Sunday, October 14, 2018

'मी-टू' का शोर छोटी मछलियों तक ही?


    देश में जब से 'मी-टू' का बवाल मचा है, बॉलीवुड से रोज ऐसी नई खबरें आना शुरू हो गई! इन हरकतों में जबरदस्ती किस करने से लेकर हाथ पकड़ने जैसी बातें शामिल हैं। देखा जाए तो बाॅलीवुड के लिए यह व्यवहार नई बात नहीं है। इस बार यह 'मी-टू' के नए नाम के साथ जगजाहिर हुआ है, वरना काॅस्टिंग काउच के नाम से ऐसी घटनाएं गाहे-बगाहे सामने आती रही हैं। 'मी-टू' के तूफान को सुनामी बनाने में मीडिया का भी बड़ा योगदान है। सारे टीवी चैनलों ने जिनके पास सुर्खियां बटोरने वाले विषयों का अकाल पड़ा था, उन्होंने बात का बतंगड बनाकर इसे राष्ट्रीय मसला बना दिया। जबकि, बच्चा-बच्चा जानता है कि फिल्मी दुनिया में लेन-देन की यह परम्परा उतनी ही पुरानी है, जितनी यह इंडस्ट्री।
    जिन लोगों ने भी 'मी-टू' से जुड़ी खबरें पढ़ी या सुनी होगी, उन्होंने एक बात नोट की होगी कि इसमें आरोप तो नामी-गिरामी लोगों पर लगे! लेकिन, आरोप लगाने वाली हस्तियां उतनी नामी गिरामी नहीं हैं। कई अभिनेत्रियों का नाम तो लोगों ने पहली बार 'मी-टू' के वाक़ये में ही सुना होगा। सवाल उठता है कि क्या फिल्मी दुनिया में इस तरह की घटनाएं केवल छोटी अभिनेत्रियों के साथ ही होती है? हकीकत तो यह है कि तमाम बड़ी अभिनेत्रियां भी कभी न कभी ऐसे दुर्व्यवहार की शिकार हो चुकी है। लेकिन, इस मामले में वे अभी तक खामोश हैं। मजे की बात है कि जिन लोगों ने तथाकथित रूप से उनके साथ 'मी-टू' कैटेगरी का सलूक किया गया है। यदि कंगना रनौत को छोड़ दिया जाए, तो 'मी-टू' पर किसी बड़ी अभिनेत्री की आप-बीती सामने नहीं आई। जबकि, हेमा मालिनी, रेखा, जीनत अमान और माधुरी दीक्षित भी इस तरह की हरकतों का शिकार हो चुकी हैं।
    यासीर उस्मान ने अपनी पुस्तक 'रेखा : अनटोल्ड स्टोरी' में लिखा है कि फिल्म 'अनजान सफर' के समय रेखा की उम्र केवल 15 साल की थी। फिल्म के निर्देशक राजा नवाथे और नायक विश्वजीत ने एक चाल चली। निर्देशक चाहते थे कि रेखा को बिना बताए विश्वजीत उसे अपनी तरफ खींचकर जकड़ ले और उसके होंठों पर जबरदस्त चुंबन कर ले। कैमरा चालूू होती ही विश्वजीत ने रेखा को जोर से अपनी और खींचा और पूरे पांच मिनट तक उसके होंठों को चूमते रहे। इस हरकत से रेखा रोती रही और पूरी यूनिट बेशरमों की तरह ठहाके लगाते रही। देखा जाए तो यह एक तरह से यौन शोषण का ही मामला है। लेकिन, रेखा यह सब सहकर आज भी खामोश हैं।
    'जानेमन' के सेट पर नशे में धुत्त प्रेमनाथ ने हेमामालिनी को बूरी तरह से जकड़ लिया था। हेमा मज़बूरी में चिल्लाती रही, तब देवआनंद ने आगे बढ़कर उसे प्रेमनाथ के शिकंजे से छुडवाया था। ये वैसी ही घटना है, जिसे आज की चंद अभिनेत्रियां 'मी-टू' का नाम दे रही है। इस मामले में हेमा मालिनी आज भी चुप है। जीनत अमान की हालत तो और भी खराब हुई थी। कंगना रनौत आज शादी के वादे और उसके बाद जिस शोषण की बात कर रही है, वह घटना जीनत की जिंदगी में बुरे सपने की तरह घट चुकी है। रितिक रोशन के ही ससुर संजय खान ने जीनत अमान से निकाह करने के बाद उसका शोषण किया और 'अब्दुल्ला' के सेट पर उसे बुरी तरह पीटा भी। लेकिन, आज क्या जीनत अमान उस घटना का जिक्र करेगी? देश के रईस खानदान की बहू और पूर्व अभिनेत्री टीना मुनीम के गाल पर चोट का एक निशान देखा जा सकता है। यह निशान उन्हें राजेश खन्ना ने दिया था। क्या टीना अपने आपको 'मी-टू का शिकार कहलाने का साहस दिखा सकती है? एक पार्टी में नशे में चूर राजकपूर ने देव आनंद को नीचा दिखाने के लिए जीनत अमान को पकड़कर उसका चुंबन लिया था। इसके बाद ही देवआनंद और जीनत के रिश्ते में दरार आई थी। लेकिन, तब से अब तक ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं किया गया।
     यह ठीक है किसी भी क्षेत्र में महिलाओं का यौन शोषण नहीं होना चाहिए। आज मेनका गाँधी इस तरह की घटनाओं के लिए एक कमेटी बनाने का वादा कर रही है। जबकि, वे खुद देश के एक बडे राजनीतिक परिवार के युवराज के शोषण का शिकार बन सकती थी। उनके फौजी पिता यदि संजय गांधी के सामने बंदूक लेकर नहीं आते, तो शायद मेनका भी देश की अनगिनत लडकियों की तरह संजय गांधी की अय्याशी का शिकार बन सकती थी। हो सकता इस बात की टीस उनके दिल में आज भी हो! लेकिन, शायद तमाम बड़ी हस्तियों की तरह उनकी भी यह मजबूरी हो सकती है कि 'मी-टू जैसे वाकये का शिकार होने के बावजूद वे इसका समर्थन तो कर सकती हैं, लेकिन खुद अपने आपको इसका विक्टिम मानने का साहस नहीं जुटा पा रही!
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आरक्षण विरोध की आवाज बनने लगी 'सपाक्स समाज' पार्टी


