Thursday, April 15, 2021

इंदौर में जनता के लिए कोरोना से किला लड़ाता अकेला नेता!

   संजय शुक्ला कांग्रेस के बहुत बड़े नेता नहीं है! वे इंदौर शहर की छह विधानसभा सीटों में से एक के विधायक हैं और पहली बार चुने गए। उनकी राजनीति की शुरुआत पार्षद से हुई थी! कांग्रेस ने उन्हें अगले निकाय चुनाव में इंदौर से महापौर पद का उम्मीदवार भी बनाया है। लेकिन, अभी इस नेता का जिक्र इसलिए कि कोरोनाकाल में उन्होंने अपनी सक्रियता से अपना कद इतना बढ़ा लिया कि कांग्रेस के अलावा भाजपा के सारे नेता भी उनके सामने बौने नजर आने लगे! उनकी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि भाजपा की रही है, पर आज वे इंदौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिनती में आ गए। इसलिए कि कोरोना संक्रमण के दौर में वे अकेले नेता हैं, जो जनता के साथ कंधे से कंधा लगाकर खड़े हैं। जनता की परेशानियों में जिस तरह साथ दे रहे हैं, उन्हें इंदौर का सोनू सूद कहा जाने लगा है!    
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- हेमंत पाल

     राजनीति का अपना अलग ही गणित होता है। यहाँ रातों-रात कोई जननेता तभी बनता है, जब जनता उसे अपना हमदर्द समझती है। जब जनता को लगता है कि उनके साथ खड़ा नेता निस्वार्थ भाव से उनकी मदद कर रहा है, तो वे भी उसके साथ हो जाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि संजय शुक्ला ने कोरोना पीड़ित लोगों को लेकर कुछ ऐसे बड़े कदम उठाए, जिसने उन्हें सीधे जनता से जोड़ दिया। उन्होंने कुछ ऐसी घोषणाएं भी की, जिनसे उनकी ऐसी छवि बन गई, जो निश्चित रूप से महापौर पद के चुनाव में उनके लिए मददगार साबित हो सकती है। अभी तक उनकी पहचान इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-एक के विधायक के रूप में थी, पर अब वे पूरे शहर में ऐसे नेता की तरह पहचाने जाने लगे हैं, जो संकट की इस घड़ी में जनता के साथ हैं। उनकी सक्रियता को देखकर लोग अब उन नेताओं को ढूंढ रहे हैं, जो नेतागिरी में तो हमेशा आगे रहते हैं, पर आज जब जनता को उनकी जरूरत है, तो कोई नजर नहीं आ रहा! भाजपा के कुछ नेता तो हर समय प्रशासन के साथ गलबहियां करते ही दिखाई दे रहे हैं! वे सरकारी मीटिंगों में बेवजह कुर्सी तोड़ते दिखाई देते हैं या 'क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप' की बैठकों में प्रशासन के पक्ष में हाथ खड़े करते हैं! उन्हें इस बात का अहसास नहीं कि उनका ये काम जनता को कितना रास आ रहा है!   
     शहर में कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए संजीवनी मानी जाने वाले रेमडेसिवीर इंजेक्शन की कमी पड़ी, तो इसे खरीदने वालों की दवा बाजार में हज़ारों लोगों की भीड़ लग गई! सुबह से लाइन में लगे इन लोगों को इंजेक्शन मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी, पर वे लाइन में लगे रहे। भूख और प्यास लगने पर भी किसी ने लाइन से हटने की कोशिश नहीं की। ये त्रासदी जब मीडिया ने उजागर की, तो दूसरे दिन संजय शुक्ला बिस्कुट और पानी लेकर लाइन में खड़े लोगों के बीच पहुँच गए। इसके बाद वे कांग्रेस के दूसरे नेताओं के साथ कलेक्टर से मिले और 5 हज़ार रेमडेसिवीर इंजेक्शन की मांग करते हुए कलेक्टर के सामने ब्लेंक चैक सामने रख दिया। वे उन गरीब मरीजों के लिए इंजेक्शन चाहते थे, जो इसे 10 और 15 हज़ार में खरीदने में असमर्थ हैं। उन्हें इंजेक्शन मिले या नहीं, ये अलग मसला है, पर उनकी इस कोशिश ने लोगों का दिल जीत लिया। उनकी आर्थिक सम्पन्नता इतनी है कि उनके ब्लैंक चैक पर शंका भी नहीं की जा सकती।   
    इसके बाद उन्होंने कोरोना मरीजों के इलाज के लिए पहल करते हुए अपने हॉस्टल को सरकार को सौंपने की घोषणा की। कांग्रेस विधायक ने इंदौर के प्रभारी बनाए गए मंत्री तुलसीराम सिलावट के सामने कोरोना मरीजों के इलाज के लिए इस हॉस्टल में 200 बिस्तरों वाला अस्पताल खोलने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि इस समय कोरोना के मरीजों को इलाज के लिए अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि स्वास्थ्य विभाग यहाँ अस्थाई अस्पताल शुरू करे। अभी शैक्षणिक गतिविधियां बंद होने से उनका यह हॉस्टल खाली है। उन्होंने यह प्रस्ताव भी किया कि यदि हॉस्टल को कोरोना मरीजों के इलाज के लिए उपयोग में लाया जाता है तो वे यहाँ भर्ती मरीजों के इलाज, दवाइयां और भोजन की व्यवस्था खुद के खर्च पर करेंगे। कोरोनाकाल के इस संकट में पहली बार इंदौर के किसी जनप्रतिनिधि ने जनता की मदद करने के लिए इस तरह का प्रस्ताव रखा है।
     संजय शुक्ला ने ऑक्सीजन बनाने की 10 ऑटोमेटिक मशीन लगाने की भी घोषणा की। वे चाहते हैं कि इससे अस्पताल में भर्ती होने के इंतजार में बैठे मरीजों की जान बचाई जा सकेगी। क्योंकि, कांग्रेस की एक टीम ने जब अस्पतालों का दौरा किया तो देखने में आया कि बिस्तर के अभाव कई मरीज एम्बुलेंस में पड़े हैं! ऑक्सीजन के अभाव में कई की सांसे भी उखड़ जाती है। अस्पताल में डॉक्टर्स ने बताया कि ऑक्सीजन की कमी बनी हुई है। बड़ी संख्या में मरीज ऑक्सीजन के लिए तड़प रहे हैं। बहुत से मरीज अस्पताल में भर्ती होने के लिए इंतजार में हैं। उनका भी ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा है। अस्पतालों में दौरे के समय उन्हें कुछ डॉक्टरों ने बताया कि ऑक्सीजन बनाने वाली ऑटोमेटिक मशीन 'ऑक्सीजन कंसंट्रेटर' की शहर में बहुत जरूरत है। यदि यह मशीन लगाई जाती है, तो कई मरीजों की जान बच सकती है। संजय शुक्ला ने तत्काल जानकारी लेकर अपनी तरफ से दस मशीन लगाने की घोषणा की। 45 हज़ार से डेढ़ लाख रुपए कीमत की ये मशीनें हवा से ऑक्सीजन खींचकर मरीज की ऑक्सीजन की पूर्ति करती है। उन्होंने शहर के समाजसेवियों और संगठनों से भी मशीनों की अपील की! इसका असर ये हुआ कि कई लोग इस पहल में उनका साथ देने के लिए राजी हो गए। अब ये मशीनें सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, एमटीएच हॉस्पिटल और एमआरटीवी हॉस्पिटल के परिसर में तंबू लगाकर लगाई जाएगी। इससे उन मरीजों को लाभ मिलेगा, जो इलाज के लिए अस्पताल लाए जाते हैं, पर बिस्तर खाली नहीं होने पर उन्हें भर्ती नहीं किया जाता। 
   संजय शुक्ला को अस्पताल के दौरे से ये जानकारी भी मिली कि अस्पतालों में मरीजों के इलाज पर पूरी तरह ध्यान भी नहीं दिया जा रहा। ऑक्सीजन की कमी के साथ-साथ रेमडेसिवीर इंजेक्शन के लिए भी मारामारी है। उन्हें पता चला कि यूनिक अस्पताल में 78 मरीज ऐसे हैं, जिन्हें तत्काल इंजेक्शन की जरूरत है। जबकि, मंगलवार को अस्पताल को सिर्फ 27 इंजेक्शन दिए गए। बुधवार को कोई इंजेक्शन नहीं भेजा गया। जबकि, मरीज को लगातार 5 दिन यह इंजेक्शन दिया जाना जरूरी है। ऐसी ही जानकारी दूसरे अस्पतालों से भी मिली। विधायक जब शहर के वर्मा हॉस्पिटल पहुंचे, तो मरीजों के परिजनों ने बताया कि अस्पताल के मैनेजमेंट ने उनसे कहा है कि रेमडेसिवीर इंजेक्शन नहीं है, आप खुद इंतजाम करें। लेकिन, संजय शुक्ला के पहुँचने पर अस्पताल से 24 इंजेक्शन निकले! अब विधायक अपनी टीम के साथ अब शहर के सभी अस्पतालों की हालत जानेंगे और खामियों का पता लगाएंगे। वे अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों से भी बात कर रहे हैं, ताकि असलियत का पता लगाया जा सके। 
   संजय शुक्ला ने सोशल मीडिया पर जनता के नाम एक अपील भी जारी की है। इसमें कहा गया कि अगर आपके परिजन इंदौर में किसी भी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में कोरोना बीमारी के कारण भर्ती है और उनको रेमडेसिवीर इंजेक्शन की जरूरत है, आप मुझसे सीधे संपर्क करें। उन्होंने इस अपील के साथ दो मोबाइल नंबर भी जारी किए हैं। लोगों ने उनसे संपर्क किया और उन्हें मदद भी मिली। इंदौर के लोगों का कहना है कि पहली बार वे किसी नेता को इस तरह सक्रिय देख रहे हैं। क्षेत्र क्रमांक-एक के लोगों के लिए ये नई बात नहीं है, पर इंदौर में पहली बार कोई ऐसा नेता सामने आया जो अस्पतालों में नकेल डालने के साथ प्रशासन के सामने खड़ा होकर सवाल कर रहा है! ऐसे में लोग संजय शुक्ला में मुंबई के सोनू सूद की छवि देख रहे हों, तो कोई गलत भी नहीं है!
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Friday, April 9, 2021

