Tuesday, December 18, 2018

बदलाव का बड़ा कारण बनी दिग्विजय की नर्मदा यात्रा!


- हेमंत पाल   

   सारे अनुमानों को झुठलाते हुए कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में सरकार बना ली। डेढ़ दशक तक सरकार चलाने के बाद भी भाजपा को गद्दी छोड़ना ही पड़ी। राजनीति को समझने वाले कुछ जानकारों के अनुमान सही निकले, कुछ के गलत! लेकिन, जो नजर आ रहा था, वो यही था कि भाजपा के लिए चौथी बार सरकार बना पाना आसान नहीं है! लेकिन, भाजपा इस जमीनी सच्चाई को ठीक से समझ नहीं सकी! फिर भी भाजपा ने जितनी सीटें हांसिल की, वो अनुमान से ज्यादा ही है! जबकि, कांग्रेस ने चुनाव पूरी तैयारी से चुनाव लड़ा, फिर भी कुछ इलाकों में उम्मीदवारों का चयन करने में पार्टी चूक गई! कांग्रेस की यही चूक भाजपा के लिए फायदे कारण बनी और उसे अनुमान से करीब 10 से 12 सीटें ज्यादा मिली। इस सबके बावजूद इस सच को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की जीत का कोई सही शिल्पकार कोई रहा, तो वे दिग्विजय सिंह ही हैं। उनकी 3300 किलोमीटर की 6 महीने में पूरी हुई नर्मदा परिक्रमा ने नर्मदा पट्टी में जिस तरह का राजनीतिक माहौल बनाया था, उसी नतीजा है कि आज कांग्रेस सत्ता में है।          
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   विधानसभा चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह की राजनीतिक सक्रियता को लेकर भी काफी भ्रम उपजा था। चुनाव में उनकी भूमिका क्या होगी, उन्हें प्रदेश की राजनीति में दखलंदाजी के योग्य समझा भी जाएगा या नहीं! ऐसे कई सवाल हवा में थे। लेकिन, पंद्रह साल तक मध्यप्रदेश की राजनीति से बाहर रहने वाले दिग्विजय सिंह ने 'नर्मदा-परिक्रमा' के बाद न केवल प्रदेश की राजनीति में सक्रिय वापसी की, बल्कि पार्टी को एक सूत्र में बांधने के लिए प्रदेशभर का दौरा भी किया। उनका 'संगत में पंगत' वाला फार्मूला काफी हद तक सफल माना गया। प्रदेश में समन्वय समिति के मुखिया के रूप में उन्होंने पार्टी को एक सूत्र में बांधने की जो कोशिश की, जो सही दिशा में उठाया गया कदम रहा। जबकि, चुनाव से पहले से इस बात को जोर-शोर से प्रचारित किया गया था कि कांग्रेस ने टिकट बंटवारे से दिग्विजय सिंह को दूर रखने का फैसला किया है! लेकिन, न तो ऐसा हुआ और न होना था। क्योंकि, पार्टी ने ऐसा कोई फार्मूला ही तय नहीं किया था। प्रदेश की अधिकांश सीटों पर उनके दखल से ही नाम तय हुए और ज्यादातर जीते भी। उनकी समन्वय यात्रा के दौरान हुई 'संगत में पंगत' का ही नतीजा था कि भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में बगावत कम हुई और बागियों ने जीतकर भी पार्टी प्रति प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी!
    मध्यप्रदेश की कांग्रेस राजनीति में दिग्विजय सिंह ही अकेले ऐसे नेता हैं, जो पूरे प्रदेश की विधानसभा सीटों के समीकरण, वहाँ की कमजोरी और वहाँ की ताकत से वाकिफ हैं। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया बड़े नेता जरूर हैं, पर प्रदेश की सभी 230 सीटों पर उनकी पकड़ मजबूत कभी नहीं मानी गई! उनके भी अपने क्षेत्र हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह की तरह व्यापक प्रभाव क्षेत्र नहीं है। कमलनाथ का प्रभाव महाकौशल में और ज्योतिरादित्य सिंधिया का चंबल और मालवा में है, वह भी चंद सीटों पर! वे शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, मुरैना, और ग्वालियर की सीटों की तासीर को ही ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं। जबकि, दिग्विजय सिंह अकेले ऐसे नेता हैं, जो पूरे प्रदेश की अधिकांश सीटों की गुत्थियों को बेहतर ढंग से समझते हैं। उन्हें हर जगह की तासीर और वे समीकरण भी पता हैं, जो चुनाव पर असर डालते हैं। दिग्विजय सिंह की इसी राजनीतिक पकड़ और नर्मदा परिक्रमा के दौरान उनका लोगों से सीधा संपर्क चुनाव में मददगार बना। 
  कांग्रेस की सियासत में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले इस नेता के बारे में कहा जाता है कि वे कभी हाशिए पर नहीं होते! उनसे नफरत तो की जा सकती है, पर उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता! उन्हें राजनीति का चाणक्य भी इसीलिए कहा जाता है, कि उन्होंने कई बार हारी हुई बाजियों को पलट दिया है। अल्पसंख्यकों को लेकर उनके कई बयान विवादास्पद भी बने! फिर भी कांग्रेस में उनके कद को कोई कम नहीं कर सका। ऐसे भी कई मौके आए, जब उनके बयान पार्टी की फजीहत का कारण बने! लेकिन, कांग्रेस में उनका वजन हमेशा बरकरार रहा। नर्मदा परिक्रमा पूरी करने के बाद राजनीतिक सक्रियता की पहली सीढ़ी चढ़ते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा था कि उनका लक्ष्य कांग्रेस को एकजुट और मजबूत करना है। इस नजरिए से उन्होंने अपनी पकड़ से पार्टी को मजबूती तो दी है। दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बाद 2003 में हुई हार से आहत दिग्विजय सिंह अपनी इच्छा से सक्रिय राजनीति से दूर रहे! जबकि, राजनीति में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने पहले कभी ऐसा किया हो! लेकिन, जब से वे सक्रिय हुए हैं, राजनीतिक गलियारों में उनकी धमक को महसूस किया गया!
  दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा से कांग्रेस को सबसे बड़ा फ़ायदा ये हुआ कि पार्टी ने सॉफ्ट हिंदुत्व वाले बदलाव को स्वीकार किया। उनकी नर्मदा परिक्रमा का सीधा सा मतलब था कि वे उस हिंदुत्व की तरफ झुके, जिससे अभी तक कांग्रेस बचती रही है। उन्होंने इस परिक्रमा को पूरी तरह धार्मिक और आध्यात्मिक कहा था। लेकिन, दिग्विजय सिंह कितनी भी सैक्यूलर पॉलिटिक्स करें, व्यक्तिगत तौर पर वे बेहद धार्मिक और आस्थावान हैं। नर्मदा परिक्रमा उनकी इसी आस्था को आगे बढ़ाने वाली कड़ी थी! राजनीति में उन्हें मुस्लिम हितरक्षक नेता माना जाता रहा है। लेकिन, नर्मदा परिक्रमा के दौरान रास्ते के आने वाले हर मंदिर में माथा टेकना और नर्मदा का संध्या पूजन कांग्रेस की बदलती भविष्य की रणनीति का संकेत माना गया। 
  दिग्विजय सिंह ने बेहद रणनीतिक तरीके से मध्यप्रदेश की राजनीति में अपनी वापसी की। उनकी छह महीने लंबी नर्मदा परिक्रमा से पहले समझा अनुमान नहीं था कि ये आध्यात्मिक यात्रा एक दिन मध्यप्रदेश की सियासत को झकझोर देगी! यात्रा की शुरुआत में तो इसे गंभीरता से नहीं लिया गया, पर जैसे-जैसे परिक्रमा आगे बढ़ी, उसके सियासी मंतव्य निकाले जाने लगे थे। इसके चलते 'संघ' और भाजपा के साथ कांग्रेस में भी मंथन होने लगा था। दिग्विजय सिंह ने तो इसे निजी और नितांत धार्मिक यात्रा पर बताया और राजनीतिक चर्चा से भी उन्होंने दूरी बनाए रखी! लेकिन, उनके हर इशारे को सियासत से जोड़कर देखा गया। आज जो दिग्विजय सिंह दिखाई दे रहे हैं, वो काफी हद तक नर्मदा यात्रा से मिली ऊर्जा से ही लबरेज है! इस चुनाव के पीछे की रणनीति में यदि कोई नेता परदे के पीछे सबसे सक्रिय रहा है, तो वे दिग्विजय सिंह ही थे। क्योंकि, उनके पास खोने को कुछ नहीं था, पर मध्यप्रदेश में पार्टी को संजीवनी देने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
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Sunday, December 16, 2018

