Thursday, June 17, 2021

जंगल के साथ परदे से भी जानवर गुम!

- हेमंत पाल
    
    किसी भी फिल्म की जान उसके नायक और नायिका होते हैं। कथानक के केंद्र बिंदु में यही दो चरित्र छाए रहते हैं। दर्शक भी फिल्म के बारे कोई अनुमान लगाने से पहले उसके नायक और नायिका पर नजर डालता है। लेकिन, कुछ ऐसे अपवाद भी होते हैं, जिनमें नायक, नायिका हाशिए पर चले जाते हैं और फिल्म का तीसरा चरित्र उभरकर सामने आता है। ये तीसरा चरित्र कोई जानवर भी हो सकता है। लेकिन, ऐसी फिल्मों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली है। इनमें कुछ ऐसी फ़िल्में भी हैं, जिनमें जानवर की भूमिका को इतना सशक्त बनाया गया कि वो नायक पर भारी पड़ गया। कई बार ये जानवर अपनी मौजूदगी से ऐसी छाप छोड़ जाते हैं कि उनका अभिनय सब पर भारी पड़ता है। ऐसी कई फिल्में हैं, जो सिर्फ जानवरों के कारण पसंद की गई और उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजनेस किया। लेकिन, जीवन की भागदौड़ में पता भी नहीं चला कि कब जानवर फिल्मों से गायब हो गए।
    जानवरों का हिंदी फिल्मों में इस्तेमाल का इतिहास बहुत पुराना है। पहली फिल्म 'राजा हरिशचंद्र' के कई दृश्यों में भी जानवर नजर आए थे। जानवर और इंसान एक-दूसरे के पूरक हैं, इसलिए वे लंबे समय तक परदे पर अपनी मौजूदगी बताते रहे। 30 और 40 के दशक में नाडिया की फिल्मों में जानवर सबसे ज्यादा दिखाई दिए! फिल्मों में जानवरों की भूमिकाओं में भी अंतर दिखा। धर्मेंद्र की 'कर्त्तव्य' जैसी कुछ फ़िल्में छोड़ दी जाए, तो ज्यादातर फिल्मों में इनका हिंसक रूप दिखाई नहीं दिखा। गाय और गौरी, हाथी मेरे साथी, रानी और जानी, धरम वीर, खून भरी मांग, मर्द, तेरी मेहरबानियां, दूध का कर्ज़, कुली और 'अजूबा' जैसी फिल्मों में जानवरों को इंसान का दोस्त या मददगार ही बताया गया। अक्षय कुमार की 'इंटरटेनमेंट' में तो जानवर की भूमिका अहम थी। सुंदरबन के बाघों पर बनी फिल्म 'रोर' को भी इसी लिस्ट में जोड़ा जा सकता है। लम्बे अरसे बाद इंसान और जानवर के बीच संघर्ष को लेकर 'शेरनी' फिल्म आई। इसमें वन अधिकारी विद्या बालन एक खतरनाक बाघिन को पकड़ने वाली टीम का नेतृत्व करती है। बाघिन खतरनाक है, पर विद्या बालन उसे जीवित पकड़ना चाहती है। वास्तव में ये इंसान और जानवर के बीच संवेदना का रिश्ता है, जिसे फिल्म में उभारा गया।  
      जानवर बरसों से हिंदी फिल्मों का असरदार हिस्सा रहे हैं। लेकिन, पिछले दो दशकों में ऐसी फिल्मों की संख्या में कमी आ गई। इसका कारण व्यावसायिक या दर्शकों की बदलती रूचि ही नहीं, मनुष्य और प्रकृति के कमजोर पड़ते रिश्तों का भी प्रमाण है। फिल्मों में जानवरों की मौजूदगी कम या लगभग ख़त्म होने के पीछे एक बड़ा कारण सरकार के 'वन्य जीव कानूनों' का कड़ा होना भी है। कोई फिल्म निर्माता बेवजह कानूनी उलझनों में पड़ना नहीं चाहता। लेकिन, जिस तरह हॉलीवुड में तकनीकों का इस्तेमाल करके इंसान और जानवर के संबंधों पर फिल्म बनाई जाती है, ऐसे प्रयोग भारतीय फिल्मकारों ने नहीं किए। दिलीप कुमार की फिल्म 'नया दौर' में जानवर और मशीन के बीच फंसे इंसान के द्वन्द को दिखाया गया था। अंत में जीत जानवर की होती है, पर आज वो स्थिति नहीं है। जैसे-जैसे मशीनों पर हमारी निर्भरता बढ़ी, जानवरों से हमारी दूरी बढ़ती गई। इस बात से इंकार नहीं कि तकनीकी तौर पर सिनेमा पहले से बेहतर हुआ है। पर, क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि अब जानवरों को परदे पर दिखाने की जरूरत ही ख़त्म हो गई! अब इसके लिए एनीमेशन और दूसरी तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। तकनीक के अलावा वैचारिक रूप से परिपक्व होते सिनेमा में अब जानवरों के साथ जंगल के लिए भी जगह नहीं बची! जबकि, जानवरों पर बनी फिल्मों को पसंद करने वालों की कमी नहीं है! 