हीरो की मौत हुई और फिल्म चल पड़ी!

- हेमंत पाल

    हिंदी फिल्मों को हिट कराने के अपने अलग ही टोटके हैं। कभी किसी क्लाइमैक्स से कोई फिल्म हिट हो जाती है, तो उसे टोटके की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर लिया जाता है। इसलिए कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों की पसंद-नापसंद का किसी को पता नहीं! जिस सलमान खान के नाम पर बॉक्स ऑफिस के सामने लाइन लग जाती है, उसी सलमान की फिल्म 'ट्यूब लाइट' ईद के दिन रिलीज होकर फ्लॉप हो जाती है। अमिताभ बच्चन और आमिर खान की फिल्म 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' ऐसे धड़ाम से गिरती है, कि पानी तक नहीं मांगती! यही कारण है कि फिल्मकार टोटकों के बहाने फिल्म हिट कराने के फॉर्मूले ढूंढा करते हैं! ऐसा ही एक फार्मूला है, हीरो की मौत का! कुछ फ़िल्में सिर्फ इसलिए चल निकली, कि उनमें हीरो की मौत ने दर्शकों को रुला दिया था। अमिताभ बच्चन की दीवार और शोले, राजेश खन्ना की 'आनंद' की सफलता के पीछे एक कारण यह भी माना जाता है। 'गाइड' में भी फिल्म के अंत में देव आनंद की मौत हो जाती है।    
     फिल्म में हीरो के मरने का फार्मूला नया नहीं है। जब से फ़िल्में बनाना शुरू हुई, इसका सैकड़ों बार इस्तेमाल किया जा चुका है। दिलीप कुमार से लगाकर राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार तक की फिल्मों में हीरो की मौत हुई। आज के दौर की आशिकी, रांझणा, शॉर्टकट, रोमियो, लुटेरा से 'धड़क' तक में हीरो को मारा गया। इन दिनों फिर यह फिल्मों का नया ट्रेंड बनता जा रहा है। संजय लीला भंसाली की अधिकांश फिल्मों में नायक का अंजाम यही होता है। मिलन लुथरिया की फिल्म 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' के अंत में अजय देवगन और उसके सीक्वल में अक्षय कुमार के मरने के दृश्य हैं। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म 'बुलेट राजा' में सैफ अली खान की मौत होती है। 
   फ़िल्मी प्रेम कहानियों का एक कड़वा सच है कि इनका अंजाम सुखद नहीं होता। ऐसी कहानियों को सच्चाई से जोड़ने के लिए एक्टर का मरना जरूरी होता है। ऐसा होता है, तभी दर्शक इससे खुद को जोड़कर महसूस करते हैं। इससे दर्शकों की भावनाएं द्रवित होती है और फिल्म के प्रति आकर्षण बढ़ता है। देखा गया है कि फिल्मों में दुखद अंत हमेशा से कामयाबी का कारण बने हैं। मुगल-ए- आजम, एक दूजे के लिए, कयामत से कयामत तक, 'शोले' तथा हॉलीवुड की 'टाइटैनिक' इसके जीवंत उदाहरण हैं। ट्रैजेडी लोगों की जिंदगी की हकीकत है। यही कारण है, कि जब दर्शक उस ट्रैजेडी को परदे पर घटित होते देखते हैं, तो उससे जुड़ जाते हैं। इसलिए कि हिट फिल्मों का कोई निर्धारित फार्मूला तो है नहीं! दर्शकों को उद्वेलित करके यदि उन्हें सिनेमाघर तक खींचा जा सकता है तो फिल्मकार इसे भी आजमाने से नहीं चूकते!  
   ताजा दौर के हीरो में अक्षय कुमार ऐसे अभिनेता हैं, जो कई फिल्मों के अंत में मारे गए हैं। इस लिस्ट में 'केसरी' तेरहवीं फिल्म थी, जिसमें ईशर सिंह का अंत में मारा जाता है। 2.0, राउडी राठौर, खाकी, गब्बर इज बैक, अजनबी, फैमिली, जॉनी दुश्मन, संघर्ष, अफलातून, खिलाड़ी 420, तस्वीर और 'दोस्ती: फ्रेंड्स फॉरएवर' भी ऐसी फ़िल्में थी जिनमे अक्षय की मौत के दृश्य फिल्माए गए। 'रांझणा' में धनुष, 'देवदास' और ' कल हो न हो' में शाहरुख़ खान, 'सत्या' में मनोज बाजपेई की मौत होती है! 'काई पो चे' में सुशांतसिंह राजपूत, 'शाहिद' में राजकुमार राव, 'ओंकारा' और ' वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई' में अजय देवगन, गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में मनोज बाजपेई, 'धूम' में जॉन अब्राहम, 'जन्नत' में इमरान हाशमी फिल्म के हीरो थे, पर अंत में इनकी मौत हो जाती है। 'क्योंकि' में सलमान खान, 'आशिक़ी 2' में आदित्य रॉय कपूर और 'धड़क' के अंत में हीरो ईशान खट्टर की मौत फिल्माई गई। 'रंग दे बसंती' में के अंत में हीरो आमिर खान की मौत होती है। 
   तीन फ़िल्में ऐसी है, जिनमें हीरो की मौत के दृश्य बेहद प्रभावशाली रहे और दर्शक सुबकते हुए सिनेमाघर से बाहर निकले। ये फिल्म थी 'आनंद' जिसके आखिरी सीन में राजेश खन्ना ने जान डाल दी थी। यही कमाल अमिताभ बच्चन ने 'दीवार' और 'शोले' में किया और दर्शकों का दिल जीत लिया था। लेकिन, इससे पहले 'गाइड' में देव आनंद ने कमाल किया था, उसका कोई जवाब नहीं! हीरो की मौत के सुपरहिट फॉर्मूले का जिस एक एक्टर पर अभी तक प्रयोग नहीं किया गया, वे हैं रजनीकांत! वे दक्षिण और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अलावा विदेशों में भी अपनी पहचान रखते हैं। बॉक्स ऑफिस पर उनके नाम से ही फिल्म हिट हो जाती है। इस सुपरस्टार की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है, कि कोई भी डायरेक्टर उनकी मौत का दृश्य फिल्माने की हिम्मत नहीं कर पाया। उन्हें डर लगता है कि अगर उन्होंने परदे पर रजनीकांत को मरते दिखाया, तो कहीं फिल्म फ्लॉप न हो जाए! इस कारण रजनीकांत ने बरसों से मरने का सीन नहीं किया। 
   इंडस्ट्री में एक मनहूस सच्चाई ये भी है कि के आसिफ ने जिस भी हीरो को अपनी फिल्म के लिए साइन किया, उसकी मौत हो गई! उन्होंने अपनी फिल्म 'मुगल ए आजम' का नाम पहले 'अनारकली' रखा था और नूतन को उस रोल के लिए साइन किय़ा था, जिसे बाद में मधुबाला ने निभाया। उन्होंने फिल्म की कहानी सैयद इम्तियाज अली ताज के उपन्यास 'अनारकली' से ली थी और चंद्रमोहन को बतौर हीरो लिया था। दस रील शूट भी हो गईं, लेकिन चंद्रमोहन की अचानक मौत हो गई। बाद में दिलीप कुमार को हीरो लिया तो नूतन ने काम करने से इंकार कर दिया। इसके बाद न मधुबाला को साइन किया और फिल्म का नाम भी 'अनारकली' से 'मुगल ए आजम' कर दिया गया। के आसिफ ने गुरुदत्त को लेकर 'लव एंड गॉड' बनाना शुरू की, तो गुरुदत्त चल बसे! फिर उन्होंने इस फिल्म में संजीव कुमार को साइन किया तो उनका भी फिल्म पूरी होने से पहले निधन हो गया। उनकी मौत के 23 साल बाद उनकी पत्नी ने 1986 में इस अधूरी फिल्म को किसी तरह रिलीज किया था। यानी कि फिल्म में हीरो की मौत को कामयाबी की तरह आजमाने के किस्से अनंत हैं। 
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Sunday, April 4, 2021

