Monday, November 19, 2018

भाजपा में क्या नाराज नेताओं को मनाने वाले नहीं बचे?


- हेमंत पाल 

 
    इस बार का विधानसभा चुनाव कई मामलों में कुछ अलग है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों में टिकट के लालायित नेताओं की संख्या इतनी ज्यादा रही कि स्थिति बगावत तक पहुँच गई! भाजपा ने 53 बागी उम्मीदवारों को पार्टी से बाहर कर दिया। क्योंकि, इन सभी ने पार्टी के नियम-कायदों का पालन नहीं किया और अधिकृत उम्मीदवार सामने ख़म ठोंककर खड़े हो गए! भाजपा ने इन बागियों को मनाने की कोशिश भी की, पर इसका कोई असर नहीं हुआ। बगावत के आरोप में पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया, सरताज सिंह, केएल अग्रवाल, तीन पूर्व विधायक और एक पूर्व महापौर को बाहर कर दिया गया। मसला ये है कि क्या भाजपा में अब ऐसे कद्दावर नेता नहीं बचे, जो बागियों को मना सकें या फिर इस असंतोष को दूर करने की कोशिश ही नहीं की गई? भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा असंतोष का सामना नहीं करना पड़ा! कांग्रेस ने सिर्फ 12 सीटों पर बगावत झेली।
000 

   असंतोष हर पार्टी में होता है! ये स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, सवाल ये कि असंतुष्ट नेताओं को भाजपा ने मनाया क्यों नहीं? भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले मध्यप्रदेश में क्या अब ऐसे नेता नहीं बचे, जो रूठों को मनाने का दम रखते हों? इस चुनाव में ऐसे नेता की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है! भाजपा का हर कार्यकर्ता इस कमी को समझ भी रहा है। टिकट वितरण के बाद पार्टी में बड़े पैमाने पर हुई बगावत ने पार्टी की रीति-नीतियों में आए बदलाव को भी उजागर किया। प्रदेश के हर जिले में टिकट बंटवारे के बाद नाराजी नजर आई! क्योंकि, पंद्रह साल सरकार में रहने का बाद भाजपा का चेहरा अब पूरी तरह बदल गया है। 2003 के चुनाव के समय पार्टी में ऐसे नेता थे, जो नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं को आसानी से समझाइश देकर शांत करके काम पर लगा देते थे। 
  पिछले तीन चुनावों में पार्टी के संकट मोचक रहे अनिल माधव दवे की इस चुनाव में काफी महसूस की गई! दवे ने तीन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी के वॉर रूम में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनके बाद पार्टी में इस जगह को कोई और नहीं ले पाया। उनसे पहले यही काम कुशाभाऊ ठाकरे किया करते थे। पर, अब न तो अनिल माधव दवे हैं और न कुशाभाऊ ठाकरे! आज पार्टी कार्यकर्ता इस बात को जानते हैं कि दवे की रणनीति के कारण ही 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में बगावत को उभरने से पहले ही ठंडा कर दिया गया था। यहाँ तक कि नाराजी कमरे से बाहर भी नहीं आ सकी! वास्तव में इस बार की बगावत का मुख्य कारण ये रहा कि पार्टी का टिकट चाहने वाले कार्यकर्ताओं को बड़े नेताओं की बात पर भरोसा नहीं रहा! बागियों को जिस तरह के प्रलोभन देकर चुनाव से अलग किया जाता है, वो फार्मूला इस बार फेल हो गया। इन बागियों का कहना है कि पिछले चुनावों में जिस तरह के वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए!  
   विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी होते ही भाजपा में बग़ावतियों ने मोर्चा संभाल लिया। बुंदेलखंड, विंध्य, महाकौशल और भोपाल इलाके में ये बागी काफी असरदार भी हैं। पार्टी के लिए दमोह सीट सबसे बड़ी चिंता बन गई। यहाँ से वित्त मंत्री जयंत मलैया भाजपा उम्मीदवार हैं। जबकि, भाजपा से बागी रामकृष्ण कुसमरिया ने दमोह और पास की पथरिया सीट से निर्दलीय नामांकन भरा है। कुसमरिया पांच बार सांसद और दो बार विधायक रहे हैं। कुसमरिया ने जयंत मलैया पर टिकट कटवाने का आरोप लगाया! मलैया ने कहा कि इस इलाके में अपना अकेले का दबदबा चाहते हैं, जिसके चलते मुझे टिकट नहीं दिया गया। हमने यहां पार्टी को खड़ा करने के लिए डाकुओं से लड़ाई लड़ी, अब हम जैसे लोगों को ही हाशिए पर डाल दिया! सरकार में कृषि मंत्री रहे कुसमरिया ने कहा कि दमोह से जयंत मलैया के खिलाफ खड़े होकर वे पार्टी की ही मदद कर रहे हैं! क्योंकि, दमोह और पथरिया दोनों सीटें भाजपा हार रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव जीतकर वे भाजपा का ही समर्थन करेंगे। 
  मध्यप्रदेश में भाजपा को लगातार दो चुनाव जिताने वाले शिवराजसिंह चौहान के सामने पार्टी की बगावत बड़ी चुनौती है। इस चुनौती का अंदाजा टिकट का फैसला होने से पहले ही होने लगा था। विरोध और बगावत की आवाजें भाजपा मुख्यालय में सुनाई देने लगी थीं। वहाँ होने वाली खुलेआम नारेबाजी को रोकने का साहस किसी में नहीं था। इसलिए कि पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता या तो खुद टिकट की जुगाड़ में थे या अपने बेटे, पत्नी या परिवार के किसी सदस्य के लिए कोशिश में लगे थे। जबकि, प्रदेश में भाजपा की पहचान अनुशासित कार्यकर्ताओं से है। यहाँ फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने की परंपरा रही है। लेकिन, इस बार का नजारा बदला हुआ लगा! कार्यकर्ताओं में असंतोष पहले भी कई बार दिखाई दिया, पर वो कभी विद्रोह की सीमा तक नहीं पहुंचा! 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष नरेंद्र तोमर ने असंतोष को किनारे करने में अहम भूमिका अदा की थी। इस बार नरेंद्र तोमर की भूमिका उस रूप में नहीं थी और अध्यक्ष राकेश सिंह को इस तरह की स्थितियों से निपटने का अनुभव नहीं है। पिछले एक दशक में प्रदेश में भाजपा के कई ऐसे नेता हाशिए पर चले गए, जो ऐसे हालात निपटने माहिर थे। 
       चुनाव में कार्यकर्ताओं नाराजी को बाबूलाल गौर और सरताज सिंह ने ज्यादा हवा दी। इन दोनों को शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल से दो साल पहले ही उम्रदराज होने का हवाला देकर मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था। कहा गया था कि पार्टी ने 70 पार कर चुके नेताओं को घर भेजने का निर्णय लिया है। लेकिन, जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भोपाल आए तो उन्होंने 70 साल वाले इस फार्मूले को नकार दिया। उसके बाद से ही शिवराजसिंह चौहान इन दोनों नेताओं के निशाने पर थे। चुनाव के समय इन दोनों नेताओं को विश्वास था कि पार्टी उनके साथ न्याय करेगी! टिकट को लेकर बाबूलाल गौर का भरोसा इसलिए बढ़ा था कि कुछ दिन पहले नरेंद्र मोदी ने भोपाल में मंच पर ही उनसे हाथ मिलाकर कहा था 'गौर साहब एक बार और!' इसके बाद ये कयास लगाए जाने लगे थे कि अब गोविंदपुरा सीट से बाबूलाल गौर को टिकट मिलना तय है! लेकिन, ऐसा नहीं हुआ तो वे कोप भवन में चले गए। पार्टी की पहली सूची आने के बाद तो गौर और सरताज सिंह का गुस्सा फट पड़ा! लेकिन, अंततः गौर की बहू को टिकट देकर मामले  ठंडा किया गया! लेकिन, सरताज सिंह की नाराजी पर जब भाजपा ने कान नहीं धरे, तो कांग्रेस ने उन्हें साधकर होशंगाबाद से अपना उम्मीदवार बना दिया।   
  बरसों बाद इन चुनावों से ये सच पुख्ता हो गया कि राजनीति में संभावनाएं अनंत हैं। यहां कब, कहाँ और कौन कैसे पलटी मार दे, कहा नहीं जा सकता। यहाँ किसी भी क्षण बाजी पलट सकती है। कौन सोच सकता था कि शिवराजसिंह के साले संजय मसानी जीजा जी की पार्टी से बगावत करके कांग्रेस की गोद में बैठ जाएंगे? लेकिन, ये अनपेक्षित घटना भी हुई! कांग्रेस के लिए संजय मसानी अभी तक विवादास्पद हुआ करते थे। उनपर कर आरोप भी लगाए गए थे! लेकिन, कांग्रेस में आते ही वे दूध से धुलकर पवित्र हो गए। उनकी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी कांग्रेस के निशाने पर थी। अजय सिंह ने तो यहाँ तक आरोप लगाया था कि संजय मसानी ने फर्जी दस्तावेजों से मध्यप्रदेश में अपनी कंपनी का रजिस्ट्रशन करवाया था। उन पर अवैध खनन, फिल्मों में बेनामी धन लगाने जैसे कई आरोप लगाए गए। लेकिन, अब सब कुछ कबूल करते हुए कांग्रेस ने उन्हें वारासिवनी से टिकट दे दिया। अब सबकी नजरें चुनाव के नतीजों पर टिकी है कि भाजपा में हुआ उभरा यह असंतोष कहाँ, कैसा असर दिखाता है!   
------------------------------------------------------