       डिज्नी की फिल्म 'जंगल बुक' ने रिलीज के शुरुआती तीन दिन में बॉक्स ऑफिस पर 40.19 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की! ये भारत में प्रदर्शित किसी भी हॉलीवुड फिल्म की कमाई का रिकॉर्ड है। इस फिल्म में इंसान के साथ जानवर भी मुख्य भूमिका में है। जानवर और इंसान के आपसी रिश्तों पर 2012 में बनी आंग ली की फिल्म 'लाइफ ऑफ पाई' ने भी हमारे यहाँ अच्छी कमाई की। ये एक लड़के और बाघ के रिश्ते की कहानी थी। फिल्म फैंटेसी ड्रामा थी और बाघ भी असली नहीं था। इसे सीजीआई (कंप्यूटर ग्राफिक इमेज) तकनीक से बनाया गया था। इसके बावजूद सब कुछ असली जैसा लगा। ख़ास बात ये कि हॉलीवुड की ये दोनों फ़िल्में भारत पर केंद्रित इंसान और जानवर के रिश्तों पर बनी थी। लेकिन, दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाले भारत में फिल्मों से जानवर और जंगल दोनों गायब हो रहे हैं।      फिल्मों में जानवरों का किस तरह इस्तेमाल हुआ इसके कई उदाहरण हैं। 'हाथी मेरे साथी' में अभिनेता राजेश खन्ना और तनुजा मुख्य भूमिका में थे। फिल्म में हाथी और इंसान के बीच की दोस्ती को दिखाया गया है। रामू नाम के इस हाथी के किरदार को परदे पर दर्शकों ने बहुत पसंद किया। हाथी अपने मालिक को बचाने के लिए अपनी जान तक दे देता है। 'कुली' में अमिताभ बच्चन का डायलॉग था 'बचपन से सिर पर अल्लाह का हाथ है, अल्लाह रक्खा मेरे साथ है।' दरअसल, अल्लाह रक्खा एक बाज होता है, जो हमेशा अमिताभ का साथ देता है। फिल्म के पोस्टर में भी ये बाज था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका किरदार कितना अहम था। 'मैंने प्यार किया' का गाना 'कबूतर जा जा' में भाग्यश्री अपनी चिट्ठी कबूतर से सलमान खान तक पहुंचाने को कहती हैं। क्लाइमैक्स में यह कबूतर विलन पर हमला भी करता है। फिल्म 'कट्टी-बट्टी' में इमरान खान और कंगना के रोमांस से ज्यादा केमिस्ट्री तो इमरान और उसके पालतू कछुए की देखने को मिलती है! इसके अलावा फिल्मों में नाग-नागिनों पर भी कई फ़िल्में बनी। 'नागिन' और 'नगीना' जैसी फिल्मों में तो इंसानों से ज्यादा सांप ही छाए रहे। 'मैं प्रेम की दीवानी हूं' में करीना कपूर और रितिक रोशन के अलावा एक तोता और कुत्ते का भी अहम रोल है। 