ज्यादा नहीं डराती, हिंदी की डरावनी फ़िल्में

- हेमंत पाल

   हिंदी फिल्मों ने काफी हद तक हॉलीवुड की फिल्मों की नक़ल कर ली और मुकाबला भी किया! लेकिन, डरावनी फिल्मों के मामले में हिंदी सिनेमा बहुत पीछे है। सौ साल से ज्यादा पुराने हिंदी सिनेमा के खाते में दस फ़िल्में भी नहीं है, जिन्होंने दर्शकों को डराकर मनोरंजन किया हो! जबकि, हॉलीवुड की कुछ फ़िल्में ऐसी हैं, जो दर्शक अकेले देखने से बचते हैं। हिंदी में हर साल कई फिल्में बनती हैं, पर उनमें डर को विषय बनाकर बनाई जाने वाली फ़िल्में इक्का-दुक्का होती है! पर, इन्हें देखकर डर नहीं लगता! 70 और 80 के दशक की फिल्मों में डरावनी फिल्मों का मतलब होता था भूत! लेकिन, समय के साथ हिंदी में बनने वाली हॉरर फिल्मों की गुणवत्ता में कुछ सुधार हुआ है। 'स्त्री' जैसी कुछ फ़िल्में जरूर आईं, जिन्होंने दर्शकों को भयभीत भी किया और आखिरी दृश्य तक बांधकर भी रखा! 
    हिंदी फिल्मों के इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो मधुबाला की फिल्म 'महल' (1949) कमाल अमरोही की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी। इस फिल्म को हिंदी की पहली डरावनी फिल्म भी कहा जाता है। लेकिन, इसमें दर्शकों को डराने की कोशिश नहीं की गई, फिल्म की कहानी जरूर डर से जुड़ी थी। इस फिल्म को खेमचंद प्रकाश के संगीत ने ज्यादा रहस्यपूर्ण और डरावना बनाया था। इसके 25 साल बाद 1975 में बनी अमेरिकी फिल्म 'द इंकार्नेशन ऑफ़ पीटर प्राउड' की कहानी 'महल' से प्रेरित थी। 60 के दशक में दो ऐसी फ़िल्में आई, जिन्हें डरावनी कहा गया। ये थीं वहीदा रहमान और विश्वजीत की 'बीस साल बाद' (1962) और 'कोहरा' (1964) इन दोनों फिल्मों के निर्माता, निर्देशक, लेखक, नायक और नायिका और यहाँ तक कि संगीतकार तक एक ही थे। ;बीस साल बाद' आधी रात में भटकती एक रहस्यमयी महिला की कहानी थी। इसे हॉलीवुड के कॉनन डॉयल की फ़िल्म 'द हाउंड ऑफ़ बास्केरविल्ले' से प्रेरित बताया जाता है। जबकि, 'कोहरा' डेफ्नी डू मॉरिएर के उपन्यास रेबीका पर बनी थी। इस फ़िल्म के क्लाइमेक्स की बहुत तारीफ हुई थी। ये दोनों फ़िल्में हेमंत कुमार ने बनाई थी और दोनों फिल्मों की कामयाबी में इसके संगीत का बड़ा हाथ था, जिसे हेमंत कुमार ने ही दिया था। 
    1965 की फिल्म 'भूत बंगला' महमूद की लिखी, निर्देशित फिल्म थी। इसमें मुख्य भूमिका भी महमूद ने ही निभाई थी। इस फिल्म में एक भयानक संगीत थ्रिलर बनाया गया था जो गानों पर नाचते हुए भूतों के साथ था! इसी साल (1965) में ही आई राजा नवाथे की फिल्म 'गुमनाम' भी डराने वाली फिल्म थी। इसमें सात लोगों को हवाई जहाज से एक वीरान द्वीप में उतार दिया जाता है और वहां एक-एक करके उनकी हत्या होने लगती है। मनोज कुमार फिल्म के नायक थे और शंकर-जयकिशन का संगीत फिल्म की जान था। इसके बाद लम्बे अरसे तक ऐसी फ़िल्में परदे से नदारद रही। राजकुमार कोहली ने रीना रॉय और रेखा की 'नागिन' (1976) और मल्टी स्टारर 'जानी दुश्मन' (1979) बनाई। इन दोनों फिल्मों में सितारों की भीड़ जुटाकर उन्होंने गज़ब के रहस्य का माहौल बनाया। दोनों फिल्मों में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत था, जो काफी पसंद किया गया। 1980 में आई 'फिर वही रात' एक रहस्यमय थ्रिलर फिल्म थी, जिसे डैनी डेन्जोंगपा ने निर्देशित किया था। राजेश खन्ना अभिनीत इस फिल्म में किम यशपाल ने एक महिला की भूमिका निभाई थी, जो गंभीर बुरे सपने से पीड़ित होती है और इलाज की तलाश में है।
   रामगोपाल वर्मा ने जो चंद देखने लायक फिल्म बनाई, उनमें एक 'रात' (1992) को गिना जा सकता है। इस फ़िल्म में एक बिल्ली मर जाती है, जिसे एक लड़की की आत्मा अपने वश में कर लेती है। इसी निर्देशक की 2003 में आई फिल्म 'डरना मना है' 6 छोटी कहानियां थी, जो बेहद डरावनी हैं। उर्मिला मातोंडकर की 2003 में आई फिल्म 'भूत' भी रामगोपाल वर्मा ने बनाई थी। फिल्म का संगीत दर्शकों की रूह कंपा देता था। साउंड इफ़ेक्ट के कारण ये फिल्म अपने मकसद में कामयाब हुई थी। लेकिन, विद्या बालन और अमीषा पटेल की फिल्म 'भूल भुलैया' (2007) प्रियदर्शन की ऐसी फिल्म थी, जो अपने साइकोलॉजिकल थ्रिलर विषय के कारण दर्शकों को डराने में ज्यादा कामयाब रही। रामगोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म 'फूँक' 2008 में रिलीज़ हुई थी। काफी कम बजट में बनी फिल्म ने अच्छी कमाई की थी। यह फिल्म इतनी डरावनी थी की डायरेक्टर ने एलान किया था कि फिल्म को अकेले थिएटर में देखने पर 5 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा। 2018 की फिल्म 'परी' अनुष्का शर्मा ने बनाई और उन्होंने ही इसमें काम भी किया था।  
   विक्रम भट्ट और मुकेश भट्ट ने भी डरावनी फिल्मों में हाथ आजमाया और 2002 में 'राज' बनाई। इसमें कोई स्पेशल इफ़ेक्ट नहीं था। सिर्फ़ कथानक और बिपाशा बसु की एक्टिंग ने पूरी फिल्म को डरावना बना दिया था। यह हॉलीवुड फिल्मकार मिशेल पफेर की फिल्म 'व्हाट लाइज बिनीथ' से प्रभावित थी। बाद में इसके सीक्वल भी बने। भट्ट कैम्प ने 2008 में '1920' नाम से फिल्म बनाई थी। ये फिल्म एक सुनसान हवेली, एक रहस्यमय चौकीदार और एक नए शादी-शुदा जोड़े के कथानक वाली फिल्म थी। इसमें न ख़ास ग्राफ़िक्स थे, न स्पेशल साउंड इफ़ेक्ट्स! फिर भी ये बेहद डरावनी फ़िल्म थी। 2010 में विक्रम भट्ट ने 'शापित' बनाई थी। इसमें उन्होंने डर का जो माहौल बनाया, वो अपनी कोशिश में सफल भी रहा। किरदार, लाइट, साउंड इफ़ेक्ट्स और अंधेरे के आस-पास बनी ये फ़िल्म, भट्ट कैम्प की दूसरी फ़िल्मों की तरह दर्शकों को डराने में कामयाब रही। 2013 की फिल्म 'हॉरर स्टोरी' के नाम से ही उसके डरावने होने का अहसास हो जाता है। फिल्म में कुछ दोस्तों का प्लान बनता है कि वो एक रात किसी भुतहा होटल में बिताएंगे। लेकिन, होटल जाने के बाद उनकी जिंदगी बदल जाती है। 2002 में आई विशाल भारद्वाज की फिल्म 'मकड़ी' ने भी बहुत डराया। इस फिल्म में चुड़ैल का किरदार शबाना आजमी ने निभाया था और अपनी एक्टिंग से उन्होंने दर्शकों को जमकर डराया। 2018 में आई 'स्त्री' एक हॉरर-कॉमेडी फिल्म है। अमर कौशिक की ये फिल्म गुदगुदाएगी भी है और डराती भी है। 
 
