटी एडवोकेट के रूप में अपनी इस मुहिम से जोड़ा है। इस मुहिम के तहत आयुष्मान खुराना बच्चों के खिलाफ हिंसा को खत्म करने की दिशा में यूनिसेफ़ के प्रयासों का समर्थन करेंगे। वे यूथ आइकन के रूप में इसके लिए काम करेंगे। इसके लिए उन्होंने मशहूर शख्सियत डेविड बेकहम के साथ हाथ मिलाया है, जो पूरी दुनिया में इस कैंपेन के लिए काम कर रहे हैं।
   इस बारे में भारत में यूनिसेफ़ के रिप्रेजेंटेटिव डॉ यास्मीन अली हक ने कहा कि आयुष्मान खुराना ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने अपने हर किरदार के जरिए एक मिसाल कायम की है। वे पूरी संवेदनशीलता और लगाव के साथ, हर बच्चे के लिए एक सशक्त आवाज बनने में कामयाब होंगे। बच्चों के खिलाफ हिंसा को खत्म करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों में आयुष्मान हमारा साथ देंगे। उनके सहयोग से इस महत्वपूर्ण मुद्दे के बारे में जागरूकता बढ़ाने में हमें काफी मदद मिलेगी! क्योंकि, कोविड-19 के दौर में लंबे समय तक चलने वाले लॉक डाउन और इस महामारी के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव की वजह से बच्चों के खिलाफ हिंसा और दुर्व्यवहार का खतरा काफी बढ़ गया है।
  इस दायित्व को निभाने के लिए उत्साहित आयुष्मान का मानना है कि बतौर सेलिब्रिटी एडवोकेट के रूप में 'यूनिसेफ़' के साथ काम करने का मौका उनके लिए  लिए बड़ी खुशी की बात है। उनका मानना कि कि  हर किसी को बेहतर बचपन पाने का पूरा हक है। वे कहते हैं कि जब मैं देखता हूं कि हमारे बच्चे अपने घर में पूरी तरह से सुरक्षित हैं! खेलकूद का पूरा आनंद लेते हैं, तब मुझे उन सभी बच्चों का ख्याल आता है जिनका बचपन सुरक्षित नहीं है। वे घर या घर के बाहर दुर्व्यवहार को झेलते हुए बड़े होते हैं। मैं यूनिसेफ़ के साथ मिलकर समाज के सबसे कमजोर तबके के बच्चों के अधिकारों का समर्थन करने के लिए तैयार हूं, ताकि वे हिंसा से मुक्त माहौल में खुश हाल, स्वस्थ और पढ़े-लिखे नागरिक के तौर पर विकसित हो सकें।
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