मध्यप्रदेश में 'सपाक्स समाज' के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिद्वंदी पार्टियां ये प्रचारित करने में लगी हैं कि ये थके, चुके और रिटायर्ड लोगों का संगठन है। इस पार्टी में ज्यादातर वे सरकारी अफसर हैं, जो नौकरी के बाद अब पार्ट टाइम राजनीति करना चाहते हैं। जबकि, जमीनी तौर पर देखा जाये तो ये सच नहीं है। यदि इन लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा होती, तो उनके लिए किसी भी पार्टी से जुड़कर राजनीति करना ज्यादा आसान होता। कई अफसरों ने ये किया भी है! लेकिन, यदि नई विचारधारा वाली रजनीतिक पार्टी की परिकल्पना की गई है, तो उसके पीछे कोई लक्ष्य निर्धारित है। जब 'सपाक्स' गैर-आरक्षित सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों का संगठन था, तब भी उसने पदोन्नति में आरक्षण के फैसले का विरोध किया! अब, जबकि इस संगठन के गर्भ से राजनीतिक पार्टी जन्म ले चुकी है, उसके सोच, संकल्प और विचारों में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। बल्कि, इस पार्टी ने आरक्षण खिलाफ लोगों में दबे आक्रोश को बाहर लाने का काम किया है।                   
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- हेमंत पाल
    ध्यप्रदेश में चुनाव आचार संहिता की घोषणा के साथ ही राजनीतिक संघर्ष की दुंदुभि बज गई! सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव के रण क्षेत्र में अपनी सेनाओं की जमावट करना शुरू कर दिया। प्रदेश की तासीर के मुताबिक यहाँ कांग्रेस और भाजपा परंपरागत प्रतिद्वंदी रहे हैं। बीच-बीच में तीसरे विकल्प के हल्के झटके जरूर आते रहे! लेकिन, कोई भी स्थाई रूप से तीसरा विकल्प नहीं बन सका। इस बार भी समझा जा रहा था कि कांग्रेस और भाजपा ही किला लड़ाएंगे, पर माहौल बदलता नजर आ रहा है। कर्मचारियों-अधिकारियों के संगठन 'सपाक्स' से जन्मी राजनीतिक पार्टी 'सपाक्स समाज' ने मालवा-निमाड़ में दोनों प्रमुख पार्टियों को घेर सा दिया है। इस पार्टी का असर कुछ ऐसा है, जो चार साल पहले दिल्ली में 'आम आदमी पार्टी' (आप) का महसूस किया गया था। प्रशासन की भट्टी में तपे अफसरों की बहुलता वाली इस पार्टी को आधार देने के लिए जिस तरह मेहनत की जा रही है, वो पार्टी की गंभीरता दर्शाती है।      
   'सपाक्स समाज' के बढ़ते असर ने सबसे ज्यादा भाजपा को प्रभावित किया है। क्योंकि, प्रदेश में 15 साल से काबिज भाजपा से लोगों की नाराजी जगजाहिर है। भाजपा को लग रहा है कि उसके प्रति मतदाताओं का गुस्सा 'सपाक्स समाज' को फ़ायदा दे सकता है। कांग्रेस 15 साल से सत्ता से बेदखल है और उसके पास खोने को कुछ है भी नहीं! यही कारण है कि पश्चिमी मध्यप्रदेश में 'सपाक्स समाज' को उम्मीद की किरण की तरह देखा जा रहा है। कांग्रेस के प्रति लोगों की नाराजी अपेक्षाकृत कम हैं। लम्बे समय से सत्ता में न होने से कांग्रेस पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती। जो लोग भाजपा से नाराज हैं और कांग्रेस को भी वोट देना नहीं चाहते, उनके लिए 'सपाक्स समाज' एक सार्थक विकल्प है। सत्ता से नाराजी के बहाव से 'सपाक्स समाज' फायदे में रहेगा। 
  कांग्रेस और भाजपा के सामने इसे तीसरा प्रतिद्वंदी समझे जाने के पीछे बड़ा कारण इससे जुड़े लोग भी है। कांग्रेस और भाजपा भले ही 'सपाक्स समाज' के पदाधिकारियों को रिटायर्ड, चुके और थके कहकर प्रचारित कर रहे हों, पर असलियत ये है कि यही वे लोग हैं, जिन्होंने सत्ता की खूबियों और खामियों को काफी नजदीक से देखा है! ये बरसों तक सत्ता और प्रशासन की कड़ी रहे हैं, इसलिए वे जानते हैं कि जनता से कैसे जुड़ा जाना चाहिए! इन लोगों ने सत्ता के दम्भ में चूर नेताओं के सामने जनता की बेबसी और मज़बूरी को भी महसूस किया है। इसके अलावा इनका सबसे सशक्त पक्ष है, इन्हें मिल रहा सवर्णों का सहयोग! एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ जब कांग्रेस और भाजपा के मुँह बंद है 'सपाक्स समाज' ही मुखरता से बोल पा रही है। इस पार्टी ने लोगों में आरक्षण के खिलाफ दबी चिंगारी को भी आवाज देने का काम किया है। अभी तक आरक्षण के प्रति नाराजी होते हुए भी लोगों के पास ऐसा कोई माध्यम नहीं था, जहाँ वे इस विरोध को व्यक्त कर सकें। 'सपाक्स समाज' ने उस विरोध को अपना झंडा बनाया है, जो कहाँ-कहाँ असर करेगा कहा नहीं जा सकता।  
   'सपाक्स समाज' की अपनी राजनीतिक विचारधारा ही भाजपा और कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी परेशानी का कारण है। एससी-एसटी कानून में संशोधन का विरोध करने की हिम्मत इन दोनों ही पार्टियों में नहीं है। केंद्र में काबिज भाजपा सरकार ही एससी-एसटी एक्ट में संशोधन की जनक है, इसलिए वो तो इसके खिलाफ बोलने से रहे! कांग्रेस भी मूक होकर इसके पक्ष में हैं। क्योंकि, संविधान संशोधन के खिलाफ बोलने से मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग उसके हाथ से निकल सकता है। 'सपाक्स समाज' का प्लस पॉइंट यही है कि इस पार्टी का जन्म ही इस विरोध के गर्भ से हुआ है। विधानसभा चुनाव में 'सपाक्स समाज' की आरक्षण विरोधी विचारधारा ही उसकी ताकत है। लेकिन, 'सपाक्स' के सदस्य सरकारी नौकरी में हैं, जो खुलकर राजनीति करने मैदान में नहीं आ सकते! इसलिए 'सपाक्स समाज' पार्टी को राजनीतिक पार्टी बनाकर मैदान में उतारा जा रहा है। पर, अब 'सपाक्स समाज' अकेला नहीं दिख रहा, करणी सेना, गुर्जर संगठन समेत कई सामाजिक संगठनों ने उसके साथ जुड़कर ताकत बढ़ाने का काम किया है।     
   'सपाक्स समाज' के प्रभाव वाले मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ में 66 सीटें हैं। इनमें 35 सामान्य, शेष 31 सीटें अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। सामान्य वाली 35 सीटों पर 'सपाक्स समाज' ने सेंध लगाने की कोशिश की है और काफी हद तक वे सफल भी रहे हैं। खरगोन, खंडवा, उज्जैन, धार और इंदौर में इसे मिल रहा समर्थन राजनीतिक रूप से विधानसभा चुनाव में असर दिखाएगा ये तय है। निमाड़ और मालवा में कई प्रभावशाली लोगों का 'सपाक्स समाज' से जुड़ना भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के लिए भी चिंता की बात है। चार साल पहले दिल्ली में 'आप' को भी गंभीरता से नही लिया गया था। लेकिन, इसी पार्टी में भाजपा की हवा निकाल दी थी! आश्चर्य नहीं कि तीसरे विकल्प के रूप में 'सपाक्स समाज' भी कुछ ऐसा ही चमत्कार कर दे! राजनीति में कुछ भी संभव है! वह भी ऐसी स्थिति में जब माहौल में कोई आँधी, लहार और तूफ़ान न हो! 2013 के विधानसभा चुनाव में मालवा इलाके में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को 10.76% वोट ज्यादा मिले थे। जबकि, निमाड़ में यह अंतर 8.33% था। इस बार कांग्रेस मालवा-निमाड़ को साधने की पूरी कोशिश में है। उन्हें उम्मीद है कि किसान आंदोलन के बाद भाजपा के खिलाफ लोगों में जो नाराजी पनपी है, इसका फायदा उन्हें विधानसभा चुनाव में मिल सकता है। लेकिन, 'सपाक्स समाज' की मौजूदगी दोनों के समीकरण बिगाड़ दे तो आश्चर्य नहीं!    
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Saturday, October 6, 2018