     हिंदी फिल्मों में डर को विषय बनाने और उसे कामयाब बनाने में सात भाइयों के बैनर 'रामसे ब्रदर्स' का बड़ा हाथ रहा है। रामसे ब्रदर्स ने परदे पर ख़ौफ़ का ऐसा माहौल बनाया कि वे इसके ब्रांड बन गए। 70 और 80 के दशक में इस बैनर ने क़रीब 45 फ़िल्में बनाईं। उस दौर में रामसे ब्रदर्स ने डर को अलग ही मुकाम तक पहुंचाया और अपनी पहचान बनाई! उन्होंने पहली फिल्म बनाई 'नन्ही मुन्नी लड़की' जो सफल नहीं हुई, मगर इस फ़िल्म के एक सीन जिसमें पृथ्वीराज कपूर एक भूत का मास्क पहनकर लड़की को डराते हैं, खूब वाहवाही बटोरी। इस एक सीन ने उन्हें भुतहा और डरावनी फ़िल्म बनाने की और प्रेरित किया। फिर उन्होंने बनाई 'दो गज़ ज़मीन के नीचे!' इस फिल्म ने तहलका मचा दिया। इस फ़िल्म की सफलता के बाद रामसे ब्रदर्स ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने तय किया कि अब वे सिर्फ़ डरावनी फ़िल्म ही बनाएंगे। फिर तो उन्होंने डरावनी फिल्मों की झड़ी लगा दी! दरवाज़ा, गेस्ट हाउस, पुराना मंदिर, पुरानी हवेली, बंद दरवाज़ा और 'वीराना' जैसी कई सफल फ़िल्में बनाईं! लेकिन, अब तो दर्शकों ने ऐसी फिल्मों से डरना बंद कर दिया। शायद यही कारण है कि ऐसी फ़िल्में बनना भी बंद हो गई!  
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Friday, March 26, 2021

होली एक बहाना है, फिल्म में ट्विस्ट का!