सिनेमा के तो अच्छे दिन आ गए!


- हेमंत पाल 

    भारतीय राजनीति में ये जुमला खूब चला कि 'अच्छे दिन आएंगे।' अच्छे दिन कौन से थे और वो आए या नहीं, ये बहस का एक अलग मुद्दा है! लेकिन, यदि सिनेमा के अच्छे दिन की बात की जाए तो वो आ चुके हैं। बीच में एक दौर ऐसा भी आया, जब दर्शकों का फिल्मों से मोहभंग हो गया था। अब वो हालात नहीं रहे! अब न तो फिल्मकारों को फिल्म बनाने के लिए बड़ा कर्ज लेना पड़ता है और न अपनी संपत्ति बेचना पड़ती है। अब फ़िल्में भी आसानी से दो से तीन सौ करोड़ का बिजनेस कर लेती हैं। याद किया जाए तो सिनेमा के शुरुआती दशक में 91 फिल्में बनी थी। आज सौ साल बाद सिनेमा उद्योग का चेहरा बदल चुका है। अब यहाँ हर साल एक हजार से ज्यादा फिल्में बनती है। 
   एक वो वक़्त था, जब सिनेमा घरों में महीनों तक फ़िल्में चलती थीं! 6 महीने चलती तो चली तो 'सिल्वर जुबली' और सालभर चले तो 'गोल्डन जुबली' मनती थी। लोग भी एक ही फिल्म को कई-कई बार देखा करते थे! फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखने का एक अलग ही जुनून होता था। सिनेमा घरों की टिकट खिड़कियों पर मारा-मारी तक होती थी! लोग देर रात से ही टिकट की लाइन में लग जाया करते थे। अब ये सब गुजरे दिन की बात हो गई! सिंगल परदे वाले थियेटर की जगह मल्टीप्लेक्स ने ली! लेकिन, फिल्म देखने वाले आज भी वही हैं।   
    हमारे यहाँ फिल्म बनाना हमेशा से ही जुनून रहा है। दादासाहेब फाल्के ने जब 1913 में भारत में पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी, तो उन्हें पत्नी के गहने तक बेचने पड़े थे। राज कपूर ने 'मेरा नाम जोकर' बनाई थी, तब उनका सबकुछ कर्ज में डूब गया था। लेकिन, अब ऐसे किस्से सुनाई नहीं देते, क्योंकि फ़िल्में ऐसा बिजनेस नहीं रह गया कि फिल्मकार की सारी पूंजी डूब जाए! भारतीय फिल्म उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2020 तक इस उद्योग के 23,800 करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है। पिछले दो साल में इसकी कंपाउंड एनुएल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) 10% से ज्यादा रही है।  
    अब वो स्थिति नहीं कि फ्लॉप फिल्म के निर्माता को कर्ज अदा करने के लिए अपना बंगला और गाड़ी तक गंवाना पड़ती हो! सच ये है कि अब कोई फिल्म फ्लॉप नहीं होती। कमाई से कमाई के कई तरीके खोज लिए गए हैं। फ्लॉप फिल्में भी आसानी से अपनी लागत निकालने में कामयाब हो जाती हैं। फ़िल्मी सितारों के नाम पर टिकी सिनेमा की दुनिया के अर्थशास्त्र को कॉरपोरेट कंपनियों ने अपनी पूंजी के सहारे मुनाफा कमाने के फॉर्मूले से जोड़ लिया है। बड़ी फ़िल्म के ढाई-तीन हजार प्रिंट रिलीज किए जाते हैं, जो प्रचार के दम पर तीन दिन में ही लागत के साथ मुनाफा निकाल लेती हैं। यशराज फिल्म की 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' इसका सबसे ताजा उदाहरण है! बुरी तरह फ्लॉप हुई इस फिल्म ने प्रचार से ऐसा आभामंडल बनाया कि शुरू के तीन दिन में ही कमाई कर ली। 
   फिल्म का अर्थशास्त्र पूरी तरह मुनाफे के सिद्धांत पर चलने लगा है। अब तो एनआरआई ने इस उद्योग में पैसा लगाना शुरू कर दिया। 2001 में जब सरकार ने फिल्मों को उद्योग का दर्जा दिया, इसके बाद से फिल्म उद्योग का पूरी तरह कॉरपोरेटीकरण हो गया! फिल्मों के निर्माण से इसके डिस्ट्रीब्यूशन तक के तरीके में इतना बदलाव आया कि हिट और फ्लॉप फिल्म की परिभाषा ही बदल गई। फिल्म के रिलीज से पहले ही सेटेलाइट राइट्स, अब्रॉड, म्यूजिक, वीडियो के लिए अलग-अलग राइट्स बेचे जाते हैं। इससे प्रोडक्शन हाऊस को जबरदस्त आय होती है और एक तरह से रिलीज से पहले ही फिल्म की लागत निकल आती है। देखा जाए तो यूटीवी मोशन पिक्चर्स, इरॉस, रिलायंस इंटरनेटमेंट, एडलैब्स, वायकॉम-18, बालाजी टेलीफिल्म्स और यशराज फिल्म्स जैसे प्रोडक्शन हाउसों ने सिनेमा कारोबार का पूरा खेल बदल दिया है। इनका फिल्मों में पैसा लगाने का तरीका भी अलग है। अब ये फिल्म नहीं ‘पोर्टफोलियो मैनजमेंट’ करते हैं। 
   मल्टीप्लेक्स ने भी फिल्म देखने के तरीके बदल दिए। यही कारण है कि कम बजट की फ़िल्में भी दर्शकों तक पहुंच रही है और अच्छा खासा बिजनेस कर रही है। सिर्फ कुछ अलग सी कहानी के दम पर ही निर्माता लागत से तीन से चार गुना कमाई करने लगे हैं। ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ 30 करोड़ में बनी, इसने 108.95 करोड़ का कारोबार किया। आलिया भट्ट तथा विक्की कौशल की फिल्म 'राजी' भी 30 करोड़ के बजट में बनी थी। इसने भी 123.84 करोड़  की। राजकुमार राव तथा श्रद्धा कपूर की हॉरर कॉमेडी 'स्त्री' की तो समीक्षकों ने भी तारीफ़ की। 24 करोड़ में बनी इस फिल्म ने 129 .90 करोड़ रुपए कमाए। ये तो चंद आंकड़े हैं, जो फिल्मों के बदले अर्थशास्त्र का उदाहरण हैं। ये पूरा परिवेश ही धीरे-धीरे बदल रहा है। इसीलिए समझा आने लगा है कि किसी के अच्छे दिन आए हों या नहीं, पर सिनेमा के तो अच्छे दिन आ ही गए!
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Monday, December 10, 2018