Sunday, November 18, 2018

इतिहास बचेगा या कुछ रचेगा?


- हेमंत पाल

    भारतीय इतिहास की पृष्ठभूमि वाली दो अहम फिल्में इस साल आईं! 'पद्मावत' और 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान।' तीसरी फिल्म 'मणिकर्णिका' भी इसी साल आने वाली थी, जो अगले साल तक बढ़ गई। वास्तव में 'पद्मावत' को 2017 में रिलीज होना था, परंतु इससे जुड़े विवादों के कारण ये फिल्म खिंचकर इस साल रिलीज हुई। 'पद्मावत' के साथ जो कुछ हुआ उससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या फिल्मकारों को वास्तव में इतिहास के अँधेरे में झांकने का जोखिम उठाना चाहिए? क्योंकि, सेंसर सिर्फ बोर्ड नहीं रह गया है? अब तो गली, मोहल्लों तक के लोग और जेबी संगठन भी कैंची लेकर फिल्मों को कतरना चाहते हैं। 'पद्मावत' बॉलीवुड में 200 करोड़ रुपए के बजट से बनी पहली फिल्म थी। लेकिन, उसका भविष्य लम्बे समय तक अधर रहा! 
   'रंगून' और 'सिमरन' के फ्लॉप होने के बाद कंगना रनौत को अब अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म 'मणिकर्णिका' से बहुत उम्मीदें हैं। क्योंकि, यह फिल्म देश की आजादी से जुड़ी एक महान योद्धा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बायोपिक है। 'पद्मावत' के विरोध देखते हुए इसके लेखक, निर्देशक की टीम ने लक्ष्मीबाई से जुड़े इतिहास को काफी खंगाला! ये जरुरी भी था, क्योंकि अब लोग किसी भी ऐतिहासिक फिल्म को महज फिल्म की तरह नहीं देखते! बल्कि, उससे जुड़े सामाजिक दृष्टिकोण को भी परखते हैं। इसके बाद भी 'मणिकर्णिका' पर से खतरा टला नहीं है। फिल्म के ट्रेलर को लेकर भी उंगली उठ चुकी है।
  एक और ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनना शुरू हुई है, जो 1897 में तत्कालीन भारत-अफगान सीमा पर सरागढ़ी में हुई लड़ाई पर आधारित है। ये फिल्म राजकुमार संतोषी और रणदीप हुड्डा को लेकर बना रहे हैं। यह फिल्म दस हजार अफगानों के खिलाफ 21 भारतीय जवानों के भीषण युद्ध की दास्तान है। हाल ही में रिलीज हुई आमिर खान और अमिताभ बच्चन की फिल्म 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता थी, पर फिल्म ने बहुत निराश किया। इस फिल्म में भारत में 18वीं सदी के ठगों के कारनामे हैं। फिल्म के प्रति दर्शकों की उत्सुकता का प्रमाण ये है कि फिल्म ने पहले ही दिन सर्वाधिक 50 करोड़ की कमाई की! लेकिन, बाद में फिल्म ने पानी नहीं माँगा! 
   फिल्मकारों के नजरिए की बात की जाए, तो कहा जा सकता है कि सिनेमा कलापूर्ण अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, अतः फिल्मकार को थोड़ी छूट लेने का अधिकार होना चाहिए। यह तर्क सही भी है। समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक फिल्में उस समय के इतिहास को नहीं, बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में एक कहानी को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती हैं। इसलिए प्रस्तुति का स्तर सिनेमा को देखने का मुख्य आधार होना चाहिए। लेकिन, ऐसा कहने से इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता कि ऐतिहासिक, इतिहास की बड़ी घटनाओं या किरदारों पर फिल्म बनाने के मामले में हिंदी सिनेमा इतना स्तरहीन और पिछड़ा क्यों है? एक भी ऐसी फिल्म का नाम याद नहीं किया जा सकता, जो पूरी तरह इतिहास या किसी महान चरित्र पर आधारित हो। चेतन आनंद की 'हकीकत' (1964) और एस राम शर्मा की 'शहीद' (1965) ही ऐसी फ़िल्में थीं, जो इस मापदंड के काफी करीब मानी जाती हैं। इसके बाद जेपी दत्ता की 'बॉर्डर' (1997) एक बेहतरीन फिल्म थी, जिसमें पाकिस्तान से जंग लड़ रही एक बटालियन की कहानी को बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया गया था। 
 आशुतोष गोवारिकर की 'मोहन जो दाड़ो' और टीनू सुरेश देसाई की 'रुस्तम' भी ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्में थीं। जहां गोवारिकर ने हजारों साल पहले की हड़प्पा सभ्यता में अपनी कहानी को बुना था। वहीं देसाई ने 1950 के दशक की एक बहुचर्चित अपराध कथा को परदे पर चित्रित किया। कथानक, अभिनय और प्रस्तुति को लेकर इन दोनों फिल्मों को जो भी प्रशंसा या आलोचना मिली है, वह तो अलग विषय है, परंतु कथा के कालखंड और इतिहास के साथ समुचित न्याय नहीं करने के लिए दोनों की बड़ी निंदा हुई! 
 पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक घटनाएं और लोक में प्रचलित कहानियां हमेशा ही सिनेमा के पसंदीदा विषय रहे हैं। पहली हिंदुस्तानी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) को दादा साहेब फाल्के ने बनाया था। अर्देशर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' (1931) में बनाई। सबसे लोकप्रिय फिल्में 'मुगले आजम' (1960) में के आसिफ ने बनाई। एस राम ने 1965 में 'शहीद' और आशुतोष गोवारीकर ने 2001 में 'लगान' बनाई! एसएस राजामौली ने 2015 में 'बाहुबली' का खाका भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की तरह बना। ऐसे में हातिम ताई (1990) और 'बाहुबली' जैसी फिल्में 'मोहन जो दाड़ो' या 'मुगले आजम' से कहीं ज्यादा ईमानदार फिल्में रहीं, जो एक अनजाने मिथकीय वातावरण में ले जाकर दर्शकों का मनोरंजन तो करती हैं! ऐसी फ़िल्में इतिहास का प्रतिनिधि होने का ढोंग भी नहीं रचती! अब, जबकि तकनीक है, दर्शक हैं, धन है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे फिल्मकार इतिहास को लेकर अधिक संवेदनशील होंगे और विगत को ईमानदारी से पेश करने का जोखिम उठाएंगे। 
----------------------------------------------------------------