- हेमंत पाल

   सिनेमा की कहानी में ट्विस्ट लाने के लिए किसी मौके की जरूरत महसूस की जाती है! इनमें सबसे आसान होता है, किसी त्यौहार का प्रसंग लाकर कहानी का प्लॉट बदला जाए! होली और ईद दो ऐसे ही त्यौहार हैं, जिन्हें फिल्म बनाने वालों ने अपनी तरफ से जमकर भुनाया! दोनों खुशियों वाले त्यौहार हैं, जिनके बहाने दर्शकों को गाना-बजाना दिखाकर कहानी में ट्विस्ट लाया जाता रहा है। 'जख्मी' से लगाकर 'शोले' और 'सिलसिला' तक को याद किया जा सकता है, जिनमें होली गीत के बाद एकदम कहानी का ट्रेक बदला था। होली वैसे तो रंगों का त्यौहार है, पर सिनेमा के शुरूआती समय में जब फ़िल्में श्वेत-श्याम हुआ करती थीं, तब भी होली प्रसंग फिल्माए और पसंद किए गए। फिल्मों में होली फिल्माने की शुरुआत 1944 में दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में हुई। ये श्वेत-श्याम फिल्मों का दौर था। संयोग है कि जब फिल्मों में रंग भरे और होली फिल्माई गई, तब भी दिलीप कुमार 'आन' में निम्मी के साथ दिखाई दिए थे। फिल्मकारों को होली के बहाने एक मस्ती भरा गाना फिल्माने का मौका भी मिल जाता है। अभी तक 'होली' नाम से सिर्फ दो फिल्में और 'होली आई रे' नाम से एक फिल्म आई है। 'फागुन' शीर्षक से भी दो फिल्में बनी। 1967 में 'भक्त प्रहलाद' फिल्म बनी जिसमें होली का धार्मिक आधार बताया गया था।     
      कथानक को जटिल स्थिति से निकालने या ट्रेक बदलने के लिए होली दृश्यों का इतने बार इस्तेमाल किया गया, जिसकी गिनती नहीं है। यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों में बार-बार होली दृश्यों का उपयोग किया। 1981 में आई ‘सिलसिला’ के गीत 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली' गीत को भी जटिल हालात को व्यक्त करने के लिए रखा गया था। होली ने अमिताभ और रेखा की घुटन से बाहर आने का मौका दिया। फिल्म के पात्र प्रेम, दाम्पत्य और अविश्वास की जिस गफलत में फँसे थे, इस होली गीत ने उन्हें उस भूल-भुलैया से निकलने का रास्ता भी दिया था। 1984 में 'मशाल' में 'होली आई होली आई देखो होली आई रे' में अनिल कपूर और रति अग्निहोत्री के प्रेम के रंग को निखारा गया। साथ ही दिलीप कुमार और वहीदा रहमान के बीच मौन संवाद पेश किया। ऐसा ही एक दृश्य यश चोपड़ा की ही फिल्म 'डर' में भी था। इसमें शाहरुख खान जूही चावला के प्रेम में जुनूनी खलनायक की भूमिका में रहते हैं। हैं। वे किसी भी कीमत पर उसे पाना चाहते हैं। तनाव के बीच होली प्रसंग शाहरुख को जूही चावला को स्पर्श करने का मौका देता है। साथ ही कहानी को अंजाम तक पहुंचाने का भी अवसर मिलता है। 'मोहब्बतें' में यश चोपड़ा ने 'सोहनी सोहनी अंखियों वाली' से जोड़ियों के बीच होली सीक्वंस फ़िल्माया। राजकुमार संतोषी ने भी 'दामिनी' में होली को कहानी का मुख्य आधार बनाकर दिखाया था। 
     सिनेमा की दुनिया भेड़ चाल पर ज्यादा विश्वास करती है। जब होली दृश्य दर्शकों को लुभाने लगे तो इन्हें कथानक में शामिल करने की होड़ सी लग गई। 'मदर इंडिया' में शमशाद बेगम का गाया 'होली आई रे कन्हाई' अभी भी सुना और पसंद किया जाता है। वी. शांताराम ने अपनी चर्चित फिल्म 'नवरंग' में भी होली गीत 'चल जा रे हट नटखट' रखा जो महिपाल और संध्या पर फिल्माया गया था। 70 के दशक की फिल्मों में होली के बहाने कुछ अच्छे दृश्य फिल्मों में देखने को मिले। राजेश खन्ना पर 'कटी पतंग' में फिल्माया गाना 'आज न छोड़ेंगे हम हमजोली' निर्देशक ने उस सामाजिक बंधन को तोड़ने के लिए रखा था, जिसमें एक विधवा को समाज सभी रंगों से बेदखल कर देता है। 
    होली को लेकर जिस गाने का सबसे पहले जिक्र आता है, वह है 1940 में आई 'औरत' का गाना। निर्देशक महबूब खान की इस फिल्म में अनिल बिस्वास के संगीतबद्ध गाने 'आज होली खेलेंगे साजन के संग' और 'जमुना तट श्याम खेले होरी' हिंदी सिनेमा के पहले होली गीत माने जाते हैं। बाद में महबूब खान ने इस फिल्म की कहानी को 'मदर इंडिया' नाम से बनाया। इसमें भी होली का सदाबहार गाना 'होली आई रे कन्हाई रंग छलके, बजा दे जरा बांसुरी' था। उसके बाद गीता दत्त के गाए 'जोगन' के गीत 'डारो रे रंग डारो रे रसिया' सुपरहिट होली गीत बना। श्वेत श्याम फिल्मों के दौर में भी होली के गाने दर्शकों को भाते थे। भले परदे पर रंग नजर न आते हो, लेकिन इन गीतों का जादू ऐसा होता था कि लोगों को परदे पर रंग बिरंगी होली का ही एहसास होता था। देश में बनी पहली टेक्नीकलर फिल्म 'आन' में दिलीप कुमार की अदाकारी के अलावा इस फिल्म के गाने 'खेलो रंग हमारे संग' ने लोगों पर खूब जादू किया। 
   फिर तो होली के गानों का सिलसिला ही चल निकला। रमेश सिप्पी की फिल्म 'शोले' में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की छेड़छाड़ वाला गाना 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं' हर होली पर सुनाई देता है। 70 और 80 के दशक की फिल्मों में होली के गाने खूब बजे। इस दौरान बने सुपरहिट होली गीतों में 'षड्यंत्र' का गाना होली आई रे मस्तानों की टोली, फिल्म 'राजपूत' का गाना भागी रे भागी रे भागी बृज बाला, फिल्म 'नदिया के पार' का गाना 'जोगीजी वाह जोगीजी, फिल्म 'कामचोर' का गाना 'मल दे गुलाल मोहे' और फिल्म 'बागबान' का गाना 'होली खेलें रघुवीरा अवध में होली खेलें रघुवीरा' कालजयी गीत बने। लेकिन, जो गाना सबसे ज्यादा हिट हुआ वह था फिल्म 'सिलसिला' का अमिताभ की आवाज का गाना 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे!' ये गाना हिंदी सिनेमा का सबसे लोकप्रिय होली गीत माना जाता है।
   'कोहिनूर' का गीत 'तन रंग लो जी आज मन रंग लो' भी पसंद किया गया था। ‘गोदान’ में भी एक होली गीत फिल्माया गया था। 'आखिर क्यों' का गीत 'सात रंग में खेल रही है दिलवालों की टोली रे' और ‘कामचोर’ के गीत 'मल दे गुलाल मोहे' के जरिए कहानी को आगे बढ़ाया गया। फिल्मों में होली का क्रेज पिछले दशक तक रहा। दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर की फिल्म 'ये जवानी है दीवानी' का गाना 'बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी' खूब हिट हुआ। होली का अल्हड़ अंदाज इस गाने में बरसों बाद हिंदी सिनेमा के परदे पर दिखा। लेकिन, इसके बाद कोई होली का गाना अब तक नहीं बन सका।  
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Sunday, March 21, 2021

आजादी के बाद नए दौर का नया सिनेमा!