न तुम हारे, न हम हारे!


- हेमंत पाल

   देश के पाॅंच राज्यों में विधानसभा चुनाव पूरे होते ही पक्ष और विपक्ष की तरफ से परस्पर जीत और हार के दावे किए जाने लगे हैं। इस बार बाजी कौन मारेगा, यह तो नतीजों से ही पता चलेगा। लेकिन, हार-जीत के इन कयासों ने बॉलीवुड की फिल्म 'हार-जीत' की बरबस याद ताजा कर दी। नेताओं की हार-जीत का फैसला भले ही पांच साल में एक बार होता हो, लेकिन बालीवुड में हर शुक्रवार फिल्म के प्रदर्शन के साथ ही तनाव बढ़ता है! इसे बॉलीवुड में फ्राइडे-फीयर भी कहा जाता है, जो निर्माता, निर्देशक से लेकर कलाकारों और प्रदर्शकों सभी के चेहरे पर दिखाई देने लगता है। वैसे भी हार-जीत सिनेमा जगत का सबसे प्रिय विषय है, जो कमोबेश सभी फिल्मों में किसी न किसी रूप में दिखाई दे ही जाता है।
   आम फिल्में यही संदेश देती है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होती है। फिल्मों में अच्छाई का प्रतिनिधित्व हीरो-हीरोइन करते हैं, तो बुराई के प्रतीक का ठेका अकसर खलनायक और खलनायिकाओं को दिया जाता रहा है। शायद ही ऐसी कोई फिल्म होगी, जो नायक और खलनायक या 'हार' और 'जीत' के फॉर्मूले के बिना बनी और चली हो! बहरहाल, हिन्दी फिल्मों में हार-जीत का यह सिलसिला फिल्म के शीर्षक से लेकर गानों और विषयवस्तु तक में फैला है। वैसे देखा जाए तो हार और जीत का चोली दामन का साथ है। ऐसी शायद ही कोई फिल्म होगी, जिसका शीर्षक केवल 'हार' पर आधारित होगा! 
    जब भी फिल्मों में हार की बात हुई है, जीत ने हमेशा उसका दामन थाम रखा है। अलबत्ता 'जीत' पर भी कई फिल्में बन चुकी है। 1949 में मोहन सिन्हा ने 'जीत' शीर्षक से फिल्म बनाई थी, जिसमें देव आनंद, सुरैया, कन्हैयालाल, भगवान और मदनपुरी की मुख्य भूमिकाएं थी। 1972 में निर्माता, निर्देशक ए सुब्बाराव ने फिर 'जीत' शीर्षक से फिल्म का निर्माण किया। इसमें रणधीर कपूर और बबीता ने पहली बार साथ मे काम किया था। बबीता ही नहीं उनकी बेटी करिश्मा ने भी 'जीत' नाम की फिल्म में काम किया था। 1996 में राज कंवर के निर्देशन में बनी साजिद नडियादवाला की फिल्म 'जीत' में करिश्मा कपूर के साथ सनी देओल थे।   
  'जीत' की तरह ही 'हार-जीत' शीर्षक से भी एक से ज्यादा फिल्में बनी! 1972 में रेहाना सुल्तान और राधा सलूजा अभिनीत फिल्म 'हार-जीत' में दोनों अपने हीरो अनिल धवन को पाने के लिए एक दूसरे के आमने-सामने आती हैं। इसके बाद 1990 में फराह और कबीर बेदी की फिल्म 'हार-जीत' आई थी, जो प्रेम कहानी कम और थ्रिलर फिल्म ज्यादा थी। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 'जीत' फिल्म जितनी बार भी बनी, सफल रही! जबकि 'हार-जीत' जब भी बनी हमेशा असफल ही रही। शीर्षक में हार का होना तो इसका कारण नहीं है? इसके अलावा प्यार की जीत, जो जीता वो सिकंदर जैसी फिल्मों में 'जीत' को शामिल किया गया था। 
   फिल्म के शीर्षक ही नही हिन्दी फिल्मों के गानों में भी 'हार-जीत' का कई बार उल्लेख होता है। महबूब की फिल्म 'अंदाज' में राज कपूर के सामने गाते हुए दिलीप कुमार जब कहते हैं 'आज किसी की हार हुई है आज किसी की जीत गाओ खुशी के गीत' तो पता चलता है कि वह जीत के घोड़े पर सवार होकर राजकपूर को उनकी हार के लिए चिढ़ा रहे हैं। जबकि, आखिर में नर्गिस को जीतने में राजकपूर ही कामयाब होते हैं। राजेश खन्ना और मुमताज की फिल्म 'अपना देश' में राजनीतिक हार जीत पर आधारित गीत 'सुन चम्पा सुन तारा कोई जीता कोई हारा' खूब चला था। जीतने की आस को सजीव करता गीत 'जीत ही लेंगे बाजी हम तुम' आज भी लोकप्रियता की दौड़ में किसी से पीछे नहीं है। जबकि, आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में प्रमुख राजनीतिक दलों की हार-जीत की बराबरी का दावा करने वाला मीडिया वास्तव में राजकपूर की फिल्म 'दीवाना' के गीत 'तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय न तुम हारे न हम हारे' को  गुनगुनाता ज्यादा दिखाई दे रहा है। 
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Tuesday, December 4, 2018

इंदौर के मतदाताओं के इस मौन को नजरअंदाज मत कीजिए!