Monday, October 29, 2018

टिकट के दावेदारों ने समीकरण गड़बड़ाए



  इन दिनों मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियाँ अपने-अपने उम्मीदवारों के कटघरे में खड़े हैं! दोनों पार्टियों को समझ नहीं आ रहा कि उनके लिए चुनाव जीतने वाला चेहरा कौनसा है! चुनाव से पहले लगा था कि दोनों के लिए उम्मीदवारों का चयन ज्यादा बड़ी मुश्किल नहीं बनेगा। भाजपा ने दर्जनभर सर्वे जरिए पता कर ही लिया था, कि उसका कौनसा विधायक फिर चुनाव लड़ने लायक है और कौनसा नाकारा! इसलिए जो नाकारा है, वो किनारे कर दिया जाएगा और उसकी जगह कोई नया आ जाएगा! उधर, कांग्रेस को तो 180 करीब नए चेहरे ढूँढना है, इसलिए उसके लिए भी ज्यादा मुश्किल नहीं आएगी! पर, जमीन पर ये सारे अनुमान गलत साबित हुए! दोनों पार्टियों में टिकट को लेकर जमकर घमासान मचा है। 100 से ज्यादा विधायकों के टिकट काटने का दावा करने वाली भाजपा को एक-एक टिकट काटने में पसीना आ गया। ऐसे में चुनाव समिति को समझ नहीं आ रहा, कि किसका टिकट काटे? उधर, कांग्रेस इस मुसीबत में है कि दावेदारों की भीड़ में किसे टिकट दें! जीत के दावों के बीच कौनसा चेहरा वास्तव में दांव लगाने लायक है! दोनों के सामने मुश्किल एक ही है कि किसे टिकट दें और किसे नहीं! टिकट चाहने वालों की भीड़ ने कांग्रेस, भाजपा की सारी चुनावी रणनीति पर पानी फेर दिया। दिल्ली से लगाकर भोपाल तक चले मंथनों के कई दौर भी धरे रह गए। 
 000 

- हेमंत पाल

    मलनाथ जब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे, तब दावा किया गया था कि अब कांग्रेस एक है। पार्टी में गुटबाजी और 'अपना आदमीवाद' की राजनीति बिल्कुल ख़त्म हो गई। इस बार टिकट उसी मिलेगा, जो वास्तव में जीतने की कूबत रखता होगा! ये बात कहने और सुनने में बहुत अच्छी लगती है। कांग्रेस का ये दावा भी अच्छा लगा, पर ऐसा हुआ नहीं! एक-एक सीट के लिए खींचतान चल रही है। विधायकों की 45-50 सीटें छोड़ जाएं, तो बची हुई अधिकांश सीटों पर घमासान मचा है। न तो कोई टिकट के दावेदार पार्टी की बात समझने को तैयार हैं, न पार्टी के नेता आपसी गुटबाजी से उभरे! टीवी सर्वे पर कांग्रेस की संभावित जीत ने पार्टी को इतना उत्साहित कर दिया कि पार्टी के सारे आका अपने मोहरों पर दांव लगाने पर तुले हैं। हर बड़ा नेता इस कोशिश में है कि जीत वाली सीटों पर उसके ही समर्थक को टिकट मिले ताकि उसका पलड़ा भारी रहे। लेकिन, इस पूरी कवायद में दिग्विजय सिंह की 'संगत में पंगत' वाली रणनीति कामयाब होती दिखाई दे रही है। वही एक नेता हैं, जिन्हें पूरे प्रदेश की जमीनी हकीकत पता है।    
     कांग्रेस ने भले ही दिग्विजय सिंह को किनारे करने का नाटक किया हो, पर टिकटों की इस मारामारी से ये बात सामने आ गई कि अभी उनकी ताकत चुकी नहीं है। यदि वे नेपथ्य में हैं, तो ये भी उनकी ही कोई रणनीति का कोई हिस्सा है। उन्होंने इस बार स्वयं ही चुप रहने और मंच पर दिखाई न देने की भूमिका चुनी है। दिग्विजय सिंह के पीछे रहने का ही नतीजा है, कि कई सीटों पर बिना किसी विवाद के सहमति बनने की बातें कही गई! कांग्रेस का दावा है कि शुरुआती 70 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम अंतिम रूप से तय हो गए हैं। लेकिन, ऐसा सभी सीटों के लिए हो सकेगा, ऐसा नहीं लगता। पिछले चुनावों की ही तरह इस बार भी अंतिम समय तक नाम उलझे रहेंगे। पहले माना जा रहा था कि टिकटों का फैसला कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की पसंद-नापसंद पर निर्भर करेगा, पर ऐसा नहीं हुआ और न ऐसा होना संभव था। दिग्विजय सिंह पार्टी में एक बड़ा फैक्टर है, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
   ये बात सभी जानते हैं कि प्रदेश की कांग्रेसी सियासत तीन-चार नेताओं के प्रभाव क्षेत्र में बंटी है। ग्वालियर-चंबल इलाके में ज्योतिरादित्य सिंधिया, महाकौशल में कमलनाथ और मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड में दिग्विजय सिंह का दबदबा है। जबकि, बघेलखंड में नेता विपक्ष अजय सिंह का असर है। पहले इन नेताओं के प्रति निष्ठा रखने वाले लोगों को ही टिकट मिलते थे! लेकिन, इस बार कहा जा रहा था कि अब यह फॉर्मूला अब नहीं चलेगा! एजेंसियों से कराए जा रहे कई सर्वे पर भी पार्टी काफी हद तक भरोसा कर रही है। यही प्रयोग गुजरात और कर्नाटक में भी किया गया था, जिसके अच्छे नतीजे रहे। पार्टी ने इस बार के सर्वे का सैंपल साइज भी हर विधानसभा में 5 हज़ार वोटर्स से बढ़ाकर 15 हज़ार कर दिया था। इसलिए कि जो आकलन निकले वो ज्यादा सटीक हो। क्योंकि, इस बार सर्वे के नतीजों को ही टिकट का आधार बनाया गया है। उम्मीदवारी का अंतिम फैसला किसी नेता के प्रति निष्ठा से नहीं होगा! कांग्रेस की योजना भाजपा से पहले ही टिकट फाइनल करने की थी। लेकिन, ऐसा हो नहीं सका। पहले यहाँ तक कहा गया था कि जिन 50 सीटों पर कांग्रेस पिछले पाँच विधानसभा से चुनाव नहीं जीत सकी थी, वहाँ उम्मीदवारों की घोषणा सितंबर में कर दी जाएगी! लेकिन, ये काम अक्टूबर अंत तक भी नहीं हुआ! 
  भाजपा में भी हालात काबू में नहीं हैं। वहाँ भी एक-एक नाम पर जमकर छिड़ी हुई है। पार्टी ने भले ही पहले 100 से ज्यादा टिकट काटने की बात कह दी हो, लेकिन अब ये संभव नहीं लग रहा। अब घटते-घटते बात 60-65 टिकटों पर आ गई! जिस भी विधायक को अपने टिकट पर संकट नजर आ रहा है, वो विद्रोह की भूमिका में नजर आने लगता है। पार्टी ने 2008 और 2013 में टिकट का फार्मूला बनाया था 'मिनिमम रिक्स-मैक्सिमम रिजल्ट।' इसके अच्छे नतीजे निकले थे। दोनों बार 50 से ज्यादा टिकट बदले गए थे। इस बार ये गाज किस पर गिरेगी, कहा नहीं जा सकता। जबकि, कुछ विधायकों की सीटें बदलने की भी कोशिश की जा रही है। इनमें विधायकों के अलावा कुछ मंत्री भी शामिल है। 
   ये भी सही है कि मौजूदा विधायकों के टिकट कटने की खबरों ने भी पार्टी के अंदर भूचाल सा ला दिया है। पार्टी का तर्क है कि सर्वे में जिनके जीतने के आसार नहीं हैं, उन्हें टिकट नहीं दिया जाएगा! लेकिन, कोई भी ये मानने को तैयार नहीं है! संघ का तर्क है कि नेतृत्व को लेकर लोगों में गुस्सा नहीं है, लेकिन विधायकों के प्रति लोगों में जबरदस्त नाराजी है। यदि इस गुस्से ठंडा करना है, तो चेहरे बदलना ही होंगे! लेकिन, ये कोई मानने को तैयार नहीं कि उसके नीचे से जमीन खिसक रही है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि टिकट काटते हैं, तो विद्रोह का खतरा है! यदि टिकट देते हैं, तो लोगों की नाराजी झेलना पड़ेगी! एक तरफ कुंआ है और दूसरी तरफ खाई! पर इसी संकट से निकलना ही तो चुनाव प्रबंधन में परीक्षा की असली घड़ी है!
    भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भले ही प्रदेश संगठन पर इस बार 200 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा हो, पर हालात ऐसे नहीं है कि पार्टी इस लक्ष्य तक पहुँच पाएगी! किसानों की नाराजी, एंटी इनकम्बैंसी, एट्रोसिटी एक्ट, सवर्णों का गुस्सा भाजपा को शायद ही टारगेट तक पहुंचने दे! परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी भी संभल संभलकर फैसले कर रही है। जबकि, भाजपा की कमजोरी को ही कांग्रेस ने अपनी ताकत बनाया है। प्रदेश सरकार की 15 साल की खामियों, किसानों की नाराजी, बेरोजगारी, अफसरशाही और सरकार के अधूरे वादों को कांग्रेस ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया है। लेकिन, सारा दारोमदार इस बात पर है कि पार्टी का चेहरा बनने वाले उम्मीदवार कौनसे हैं। क्योंकि, दोनों पार्टियां जिसे चुनाव में उतारेगी, वही उसकी जीत का आधार बनेंगे!  
-----------------------------------------------------------------------------