     'शोले' में बसंती के तांगे की घोड़ी धन्नो भी भुलाने वाला कैरेक्टर नहीं है। इस फ़िल्म में तांगा दौड़ का काफी लंबा सीन है। 'एंटरटेनमेंट' फिल्म का तो नाम ही कुत्ते के नाम पर पड़ा। फिल्म में कुत्ते का नाम 'एंटरटेनमेंट' हैं कहानी कुत्ते के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए कि वो करोड़ो की दौलत का वारिस होता है। 'हम आपके हैं कौन' में यदि कुत्ता टफी न होता, तो फिल्म का एंड सुखद न होता। सलमान खान और माधुरी दीक्षित की शादी कराने में इसी कुत्ते का योगदान था। फिल्म 'दिल धड़कने दो' में प्लूटो एक कुत्ता है, जो फिल्म की कहानी भी सुनाता है। प्लूटो को आमिर खान ने आवाज दी। 'मां' फिल्म में जितेंद्र और जया प्रदा मुख्य भूमिका में थे। जयाप्रदा को कुछ लोग मार देते हैं और वो आत्मा बन जाती हैं। उन्हें केवल उनके घर का कुत्ता देख पाता है, जो जयाप्रदा के साथ मिलकर बदला लेता है। 'नगीना' में श्रीदेवी के अभिनय को कौन भूल सकता है। फिल्म में श्रीदेवी नागिन के किरदार में होती है, जो अपना बदला लेती हैं। 'आंखे' में गोविंदा और चंकी पांडे मुख्य रोल में थे। गोविंदा और चंकी के बाद जो कैरेक्टर अहम था वो था एक बंदर का। उस बंदर ने फिल्म में जो धमाल मचाया था वो देखते ही बनता था। 'दूध का कर्ज' में जैकी श्रॉफ और नीलम कोठारी की भूमिकाएं थी. इस फिल्म में एक सांप अहम किरदार में था। गंगू को चोरी के झूठे आरोप में फंसा कर मार दिया जाता है। गंगू के परिवार में एक सांप भी रहता है। पार्वती (गंगू की पत्नी) उस सांप को अपना दूध पिलाती है और सालों बाद वो सांप अपने दूध का कर्ज अदा कर गंगू की हत्या का बदला लेता है! 'तेरी मेहरबानियां' में जैकी श्रॉफ नायक थे, जिसके साथ मोती नाम का एक कुत्ता हमेशा साथ रहता है। दोनों के बीच अच्छी दोस्ती बताई गई। कुछ लोग जैकी श्रॉफ की हत्या कर देते हैं, जो मोती देख लेता है। वो अपने मालिक की हत्या का बदला लेते हुए सभी हत्यारों को मार देता है। 
    हिंदी के मुकाबले तमिल फिल्मों में जानवरों का सबसे ज्यादा उपयोग किया गया है। हिंदी में डब की गई दक्षिण भारतीय फिल्मों की हमेशा मांग रही है। एक्शन और जानवरों पर फिल्माए गए फिल्मों के लिए यह मांग और भी ज्यादा है। नेल्सन वेंकटेशन की फिल्म 'मॉन्स्टर' को बहुत पसंद किया। इसमें एक चूहे की मुख्य भूमिका है। 'मॉन्स्टर' कम बजट की फिल्म है, इसके बावजूद इसने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की। जीवा अभिनीत 'गोरिल्ला' को असली चिम्पांजी पर फिल्माया गया था। जीवा के मुताबिक जानवरों के साथ काम करना आसान नहीं होता। लेकिन, कुत्ते और हाथियों वाले फिल्मों की मांग ज्यादा है। अशोक सेलवन की फिल्म 'जैक' और योगी बाबू की 'गोरखा' दो ऐसी फिल्में हैं, जिनमें कुत्ते अहम भूमिकाओं में हैं। जबकि, 'कुमकी-2' और 'राजा भीमा' की कहानी हाथियों पर केंद्रित है। 
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Thursday, June 10, 2021

पोस्टर के कोने से झांकती है पूरी फिल्म!