बदलते दौर का अक्स है ये नया सिनेमा


- हेमंत पाल 
    दलते हुए दौर में यदि सबसे पहले कहीं बदलाव देखना हो, तो सिनेमा में देखिए! ज़माने को तो बदलने में बरसों लग जाते हैं, पर सिनेमा का चेहरा चंद दिनों में अपने आपको बदल लेता है। एक ढर्रे पर चलता हुआ सिनेमा, एक झटके में नया दिखाई देने लगता है। दर्शकों की पसंद को सिनेमा ही बहुत जल्द समझता है! फिल्मकार जानते हैं कि दर्शकों की पसंद की प्लेट में अब क्या परोसा जाना चाहिए! फिलहाल जो दौर आया है, वह इसी बदलाव का संकेत है। बॉलीवुड ने इस सच को जरा देर से स्वीकारा, पर अब वो नया दौर दिखाई देने लगा है। बीते चंद सालों में फिल्मों की कहानियों में जो परिवर्तन आया, वो आने वाले कल के मनोरंजन का ही संकेत है।  
   घिसे-पिटे पुराने ढर्रे वाली रोमांटिक कहानियों, फूहड़ कॉमेडी और फिजूल की मारधाड़ वाली फ़िल्में अब दर्शकों की पसंद से बाहर हो चुकी है। दर्शक अब कुछ नया देखना चाहता है। उसे सार्थक मनोरंजन चाहिए न कि खोखली संवेदनों वाली रोतली फ़िल्में! वो जिंदगी की असली कहानियां देखना चाहता है, जिसमें चुनौतियां भी हों और उनका निराकरण भी सामने आए! उसे कुछ ऐसा देखना है, जो उसकी कल्पना से बाहर की बात न हो! साफ़ कहें तो दर्शक का रुख अच्छी कहानियों पर केंद्रित है, न कि निरर्थक मनोरंजन में! इस सच्चाई को नकारा भी कैसे जा सकता है कि फिल्म की कहानी ही सब कुछ होती है। एक्टिंग तो हर एक्टर कर ही लेता है, बशर्ते कहानी में दम हो!  
    सिनेमा के माध्यम से यदि पिछड़े सोच और पुरातन मान्यताओं पर चोट की जा रही है, तो सिनेमा को भी इसी दिशा में सोचना होगा। सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने में सिनेमा हमेशा ही एक अच्छा माध्यम रहा है, तो उसे ये प्रयास करना भी चाहिए। पिछले कुछ दिनों में इस तरह की जो भी फ़िल्में बनी, उन्हें सराहा भी इसीलिए गया कि उनमें कुछ नयापन है। समाज में वर्जनाओं की कमी नहीं है, पर जब तक सिनेमा के जरिए उन पर चोट नहीं होगी, समाज में नई सोच भी जागृत नहीं होगी। हिचकी, शुभ मंगल सावधान, पैडमेन, टॉयलेट : एक प्रेम कथा, न्यूटन, अलीगढ़ के बाद 'सुई-धागा' और 'बत्ती गुल-मीटर चालू' जैसी फ़िल्में इसी बदलाव का प्रतीक हैं। इनमें ऐसी कई फ़िल्में हैं जो वर्जित विषय पर बनी, पर उनका कहीं कोई विरोध नहीं हुआ और वे खूब चलीं! ऐसी फिल्मों को महज मनोरंजन नहीं, बल्कि गंभीर विषय के रूप में लिया गया।
    'सुई-धागा' में हथकरघा के आधार बनाकर कुटीर उद्योग के महत्व को दर्शाया गया है और अंततः इस श्रम की जीत भी दिखाई गई! इशारों में चीन के बढ़ते बाजार के बीच स्वदेशी की जरुरत को भी महसूस कराया गया है। 'बत्ती गुल मीटर चालू' बिजली चोरी और बिजली कंपनियों की मनमानी पर बनी फिल्म है। कौन सोच सकता था कि कभी कोई ऐसे विषयों पर भी फिल्म बनाने का साहस कर सकेगा? 'टॉयलेट : एक प्रेम कथा' और 'पैडमेन' तो समाज की पुरातन सोच को बदलने वाली ऐसी फ़िल्में हैं, जिनके बारे में कुछ साल पहले तक तो सोचा भी नहीं गया होगा?  
   अच्छी कहानियों की खोज में अब समाज के ऐसे चरित्रों पर भी बायोपिक बनाई जाने लगी, जिनके बारे में कभी आयडिया नहीं आया होगा। बड़े खिलाड़ियों और एक्टरों पर तो बायोपिक बनाना सामान्य बात है, पर अब तो सहादत हसन मंटो और आनंद कुमार पर भी बायोपिक बनाई जा रही है। आनंद कुमार आईआईटी के लिए हर साल अभावग्रस्त पर प्रतिभाशाली 30 बच्चों को पढ़ाते हैं। ऐसे ही साहित्य की दुनिया के सआदत हसन मंटो की जिंदगी पर भी फिल्म बनाई गई। थोड़ा इंतजार किया जाए, तो अभी और भी ऐसे चेहरे सामने आएंगे, जिनकी प्रतिभा और समाज के प्रति उनके योगदान को अभी तक सामने आने का मौका नहीं मिल पाया है। 
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Monday, October 1, 2018