 - हेमंत पाल

    जब भी सिनेमा की बात होती है, उसके शुरूआती काल से आजतक की ही बात होती है। जबकि, हिंदी सिनेमा की दुनिया दो भागों में बंटी है। पहली है आजादी से पहले की फ़िल्में, दूसरी है आजादी के बाद की! सामान्यतः दोनों समय काल में सिनेमा का मूल तत्व मनोरंजन ही था, पर दोनों में बहुत अंतर देखा गया। कई फिल्मकार विभाजित भारत के उस हिस्से से इधर आए और कुछ अपने यहाँ से उधर चले गए। इस अदला-बदली का भी फिल्म निर्माण में अंतर आया। क्योंकि, देश की सामाजिक व्यवस्था के साथ सिनेमा की दुनिया भी बदली। ये भी सच है कि सिनेमा ने हमेशा भी खुद को समाज के साथ बदला है। आजादी के बाद सोच, कथानक, विषय, गीत-संगीत के साथ निर्माण प्रक्रिया में भी नए प्रयोग किए गए। 1948 में राज कपूर की फिल्म 'आग' आई थी। मुकेश ने इसमें 'जिंदा हूं इस तरह के गमे जिंदगी नहीं' गीत गाया। शमशाद बेगम ने 'काहे कोयल शोर मचाए रे' गाया। इन गीतों में शायरी हावी थी। क्योंकि, फिल्मों में हिंदी के साथ उर्दू का प्रयोग होने लगा था।   
    आजादी के बाद सिनेमा के उस दौर में अंतर आया जो धार्मिक और पौराणिक किस्से-कहानियों के अलावा ऐतिहासिक प्रसंगों तक सीमित था। तलवारबाजी और अखाड़ों में कुश्तियों वाली फ़िल्में धीरे-धीरे नेपथ्य में चली गईं, उसकी जगह ली सामाजिक कहानियों, किसानों की पीड़ा, गाँव में साहूकारों के जुल्म और हल्की-फुल्की प्रेम कथाओं ने। शुरुआत की कई फिल्मों में सूदखोर के कर्ज से परेशान किसानों की बेबसी को संजीदगी के साथ फिल्माया गया। 50 के दशक के बाद ऐसी कई फ़िल्में आई जिनमें जमींदार के आतंक और सूदखोर के आतंक को ही खलनायक बनाकर दिखाया गया। ये किसानों की दुर्दशा दर्शाने वाला दौर था। परदे पर जिस भी किसान की कहानी गढ़ी गई, उसे गरीबी के चक्रव्यहू से जूझता हुआ ही दिखाया गया। इसके अलावा महिला किरदारों को भी जुल्मी जमींदार की नजरों से बचता हुआ दिखाया गया। आजादी के बाद करीब एक दशक तक फिल्मों में किसानों की इसी मजबूरी को फिल्माया गया। 
   बंटवारे के बाद का दौर ऐसा रहा, जिसने सिनेमा पर सीधा असर डाला। लोग सिनेमा के मनोरंजन से दूर हो गए! क्योंकि, जीवन की समस्याएं मनोरंजन से कहीं ज्यादा बड़ी थीं। इस दौर के गुजरने के बाद फिल्मों के कथानक बदलने लगे। देश के नवनिर्माण की बातें होने लगी। 50 के दशक के सिनेमा पर आजाद भारत की झलक दिखाई देने लगी। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आर्थिक सुधारों और आधुनिकीकरण के सोच के साथ आजादी के बाद के आशावाद की झलक देखी जा सकती है। ये पं नेहरू के ही विचार थे, जब उन्होंने नए देश के निर्माण के समाजवादी मॉडल के साथ प्रयोग किए। पं नेहरू के विचारों का नजरिया आजादी के संघर्ष की वैचारिक विरासत का विस्तार करने के पक्ष में था। लेकिन, यह इतना अतिआदर्शवादी हो गया था, कि इसके सहारे कसी हुई फ़िल्मी कहानी कहना आसान नहीं था। 
  'जागृति' (1954) में मोहम्मद रफ़ी के गाए गीत 'हम लाए हैं तूफानों से कश्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के' में कैमरा पं नेहरू के फोटो पर फोकस होता है। इसी गीत की आगे पंक्तियां 'देखो कहीं बर्बाद न हो ये बगीचा' पं नेहरू की शांतिदूत वाली अंतरराष्ट्रीय छवि को स्थापित करने की कोशिश लगती थी। 'एटम बमों के जोर पर ऐंठी है ये दुनिया, बारूद के एक ढेर पर बैठी है ये दुनिया' जैसी पंक्तियां भी आने वाले कल का संकेत समझा जा सकता है। 60 और 70 के दशक में देश में औद्योगीकरण का माहौल बना। तब कारखाना मालिकों को फिल्मों में खलनायक के रूप में दिखाया जाने लगा। तब की फिल्मों में इन मालिकों के किरदार कभी अच्छे आदमी के नहीं दिखाई दिए। क्योंकि, फिल्मकारों के जहन में कहीं न कहीं वामपंथी सोच भी छुपा था जो मजदूरों के साथ खड़ा था।   
   आजादी के बाद सभी को अहसास था कि जो जहाँ है, उसे वहीं से देश को नवनिर्माण के रास्ते पर ले जाना है। सिनेमा की भी अपनी जिम्मेदारी थी और फिल्मकारों को नई सोच के साथ अपना योगदान देना था। आजादी के साल भर बाद महात्मा गांधी की हत्या हो गई। राजेंद्र कृष्ण ने गांधीजी की याद में 'सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी' गीत रचा! इसके बाद 1949 में राज कपूर की ‘बरसात’ और महबूब खान की ‘अंदाज’ जैसी फिल्में आईं। 'अंदाज' में नौशाद का संगीत था और 'बरसात' से आए शंकर-जयकिशन। जमींदारों की सामंती अकड़, सूदखोर और गरीब किसान जैसी स्थितियों के बीच 'मदर इंडिया' (1957) और 'गंगा जमुना' (1961) जैसी फिल्में बनी। इसके साथ 'बूट पॉलिश' (1954) और 'आवारा' (1951) ने नए भारत में उपजी आर्थिक असमानताओं पर प्रकाश डाला। 
    1957 का साल आजादी के बाद देशभक्ति का नया स्वरूप लेकर आया। गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' के लिए लिखे साहिर लुधियानवी के गीत में उन्होंने कुलीन देशभक्ति पर कटाक्ष किया था। मोहम्मद रफ़ी के गाए इस गीत के बोल थे 'ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के, ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के, कहां हैं मुहाफिज खुदी के, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं!' 1958 में साहिर लुधियानवी ने राज कपूर की फिल्म 'फिर सुबह होगी' में इकबाल के गीत 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' पर व्यंग्य किया। मुकेश का गाया यह गीत आजादी के दस साल बाद की स्थिति और खामियों पर टिप्पणी की तरह था। साहिर ने लिखा था 'चीन-ओ-अरब हमारा, हिन्दोस्तान हमारा, रहने को घर नहीं है, सारा जहां हमारा!' समाजवादी राजनीतिक व्यवस्था का मखौल उड़ाते हुए इसके आगे की पंक्तियां थीं 'जितनी भी बिल्डिंगें थीं, सेठों ने बांट ली हैं, फुटपाथ बम्बई के हैं आशियां हमारा!' कहा जा सकता है कि बंटवारे के बाद देश की दिशा और दशा क्या होगी, ये फिल्मकारों ने पहले ही भांप लिया था। 
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'दीदी' की सत्ता को इंदौर के 'भाई' की चुनौती!

 इस बात को करीब तीन दशक हो गए जब लोग इंदौर की एलआईजी कॉलोनी के चौराहे पर केशरिया दुपट्टा डाले एक नेता को अकसर देखते थे! तब वे स्कूटर के पीछे बैठे नजर आते थे! ये थे कैलाश विजयवर्गीय! आज भी उनकी सहजता में फर्क नहीं आया! लेकिन, आज उनका राजनीतिक कद आसमान छूने लगा! इंदौर के बाद प्रदेश की भाजपा राजनीति में अपना दम दिखाने वाले कैलाश विजयवर्गीय ने मध्यप्रदेश के बाहर भी कारनामे किए हैं! हरियाणा में भाजपा की सरकार बनाने की जुगत लगाने के बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल के ममता राज की जड़ें हिला दी! लोकसभा चुनाव में वहाँ की 42 में से 18 सीटों पर 'कमल' खिलाकर उन्होंने पार्टी के लिए नई संभावनाएं भी जगाई! मुद्दे की बात की बात ये कि इस नेता ने उस राज्य में भाजपा की जड़ें मजबूत की, वे जहाँ की भाषा भी नहीं जानते! लेकिन, कहा जाता है कि विश्वास और उम्मीद की कोई भाषा नहीं होती! बंगाली राज्य के लोगों को ये भरोसा हो गया कि उन्हें कोई ममता बैनर्जी के अराजक राज से मुक्त करवा सकता है तो वो है भाजपा और कैलाश विजयवर्गीय! इसी विश्वास ने तो वहाँ कमाल किया है!   