- हेमंत पाल

   इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि फ़िल्में सिर्फ प्रचार से चलती हैं। ये काम पहले भी होता था और आज भी होता है! लेकिन, वक़्त के साथ प्रचार का तरीका और संसाधन बदलते गए। पहले फिल्म के प्रचार पर इतनी मेहनत नहीं होती थी, जितनी आज होती है। तब उतनी प्रतिद्वंदिता भी नहीं थी। आज तो फिल्म की परिकल्पना से उसके रिलीज होने और उसके बाद तक दर्शकों को आकर्षित करने की कोशिश चलती है। लेकिन, एक वक़्त था जब फिल्मों के प्रचार का सबसे सशक्त माध्यम उसका पोस्टर होता था। तब ये दर्शकों  सूचना मात्र हुआ करता था। उसे देखकर दर्शक अनुमान लगाता था कि फिल्म के कलाकार कौन हैं उसके कथानक आधार क्या है। उस वक़्त प्रचार का कोई माध्यम नहीं था, बस पोस्टर ही ऐसी बेजान चीज थी जो बोलती थी। यानी पोस्टर तब भी महत्वपूर्ण थे और आज भी हैं। ये पोस्टर कला का भी एक हिस्सा हैं। दर्शकों के साथ संवाद का माध्यम होने के साथ इनमें उस फिल्म का इतिहास भी छुपा हैं। फिल्म के 100 दिन पूरे होने, सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली होने पर अलग से पोस्टर छापकर लगाए जाते रहे हैं। 
      मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों के शुरूआती दिनों तक हाथों से पोस्टर बनाए जाने लगे थे। फिर उन्हें छपवाकर सिनेमाघरों और शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों में चिपकाया जाता। शुरुआती समय से ही फिल्मों के प्रचार में पोस्टर का सबसे बड़ा हाथ होता है, यही कारण है कि आज प्रसार के पचासों तरीकों के बावजूद फिल्मी पोस्टरों का प्रचलन बंद नहीं हुआ, बदल जरुर गया। लेकिन, अब हाथ से बनाए जाने वाले पोस्टरों का चलन लगभग बंद  हो गया और उसकी जगह मल्टीमीडिया तकनीक से छपे होर्डिंग ने ले ली। आज फिल्मी पोस्टरों में कम्प्यूटर से डिजाइन किए विनाइल पोस्टरों का उपयोग बढ़ा है। पोस्टर बनाने वालों की भी एक अपनी अलग दुनिया थी! वे फिल्म के मूड को दर्शकों तक चंद चेहरों के जरिए पहुंचा देते थे। दुनियाभर में अपनी पैंटिंग के लिए विख्यात एमएफ हुसैन ने भी जीवन के संघर्ष के दिनों में फिल्मी पोस्टर बनाए थे।
   फिल्मों को पोस्टर के जरिए प्रचारित करने का चलन कब शुरू हुआ, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन, सबसे पुराना उपलब्ध पोस्टर 1924 में बनी मराठी फिल्मी 'कल्याण खजाना' का मिला है। मराठा शासक शिवाजी के जीवन पर बनी इस फिल्म के लिए फिल्म के निर्देशक बाबूराव पेंटर ने पहली बार पोस्टर बनाया था। उनका पूरा नाम बाबूराव कृष्णाराव मिस्त्री था और वे थिएटर कंपनियों के लिए सीन पेंट किया करते थे, उनका काम ऐसा था तो उनका उपनाम 'पेंटर' पड़ गया। वे पहले फिल्म निर्देशक थे, जिन्होंने प्रचार के लिए फिल्मों के पोस्टर की जरूरत को समझा। बाद में दूसरे निर्माता-निर्देशकों ने भी पोस्टर का महत्व और दर्शकों पर उसके प्रभाव को समझा और पोस्टर बनवाना शुरू किए। बाद में यही फिल्मों के प्रचार का मुख्य तरीका बन गया।