कुछ अलग ही मूड में है इस बार मालवा और निमाड़!


   मध्य प्रदेश में मालवा-निमाड़ का राजनीतिक मूड बहुत कुछ तय करता है। ये वो इलाका है जहाँ के बारे में कहा जाता है कि जो भी पार्टी यहाँ आगे रहती है, वही प्रदेश में सरकार बनाती है। लम्बे समय से ये इलाका हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव में रहा है, इसलिए यहाँ भाजपा हमेशा ही ताकतवर बनी रही। भाजपा और संघ से जुड़े कई नेता मालवा से ही निकले हैं। जातीय हिसाब से भी ये इलाका अजीब सा सामंजस्य रखता है। यहाँ आदिवासी सीटें भी हैं और सामान्य भी। अभी तक आदिवासियों को कांग्रेस समर्थित माना जाता था। पर, पिछले विधानसभा चुनाव में मालवा-निमाड़ की अधिकांश आदिवासी सीटें भाजपा ने जीती थीं। यहाँ कुल 66 सीटें हैं, जिनमें 50 सीटें मालवा में हैं और 16 निमाड़ में। पिछले चुनाव में कांग्रेस के हाथ सिर्फ 9 सीटें लगी थीं। लेकिन, इस बार यहाँ का मिजाज अलग ही नजर आ रहा है।  