- हेमंत पाल

   भाजपा को जब लोकसभा चुनाव ने दो सीटें मिली थी, तब अटलबिहारी बाजपेयी ने दावा किया था कि एक दिन भाजपा देश पर राज करेगी! उस समय लोगों को ये बात कुछ असहज लगी थी! क्योंकि, सामने कांग्रेस जैसी पार्टी थी! लेकिन, अंततः अटलजी की बात सही निकली! आज लोकसभा में भाजपा की 303 सीटें हैं। कुछ ऐसी ही कहानी पश्चिम बंगाल की है! इस राज्य में भी पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 2 सीटें मिली थी! इस बार यहाँ भी कमाल हुआ और भाजपा ने 42 में से 18 सीटों पर कब्ज़ा जमाया! अब पार्टी विधानसभा चुनाव में वही कहानी दोहराने के प्रयास में लगी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सिर्फ 3 सीट जीती थी, आज उसी पार्टी ने इतनी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी, कि उसे राज्य में सरकार बनाने वाली संभावित पार्टी माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रभारी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने राज्य में अपना ख़म ठोंक दिया। ममता बैनर्जी को जिस 'तृणमूल' पर भरोसा था, वह पार्टी तृण-तृण होकर बिखरने लगी। ममता की पार्टी के कई नेता पाला बदलकर भाजपा के साथ खड़े हो गए। विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह के हालात बदले, उससे लगता है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में काफी मजबूत स्थिति में है। 
   भाजपा के विश्वास का सबसे बड़ा आधार है लोकसभा चुनाव में मिली सफलता। लेकिन, यह सब कर पाना आसान नहीं था! पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी ने जिस तरह से अपनी सरकार चलाई, वहाँ किसी और पार्टी के लिए जगह बनाना बेहद मुश्किल काम था! हिंसा, अराजकता और हत्या जैसी घटनाएं यहाँ सामान्य बात है। हिंदू-मुस्लिम को बाँटकर ममता बैनर्जी ने जिस तरह वोट के लिए तुष्टिकरण की राजनीति की, उसमें सेंध लगाने की कोई सोच भी नहीं सकता था! लेकिन, लोकसभा चुनाव में सेंध भी लगी और चमत्कार भी हुआ! इस सबके पीछे एक व्यक्ति की मेहनत और रणनीति कारगर रही! ये हैं इंदौर के 'भाई' उर्फ़ कैलाश विजयवर्गीय! उन्होंने जिस रणनीतिक कौशल से पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 18 सीटों पर 'कमल' खिलाया, वो राजनीति के जानकारों के लिए चिंतन का विषय है! कैलाश विजयवर्गीय ने सिर्फ पाँच महीने में पार्टी का आधार मजबूत किया, जिसका सुखद नतीजा सामने आया! अब वे विधानसभा चुनाव में इसी कमाल को दोहराने में लगे हैं। उन्होंने जिस तरह बंगाली लोगों में अपनी पैठ बनाई और उन्हें घर से निकलकर ममता बैनर्जी के खिलाफ खड़ा किया, वो आसान नहीं था।       
      भारतीय जनता पार्टी ने बहुत सोच-समझकर ममता बैनर्जी के अभेद्य किले में सेंध लगाने के अभियान की कमान कैलाश विजयवर्गीय को सौंपी है! उन्हें पश्चिम बंगाल फतह के लिए प्रभारी बनाकर मोर्चे पर लगाया गया! वहाँ की गुंडा राजनीति को काबू करके जिस तरह भाजपा के लिए जमीन तैयार की, उसे वही समझ सकता है, जिसे वहाँ ममता बैनर्जी की राजनीतिक शैली का अंदाजा हो! भाजपा ने सबसे पहले ममता के उन किलों पर कब्ज़ा जमाया, जो 'तृणमूल' की ताकत थे। कैलाश विजयवर्गीय ने लोगों का भरोसा जीता, उन्हें तृणमूल पार्टी के खौफ से मुक्त किया, फिर उन्हें झंडा थमाकर सड़क पर निकाला। इसी का नतीजा रहा कि पश्चिम बंगाल में 'तृणमूल' के खिलाफ लोगों की आवाज निकली! जब कैलाश विजयवर्गीय को पश्चिम बंगाल का प्रभार सौंपा गया था, तब किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं की थी! क्योंकि, पश्चिम बंगाल में 'तृणमूल' के विरोध का मतलब सिर्फ मौत था! ऐसे अराजक और अलोकतांत्रिक माहौल में कैलाश विजयवर्गीय ने अपना काम शुरू किया। लोकसभा चुनाव में ही 53 भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, जो अब बढ़कर सवा सौ से ज्यादा हो गई है! खुद कैलाश विजयवर्गीय को भी धमकियाँ मिली! लेकिन, उन्होंने कोई सुरक्षा नहीं ली! बाद में पार्टी अध्यक्ष के दबाव में कुछ दिन सुरक्षा जरूर ली, पर जल्दी ही वापस भी कर दी!   
   पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास हिंसा से भरा रहा है! वामपंथियों के राज में वहां जमकर हिंसा हुई, फिर इसे 'तृणमूल' ने भी खाद-पानी दिया। ममता के दो कार्यकाल में हिंसा की राजनीति कुछ ज्यादा ही पनपी! राजनीतिक विरोध का जवाब मारपीट से दिया जाने लगा! असहमति के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है! ममता राज में लोग कितने परेशान है, इस बात का पता भी कैलाश विजयवर्गीय को वहाँ जाकर लगा! इसी वजह से उन्हें लोगों का साथ मिला! जहाँ लोग 'तृणमूल' के झंडे और बैनर के अलावा कुछ सोच भी नहीं सकते थे! लेकिन, वहाँ विरोध और दबाव के बावजूद भाजपा के झंडे लगे! रैलियों में भीड़ बढ़ी! घरों, दुकानों पर भाजपा का चुनाव चिन्ह दिखाई देने लगा! लोग भी भाजपा को वोट देने की अपील करने लगे! जहाँ 'जय श्रीराम' बोलना अपराध था, आज वहां इसका उद्घोष होने लगा! इसे कैलाश विजयवर्गीय की उपलब्धि माना जाना चाहिए कि उन्होंने पश्चिम बंगाल के लोगों में ये विश्वास प्रबल किया कि भाजपा का साथ देने से उन्हें नुकसान नहीं होगा! 
   वास्तव में ये विश्वास जीतना बेहद मुश्किल काम था। क्योंकि, वहां के लोग ये भ्रम भी पाल सकते थे, कि चुनाव का नतीजा कुछ भी हो, कैलाश विजयवर्गीय तो वापस लौट जाएंगे! ऐसे में उन्हें ममता सरकार का कोप भाजन बनना पड़ सकता है! लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और लोग विजयवर्गीय के साथ सड़क पर निकल आए! इसी भरोसे ने पश्चिम बंगाल में सेंधमारी का मौका दिया। लोकसभा चुनाव में 42 में से भाजपा को 18 सीटें जीतने का मौका मिला। ये आंकड़ा भले ही ज्यादा बड़ा नहीं लगे, पर वास्तव में अप्रजातांत्रिक सत्ता के सामने पार्टी की जड़ें ज़माने के लिए ये बहुत जरुरी था। अब इसके आगे का काम विधानसभा चुनाव के नतीजों में दिखाई देगा। पिछले साल 3 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार राज्य में 150 से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश में है।    
   इंदौर के मिल क्षेत्र के इस हरफनमौला भाजपा नेता को ऐसी चुनौतियाँ स्वीकारने की आदत रही है! इंदौर के जिस मिल क्षेत्र (विधानसभा क्षेत्र क्रमांक-2) का उन्होंने बरसों तक प्रतिनिधित्व किया है! एक समय था, जब वहाँ भाजपा का कोई नामलेवा नहीं था! मिल मजदूरों के कारण 'इंटक' के प्रभाव वाले इस इलाके से उन्होंने पहली बार भाजपा को जीत का स्वाद चखाया! वे इंदौर के क्षेत्र-4 से भी चुनाव जीत चुके हैं और इंदौर विधानसभा के महू से भी! यानी इंदौर के तीन विधानसभा से वे चुनाव जीते हैं और उनके बेटे आकाश ने इन तीनों के अलावा चौथे विधानसभा (क्षेत्र-3) से चुनाव जीतकर उनके सही उत्तराधिकारी होने का सबूत दिया। 
  कैलाश विजयवर्गीय ने भाजपा को पहली बार इंदौर के महापौर पर कुर्सी पर भी काबिज करवाया! इस नेता की खासियत ही यह है कि पार्टी इन्हें जो लक्ष्य देती है, वहाँ ये 'कमल' खिला देते हैं! इन्हें पार्टी ने पहली बार इंदौर से बाहर हरियाणा में आजमाया था! 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए कैलाश विजयवर्गीय को चुनाव प्रभारी बनाया! इसमें भी नतीजा भाजपा के पक्ष में रहा और वहाँ पार्टी बहुमत से चुनाव जीती! इसके बाद उन्हें पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया। हरियाणा में उनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर ही पार्टी ने उन्हें पश्चिम बंगाल कमान सौंपी थी! वे यहाँ भी लोकसभा चुनाव में रणनीति बनाने और उसे क्रियान्वित करने में सफल रहे! अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती विधानसभा चुनाव है, जिसके लिए उन्होंने अपना सबकुछ झोंक दिया! पश्चिम बंगाल में भाजपा को जो सफलता मिलेगी, वो पार्टी की होगी, पर इसके पीछे रणनीतिकार तो इंदौरी 'भाई' ही होगा।  
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Friday, March 19, 2021

राज्यपाल पद की गरिमा और सत्यपाल मलिक उवाच!