     ये भी कहा जाता है कि बाबूराव पेंटर ने 1923 में अपनी फिल्म 'वत्सलाहरण' के प्रचार के लिए पहली बार पोस्टर बनाया था। पोस्टर के जरिए फिल्मों के प्रचार में शुरुआती योगदान बाबूराव पेंटर का ही रहा है। वे सिर्फ फिल्मों के पोस्टर ही नहीं बनाते थे, फिल्मों की कहानी और कलाकारों के फोटोयुक्त प्रचार पुस्तिकाएं भी बांटा करते थे। ऐसी पुस्तिकाओं का चलन बाद में बहुत बढ़ गया था। 'आलम आरा' (1931) के लिए बनाया जुबैदा का उनका पोस्टर बहुत चर्चित रहा था। 1913 में दादा साहेब फाल्के ने पहली भारतीय फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का निर्माण और निर्देशन किया था। लेकिन, इसका कोई पोस्टर नहीं, प्रदर्शन की सूचना देने वाला विज्ञापन था। डेढ़ घंटे की इस फिल्म के रोज चार शो होते थे और दोगुना प्रवेश शुल्क लिया गया था। तब अखबारों में सूचना जैसे विज्ञापन के साथ हैंडबिल बांटे जाते थे। क्योंकि, फिल्म दर्शकों तक पहुंचने का यही एक साधन था। 
     इन पोस्टरों में उपयोग किए जाने वाले बहुरंग और नायक, नायिका और खलनायक के चेहरे के भाव फिल्म की कहानी का अहसास भी करा देते थे। इसके अलावा कई बार कॉमेडियन को भी इन पोस्टर में जगह मिला करती थी! लेकिन, ये सम्मान जितना महमूद और जॉनी वॉकर को जितना मिला, उतना किसी और हास्य कलाकार को नहीं! चटख रंग में हीरो का अंदाज और हीरोइन के जलवे दिखाए जाते थे, तो खलनायक का चेहरा क्रूरता से भरा होता था। उसकी आँखों से ललामी झलकती थी! यदि फिल्म डाकुओं की हुई (मेरा गांव-मेरा देश, कच्चे धागे, गंगा की सौगंध) तो हीरो के हाथ में बंदूक और डांस करती हीरोइन छाई रहती थी! पोस्टर से दर्शकों को आकर्षित करने में पेंटर अपनी सारी कलाकारी झौंक देते थे। फिल्मों के पोस्टर में कलाकारों के हर मनोभाव व्यक्त करने के लिए अलग-अलग रंगों का उपयोग किया जाता रहा है। यदि फिल्म प्रेम कहानी हो और रोमांटिक भावना दर्शाना हो, तो गुलाबी रंग ज्यादा उंडेला जाता था। खलनायक का क्रूर चेहरा नीले रंग से रंगा होता था और लाल होंठ उसकी क्रूरता को और गाढ़ा करते थे। 
   अमिताभ बच्चन को एंग्री यंगमैन बनाने में  पोस्टर का बड़ा हाथ रहा है। दर्शक पोस्टर पर अमिताभ का गुस्सैल अंदाज देखकर ही टिकट खरीदते थे। लेकिन, सुपरहिट फिल्म 'जंजीर' के पोस्टर में अमिताभ का चेहरा जया भादुड़ी से बहुत छोटा था। इस फिल्म के पोस्टर में प्राण, अजीत और जया इसलिए छाए थे, क्योंकि वे अमिताभ से बड़े कलाकार थे। लेकिन, 'दीवार' तक आते-आते अमिताभ का कद शशि कपूर से ज्यादा बड़ा हो गया। उनके पोस्टर के अलावा कटआउट भी लगने लगे थे। इन फ़िल्मी पोस्टर की ही महिमा कही जाना चाहिए कि सलीम-जावेद से पहले किसी स्क्रिप्ट राइटर का नाम कभी पोस्टर पर नहीं आता था। लेकिन, सलीम-जावेद की लोकप्रियता जा आसमान छूने लगी तो कलाकारों के साथ उनका नाम भी दिया गया। ये बात भी अविश्वसनीय भले लगे, पर सच है कि 'मदर इंडिया' के सुपरहिट होने के पीछे इस फिल्म के पोस्टर का बड़ा योगदान था। इस फिल्म के प्रचार के लिए के आसिफ ने कुछ नहीं किया था। लेकिन, फिल्म का एक पोस्टर फिल्म की अपार सफलता  कारण बन गया। इस पोस्टर में खुद को बैल की जगह जोतकर खेत जोतती और पीड़ा से कराहती नरगिस को दिखाया था। इस पोस्टर को देखने के बाद शायद ही कोई खुद को फिल्म देखने से रोक पाया होगा। फिल्म के पोस्टर ने एक औरत के संघर्ष को जिस तरह प्रदर्शित किया, वो पहले कोई नहीं कर पाया था।   