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- हेमंत पाल

    मध्यप्रदेश का राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से लगने वाला पश्चिमी क्षेत्र मालवा-निमाड़ कहलाता है। ये अभी तक तीसरी राजनीतिक शक्ति के प्रभाव से मुक्त रहा है। लेकिन, इस बार के विधानसभा चुनाव का माहौल कुछ अलग है। इसलिए कहा नहीं जा सकता कि ऊंट किस करवट बैठेगा? क्योंकि, आदिवासियों के बीच 'जयस' ने, सवर्णों-पिछड़ों में 'सपाक्स' राजनीतिक पार्टी ने, पंचायतों में 'भारतीय पंचायत पार्टी' ने सेंध लगा दी है। पाटीदारों के स्वयंभू नेता हार्दिक पटेल भी चुनाव में अपना असर दिखाएंगे ये तय है। प्रशासनिक रूप से इंदौर और उज्जैन संभागों वाले इस इलाके में विधानसभा की 66 सीटें आती हैं। 2013 के चुनाव में मालवा की 50 सीटों में से 45 पर भाजपा जीती थी! जबकि, कांग्रेस केवल 4 सीटें ही जीत पाई थी। वहीं, थांदला सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीता था। निमाड़ की 16 में से 11 सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों ने जीत हांसिल की थी। कांग्रेस के हाथ महज 5 सीट ही लग थी। इस बार के विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पार्टियां पूरी जोश से मैदान में हैं। अपनी पैठ बनाने के लिए सभी पार्टियां ने अलग-अलग रणनीति के साथ तैयारी की है। यह भाजपा का गढ़ है और 15 साल से पार्टी इसी इलाके में अपनी पकड़ के बल पर प्रदेश पर राज करती आ रही है। कहा जाता है कि जो मालवा-निमाड़ में जो जीत हांसिल करता है, उसे प्रदेश पर राज करने का मौका मिलता है। दरअसल, ये इलाका भाजपा के लिए साख और नाक का सवाल है। आपातकाल के पहले तक ये कांग्रेस का गढ़ रहा। लेकिन, उसके बाद से यहां भाजपा की जड़ें मजबूत होती गई! 
    मालवा-निमाड़ की 66 में से 35 सामान्य, 22 अनुसूचित जनजाति-22 की और 9 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। अभी भाजपा के पास सामान्य वाली 32, अजजा की 16 (थांदला के निर्दलीय विधायक समेत) और अजा की 9 सीटें हैं। जबकि, कांग्रेस के पास 3 सामान्य, 6 अजजा सीटें हैं। अजा की कोई सीट पिछली बार कांग्रेस नहीं जीत सकी थी। यहाँ की 12 सीटें शहरी इलाके में हैं, 11 अर्द्ध शहरी इलाकों में और 46 सीट ग्रामीण क्षेत्र की हैं। इनमें से कांग्रेस के जीतू पटवारी सिर्फ राऊ वाली अर्द्धशहरी सीट जीत सके थे। इसके अलावा सभी सीटें भाजपा के पास हैं। 2013 के चुनाव में मालवा इलाके में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को 10.76% वोट ज्यादा मिले थे, निमाड़ में यह अंतर 8.33% था। लेकिन, इस बार कांग्रेस मालवा-निमाड़ को साधने की पूरी कोशिश में है। उन्हें उम्मीद है कि किसान आंदोलन के बाद भाजपा के खिलाफ लोगों में जो नाराजी पनपी है, इसका फायदा उन्हें विधानसभा चुनाव में मिल सकता है।      
    प्रदेश और देश की राजनीति के ज्यादातर संघ और भाजपा के बड़े नेता इसी मालवा-निमाड़ से आते हैं। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे, पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र सखलेचा, कैलाश जोशी के अलावा सत्यनारायण जटिया, विक्रम वर्मा, नंदकुमार सिंह चौहान और लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन, केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत भी यहीं से हैं। संघ में नंबर दो की हैसियत रखने वाले सुरेश भैय्याजी जोशी भी मालवा से ही हैं। जबकि, कांग्रेस की तरफ से सुभाष यादव और बाद में उनके बेटे अरुण यादव ने ही निमाड़ का प्रतिनिधित्व किया है। मालवा से कांग्रेस के नेता तो कई हुए, पर जिन्हें याद रखा जाए ऐसे नेताओं में आदिवासी इलाके से शिवभानुसिंह सोलंकी और जमुना देवी ही रही। ये दोनों प्रदेश के उपमुख्यमंत्री तो रहे, पर मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे दूर ही रही। लेकिन, ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव को आज भी यहाँ नाकारा नहीं जा सकता! इसका कारण ये कि मालवा का एक बड़ा क्षेत्र 'सिंधिया रियासत' का हिस्सा रहा है।  
  इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा 'जय आदिवासी संगठन' (जयस) और 'सपाक्स' के राजनीति में उतरने से भी समीकरण बदलने के आसार हैं। ये दोनों राजनीतिक पार्टियाँ नहीं, बल्कि संगठन हैं, पर अब इन्होंने राजनीति के लिए मैदान में उतरने की तैयारी की है। दोनों के ही कर्ताधर्ता मालवा से हैं। 'जयस' के डॉ हीरालाल अलावा झाबुआ से हैं और 'सपाक्स' के हीरालाल त्रिवेदी बड़नगर (उज्जैन) के हैं। डॉ अलावा दिल्ली के एम्स जैसा संस्थान छोड़कर आदिवासी युवाओं में अलख जगाने आ गए! जबकि, हीरालाल त्रिवेदी आईएएस से रिटायरमेंट के बाद सवर्णों और पिछड़ों को एकजुट करके 'सपाक्स' को खड़ा करने में सफल हुए। 'जयस' जनजातीय समुदाय के दबदबे वाली प्रदेशभर की 80 सीटों पर अपनी ताकत आजमाने की तैयारी में हैं। 'अबकी बार, आदिवासी सरकार' का नारा देने वाला 'जयस' यदि आदिवासी वोट काटने में सफल हुआ तो इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिलना तय समझा जा रहा है। उधर, 'सपाक्स' ने भी भोपाल में अपने सफल जमावड़े के बाद सभी 230 सीटों पर लड़ने का एलान कर दिया। दिल्ली से जुड़े पंचायत पदाधिकारियों के राष्ट्रीय संगठन ने भी 'भारतीय पंचायत पार्टी' (बीपीपी) बनाकर घुसपैठ शुरू की है। नरेश यादव की अगुवाई में इसे चुनाव आयोग ने रजिस्टर्ड कर 'पोस्ट बॉक्स' चुनाव चिन्ह भी आवंटित किया है। संगठन से राजनीतिक पार्टी बनकर जयस, सपाक्स और बीपीपी क्या रंग दिखाते हैं, ये चुनाव से पहले स्पष्ट हो जाएगा।     
    गुजरात चुनाव में भाजपा के लिए परेशानी खड़ी करने वाले पाटीदार नेता व 'किसान क्रांति सेना' के अध्यक्ष  हार्दिक पटेल मध्यप्रदेश में भी भाजपा के लिए मुसीबत बन सकते हैं। उनकी मौजूदगी पाटीदार समाज  प्रभावित करती है और मालवा-निमाड़ में इस समाज का असर है। प्रदेश की 58 सीटों को पाटीदार वोट प्रभावित करते हैं। जो ज्यादातर मालवा-निमाड़ सहित रीवा और सागर संभाग में रहते हैं। प्रदेश में 1 करोड़ 42 लाख लोग पाटीदार समाज के हैं। हार्दिक ने घोषणा की है, कि वे प्रदेशभर में आमसभा करेंगे। 17 दिन की जनजागृति यात्रा भी निकालेंगे, ये यात्रा 14 दिन मालवा-निमाड़ में रहेगी। घोषित तौर पर तो वे कांग्रेस या भाजपा के साथ होने की बात नहीं करते! लेकिन, सब जानते है कि वे हमेशा भाजपा के खिलाफ ही खड़े दिखाई देते है। 
    कृषि और व्यापार का केंद्र माने जाने वाले मालवा-निमाड़ पर भाजपा कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रही है। क्योंकि, भाजपा को किसानों की नाराजी का भय सता रहा है, जिसके पीछे मंदसौर गोलीकांड है। देखा जाए तो प्रदेश में किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा जोर मालवा-निमाड़ में ही था। मंदसौर में हुए गोलीकांड में किसानों की मौत को कांग्रेस काफी हद तक भुनाने में सफल भी रही। इसके अलावा शिवराज सरकार पर उनकी ही पार्टी के लोग यह आरोप भी लगाते आए हैं कि पाँच साल से मालवा-निमाड़ को उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। इंदौर, धार, देवास, शाजापुर, झाबुआ, रतलाम, मंदसौर, नीमच, और आलीराजपुर ऐसे जिले हैं जहां से इस बार सरकार में एक भी मंत्री नहीं रहा। जबकि, निमाड़ का प्रतिनिधित्व करने के लिए तीन मंत्री हैं। अब देखना ये है कि मालवा-निमाड़ का खामोश मतदाता के दिल में क्या छुपा है? 
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Saturday, September 29, 2018