- हेमंत पाल 

  विधानसभा चुनाव का मतदान होने के बाद अब इस बात लगाए जा रहे हैं कि किस सीट पर किसका पलड़ा भारी है और क्यों? लोगों की बातचीत का विषय इस बात पर केंद्रित हो गया है कि इंदौर की 9 विधानसभा सीटों की स्थिति क्या होगी! ख़ास बात ये कि वास्तविक मतदाता मौन रहा! उसने खुलकर न तो किसी पार्टी का विरोध किया न समर्थन! मतदाताओं की ख़ामोशी ने कयास लगाने वालों के सामने सवालिया निशान लगा दिया है। लेकिन, निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि इस बार के नतीजे पिछले चुनाव जैसे एक तरफ़ा नहीं होंगे। पिछली बार भाजपा ने 8 सीटें जीती थी और कांग्रेस को सिर्फ राऊ की सीट जीतकर संतोष करना पड़ा था। इस बार लग रहा है, कि 9 में से 5 सीटें भाजपा को मिल सकती हैं, जबकि 4 पर कांग्रेस जीतेगी। हो सकता है, नतीजे इसके उलट भी हों! फिलहाल तो ये सिर्फ संभावना ही है। 
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  इंदौर का चुनावी माहौल, लोगों की बातचीत, मतदान के बढ़े प्रतिशत और उम्मीदवारों को कोशिशों को देखकर लग रहा है कि इस बार इंदौर की 9 में से 7 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर है। भाजपा के नेता और कार्यकर्ता लाख दावे करें, पर जमीनी हकीकत बता रही है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस उतनी कमजोर नहीं है, जितना उसे आँका जा रहा है। कई सीटों पर कांग्रेस टक्कर की स्थिति में है और कई पर वो जीत भी रही है। भाजपा की झोली में जो दो सीटें साफ़-साफ जाती दिखाई दे रही हैं, वे हैं क्षेत्र क्रमांक-2 जहां से रमेश मेंदोला उम्मीदवार हैं और क्षेत्र क्रमांक-4 जहाँ से महापौर मालिनी गौड़ तीसरी बार मैदान में हैं। अब पड़ताल की जाए इंदौर की सभी 9 सीटों की, जहाँ कांग्रेस और भाजपा दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी। है   
   इंदौर की क्षेत्र क्रमांक-1 सीट से भाजपा उम्मीदवार सुदर्शन गुप्ता पिछले दो बार चुनाव जीते हैं। एक बार ऐसा भी अवसर आया जब वे मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले थे, पर एक वक़्त पर पांसा पलट गया और वे शपथ नहीं ले सके। लेकिन, इस बार के चुनाव में उनकी स्थिति कुछ कमजोर नजर आ रही है। कांग्रेस में बगावत थमने और विष्णु शुक्ला के खिलाफ सुदर्शन गुप्ता की बयानबाजी से माहौल पर असर पड़ा! माना जा रहा है कि ये सीट कांग्रेस उम्मीदवार संजय शुक्ला खाते में दर्ज हो सकती है। क्षेत्र क्रमांक-2 बरसों तक शहर का मिल मजदूरों का इलाका रहा है। यहाँ से पिछले कई विधानसभा चुनाव भाजपा के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय जीतते रहे हैं। लेकिन, दो चुनाव रमेश मेंदोला ने जीते और पार्टी ने मेंदोला को तीसरी बार फिर उम्मीदवार बनाया है। इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस के मोहन सेंगर हुआ! करीब महीनेभर लम्बे चुनाव प्रचार और माहौल देखकर संकेत मिलता है कि जीत तो रमेश मेंदोला की होगी, लेकिन पिछले चुनाव की तरह हार-जीत में 90 हज़ार वाला अंतर शायद न हो! क्योंकि, मोहन सेंगर ने भी पूरे जोश से चुनाव लड़ा है। इस क्षेत्र में मतदान कम होने से जीत का अंतर भी ज्यादा नहीं होगा। लेकिन, इस बार इस इलाके में कांग्रेस ने पूरी दमदारी से मैदान संभाला, इसमें कोई शक नहीं!  
  अब आते हैं,  इंदौर की क्षेत्र क्रमांक-3 सीट पर जो इस बार सबसे ज्यादा टक्कर और प्रतिष्ठा वाली मानी जा रही है। इसलिए कि यहां से भाजपा के उम्मीदवार आकाश विजयवर्गीय हैं, जो बड़े भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। उनके सामने हैं कांग्रेस के अश्विन जोशी, जो तीन बार इसी क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। मुकाबला जितना कड़ा भी है, उतना ही प्रतिष्ठापूर्ण भी! यही कारण है सभी की नजरें इसी सीट के नतीजों पर टिकी है। अभी यहाँ किसी की हार-जीत के स्पष्तः कयास नहीं लगाए जा सकते। लेकिन, मुस्लिम इलाकों में ज्यादा मतदान को कांग्रेस अपने पक्ष में बता रही है, पर नतीजे ही बताएँगे कि पलड़ा किसके पक्ष में झुका। शहर का क्षेत्र क्रमांक-4 भी भाजपा के लिए प्रतिष्ठा वाली सीट है। यहां से भाजपा उम्मीदवार मालिनी गौड़ हैं, जो इंदौर की महापौर भी हैं। शहर को दो बार साफ़-सफाई में देश में नम्बर-वन बनाने की उपलब्धि उनके खाते में दर्ज है। लेकिन, स्मार्ट सिटी के नाम पर उनके क्षेत्र में हुई तोड़फोड़ भी उनके ही खाते में है। तोड़फोड़ वाला मामला उनके विपरीत जा सकता है। यहाँ उनके सामने कांग्रेस उम्मीदवार सुरजीतसिंह चड्ढ़ा हैं, पर उनसे किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद कम ही की जा रही है। चुनाव में जीत के दावे तो उन्होंने भी किए पर उनके दावों में भरोसा कुछ कम। उनके पिता उजागरसिंह चड्ढा भी शहर कांग्रेस के नेता रहे थे।  