फिल्मों में हिट रहा 'चोर' फार्मूला!


- हेमंत पाल 

    इन दिनों तमाम टीवी चैनलों और राजनीतिक रैलियों में 'चोर' शब्द की धूम है। हर राजनीतिक पार्टी प्रतिद्वंदी को ज्यादा बड़ा चोर साबित करने पर तुली है। राजनीति में तो ये फार्मूला ज्यादा सफल नहीं रहा! लेकिन, फिल्मों के लिए 'चोर' फार्मूला हमेशा से हिट रहा है। फिल्मों का इतिहास टटोलकर देखा जाए, तो 'चोर' शीर्षक से बनी अधिकांश फिल्में या गाने हिट हुए हैं। बाॅलीवुड की पहली हिट फिल्म कहलाने का श्रेय 1943 में प्रदर्शित अशोक कुमार की फिल्म 'किस्मत' को जाता है, जिसने कोलकाता के एक सिनेमा हाॅल में लगातार साढ़े तीन साल चलने का रिकार्ड बनाया था। 1975 में मुंबई के मराठा मंदिर में प्रदर्शित 'शोले' का भी लगातार पांच साल से ज्यादा चलने का रिकॉर्ड 32 साल तक कायम रहा। 'किस्मत' में अशोक कुमार ने चोर का चरित्र निभाया था, वहीं शोले के दोनों नायक धर्मेन्द्र और अमिताभ चोर बने थे।  
   हिन्दी फिल्मों में 'चोर' का चरित्र ब्लेक-शेड वाला न होकर ग्रे-शेड वाला होता है, जो नायिका से लेकर दर्शकों का दिल जीतकर बाॅक्स ऑफिस को लूटने में कामयाब होता है। कई फिल्में ऐसी भी बनी, जिनमें क्लाइमेक्स से पहले तक तो नायक को चोर दिखाया जाता है, लेकिन अंतिम रील आते-आते वो पुलिस वाला बन जाता है। 'ज्वैल थीफ' इस तरह की सबसे ज्यादा मनोरंजक फिल्म थी, जिसमें दर्शक आखिरी तक देव आनंद को चोर ही समझते हैं, लेकिन क्लाइमेक्स में अशोक कुमार को चोर के रूप में देखकर सब चौंक जाते है। 
  अशोक कुमार ने आरंभिक दिनों कई अपराधिक फिल्मों में चोर की भूमिका निभाई। उसके बाद देव आनंद लगभग हर दूसरी फिल्मों में चोर ही नहीं महिला दर्शकों के चितचोर भी बनें। राजकपूर ने 'आवारा' में चोर की भूमिका निभाकर दुनियाभर में वाहवाही लूटी, तो उनके भाई शम्मी कपूर भी ज्यादातर फिल्मों में चोर बने। सबसे छोटे भाई शशि कपूर तो इससे एक कदम आगे निकले। वह एनसी सिप्पी की एक फिल्म में न केवल चोर बने, बल्कि चोर बनकर उन्होंने 'चोर मचाए शोर' में खूब शोर मचाया और बाॅक्स आफिस पर पैसा भी बटोरा!
   हिन्दी फिल्मों के कई निर्माता-निर्देशकों को 'चोर' विषयों पर फिल्में बनाने या निर्देशित करने में महारथ हांसिल थी। गुरूदत्त गंभीर फिल्मकार बनने से पहले 'चोर' विषय पर सीआईडी, 12'ओ क्लाॅक जैसी सफल फिल्म बना चुके थे। विजय आनंद, शक्ति सामंत, राज खोसला जैसे फिल्मकारों ने हिन्दी फिल्मों में चोरों का जमकर महिमा मंडन किया। ऐसे ही निर्देशकों की बदौलत हिन्दी फिल्मों के चोरों पर दर्शकों का खूब प्यार उमड़ा है। हिन्दी फिल्मों में शायद ही कोई अभिनेता हो, जो कभी चोर न बना हो। मनोज कुमार जैसा कलाकार भी 'बेईमान' में चोर का चरित्र निभा चुके हैं। अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, देव आनंद, शत्रुघ्न सिंहा, राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र जैसे पुराने नायकों ने कई फिल्मों में चोर बनकर दर्शकों को लुभाया। अब शाहरूख, सलमान और आमिर भी इस दौड में पीछे नहीं हैं। 'धूम' सीरिज की सारी फिल्मों का कथानक चोरों के इर्द गिर्द ही घूमता रहा। 
   'चोर' शीर्षक से बनी फिल्मों में ज्वैल थीफ, चोरी मेरा काम, चोर-चोर, दो चोर, तू चोर में सिपाही, हम सब चोर हैं, अलीबाबा चालीस चोर, चोर मचाए शोर, बम्बई का चोर, चोर और चांद, थीफ आफ बगदाद, बैंक चोर, नामी चोर, महाचोर, चोर बाजार प्रमुख है। कुछ ऐसी फिल्में भी हैं, जिनमें नायक तो शरीफ होता है लेकिन नायिकाएं चोर होती हैं। जीनत अमान, मुमताज, हेमा मालिनी और श्री देवी ऐसी भूमिकाओें में खूब फबती रही है। नीतू सिंह की एक फिल्म का शीर्षक ही 'चोरनी' था। 
   हिन्दी फिल्मों के 'चोर' केवल शीर्षक तक ही सीमित नहीं रहे। ऐसे कई हिन्दी गीत हैं जिन्हें 'चोर' शब्द के प्रयोग ने हिट बनाया है। ऐसे गीतों में चुरा के दिल मेरा, चुरा लिया है तुमने जो दिल तो, मैं एक चोर मेरी रानी, शोर मच गया शोर, आया बिरज का बांका चोर, मेरी गली में आया चोर, इस दुनिया में सब चोर चोर, जब अंधेरा होता है आधी रात को एक चोर निकलता है। मैं एक चोर मेरी रानी गीत को भी लोगों ने खूब सुना और गुनगुनाया है। सलीम जावेद ने तो अपनी फिल्म 'दीवार' में अमिताभ के हाथ पर 'मेरा बाप चोर है' लिखकर हिन्दी सिनेमा में चोर को न केवल अमर कर दिया, बल्कि बाॅलीवुड को चोर विषय पर हिट फिल्म बनाने का एक फार्मूला भी बता दिया है। 
------------------------------------------------------------------