 

 मेघालय के राज्यपाल ने अपने पद की मर्यादा सीमा रेखा की कई बार लांघा है। अब उन्होंने 'किसान आंदोलन' का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सामने किसानों की बात रखी है। ये भी कहा कि इन्हें खाली हाथ मत भेजना, न इन पर बल प्रयोग करना। ये खाली हाथ गए, तो 300 साल तक नहीं भूलेंगे। सिखों को मैं जानता हूँ,  इंदिरा गांधी ने भी 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के बाद अपने यहां एक माह तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया था। उन्हें अहसास था कि मैंने इनके अकाल तख्त को नुकसान पहुँचाया है, ये मुझे छोड़ेंगे नहीं! सत्यपाल मलिक ने तो यहाँ तक कहा कि उन्होंने किसान नेता राकेश टिकैत की गिरफ्तारी भी रुकवाई।  

- हेमंत पाल 
   देश में राज्यपाल का पद निरपेक्ष माना जाता है! वह न तो खुलकर किसी का पक्ष लेता है और न विरोध करता है। राज्य में उसकी भूमिका केंद्र सरकार के प्रतिनिधि की होती है और मर्यादा की खातिर उसे राजनीति से दूर रहना पड़ता है। लेकिन, कुछ सालों से राज्यपालों की राजनीतिक प्रतिबद्धता सामने आने लगी है। यदि राज्यपाल के पद पर कोई नेता बैठा है, तो उसका अपनी पार्टी के प्रति झुकाव साफ़ नजर आता है! राज्यपाल अब न सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी करने लगे, बल्कि विवादों में भी फंसने से भी नहीं चूकते! क्योंकि, अब वो रास्ता भी खुला है, जो राज्यपाल की कुर्सी पर बैठे किसी व्यक्ति को राजनीति के गलियारे में ले जाता है। ताजा प्रसंग मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से जोड़कर देखा जा रहा है, जिन्होंने खुलकर 'किसान आंदोलन' का समर्थन करके केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। सत्यपाल मलिक ने भाजपा में लम्बा समय बिताया, पर उनको जानने वाले उन्हें आज भी 'सोशलिस्ट' विचारधारा वाला व्यक्ति मानते हैं। समाजवादी आंदोलन का हिस्सा रहे मलिक राजनीति में हवा का रुख समझने में भी माहिर समझे जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने जो भी बोला उसके पीछे कोई गूढ़ अर्थ छुपा है! 
    अपने घर लौटे सत्यपाल मलिक ने साफ़ कहा कि केंद्र सरकार एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को कानूनी मान्यता दे, तो किसान मान जाएंगे और अपना आंदोलन ख़त्म कर देंगे। उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार गलत रास्ता अपना रही है, वो किसानों को हरा नहीं पाएगी। सत्ता के अहंकार में किसानों के साथ ज्यादती न करें, उनकी जायज मांगे मान लेनी चाहिए। उनका यह भी कहना था, कि राज्यपाल का काम चुप रहना है, लेकिन मेरी आदत है कि जो सामने हो रहा है, उस पर बोलूं! लेकिन, मलिक ने जो बोला, वो उनके लिए मुसीबत का कारण बन सकता है! अमूमन कोई राज्यपाल केंद्र सरकार की नीतियों पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करते! लेकिन, सत्यपाल मलिक की आदत रही है कि वे अकसर राज्यपाल पद की मर्यादा की सीमा लांघते रहते हैं। जब वे जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे, तब भी उन्होंने ऐसी कई टिप्पणियां की, जिस पर उंगलियां उठी! शायद यही कारण था कि उन्हें कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद अपेक्षाकृत छोटे राज्य मेघालय भेज दिया गया।    
    उत्तर प्रदेश के अपने घर अमीनगर सराय आए सत्यपाल मालिक ने अपने सम्मान में हुए अभिनंदन समारोह में केंद्र सरकार के लिए यह तल्ख़ टिप्पणियां की। उन्होंने कहा कि मैंने किसान आंदोलन के बारे में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सामने किसानों की बात रखी है। ये भी कहा कि इन्हें खाली हाथ मत भेजना, न इन पर बल प्रयोग करना। ये खाली हाथ गए, तो 300 साल तक नहीं भूलेंगे। सिखों को मैं जानता हूँ,  इंदिरा गांधी ने भी ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद अपने यहां एक माह तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया था। क्योंकि, उन्हें अहसास था कि मैंने इनके अकाल तख्त को नुकसान पहुँचाया है, ये मुझे छोड़ेंगे नहीं! सत्यपाल मलिक ने तो यहाँ तक कहा कि उन्होंने किसान नेता राकेश टिकैत की गिरफ्तारी भी रुकवाई। मालिक ने अपने आपको किसान परिवार का बताते हुए ये भी कहा कि मैं किसान परिवार से हूँ, इसलिए उनकी तकलीफ समझता हूं।
    सत्यपाल मलिक का पूरा भाषण राजनीति से प्रेरित होने के साथ केंद्र को सलाह देने वाला रहा। वे मंच पर ये भूल गए थे वे जिस पद पर हैं, उसकी मर्यादा है और वे उसका पालन करने के लिए बाध्य हैं। उन्होंने आगे की योजनाओं का खुलासा करते हुए, ये भी कहा कि किसानों की समस्या हल कराने के लिए मुझे जहां भी जाना पड़ेगा, मैं जाऊंगा। मलिक ने कहा कि एक कानून का प्रचार किया जा रहा है कि किसान अपनी फसल देश में कहीं भी बेच सकता है! लेकिन, उनका तर्क था कि ये कानून 15 साल से है। लेकिन, जब उत्तर प्रदेश का किसान हरियाणा में फसल बेचने जाता है, तो उस पर हमला होता है।
   एक बात तो स्पष्ट है कि सत्यपाल मालिक ने जो बोला वो गलती से या भावना के अतिरेक में नहीं बोला। ये भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी पुरानी सोशलिस्ट विचारधारा उन पर हावी हो गई, इसलिए वे किसानों के समर्थन में उतर आए! संभव है कि राजभवन से फिर राजनीति में आने की कोशिश में हों और ऐसी टिप्पणी करने वे अपना मंतव्य स्पष्ट करने में लगे हों। वे बरसों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़े रहे हैं और शायद फिर वहीं की राजनीति में हाथ आजमाना चाहते हों! यही कारण है कि उन्होंने किसान आंदोलन का समर्थन करके अपने लिए जनाधार खड़ा करने की कोशिश तो की है। उनमें  इतनी समझ तो है, कि इस सार्वजनिक बयान के बाद वे भाजपा की आँख की किरकिरी बन सकते हैं और इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। मनमर्जी चलाने के लिए बदनाम किरण बेदी को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब उन्हें राज्यपाल की कुर्सी से चलता कर दिया गया।
   राजनीति की किताब में सत्यपाल मलिक की वाचालता के किस्से कम नहीं हैं। वे जब तक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे, उन्होंने कई बार बोलने में मर्यादा लांघी! एक बार उन्होंने कहा था कि आतंकवादी सुरक्षाकर्मियों और बेगुनाहों लोगों की हत्या करना बंद करें! इसके बजाए उन लोगों को निशाना बनाएं, जिन्होंने सालों तक कश्मीर की दौलत लूटी है। उनके इस बयान ने भी तूल पकड़ा था। तब इस टिप्पणी पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि सत्यपाल मलिक को दिल्ली में अपनी प्रतिष्ठा की पड़ताल करनी चाहिए। यह शख्स जो एक जिम्मेदार संवैधानिक पद पर है, वह आतंकवादियों को भ्रष्ट समझे जाने वाले नेताओं की हत्या के लिए कह रहा है। बाद में सत्यपाल मलिक ने इस बयान पर बहुत लीपा-पोती भी की। ये भी कहा कि मैंने जो कुछ भी कहा, वह गुस्से में कहा। राज्यपाल होने के नाते मुझे इससे बचना चाहिए था। आश्चर्य नहीं कि सत्यपाल मलिक अपनी आदत को दोहराते हुए, फिर कह दें कि 'मैंने तो गुस्से में किसान आंदोलन का समर्थन कर दिया था।' लेकिन, उन्होंने हवा का रूख भांप लिया है! उन्हें पता है कि राजनीति की पतंग वहीं ज्यादा ऊँची उड़ती है, जिस दिशा में हवा होती है।  
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