नायिका का नया ताना-बाना


- हेमंत पाल

   पुरानी फिल्म 'खानदान' में एक गीत था 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम ही देवता हो!' ये गीत सुनील दत्त और नूतन पर फिल्माया गया था। वास्तव में ये गीत पत्नी का पति के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक माना जा सकता है। लेकिन, आज किसी फिल्म में इस तरह का कोई गीत हो, तो क्या दर्शक उसे पसंद करेंगे? पत्नी का पति से प्रेम अपनी जगह है, पर क्या नायिका के समर्पण का ये पूजनीय अंदाज सही है! जब ये फिल्म बनी, तब सामाजिक दृष्टिकोण से इसे स्वीकार लिया गया हो, पर आज के संदर्भों में सिर्फ पति को पूजनीय मान लेने से बात नहीं बनती! समाज में भी और फिल्मों में भी आज ऐसी पत्नी या नायिका को पसंद किया जाता है, जो प्रैक्टिकल हो! वास्तव में हिंदी फिल्मों में नायक के किरदार उतने नहीं बदले, जितने नायिकाओं के! आजादी के बाद जब समाज मनोरंजन के लिए थोड़ा अभ्यस्त हुआ तो फिल्मों में नायिका को नायक की सहयोगी की तरह दिखाया जाने लगा। नायक की सहयोगी की तरह नहीं!  
    फिल्मों में नायिका को आज भी एक जरुरी फैक्टर की तरह रखा जाता है। इसलिए कि सौ साल से ज्यादा पुरानी हिंदी फिल्मों की अधिकांश कहानियाँ नायक केंद्रित होती हैं। सालभर में इक्का-दुक्का फ़िल्में ही ऐसी नजर आती है, जिसका केंद्रीय पात्र नायिका हो! इस साल की उन चुनिंदा फिल्मों में 'सुई-धागा' को गिना जा सकता है, जिसकी नायिका परेशान पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उसकी मदद करती है। उसका आत्मविश्वास जगाकर उसे सहारा देती है। लेकिन, ऐसी फ़िल्में बनाने का साहस कितने निर्माता कर पाते हैं? फिल्मकारों को लगता है कि नायक के सिक्स-पैक और मारधाड़ ही दर्शकों की डिमांड है! वे कहानी में नायिका की जगह तो रखते हैं, पर उसके कंधों पर इतना भरोसा नहीं करते कि वो फिल्म को बॉक्स ऑफिस की संकरी गली से निकाल सकेगी! जब 'दामिनी' आई थी, तो किसने सोचा था कि ये फिल्म के नायक सनी देओल के अदालत में चीख-चीखकर बोले गए संवाद से कहीं ज्यादा मीनाक्षी शेषाद्री के किरदार के कारण पसंद की जाएगी?   
   दरअसल, बॉक्स ऑफिस को लेकर फिल्मकारों का अज्ञात भय ही नायिका को परम्पराओं की देहरी पार नहीं करने देता! हर बार नायिका में सहनशील और परम्परावादी नारी की छवि दिखने की कोशिश की जाती है। इसी वजह से नायिकाओं ने लंबे अरसे तक अपनी महिमा मंडित छवि को बनाए रखने के लिए त्याग, ममता और आंसुओं से भीगी इमेज को बनाए रखा। लेकिन, अब जरुरत है 'सुई धागा' वाली जैसी नायिका ममता की, जो पति को नौकरी छोड़कर अपना काम शुरू करने के लिए प्रेरित करती है और अपनी कोशिश में सफल भी होती है। 'अभिमान' वाली जया भादुड़ी जैसे किरदार अब बीते कल की बात हो गई! जया का वो किरदार उस वक़्त की मांग थी, जो पति को आगे बढ़ने का मौका देने के लिए अपना कॅरियर त्याग देती है। आज फिल्मों को न तो ऐसी कहानियों की जरुरत है और ऐसे किरदारों की! 
   बेआवाज फिल्मों से 'अछूत कन्या' और 'मदर इंडिया' के बाद से सुजाता, बंदिनी, दिल एक मंदिर और 'मैं चुप रहूंगी' तक नायिकाएं परदे पर सबकी प्रिय बनी रहीं। इन नायिकाओं ने मध्यवर्गीय पुरातन परिवार के दमघोटूं माहौल में अपनी किस्मत को कोसते हुए 'मैं चुप रहूंगी' जैसी फिल्मों का दौर भी देखा है। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगें’ से लेकर ‘हम दिल दे चुके सनम’ तक में करवा चौथ का माहौल भी देखा है। लेकिन, सिनेमा का इतिहास बताता है कि हर दौर में ऐसी नायिकाएं भी सामने आईं हैं, जिन्होंने इस मिथक को तोड़ा है। समाज के लिए वे मुक्ति का आख्यान हैं, लेकिन अभी इनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक ही हो पाईं! पर, अब यंग इंडिया की सोच बदल रही है। इसलिए महिलाओं के प्रति भी सोच बदलने की जरूरत है। लड़की है, तो खाना बनाएगी और लड़का है तो काम करेगा। ये विचारधारा अब नहीं चलती! समाज और लोगों की सोच में बदलाव आया है, लेकिन अभी फिल्मों में बहुत कुछ बदलना बाकी है।
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उम्र की मोहताज नहीं मोहब्बत!