भाजपा की गलतियाँ ही कांग्रेस को सत्ता का मौका देगी!


   विधानसभा चुनाव की दुंदुभि बज चुकी है। मध्यप्रदेश के दो परंपरागत राजनीतिक प्रतिद्वंदी फिर आमने-सामने हैं। एक के पास डेढ़ दशक की सत्ता की ताकत है, तो दूसरे के पास प्रतिद्वंदी की खामियों की फेहरिस्त! इस चुनाव में एक पार्टी अपनी उपलब्धियां गिनाएगी, दूसरी उसकी खामियां ढूंढेंगी! लेकिन, इस बार के चुनाव की खासियत है कि मतदाता किसी आँधी, तूफान से प्रभावित नहीं है। उसे पार्टी और उम्मीदवार को समझने का पूरा मौका मिल रहा है। मतदाता की ख़ामोशी इस बात का अहसास नहीं कराती कि उसके मन में क्या है! लेकिन, ये सच है कि सत्ताधारी पार्टी की गलतियां ही इस बार निर्णायक होगी। मतदाता उसे इन गलतियों की सजा देगा या माफ़ करेगा, यही अगली सरकार का फैसला करेगा।  
000      

 - हेमंत पाल

   मध्यप्रदेश में सत्ता में लौटने का सपना देख रही कांग्रेस इन दिनों अच्छे उम्मीदवारों को लेकर संकट में है। पार्टी को ऐसे उम्मीदवार नहीं मिल रहे, जो  भाजपा के मुकाबले डंके की चोट पर चुनाव जीतने का दावा कर सकें। पार्टी को अभी ऐसे चेहरों की जरुरत है जिनकी छवि साफ़ हो और जो भाजपा उम्मीदवारों पर हावी हो सकें। पश्चिम मध्यप्रदेश का मालवा-निमाड़ इलाका भी कांग्रेस की इस परेशानी अछूता नहीं है। इंदौर, उज्जैन संभाग की 25 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहाँ पार्टी के पास सौ टंच चुनाव जीतने वाले चेहरे नदारद हैं। क्योंकि, लगातार तीन विधानसभा चुनाव की हार ने कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास खोखला कर दिया। जब कोई पार्टी लगातार चुनाव हारती है, तो उसके पास नए चेहरों का अकाल पड़ जाता है। नए लोग पार्टी से कन्नी काटने लगते हैं और पुराने नेता मायूस होकर बैठ जाते हैं। 
  चुनाव के उत्साह में भले ही नए, पुराने नेता चुनाव जीतने का दावा कर रहे हों, पर लगता नहीं कि वे कोई चमत्कार कर सकेंगे! इंदौर में ही कांग्रेस को 5 ऐसे चेहरे नहीं मिल रहे, जिन पर दांव लगाया जाए। इंदौर जिले में विधानसभा की 9 सीटें हैं, जिनमें 6 सीटें शहरी हैं। सांवेर, महू और देपालपुर ग्रामीण सीटें हैं। पिछले दो चुनाव छोड़ दिए जाएं तो तीनों ग्रामीण सीटों की तासीर हमेशा बदलती रही है। महू से पिछले दो विधानसभा चुनाव भाजपा के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय जीते। इससे पहले वे इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-2 से चुनाव लड़ते रहे हैं। महू से फिर कैलाश विजयवर्गीय चुनाव लड़ते हैं, तो यहाँ कांग्रेस उम्मीदवार के लिए जीत आसान नहीं होगी। देपालपुर से भी मनोज पटेल ने दो चुनाव जीते हैं, जबकि यहाँ लम्बे समय तक कांग्रेस का झंडा लहराया। यहाँ इस बार मनोज पटेल से लोगों की नाराजी के कारण भाजपा कमजोर दिख रही है, पर सारा दारोमदार कांग्रेस के चेहरे पर टिका है। यदि कांग्रेस ने किसी नए चेहरे पर दांव लगाया तो यहाँ पंजा मजबूत हो सकता है। उधर, सांवेर की सीट पर कांग्रेस के तुलसी सिलावट ने हमेशा अपना दम दिखाया है, पर पिछले चुनाव में मोदी की आँधी में वे भी अपनी सीट बचा नहीं सके थे। लेकिन, जीतने वाले राजेश सोनकर पिछले 5 साल में अपना प्रभाव नहीं छोड़ सके। इस बार फिर इन्हीं दोनों के बीच मुकाबले की उम्मीद की जा रही है। 
    शहर की दो विधानसभा सीटें ऐसी हैं जो लम्बे समय से भाजपा के कब्जे में हैं। ये हैं क्षेत्र क्रमांक-2 और 4 क्षेत्र। क्षेत्र क्रमांक-2 मिल मजदूरों का एरिया कहा जाता है, जहाँ से कैलाश विजयवर्गीय ने कई बार चुनाव जीता और दो चुनाव पहले अपनी सियासी सल्तनत अपने दोस्त रमेश मेंदोला को सौंपकर किला फतह करने महू चले गए। ऐसे में रमेश मेंदोला ने पिछला चुनाव 92 हज़ार से जीतकर अपने दावे को एकबार फिर मजबूत किया है। इस बार भी यहाँ कांग्रेस सिर्फ खानापूरी के लिए चुनाव मैदान उतरेगी, यह जानते हुए कि रमेश मेंदोला को हराना आसान नहीं है। पिछले चुनाव की लीड कम हो सकती है, पर इतनी कम भी नहीं कि कांग्रेस का झंडा लहराने लगे।   