  शहर का क्षेत्र क्रमांक- 5 आधुनिक इंदौर का चेहरा है। यहाँ से पिछले तीन बार से भाजपा के महेंद्र हार्डिया विधायक चुने जाते रहे हैं। अबकी बार उनके सामने कांग्रेस ने सत्यनारायण पटेल को मैदान में उतारा है। पटेल की इस क्षेत्र में बस यही उपलब्धि है, कि उनका क्षेत्र में पुराना और बड़ा स्कूल है और इस नजरिए से उनके कई परिवारों से जीवंत संपर्क हैं। राजनीतिक परिवार से जुड़े सत्यनारायण पटेल को यदि कोई लाभ मिला तो भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का ही मिल सकता है। इस इलाके में भी बड़ी मुस्लिम बस्तियाँ हैं, जहाँ काफी अच्छा मतदान हुआ है। यदि इसे संकेत माना जाए तो हार-जीत का अंतर काफी काम हो सकता है।  
   इंदौर की 9 में से 4 विधानसभा सीटें ग्रामीण हैं। राऊ को भी ग्रामीण कहा जाता है, जबकि इस विधानसभा क्षेत्र का बड़ा इलाका शहर में आता है। मोदी लहर में भी यहाँ से पिछला चुनाव जीतने वाले कांग्रेस उम्मीदवार जीतू पटवारी फिर मैदान में हैं। उनके सामने भाजपा ने मधुकर वर्मा को उम्मीदवार बनाया है। लेकिन, जीतू पटवारी की स्थिति बहुत ज्यादा दमदार नजर नहीं आ रही। भाजपा उम्मीदवार का संघ परिवार से जुड़ा होने के कारण प्रचार के दौरान यहाँ संघ की काफी सक्रियता देखी गई, जो नतीजों को प्रभावित कर सकती है। इंदौर की यही एक सीट है जहाँ संघ के कार्यकर्ताओं ने काम किया है। जीतू पटवारी की वाचालता और अनर्गल बयानबाजी से कुछ लोग नाराज भी हुए! जबकि, भाजपा उम्मीदवार मधुकर वर्मा अपेक्षाकृत सौम्य हैं।  
  ग्रामीण इलाके की दूसरी सीट महू है। यहाँ से लगातार दो बार कैलाश विजयवर्गीय विधायक रहे हैं। उनके राजनीतिक कद के कारण बाहरी होते हुए भी उनका विरोध नहीं हुआ। लेकिन, इस बार यहाँ से पिछला चुनाव इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-3 से जीतने वाली उषा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया गया है, जिससे महू के स्थानीय नेता नाराज हैं। इस वजह से महू में भाजपा का पलड़ा काफी हल्का नजर आ रहा है। क्योंकि, स्थानीय नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने का विरोध बाहर से तो नजर नहीं आ रहा, पर सेबोटेज की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। यहां से उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार के अंतरसिंह दरबार से कड़ी चुनौती मिली है। मतदान के दो दिन बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए उषा ठाकुर के एक वीडियो ने इस आशंका की पुष्टि कर दी कि नतीजे उनके पक्ष में नहीं होने वाले! उन्होंने भाजपा में वंशवाद और खुद को इंदौर से महू धकेले जाने पर अपना रोष व्यक्त किया है। 
   ग्रामीण इलाके की एक सीट देपालपुर भी है, जिस पर कलौता समाज का वर्चस्व रहा है। यहाँ से भाजपा ने दो बार के विधायक रहे मनोज पटेल को तीसरी बार मैदान में उतारा है। उनके सामने कांग्रेस ने विशाल पटेल पर दांव लगाया और ये सही भी लग रहा है। मनोज पटेल को लेकर क्षेत्र में चुनाव से पहले ही काफी विरोध देखा गया, ऐसे में उनकी जीत के आसार कम ही दिखाई दे रहे हैं। जबकि, पहली बार चुनावी राजनीति में उतरे विशाल पटेल का पलड़ा भारी है। जिले की सांवेर भी ग्रामीण इलाके में आती है। जहाँ से कांग्रेस ने पिछले कई चुनाव में तुलसी सिलावट को ही अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार भी वही मैदान में हैं। उनके सामने हैं, पिछले विधायक और भाजपा उम्मीदवार डॉ राजेश सोनकर। प्रचार के दौरान यहाँ जो माहौल नजर आया उसके मुताबिक इस सीट पर कांग्रेस भारी है। यहाँ के किसानों में भाजपा के प्रति नाराजी होने के साथ उम्मीदवार के व्यवहार से भी शिकायत है। इस कारण डॉ सोनकर को प्रचार के दौरान कई जगह विरोध का सामना भी करना पड़ा। जबकि, तुलसी सिलावट को वहां के लोग उनके व्यवहार के कारण ज्यादा पसंद करते हैं।  महीनेभर के चुनाव प्रचार के हंगामे और जिले की जमीनी हालात को देखकर लगता है कि मतदाता की ख़ामोशी अपना असर जरूर दिखाएगी। मतदाता का मौन को सुना जाए तो आने वाले नतीजों का अंदाजा हो जाता है।    
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Sunday, December 2, 2018