- हेमंत पाल

    'बिग बॉस' में इस बार सबसे अधिक चर्चा अनूप जलोटा की हो रही है। वजह यह कि वे खुद से 37 साल की कम उम्र की महबूबा के साथ शो का हिस्सा बने हैं। जसलीन के साथ अपने रिश्ते का खुलासा उन्होंने इस शो पर आकर ही किया। हालांकि, दोनों लंबे समय से साथ थे। कहते हैं कि प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती! समाज के अन्य सभी समूहों की तरह बाॅलीवुड के कुछ नायक और नायिकाएं भी इस सिद्धांत का अनुसरण करते आए हैं। 
  कम वय के लडके का उम्रदराज महिला पर दिल आ जाना या उम्रदराज पुरूष का कम वय की लडकी से आंखे लडाने जैसे विषय पर फिल्में भी बनी और फिल्मकारों ने पर्दे से बाहर भी इस परम्परा को बरकरार रखा। राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का पहला भाग इसी विषय पर आधारित था, जिसमें कम वय का छात्र अपनी उम्र से दुगनी वय की टीचर के प्रेम में पड़ जाता है। इस विषय को उठाकर राजकपूर ने जिस खूबसूरती से दर्शकों को गुदगुदाने का कमाल किया इसका समाधान भी मनोज कुमार ने बड़ी संजीदगी से किया था। 'मेरा नाम जोकर' के इस भाग के राजू यानी ऋषि कपूर ने इस विषय पर बनी फिल्म 'दूसरा आदमी' में अपनी उम्र से बड़ी राखी से इश्क लड़ाया था। अंग्रेजी फिल्म 'फोर्टी कैरेट' पर बनी इस फिल्म में राखी और ऋषि कपूर के बीच उम्र के अंतराल और एक दूसरे के प्रति लगाव को यश चौपड़ा ने संगीतमय अंदाज में फिल्माया था। जिसे दर्शकों ने बेहद पसंद भी किया था। गुरू शिष्य के बीच प्रेम पर बनी फिल्मों में भी इसी तरह के संबंधों को दिखाया गया! देवआनंद और टीना मुनीम अभिनीत हाॅलीवूड की 'मायफेयर लेडी' पर आधारित फिल्म 'मनपसंद' ऐसी ही फिल्म थी। 
    उम्र के अंतर पर बनी अधिकांश फिल्मों में इस तरह के प्रेम संबंधों को नादानी या आकर्षण कहकर पुकारा जाता रहा है। किसी भी फिल्म ने इस तरह के कच्ची-पक्की उम्र के संबंध की वकालत नहीं की। इसके ठीक उलट फिल्मी सितारों ने उम्र की इस बेमैल खिचड़ी को खूब पकाया और खाया है। बाॅलीवुड में इस तरह की हरकतें करने में आईएस जौहर और उनकी ही तरह के कलाकार किशोर कुमार काफी मशहूर रहे हैं! उन्होंने पता नहीं किस अंदाज से अपने बेटे-बेटी की उम्र की लडकियों को आकर्षित करने में सफलता पाई। आईएस जौहर अपनी बेटी की उम्र की बीबी ब्याह कर लाए, तो अमित कुमार का सेहरा बंधने की उम्र में किशोर कुमार ने लीना चंदावरकर से शादी की थी। बाद में कबीर बेदी और विनोद खन्ना ने भी अपने डेशिंग अवतार का फायदा उठाकर आधी उम्र की लडकियों से शादियाॅं रचाई। कबीर बेदी ने तो 67 साल की उम्र में ब्रिटेन में जन्मी परवीन दुसानी से 2005 में शादी की उस समय उनकी बेटी पूजा बेदी अपनी नई माॅं से बड़ी थी। दक्षिण भारत में एनटीआर ने भी जीवन के उत्तरार्ध में शादी करके सभी को चौंकाया था। 
  हिन्दी फिल्मों में दिलीप कुमार की जितनी ज्यादा लोकप्रियता है, उनकी शादी ने भी उतनी ही लोकप्रियता बटोरी! 45 साल की उम्र में जिस समय दिलीप कुमार की शादी हुई, उनकी बेगम सायरा बानू की उम्र महज 22 साल थी। उनके बीच 23 साल का अंतर था। दिलीप कुमार के पदचिन्हों पर चलते हुए संजय दत्त ने जब मान्या से शादी की, तो मान्या उनसे 19 साल छोटी थी। हालांकि, इससे पहले संजय दो बार पहले भी शादी कर चुके हैं। दिलीप कुमार को आदर्श मानने वाले धर्मेन्द्र ने भी अपने से 13 साल छोटी हेमा मालिनी से निकाह कर साबित किया कि मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज है। 13 साल के अंतर वाली जोड़ियों में मीरा कपूर और उनसे 13 साल बड़े शाहिद कपूर का नाम भी शामिल है। इस दौड़ में शाहिद की पूर्व प्रेमिका करीना कपूर और सैफ अली की जोड़ी थोड़ा पीछे रह गई, क्योंकि उनके बीच 11 साल का अंतर है। 
    जिन दिनों राजेश खन्ना की शादी हुई देश की लाखों लडकियां उनकी दीवानी थी। लेकिन, राजेश खन्ना ने लाखों युवकों की धडकन डिम्पल कापडिया से शादी कर सभी को झटका दिया था। जिस समय राजेश खन्ना ने डिम्पल के साथ सात फेरे लिए उनकी उम्र महज 16 साल थी और राजेश खन्ना 15 साल बड़े थे। यह भी संयोग कि बात है कि बॉलीवुड में मियां-बीबी की उम्र में 9 साल के अंतर वाली जोड़ियां सबसे ज्यादा है। यदि आमिर खान अपनी दूसरी बीबी किरण राव से 9 साल बड़े हैं तो श्री देवी के पति बोनी कपूर भी उनसे 9 साल बडे थे! रितेश देशमुख और उनकी बीबी जेनिलिया के बीच भी 9 साल का ही अंतर है।
   ऐसी बात नहीं कि बाॅलीवुड के नायकों ने ही अपने से छोटी उम्र का दुल्हा चुना है। कुछ नायिकाओं ने इस परम्परा को उलटा भी है। यदि नरगिस अपने पति सुनील दत्त से बड़ी थी, तो अभिषेक बच्चन भी अपनी बीबी ऐश्वर्या राय से छोटे हैं। लेकिन, इनके बीच उम्र का फासला बहुत ज्यादा नहीं है। अलबत्ता कोरियोग्राफर और डायरेक्टर फराह खान ने अपने से 8 साल छोटे शिरिष कुंदर से शादी करके तीन बच्चों को एक साथ जन्म दिया। हाल ही में नेहा धूपिया ने अपने से छोटे अंगद बेदी से शादी कर साबित कर दिया कि प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती!  
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बॉलीवुड के गणपति बप्पा!