    डेढ़ दशक तक सत्ता से बाहर रहने वाली कांग्रेस के सामने अच्छे उम्मीदवारों के अभाव का संकट खड़ा होना स्वाभाविक है। लेकिन, कांग्रेस का राजनीतिक वनवास इस बार ख़त्म हो जाएगा, इस बात का दावा भी नहीं किया जा सकता। भाजपा जिस आक्रामक ढंग से चुनाव लड़ने की तैयारी में है, कांग्रेस उसके मुकाबले कई मोर्चों पर बेहद कमजोर है। चुनाव को लेकर कांग्रेस के नेताओं ने भी रणनीति बनाई होगी, पर वो रणनीति अभी तक किसी भी नजरिए से कारगर होती दिखाई नहीं दे रही। मेहनत के बावजूद कांग्रेस में एक बिखराव सा लग रहा है। उम्मीद की जा रही थी, कि कमलनाथ के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में एकजुटता आएगी और लोगों को पार्टी की ताकत दिखेगी, पर ऐसा हुआ नहीं। पार्टी के तीन दिग्गजों की तीन धाराएं स्पष्टतः अलग-अलग दिशाओं में बहती नजर आ रही है। कहीं-कहीं तो ये धाराएं आपस में उलझ भी रही है। अब देखना है कि उम्मीदवारों की घोषणा के बाद चुनावी माहौल कैसा बनेगा। वैसे भी कांग्रेस के पास खोने के लिए बहुत बड़ी सियासी जायदाद नहीं है। पार्टी पिछले चुनाव में जीती 57 सीटों से वो नीचे उतरेगी, ऐसा भी नहीं लगता! लेकिन, ये तय है कि कांग्रेस इस चुनाव में जो भी पाएगी, वो उसे भाजपा की गलतियों से ही मिलेगा।   
  फिलहाल कांग्रेस को सारी उम्मीदें पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी के धुंआधार प्रचार और भाजपा की कमजोरी से है। राहुल गाँधी भोपाल, विंध्य, महाकौशल और ग्वालियर-चंबल इलाके में चुनाव प्रचार का अपना पहला दौर पूरा कर चुके हैं। अब उनका फोकस मालवा-निमाड़ पर है, जहाँ कांग्रेस को अपनी उस खोई पहचान को पाना है, जो कभी उसकी ताकत हुआ करती थी। 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिमी मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ में कांग्रेस ने अपनी जमीन ही खो दी। कांग्रेस की सबसे बुरी स्थिति 2003 और 2013 में हुई, जब मालवा से कांग्रेस के कई गढ़ उखड़ गए थे। इस बार क्या पार्टी उन पुराने किलों को से फतह कर पाएगी, ये सवाल मौंजूं है। 
  मालवा-निमाड़ की 66 में से मालवा की 48 विधानसभा सीटें ऐसी थीं, जिसे कई चुनाव में कांग्रेस ने ख़म ठोंककर जीती हैं। लेकिन, पिछले चुनाव में इनमें से 44 पर भाजपा का झंडा लहराया। इस बार कांग्रेस की कोशिश है कि खोई हुई साख को फिर पा लिया जाए। पार्टी को ये इसलिए भी संभव लग रहा है, कि इस बार किसान आंदोलन, एससी-एसटी एक्ट जैसे मुद्दे भाजपा के खिलाफ जाते दिख रहे हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि इन मुद्दों को भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करके अपने वोट बैंक को मजबूत किया जाए। मंदसौर में हुए किसान आंदोलन के बाद कांग्रेस ने इस मामले को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। राहुल गाँधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया यहाँ दो-दो बार आम सभाएं कर लोगों की संवेदनाओं को झकझोर चुके हैं। जबकि, एससी-एसटी मामले पर सवर्ण-ओबीसी सरकारी कर्मचारी उद्वलित हैं। अब दारोमदार इस पर है, कि कांग्रेस लोगों की नाराजी को किस तरह वोटबैंक में तब्दील कर पाती है। 
   मालवा-निमाड़ इलाके में भी कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व पांसा फैंकने की कोशिश में है। यही कारण है कि राहुल गाँधी को महांकाल और ओंकारेश्वर ले जाने की योजना है। ब्राह्मणों को रिझाने के लिए उन्हें भगवान परशुराम की जन्मस्थली जानापाव भी ले जाने का विचार है। इन सारी तैयारियों का लक्ष्य है कि पार्टी के प्रदर्शन को सुधारा जाए। कांग्रेस की कोशिश है कि इंदौर जिले की 9 विधानसभा सीटों में से जिन 8 पर भाजपा का कब्जा है, उसमें सेंध लगाई जाए। जबकि, धार जिले की 7 में से 5 सीटें भाजपा के पास हैं। झाबुआ की भी 3 में से 2 सीटें भाजपा ने जीती थीं। यहाँ की एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीता था। जबकि, नीमच की सभी 3 सीटें, मंदसौर की 4 में से 3 सीटें, उज्जैन जिले की सभी सातों सीटें, रतलाम जिले की सभी 5 सीटें, देवास की सभी 5 सीटें, शाजापुर की सभी 3 सीटें और आगर जिले की दोनों सीटों पर भाजपा काबिज है। पिछले चुनाव में जिन 7 जिलों में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था, पार्टी की कोशिश होगी कि वहां कोई चमत्कार किया जाए! लेकिन, वो चमत्कार कैसे होगा ये कोई नहीं जानता! शायद भाजपा की गलतियाँ ही कांग्रेस को मौका देंगी। जबकि, भाजपा पुरानी गलतियों को सुधारने के बजाए नए चुनावी पांसे फैंककर मतदाताओं को भरमाने में लगी है।     
-----------------------------------------------

Sunday, October 21, 2018

देखिए, अच्छी भी है फ़िल्मी दुनिया!