आमिर को इस फ्लॉप फिल्म पर अफ़सोस क्यों?


- हेमंत पाल

  फिल्म एक अनिश्चय वाला व्यवसाय है, जिसके बारे में कोई दावा नहीं किया जा सकता! कब कौनसी फिल्म दर्शकों के दिल को लुभा जाए और कौनसी दिल से उतर जाए, कहा नहीं जा सकता! सौ साल से ज्यादा पुरानी इस फ़िल्मी दुनिया में ऐसे कई उदाहरण है, जो इस व्यवसाय की अनिश्चितता को साबित करते हैं! इस साल ऐसी ही एक फिल्म आई यशराज बैनर की 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान।' इस फिल्म को लेकर काफी संभावनाएं जगाई गई थी। 'यशराज' जैसा बड़ा बैनर, आमिर खान और बच्चन जैसे जाने-माने कलाकारों के होते उम्मीद की जा रही थी, कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धमाल करेगी! लेकिन, पहले दिन रिकॉर्ड कमाई करने के बाद ये फिल्म जिस तरह दर्शकों के दिल से उतरी, वो मिसाल है।   
      आमिर खान को फ़िल्मी दुनिया में 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' कहा जाता है, जो बहुत सोच समझकर फिल्म में काम करने का फैसला करते हैं और जब काम शुरू करते हैं, तो कोई खामी की गुंजाइश नहीं रखते! इसके बाद भी 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' का बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकामयाब होना एक अचरज वाली बात है। खुद आमिर खान ने भी इस बात को स्वीकारा कि इस बार वे दर्शकों की उम्मीद पर खरे नहीं उतर पाए, जबकि उन्होंने कोशिश पूरी की! उन्होंने फिल्म के फ्लॉप होने की पूरी जिम्मेदारी भी ली। लेकिन, ये पहली बार हुआ कि आमिर ने किसी फिल्म की असफलता के लिए खुद को दोषी माना है। जबकि, इससे पहले भी उनकी फ़िल्में फ्लॉप हुई हैं।       
  आमिर खान ने अपने करियर इससे पहले भी बड़ी फ्लॉप फ़िल्में दी है। लेकिन, ये पहला मौका  है, जब उन्होंने 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' के लिए अफ़सोस जाहिर किया। पहले भी उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर पानी नहीं माँगा! थोड़ा पीछे जाकर उनकी फिल्मों को याद किया जाए तो 2000 में आई आमिर की फिल्म 'मेला' ऐसी फिल्म थी, जो ऐसे ही बुरी तरह फ्लॉप हुई थी। अब 18 साल बाद 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' की नाकामयाबी भी वैसी ही है। जबकि, बीते 18 सालों में आमिर खान ने सुपर स्टार का दर्जा हांसिल किया है। ये आमिर ही हैं जिनकी फिल्म 'गजनी' ने 100 करोड़ क्लब की, 'थ्री इडियट्स' ने 200 करोड़ क्लब की और 'पीके' ने 300 करोड़ क्लब की शुरुआत्त की थी। 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' के बारे में अनुमान था कि ये फिल्म बॉलीवुड में 400 करोड़ क्लब की शुरूआत करेगी। लेकिन, सबकुछ होते हुए भी अपनी लचर कहानी के चलते फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई! 
  ऐसे हादसे आमिर खान के साथ पहले भी हुए हैं, जब उनकी एक फिल्म ने बड़ी शुरुआत की और बाद में वह धड़ाम से ऐसी गिरी कि उठ ही नहीं सकी। 'मंगल पांडे' ऐसी ही फिल्म थी। वो भी अंग्रेजी शासन से जुड़ी ऐतिहासिक फिल्म थी, 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' की कहानी भी अंग्रेजी राज की है। 2000 में आई 'मेला' इस मिलेनियम यानी 2000 की पहली रिलीज़ फिल्म थी, लेकिन, चली नहीं! आमिर की फ्लॉप फिल्मों में 'धोबी घाट' भी है। इसे आमिर की पत्नी किरण राव ने बनाया था। इस फिल्म के ब्लॉक बस्टर होने की तो किसी को उम्मीद नहीं थी। लेकिन, दुर्भाग्यवश ये बेहद बोरिंग फिल्म निकली। 
  डायरेक्टर मंसूर खान ने 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिकंदर' जैसी फ़िल्में बनाई हैं। लेकिन, आमिर को लेकर जब उन्होंने ;अकेले हम-अकेले तुम' बनाई तो बात बनी नहीं! आमिर और मनीषा कोइराला ने अच्छी एक्टिंग भी की। इसके बावजूद दर्शक फिल्म से ऊब गए थे। आशुतोष गोवारीकर की एक्शन फिल्म 'बाजी' एक ठीक-ठाक फिल्म थी। लेकिन, दर्शकों ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं ली। 'अंदाज़ अपना अपना' भी इसी फेहरिस्त की फिल्म है, जो एक क्लासिक फिल्म थी, पर दर्शकों के दिल में नहीं उतर सकी थी। '1947 : पृथ्वी' फिल्म उस समय आई थी, जब आमिर खान ने लगातार तीन हिट फ़िल्में राजा हिन्दुस्तानी, इश्क और 'ग़ुलाम' दी थीं। लेकिन, इस फिल्म को लेकर दर्शकों में कोई उत्सुकता नहीं थी। बाद में आसानी से इस फिल्म को भुला भी दिया गया। ऐसी ही एक और फिल्म थी 'आतंक ही आतंक' जो काफी हद तक 'गॉडफादर' से प्रेरित थी। इस फिल्म की ओपनिंग काफी खराब थी। क्योंकि, फिल्म का निर्देशन भी ठीक नहीं था। जल्दबाजी में बनी इस फिल्म की रिलीज़ भी ठीक से अच्छी नहीं हुई थी। 
  इस फेहरिस्त की आमिर की आखिरी फ्लॉप फ़िल्म भी 'यशराज' की ही बनाई हुई है। फिल्म 'परम्परा' को आदित्य चोपड़ा ने लिखा था और यश चोपड़ा ने डायरेक्ट किया था। आमिर खान, सैफ अली खान और सुनील दत्त जैसी स्टार्स के साथ बनी ये फिल्म बुरी तह फ्लॉप हुई थी। इसलिए 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' के लिए जिम्मेदारी लेने का आशय ये नहीं कि अभी तक आमिर खान ने हमेशा हिट फ़िल्में ही दी है! 'ठग्स और हिंदुस्तान' उनकी पहली फ्लॉप फिल्म नहीं है और न आखिरी! हो सकता है आगे आमिर इससे भी बड़ी फ्लॉप फ़िल्में दर्शकों को परोसें!      
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Monday, November 19, 2018

भाजपा में क्या नाराज नेताओं को मनाने वाले नहीं बचे?