       फिल्मी पोस्टर फिल्म का प्रचार तो करते है, पर कभी ये विवाद भी खड़े करते हैं। 'क्रिमिनल' फिल्म के पोस्टर में नायिका की हत्या को लेकर पोस्टरों में ऐसा माहौल बनाया गया था कि उसकी वास्तव में हत्या हो गई। शाहरुख़ खान की फिल्म 'रा-वन' के एक पोस्टर को धूमधड़ाके साथ प्रदर्शित किया गया था। लेकिन, उसके बारे में कहा गया कि वो हॉलीवुड की एक फिल्म की हूबहू नकल है। फिल्म 'हेट स्टोरी' के अश्लील पोस्टर ने भी विवाद खड़ा किया था। प्रोड्यूसर एकता कपूर की वेब सीरीज 'हिज स्टोरी' के पोस्टर पर भी विवाद हुआ। सुधांशु सरिया ने एकता कपूर पर पोस्टर चोरी का आरोप लगाया। उनका कहना था कि ये उनकी फिल्म 'लोएव' के पोस्टर की नक़ल है। इस विवाद के बाद ऑल्ट बालाजी ने पोस्टर को डिलीट कर दिया था। डायरेक्टर अमजद खान की फ़िल्म 'गुल मकई' को लेकर भी फ़तवा जारी हुआ था। पाकिस्तानी एजुकेशन एक्टिविस्ट मलाला यूसुफजई पर आधारित इस फ़िल्म के पोस्टर पर धार्मिक ग्रंथ के अपमान का आरोप लगा। नोएडा के एक मुस्लिम धर्मगुरु ने इस अपमान को लेकर फ़तवा जारी किया था। पोस्टर में मलाला को हाथ में एक किताब लिए दिखाया गया, दूसरी तरफ ब्लास्ट का सीन है। उन्हें लगता है कि यह एक धार्मिक ग्रंथ है। 
   समय के साथ पोस्टर तकनीक में भी अंतर आता रहा। शुरुआत से साठ के दशक तक पोस्टर हाथ से बनते रहे। उसके बाद पोस्टर बनाने की कट-पेस्ट तकनीक लोकप्रिय हुई। इसमें पोस्टर बनाने वाले फोटो से कलाकारों की छवि काटकर उसे कोलाज बनाकर चिपका देते थे। इसके बाद पोस्टर विधा पर छपाई तकनीक ने ऐसा जलवा दिखाया कि पोस्टर सिर्फ चेहरों तक सीमित नहीं रहे। कंप्यूटर डिजाइनिंग ने इसे आसान और प्रभावी बना दिया। जो पोस्टर कलाकार मास्टरपीस पोस्टर बनाने माहिर थे, वे इतने लोकप्रिय हो गए कि फिल्मकार उन्हें कोई भी कीमत देने को तैयार हो जाते। इन पोस्टरों की कलात्मकता को इतना पसंद किया गया कि देश सबसे बड़े आर्ट कॉलेज मुंबई के जेजे स्कूल आफ आर्टस में इन्हें पढाया जाने लगा। 
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Saturday, June 5, 2021

छातों के नीचे गढ़े कई दृश्य और गीत


- हेमंत पाल 
     बारिश के मौसम में छाता जिंदगी का एक हिस्सा है। अमीर हो या गरीब, ये साधन सबके लिए एक ही काम करता है। ये बारिश के अलावा सूरज के ताप से बचाने के साथ जीवन की समृद्धि दर्शाने का भी प्रतीक है। जो जितना अमीर होता है, उसकी छतरी उतनी महंगी होती है। एक जमाना था, जब हाथ में छतरी या छाता होना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। तब छतरी सम्पन्न लोगों के हाथों में ही नजर आती थी। लेकिन, जब छाता सामाजिक वजूद रखने लगा, तो फिल्मों ने भी इसकी शान को स्वीकारा! हमारी फ़िल्में जीवन से जुड़ी है, इसलिए छातों ने फिल्मों में कथानक के मुताबिक अपनी जगह बनाई। कई फ़िल्मी गीतों में जमकर छतरियां उपयोग की गई, साथ ही फ़िल्मी दृश्यों में छतरियों को अलग-अलग संदर्भों में दिखाया गया! कभी छतरियों को नायक, नायिका के रोमांस का बहाना बनाया गया, तो कभी हिंसक दृश्यों को ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए छतरियों की आड़ ली गई। गांव का सूदखोर जब वसूली के लिए जाता है, तो उसका एक गुर्गा उसके ऊपर छतरी ताने दिखाई देता है। कन्हैयालाल और जानकीनाथ को पुराने दर्शकों ने कई बार ऐसे दृश्यों में देखा होगा। फिल्मी मास्टरजी भी छाते का उपयोग करते बहुत देखे गए। 