- हेमंत पाल

   सिनेमा की दुनिया पर अकसर तोहमत लगाई जाती है, कि यहाँ के स्वार्थी होते हैं। कोई किसी का साथ नहीं देता और चढ़ते सूरज का तिलक किया जाता है। कुछ मामलों में ये बात सही भी है! पर, कुछ लोग इससे अलग भी हैं, जो दूसरों का दर्द समझते हैं और मदद का हाथ बढ़ाने से पीछे नहीं रहते! जिंदादिल फिल्मकारों से जुड़े ऐसे कुछ किस्से, जो बताते हैं कि सिनेमा की दुनिया उतनी बुरी भी नहीं, जितनी समझी जाती है। 
     मोहम्मद रफी एक बार गाने की रिकार्डिंग के लिए स्टूडियों की लिफ्ट से ऊपर जा रहे थे। उस रिकॉर्डिंग स्टूडियो का पुराना लिफ्ट मैन रफ़ी साहब को जानता था। उसने मोहम्मद रफी की तरफ शादी का कार्ड बढ़ाते हुए कहा 'मेरी बेटी की शादी है, आप आइएगा।' रफी साहब ने अनमने से कार्ड ले लिया, उसकी तरफ देखा भी नहीं। लिफ्ट मैन ने भी इसे कमजोर लोगों की नियति मान लिया और चुप हो गया। करीब घंटेभर बाद मोहम्मद रफी रिकार्डिंग करके लौटे! वापसी में उसी लिफ्ट मैन से पूछा 'शादी किस दिन है, ये कहते हुए एक लिफाफा उसके हाथ में दिया।' रफी के इस बदले व्यवहार को वो समझ नहीं पाया! थोड़ी देर बाद फिल्म के निर्देशक ने कहा कि रफी साहब से गुस्सा मत होना! उस समय वे रिकार्डिंग के लिए जा रहे थे, इसलिए उनका ध्यान केवल गाने पर था। लेकिन, जब गाने की रिकार्डिंग हो गई तो मुझसे कहा कि मेरी फीस में अपना पैसा भी मिलाइए नीचे लिफ्ट मैन की बेटी की शादी है। 
   जाने-माने गायक मुकेश के घर के पास एक प्रेस की दुकान थी। वह प्रेस वाला अकसर अपने साथियों से कहता था कि मुकेशजी उससे आते-जाते बात करते हैं, मेरी उनसे दोस्ती है। जब उस प्रेस वाले की लड़की की शादी तय हुई, तो लोगों ने कहा कि मुकेशजी को क्यों नहीं बुलाते, वो तो तुम्हारे दोस्त हैं! उसने झिझकते हुए शादी का निमंत्रण मुकेशजी को दे दिया। उसने सोचा नहीं था कि वास्तव में मुकेशजी उसकी बेटी की शादी में आएंगे। शादी के दिन मुकेशजी जब वे सांजिदों के साथ मंडप में पहुंचे, तो वह घबरा गया। उसे लगा कि उसने मुकेशजी को गाने के लिए थोडी बुलाया था। वह मुकेशजी के पास गया और कहने लगा 'आपको तो बस आने के लिए कहा था, बेटी की शादी है आपके गाने का ख़र्चा कैसे दे पाऊंगा। ऊपर से तबला, बाँसुरी और सारंगी अलग।' मुकेशजी ने कहा कि तुम्हारी बेटी क्या मेरी बेटी नहीं। तुमसे पैसा कौन मांग रहा है। मैं तो बारातियों को गाना सुनाने आया हूँ। मुकेशजी ने उस शादी में देर रात तक गीत गाए। देर रात जब वे घर लौटे तो बेटे नितिन से कहा कि वहाँ गाने में इतना सुकून मिला, जितना अाजतक रिकॉर्डिंग में भी नहीं मिला! मुकेशजी ने वहाँ सिर्फ गाने ही नहीं गाए, उस बेटी को तोहफे में अच्छे-खासे पैसे भी देकर आए थे। 
  मुकेशजी अकसर सर्दियों की रात दिल्ली में कार से सड़क पर निकलते और फुटपाथ पर सोते भिखारियों को कंबल ओढ़ा देते थे। एक बार एक भिखारी ने उन्हें ऐसा करते पहचान लिया, लेकिन कहा कुछ नहीं। बस, उनका एक गीत 'दुनिया मैं तेरे तीर का या तक़दीर का मारा हूँ' गाने लगा। मुकेशजी ने कहा ये गीत तुमने कहाँ सुना? भिखारी ने कहा हमारी किस्मत में ये कहाँ कि मुकेशजी हमें ये गीत सुनाएं या हम उनके प्रोग्राम में जाएं। इस पर मुकेशजी ने कहा कि यहीं रहना मैं लौटकर आता हूँ। मुकेश वापस आए तो उस भिखारी के लिए अपने शो के चार टिकट लाएं, साथ में तीन सौ रुपए दिए और कहा 'परसों मुकेशजी का कार्यक्रम है वहाँ आ जाना।' भिखारी ने पांव छू लिए और कहा 'मैं आपको पहचान गया था, पर हिम्मत नहीं थी, इसलिए आपका गीत गा दिया।' 
 मीना कुमारी बहुत अच्छी शायरा थी, लेकिन कभी मंचों पर नहीं गाती थी। एक बार किसी ने कहा कि सैनिको के लिए कवि सम्मेलन है, आप कभी मंच पर नहीं आतीं, पर हो सके तो सैनिकों के लिए आइए! मामला सैनिकों का था तो मीनाजी वहाँ गईं भी और कविताएं भी पढ़ी! उन्होंने कविता के लिए पैसा लेना तो दूर, अपनी तरफ से सैनिक कल्याण कोष में अच्छी खासी रकम दे आईं।
--------------------------------------------------------------------------------------

Tuesday, October 16, 2018

कांग्रेसी सियासत के गलियारों में दिग्विजयी धमक!


   मध्यप्रदेश में सियासी माहौल गरमा रहा है। पार्टियों में सही उम्मीदवार के लिए बार-बार पत्ते फैंटे जा रहे हैं। चुनाव की घोषणा के बाद से ही कांग्रेस और भाजपा के अलावा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, सपाक्स, जयस और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी समेत और भी कई छोटी-छोटी पार्टियां भी दांव खेलने को तैयार हैं। डेढ़ दशक से प्रदेश की सत्ता में काबिज भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 165 विधायकों में से जीतने वाले चेहरों को चुनना है। जबकि, कांग्रेस को अपने सिर्फ 57 विधायकों में से उन्हें चुनना है, जो उसके लिए सत्ता की सीढ़ी बन सकें। सारा दारोमदार उम्मीदवारों के चयन का है। जिस भी पार्टी ने मतदाताओं की नब्ज पहचानकर सही चेहरे को उम्मीदवार चुना, उसके लिए ये जंग आसान हो जाएगी। भाजपा का तो पूरा संगठन इस काम में लगा है! उधर, कांग्रेस में भी पार्टी आलाकमान के साथ प्रदेश के तीनों प्रमुख नेता अपने समर्थकों को टिकट दिलाने की कोशिश में हैं। लेकिन, हवा बताती है कि कांग्रेस के टिकटों के फैसले में दिग्विजय सिंह का पलड़ा कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया से कहीं ज्यादा भारी है।   
000 