- हेमंत पाल 

 
    इस बार का विधानसभा चुनाव कई मामलों में कुछ अलग है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों में टिकट के लालायित नेताओं की संख्या इतनी ज्यादा रही कि स्थिति बगावत तक पहुँच गई! भाजपा ने 53 बागी उम्मीदवारों को पार्टी से बाहर कर दिया। क्योंकि, इन सभी ने पार्टी के नियम-कायदों का पालन नहीं किया और अधिकृत उम्मीदवार सामने ख़म ठोंककर खड़े हो गए! भाजपा ने इन बागियों को मनाने की कोशिश भी की, पर इसका कोई असर नहीं हुआ। बगावत के आरोप में पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया, सरताज सिंह, केएल अग्रवाल, तीन पूर्व विधायक और एक पूर्व महापौर को बाहर कर दिया गया। मसला ये है कि क्या भाजपा में अब ऐसे कद्दावर नेता नहीं बचे, जो बागियों को मना सकें या फिर इस असंतोष को दूर करने की कोशिश ही नहीं की गई? भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा असंतोष का सामना नहीं करना पड़ा! कांग्रेस ने सिर्फ 12 सीटों पर बगावत झेली।
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   असंतोष हर पार्टी में होता है! ये स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, सवाल ये कि असंतुष्ट नेताओं को भाजपा ने मनाया क्यों नहीं? भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले मध्यप्रदेश में क्या अब ऐसे नेता नहीं बचे, जो रूठों को मनाने का दम रखते हों? इस चुनाव में ऐसे नेता की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है! भाजपा का हर कार्यकर्ता इस कमी को समझ भी रहा है। टिकट वितरण के बाद पार्टी में बड़े पैमाने पर हुई बगावत ने पार्टी की रीति-नीतियों में आए बदलाव को भी उजागर किया। प्रदेश के हर जिले में टिकट बंटवारे के बाद नाराजी नजर आई! क्योंकि, पंद्रह साल सरकार में रहने का बाद भाजपा का चेहरा अब पूरी तरह बदल गया है। 2003 के चुनाव के समय पार्टी में ऐसे नेता थे, जो नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं को आसानी से समझाइश देकर शांत करके काम पर लगा देते थे। 
  पिछले तीन चुनावों में पार्टी के संकट मोचक रहे अनिल माधव दवे की इस चुनाव में काफी महसूस की गई! दवे ने तीन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी के वॉर रूम में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनके बाद पार्टी में इस जगह को कोई और नहीं ले पाया। उनसे पहले यही काम कुशाभाऊ ठाकरे किया करते थे। पर, अब न तो अनिल माधव दवे हैं और न कुशाभाऊ ठाकरे! आज पार्टी कार्यकर्ता इस बात को जानते हैं कि दवे की रणनीति के कारण ही 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में बगावत को उभरने से पहले ही ठंडा कर दिया गया था। यहाँ तक कि नाराजी कमरे से बाहर भी नहीं आ सकी! वास्तव में इस बार की बगावत का मुख्य कारण ये रहा कि पार्टी का टिकट चाहने वाले कार्यकर्ताओं को बड़े नेताओं की बात पर भरोसा नहीं रहा! बागियों को जिस तरह के प्रलोभन देकर चुनाव से अलग किया जाता है, वो फार्मूला इस बार फेल हो गया। इन बागियों का कहना है कि पिछले चुनावों में जिस तरह के वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए!  
   विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी होते ही भाजपा में बग़ावतियों ने मोर्चा संभाल लिया। बुंदेलखंड, विंध्य, महाकौशल और भोपाल इलाके में ये बागी काफी असरदार भी हैं। पार्टी के लिए दमोह सीट सबसे बड़ी चिंता बन गई। यहाँ से वित्त मंत्री जयंत मलैया भाजपा उम्मीदवार हैं। जबकि, भाजपा से बागी रामकृष्ण कुसमरिया ने दमोह और पास की पथरिया सीट से निर्दलीय नामांकन भरा है। कुसमरिया पांच बार सांसद और दो बार विधायक रहे हैं। कुसमरिया ने जयंत मलैया पर टिकट कटवाने का आरोप लगाया! मलैया ने कहा कि इस इलाके में अपना अकेले का दबदबा चाहते हैं, जिसके चलते मुझे टिकट नहीं दिया गया। हमने यहां पार्टी को खड़ा करने के लिए डाकुओं से लड़ाई लड़ी, अब हम जैसे लोगों को ही हाशिए पर डाल दिया! सरकार में कृषि मंत्री रहे कुसमरिया ने कहा कि दमोह से जयंत मलैया के खिलाफ खड़े होकर वे पार्टी की ही मदद कर रहे हैं! क्योंकि, दमोह और पथरिया दोनों सीटें भाजपा हार रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव जीतकर वे भाजपा का ही समर्थन करेंगे। 
  मध्यप्रदेश में भाजपा को लगातार दो चुनाव जिताने वाले शिवराजसिंह चौहान के सामने पार्टी की बगावत बड़ी चुनौती है। इस चुनौती का अंदाजा टिकट का फैसला होने से पहले ही होने लगा था। विरोध और बगावत की आवाजें भाजपा मुख्यालय में सुनाई देने लगी थीं। वहाँ होने वाली खुलेआम नारेबाजी को रोकने का साहस किसी में नहीं था। इसलिए कि पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता या तो खुद टिकट की जुगाड़ में थे या अपने बेटे, पत्नी या परिवार के किसी सदस्य के लिए कोशिश में लगे थे। जबकि, प्रदेश में भाजपा की पहचान अनुशासित कार्यकर्ताओं से है। यहाँ फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने की परंपरा रही है। लेकिन, इस बार का नजारा बदला हुआ लगा! कार्यकर्ताओं में असंतोष पहले भी कई बार दिखाई दिया, पर वो कभी विद्रोह की सीमा तक नहीं पहुंचा! 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष नरेंद्र तोमर ने असंतोष को किनारे करने में अहम भूमिका अदा की थी। इस बार नरेंद्र तोमर की भूमिका उस रूप में नहीं थी और अध्यक्ष राकेश सिंह को इस तरह की स्थितियों से निपटने का अनुभव नहीं है। पिछले एक दशक में प्रदेश में भाजपा के कई ऐसे नेता हाशिए पर चले गए, जो ऐसे हालात निपटने माहिर थे। 
       चुनाव में कार्यकर्ताओं नाराजी को बाबूलाल गौर और सरताज सिंह ने ज्यादा हवा दी। इन दोनों को शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल से दो साल पहले ही उम्रदराज होने का हवाला देकर मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था। कहा गया था कि पार्टी ने 70 पार कर चुके नेताओं को घर भेजने का निर्णय लिया है। लेकिन, जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भोपाल आए तो उन्होंने 70 साल वाले इस फार्मूले को नकार दिया। उसके बाद से ही शिवराजसिंह चौहान इन दोनों नेताओं के निशाने पर थे। चुनाव के समय इन दोनों नेताओं को विश्वास था कि पार्टी उनके साथ न्याय करेगी! टिकट को लेकर बाबूलाल गौर का भरोसा इसलिए बढ़ा था कि कुछ दिन पहले नरेंद्र मोदी ने भोपाल में मंच पर ही उनसे हाथ मिलाकर कहा था 'गौर साहब एक बार और!' इसके बाद ये कयास लगाए जाने लगे थे कि अब गोविंदपुरा सीट से बाबूलाल गौर को टिकट मिलना तय है! लेकिन, ऐसा नहीं हुआ तो वे कोप भवन में चले गए। पार्टी की पहली सूची आने के बाद तो गौर और सरताज सिंह का गुस्सा फट पड़ा! लेकिन, अंततः गौर की बहू को टिकट देकर मामले  ठंडा किया गया! लेकिन, सरताज सिंह की नाराजी पर जब भाजपा ने कान नहीं धरे, तो कांग्रेस ने उन्हें साधकर होशंगाबाद से अपना उम्मीदवार बना दिया।   
  बरसों बाद इन चुनावों से ये सच पुख्ता हो गया कि राजनीति में संभावनाएं अनंत हैं। यहां कब, कहाँ और कौन कैसे पलटी मार दे, कहा नहीं जा सकता। यहाँ किसी भी क्षण बाजी पलट सकती है। कौन सोच सकता था कि शिवराजसिंह के साले संजय मसानी जीजा जी की पार्टी से बगावत करके कांग्रेस की गोद में बैठ जाएंगे? लेकिन, ये अनपेक्षित घटना भी हुई! कांग्रेस के लिए संजय मसानी अभी तक विवादास्पद हुआ करते थे। उनपर कर आरोप भी लगाए गए थे! लेकिन, कांग्रेस में आते ही वे दूध से धुलकर पवित्र हो गए। उनकी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी कांग्रेस के निशाने पर थी। अजय सिंह ने तो यहाँ तक आरोप लगाया था कि संजय मसानी ने फर्जी दस्तावेजों से मध्यप्रदेश में अपनी कंपनी का रजिस्ट्रशन करवाया था। उन पर अवैध खनन, फिल्मों में बेनामी धन लगाने जैसे कई आरोप लगाए गए। लेकिन, अब सब कुछ कबूल करते हुए कांग्रेस ने उन्हें वारासिवनी से टिकट दे दिया। अब सबकी नजरें चुनाव के नतीजों पर टिकी है कि भाजपा में हुआ उभरा यह असंतोष कहाँ, कैसा असर दिखाता है!   
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Sunday, November 18, 2018

इतिहास बचेगा या कुछ रचेगा?