हेमंत पाल 

   इन दिनों पूरे देश में गणेशोत्सव मनाया जा रहा है। लेकिन, मुंबई और बॉलीवुड में गणेशजी का ज्यादा ही महत्व है। सामाजिक समरसता के मकसद से मनाए जाने वाले इस पर्व ने न केवल समाज में अपनी छाप छोड़ी, बल्कि बॉलीवुड के फिल्मकारों को भी फिल्म की गति को आगे बढ़ाने का एक विषय दिया! गणेशोत्सव की धूम को फिल्मों में उत्सवी माहौल बनाने से लगाकर रोमाॅंच और मारधाड़ सहित अलग-अलग घटनाक्रमों में शामिल किया जाता रहा है। कई फिल्में ऐसी हैं, जो गणेश की कथा-कहानियों पर आधारित है, तो बप्पा के गीतों ने कई फिल्मों को दर्शनीय बनाने का काम भी किया है।
   याद किया जाए, तो बॉलीवुड के सितारों में गणेश उत्सव के प्रसंग मिथुन चक्रवर्ती के साथ आरंभ हुए! बाद में इस परम्परा को सलमान खान से लगाकर  रितिक रोशन ने आगे बढ़ाया और अब वरूण धवन इसे अपनी फिल्मों से बढ़ा रहे हैं। मिथुन चक्रवर्ती और अमजद खान अभिनीत फिल्म 'हम से बढकर कौन' का टाइटल सांग ही गणेशोत्सव के दृश्यों को जोड़कर फिल्माया गया था। इस फिल्म के गीत 'देवा हो देवा गणपति देवा को आज भी गणेशोत्सव के विभिन्न पंडालों में सुबह-शाम सुना जा सकता है। यूं तो सलमान खान की प्रभुदेवा निर्देशित फिल्म 'वांटेड' एक एक्शन थ्रिलर थी, लेकिन इसमें सलमान खान ने जमकर मेरा ही जलवा गाकर अपना जलवा बिखेरा था। रितिक रोशन की फिल्म 'अग्निपथ' में भी गणेशोत्सव का रोमांचक फिल्मांकन किया गया था। 1990 में अपराधिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में संगीतकार अजय-अतुल की जोड़ी ने 'देवा श्री गणेशा' की जो धुन तैयार की, वह अपने आपमें यादगार बन गई है! इसके साथ रितिक रोशन का जोशीला डांस देखने वालों को चमत्कृत कर देता है। 
    महेश मांजरेकर ने अपनी फिल्म 'वास्तव' में गणेशजी का नया अवतार दिखाया था। संजय दत्त अभिनीत इस फिल्म में बताया गया था कि गणेशजी बालसुलभ देवता ही नहीं, बल्कि दुश्मनों की फौज को नष्टकर दंड देने वाले सख्त देवता भी है। फिल्म में रवीन्द्र साठे द्वारा गया गया गीत 'सिंदूर लाल ...' अपराधियों के पतन को रेखांकित करने में कामयाब रहा है। वरूण धवन को फिल्मों में आए ज्यादा समय नहीं हुआ, लेकिन बप्पा ने उन्हें फिल्म दर फिल्म अपनी महिमा गाने का अवसर प्रदान किया है। प्रभुदेवा ने 'वांटेड' के बाद एक बार फिर 'एबीसीडी-2' में गणेशजी की वंदना करने के लिए 'हे गणराया' का सहारा लिया, जिसमें दिव्य कुमार ने अपने प्राण फूंके तो वरूण धवन ने इसमें खास रंग भरे हैं। इस गीत की शूटिंग के दौरान सेट पर किसी को मांसाहार खाकर आने या जूते पहनकर आने की इजाजत नहीं थी। वरूण धवन ने अपनी फिल्म 'जुड़वाँ-2' में एक बार फिर बप्पा के प्रति अपनी श्रृद्धा प्रकट की। शाहरूख खान ने भी अपनी फिल्म 'डाॅन-2' में 'मोरया रे बप्पा मोरया रे' गाकर अपनी आदरांजलि दी। 
   बप्पा के आगमन को फिल्मों में उत्सवी माहौल तैयार करने में मदद की, तो उनकी बिदाई ने फिल्मों में उदासी को माहौल को प्रदर्शित करने में सफलता पाई है। सुनील दत्त की फिल्म 'दर्द का रिश्ता' में अपनी बेटी की बीमारी और उसकी जुदाई की आशंका को सुनील दत्त ने बप्पा की बिदाई के साथ जोड़कर दर्शकों की आंखों को भिगोया है। मेहुल कुमार की फिल्म 'आंसू बने अंगारे' में राजेश रोशन ने 'अगले बरस तू जल्दी आ' को माधुरी दीक्षित के गरिमामय नृत्य के साथ परदे पर उतारा। अजय देवगन और परेश रावल की फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे' में भी गणेश विसर्जन की भीड़ का अच्छा इस्तेमाल किया गया है। देखा जाए तो पूरी फिल्मी दुनिया ही गणपति की मुरीद है। हर छोटा-बड़ा सितारा पूरे आदर औेर सम्मान के साथ इन दिनों अपने यहां गणेशजी को स्थापित कर नंगे पैर चलकर उसका विसर्जन करता है। इसमें जाति धर्म जैसी बात आड़े नहीं आती! यही कारण है कि यदि बॉलीवुड में सलमान के गणेशजी लोकप्रिय हैं, तो नाना पाटेकर और जाॅन अब्राहम के गणेशजी भी याद किए जाते हैं। 
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