- हेमंत पाल   
   र पार्टी के लिए चुनाव के मौसम में सबसे मुश्किल काम होता है, ऐसे उम्मीदवार को खोजना जो उसकी रीति-नीति पर खरा उतरने के साथ जीतने वाला मोहरा बन सके। मध्यप्रदेश के इस बार के विधानसभा चुनाव का दारोमदार इसी पर टिका है। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों अपने उम्मीदवारों को कई कसौटियों पर परख रही है। भाजपा ने तो काफी पहले से इसके लिए सर्वेक्षण करवाए और कई रिपोर्ट पर काम किया। ये काम कांग्रेस ने भी किया, पर अंतिम स्थिति में टिकट वितरण में किस नेता का पलड़ा भारी रहेगा, इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में 57 सीटें मिली थी, इसलिए उसे अधिकांश नए चेहरों पर दांव लगाना होगा। पिछला चुनाव जीतने वाले विधायकों में से भी कुछ के टिकट कटना तय है, पर ज्यादातर विधायक फिर मैदान में दिखाई देंगे! अभी ये सवाल ही है कि किन विधायकों के टिकट कटेंगे और चुनाव में नए चेहरों को उतारने में किसका पलड़ा भारी रहेगा? कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले नेता दिग्विजय सिंह का, प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ का या फिर नए जोश वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का?
    विधानसभा चुनाव से पहले कहा जा रहा था, कि पार्टी ने टिकट बंटवारे से दिग्विजय सिंह को दूर रखने का फैसला किया है! लेकिन, हालात देखकर कहा नहीं जा सकता कि पार्टी ने ऐसा कोई फार्मूला तय किया होगा! ये किसी भी स्थिति में संभव भी नहीं है। सियासी अनुमान हैं कि प्रदेश की अधिकांश सीटों पर उनके दखल से ही नाम तय हो रहे हैं। चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह की राजनीतिक सक्रियता को लेकर भी काफी भ्रम था। उनकी भूमिका क्या होगी, उन्हें प्रदेश की राजनीति में दखलंदाजी के योग्य समझा भी जाएगा या नहीं! ऐसे कई सवाल हवा में थे। लेकिन, पंद्रह साल तक मध्यप्रदेश की राजनीति से बाहर रहने वाले दिग्विजय सिंह ने 'नर्मदा-परिक्रमा' के बाद न केवल प्रदेश की राजनीति में सक्रिय वापसी की, बल्कि पार्टी को एक सूत्र में बांधने के लिए प्रदेशभर का दौरा भी किया। उनका 'संगत में पंगत' वाला फार्मूला काफी हद तक सफल माना गया। प्रदेश में समन्वय समिति के मुखिया के रूप में उन्होंने पार्टी को एक सूत्र में बांधने की जो कोशिश की, जो सही दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। 
    प्रदेश कांग्रेस में फिलहाल दिग्विजय सिंह अकेले ऐसे नेता हैं, जो पूरे प्रदेश की विधानसभा सीटों के समीकरण से वाकिफ हैं। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया बड़े नेता जरूर हैं, पर प्रदेश की सभी 230 सीटों पर उनकी पकड़ मजबूत नहीं मानी जा सकती! कमलनाथ का प्रभाव महाकौशल के कुछ जिलों तक सीमित हैं। जबकि, ज्योतिरादित्य सिंधिया का मालवा में जोर है, पर सभी सीटों पर नहीं! वे शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, मुरैना, और ग्वालियर की सीटों की तासीर को ही ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं। जबकि, दिग्विजय सिंह अकेले ऐसे नेता हैं, जो पूरे प्रदेश की अधिकांश सीटों को समझते हैं। उन्हें हर जगह की तासीर और वो समीकरण भी पता हैं, जो चुनाव पर असर डाल सकते हैं। दिग्विजय सिंह की यही राजनीतिक पकड़ उन्हें टिकट वितरण में मददगार बनाती है। 
  कांग्रेस की सियासत में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले दिग्विजय सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे कभी हाशिए पर नहीं होते! उनसे नफरत तो की जा सकती है, पर उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता! उन्हें राजनीति का चाणक्य भी इसीलिए कहा जाता है, कि उन्होंने कई बार हारी हुई बाजियों को पलट दिया है। अल्पसंख्यकों को लेकर उनके कई बयान विवादास्पद भी बने! फिर भी कांग्रेस में उनके कद को कोई कम नहीं कर सका। ऐसे भी मौके आए, जब उनके बयान पार्टी की फजीहत का कारण बने! लेकिन, कांग्रेस में उनका वजन बरकरार रहा। नर्मदा परिक्रमा पूरी करने के बाद राजनीतिक सक्रियता की पहली सीढ़ी चढ़ते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा था कि उनका लक्ष्य कांग्रेस को एकजुट और मजबूत करना है। इस नजरिए से कहा जा सकता है कि उन्होंने अपनी पकड़ से पार्टी को मजबूती तो दी है। दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बाद हुई हार से आहत दिग्विजय सिंह अपनी इच्छा से सक्रिय राजनीति से दूर रहे! जबकि, राजनीति में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने पहले कभी ऐसा किया हो! लेकिन, जब से वे सक्रिय हुए हैं, राजनीतिक गलियारों में उनकी धमक को महसूस किया जाने लगा है!
     दिग्विजय सिंह ने बेहद रणनीतिक तरीके से राजनीति में वापसी की है। उनकी छह महीने लंबी नर्मदा परिक्रमा से पहले समझा नहीं गया था कि ये खामोश और अराजनीतिक यात्रा एक दिन सियासत को झकझोर देगी! यात्रा की शुरुआत में तो इसे गंभीरता सी नहीं लिया गया, पर जैसे-जैसे परिक्रमा आगे बढ़ती गई, उसके सियासी मंतव्य खोजे जाने लगे। इसके चलते संघ और भाजपा के साथ कांग्रेस में भी मंथन होने लगा था। दिग्विजय सिंह ने तो इसे निजी और नितांत धार्मिक यात्रा पर बताया और राजनीतिक चर्चा से भी उन्होंने दूरी बनाए रखी! लेकिन, उनके हर इशारे को सियासत से जोड़कर देखा गया। आज जो दिग्विजय सिंह दिखाई दे रहे हैं, वो काफी हद तक नर्मदा यात्रा से मिली ऊर्जा से ही लबरेज है! इस चुनाव के बाद यदि किसी नेता के सबसे ज्यादा उभरने की उम्मीद की जा सकती है, तो वे दिग्विजय सिंह ही होंगे! क्योंकि, उनके पास खोने को कुछ नहीं है।
   पिछले विधानसभा चुनाव में मालवा और निमाड़ भाजपा का सबसे ताकतवर गढ़ रहा था। रतलाम, झाबुआ, उज्जैन, शाजापुर, आगर मालवा, आलीराजपुर, देवास और सीहोर की सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। इंदौर की 9 सीटों में से 8, धार की 7 में से 5 सीटें और मंदसौर की 4 में से 3 सीटों पर भाजपा ने झंडा गाड़ा था। सीहोर जिले की मालवा क्षेत्र की 2 सीटें हैं, इन पर भी भाजपा जीती थी। लेकिन, इस बार मालवा और निमाड़ का माहौल भाजपा के पक्ष में झुका दिखाई नहीं दे रहा। 2013 के मुकाबले भाजपा कमजोर नजर आ रही है। इसके कई कारण गिनाए जा सकते हैं। करीब सवा साल पहले मंदसौर जिले से शुरू हुए उग्र किसान आंदोलन ने पूरे मालवा को अपने प्रभाव में लिया था। यहाँ पुलिस फायरिंग में मारे गए 7 किसानों के कारण पूरे प्रदेश में भारी हंगामा भी हुआ। मृतक किसानों में 5 पाटीदार समुदाय से आते थे, जो मालवा का प्रभावशाली किसान वर्ग है। बुंदेलखंड और मालवा में दलित आबादी बहुत बड़ी है। उज्जैन जिले में प्रदेश के सबसे ज्यादा दलित रहते हैं। इनके कर्मचारी संगठन सपाक्स की सबसे ज्यादा सक्रियता भी मालवा में है। सपाक्स खुलकर शिवराज सरकार के विरोध में है। इन सब चीजों के चलते भाजपा की राह बहुत आसान समझ नहीं आ रही। ऐसे में यदि कांग्रेस ने सही उम्मीदवारों को चुन लिया तो भाजपा के लिए ये चुनाव मुश्किल बन सकते हैं। 
-------------------------------------------------