- हेमंत पाल

    भारतीय इतिहास की पृष्ठभूमि वाली दो अहम फिल्में इस साल आईं! 'पद्मावत' और 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान।' तीसरी फिल्म 'मणिकर्णिका' भी इसी साल आने वाली थी, जो अगले साल तक बढ़ गई। वास्तव में 'पद्मावत' को 2017 में रिलीज होना था, परंतु इससे जुड़े विवादों के कारण ये फिल्म खिंचकर इस साल रिलीज हुई। 'पद्मावत' के साथ जो कुछ हुआ उससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या फिल्मकारों को वास्तव में इतिहास के अँधेरे में झांकने का जोखिम उठाना चाहिए? क्योंकि, सेंसर सिर्फ बोर्ड नहीं रह गया है? अब तो गली, मोहल्लों तक के लोग और जेबी संगठन भी कैंची लेकर फिल्मों को कतरना चाहते हैं। 'पद्मावत' बॉलीवुड में 200 करोड़ रुपए के बजट से बनी पहली फिल्म थी। लेकिन, उसका भविष्य लम्बे समय तक अधर रहा! 
   'रंगून' और 'सिमरन' के फ्लॉप होने के बाद कंगना रनौत को अब अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म 'मणिकर्णिका' से बहुत उम्मीदें हैं। क्योंकि, यह फिल्म देश की आजादी से जुड़ी एक महान योद्धा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बायोपिक है। 'पद्मावत' के विरोध देखते हुए इसके लेखक, निर्देशक की टीम ने लक्ष्मीबाई से जुड़े इतिहास को काफी खंगाला! ये जरुरी भी था, क्योंकि अब लोग किसी भी ऐतिहासिक फिल्म को महज फिल्म की तरह नहीं देखते! बल्कि, उससे जुड़े सामाजिक दृष्टिकोण को भी परखते हैं। इसके बाद भी 'मणिकर्णिका' पर से खतरा टला नहीं है। फिल्म के ट्रेलर को लेकर भी उंगली उठ चुकी है।
  एक और ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनना शुरू हुई है, जो 1897 में तत्कालीन भारत-अफगान सीमा पर सरागढ़ी में हुई लड़ाई पर आधारित है। ये फिल्म राजकुमार संतोषी और रणदीप हुड्डा को लेकर बना रहे हैं। यह फिल्म दस हजार अफगानों के खिलाफ 21 भारतीय जवानों के भीषण युद्ध की दास्तान है। हाल ही में रिलीज हुई आमिर खान और अमिताभ बच्चन की फिल्म 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता थी, पर फिल्म ने बहुत निराश किया। इस फिल्म में भारत में 18वीं सदी के ठगों के कारनामे हैं। फिल्म के प्रति दर्शकों की उत्सुकता का प्रमाण ये है कि फिल्म ने पहले ही दिन सर्वाधिक 50 करोड़ की कमाई की! लेकिन, बाद में फिल्म ने पानी नहीं माँगा! 
   फिल्मकारों के नजरिए की बात की जाए, तो कहा जा सकता है कि सिनेमा कलापूर्ण अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, अतः फिल्मकार को थोड़ी छूट लेने का अधिकार होना चाहिए। यह तर्क सही भी है। समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक फिल्में उस समय के इतिहास को नहीं, बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में एक कहानी को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती हैं। इसलिए प्रस्तुति का स्तर सिनेमा को देखने का मुख्य आधार होना चाहिए। लेकिन, ऐसा कहने से इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता कि ऐतिहासिक, इतिहास की बड़ी घटनाओं या किरदारों पर फिल्म बनाने के मामले में हिंदी सिनेमा इतना स्तरहीन और पिछड़ा क्यों है? एक भी ऐसी फिल्म का नाम याद नहीं किया जा सकता, जो पूरी तरह इतिहास या किसी महान चरित्र पर आधारित हो। चेतन आनंद की 'हकीकत' (1964) और एस राम शर्मा की 'शहीद' (1965) ही ऐसी फ़िल्में थीं, जो इस मापदंड के काफी करीब मानी जाती हैं। इसके बाद जेपी दत्ता की 'बॉर्डर' (1997) एक बेहतरीन फिल्म थी, जिसमें पाकिस्तान से जंग लड़ रही एक बटालियन की कहानी को बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया गया था। 
 आशुतोष गोवारिकर की 'मोहन जो दाड़ो' और टीनू सुरेश देसाई की 'रुस्तम' भी ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्में थीं। जहां गोवारिकर ने हजारों साल पहले की हड़प्पा सभ्यता में अपनी कहानी को बुना था। वहीं देसाई ने 1950 के दशक की एक बहुचर्चित अपराध कथा को परदे पर चित्रित किया। कथानक, अभिनय और प्रस्तुति को लेकर इन दोनों फिल्मों को जो भी प्रशंसा या आलोचना मिली है, वह तो अलग विषय है, परंतु कथा के कालखंड और इतिहास के साथ समुचित न्याय नहीं करने के लिए दोनों की बड़ी निंदा हुई! 
 पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक घटनाएं और लोक में प्रचलित कहानियां हमेशा ही सिनेमा के पसंदीदा विषय रहे हैं। पहली हिंदुस्तानी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) को दादा साहेब फाल्के ने बनाया था। अर्देशर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' (1931) में बनाई। सबसे लोकप्रिय फिल्में 'मुगले आजम' (1960) में के आसिफ ने बनाई। एस राम ने 1965 में 'शहीद' और आशुतोष गोवारीकर ने 2001 में 'लगान' बनाई! एसएस राजामौली ने 2015 में 'बाहुबली' का खाका भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की तरह बना। ऐसे में हातिम ताई (1990) और 'बाहुबली' जैसी फिल्में 'मोहन जो दाड़ो' या 'मुगले आजम' से कहीं ज्यादा ईमानदार फिल्में रहीं, जो एक अनजाने मिथकीय वातावरण में ले जाकर दर्शकों का मनोरंजन तो करती हैं! ऐसी फ़िल्में इतिहास का प्रतिनिधि होने का ढोंग भी नहीं रचती! अब, जबकि तकनीक है, दर्शक हैं, धन है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे फिल्मकार इतिहास को लेकर अधिक संवेदनशील होंगे और विगत को ईमानदारी से पेश करने का जोखिम उठाएंगे। 
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