     राज कपूर ने अपनी कई फिल्मों में छतरी से प्रभाव पैदा करके कहानी को आगे बढ़ाया! कई फिल्मों में छतरी को नायक ने हथियार की तरह इस्तेमाल कर गुंडों की धज्जियां भी बिखेरी है। पुरानी फिल्मों के खलनायक केएन सिंह की खलनायकी का एक अलग अंदाज था। अभिजात्य वर्ग का ये खलनायक हमेशा सूट-बूट और हैट पहने दिखाया गया। मुँह में पाइप दबाए केएन सिंह जब परदे पर आते तो दर्शकों में सिहरन सी होती थी। उनके इस अभिजात्य अंदाज़ में कई फिल्मों में हाथ छतरी भी दिखाकर प्रभाव पैदा किया जाता था। आशय यह कि छतरी सिर्फ बारिश से बचने का साधन ही नहीं, इसके जरिए फिल्मों में कई अनूठे प्रसंग भी गढ़े गए।  
      इसके बावजूद फिल्मों में छाते को कहानी से जोड़कर कथानक को आगे बढ़ाने के प्रयास कम ही हुए। लेकिन, गीतों में बतौर प्राॅप छातों का प्रयोग लम्बे समय से होता रहा है और आज भी ये दिखाई देता है। कथानक में छातों के इस्तेमाल का जिक्र किया जाए, तो ऐसी दो फिल्में ही ध्यान में आती है जिनमें छातों का बेहतरीन उपयोग किया गया। पहली फिल्म है, मनोज कुमार निर्देशित 'पूरब और पश्चिम' जिसकी शुरुआत की रीलें ब्लैक एंड व्हाइट थी। इसमें देश के गद्दार देशप्रेमी कृष्ण धवन की जानकारी ब्रिटिश सिपाहियों दे देते हैं, जो उसे बरसते पानी में उसे गोलियों से छलनी कर देते हैं। प्राण छाते की आड़ से यह सब होते देख लेता है। इस दृश्य को फिल्माने में मनोज कुमार ने छाते का बेहद प्रभावी उपयोग किया था। इसके बाद सनी देओल की फिल्म 'अर्जुन' में मुंबई के एक उपनगरीय रेलवे स्टेशन के बाहर बरसात का दृश्य था, जिसमें हजारों लोग छाता लिए आते-जाते हैं। इन्हीं छातों की आड़ में एक हत्या हो जाती है। इस सीन की शूटिंग के लिए कई लोग बुलाए गए थे। यह दृश्य बारिश में शूट होना था और तलवारें भी चलना थी। हर आदमी के हाथ में दो-दो छाते थे। कभी तलवारों से छाते फट जाते, कभी छाते लेकर चल रहे लोगों के चेहरों पर छातों की तीलियां चुभ जाती। बहुत मुश्किल ये सीन पूरा हुआ! लेकिन, जब दर्शकों ने परदे पर इसे देखा तो ये हिंदी सिनेमा के चंद कालजयी दृश्यों में एक बन गया था। इस दृश्य में सैकड़ों छाते दिखाकर निर्देशक राहुल रवैल और सिनेमेटोग्राफर बाबा आजमी ने उसे यादगार बना दिया था। 
    1953 में आई फिल्म 'श्री 420' के गीत 'प्यार हुआ इकरार हुआ' के जहन में आते ही राज कपूर और नरगिस की जोड़ी स्मृतियों में कौंध जाती है। शाम ढलने के साथ गढ़े गए उस दृश्य को हिंदी फिल्मों का क्लासिक गीत ही नहीं, छतरी की आड़ में श्रेष्ठ रोमांटिक दृश्य भी माना जाता है। बरसात की फुहारों के बीच इस युगल गीत में प्रेम का उदात्त भाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसमें पानी की बौछार, चाय वाले की केतली से उड़ती गर्म भाप और नरगिस की भाव भंगिमाओं ने इसे रोमांस की चरम सीमा तक पहुंचा दिया था। कहा जा सकता है कि छतरी वाले गीतों और दृश्यों में राज कपूर को महारत हांसिल थी। उनकी फिल्म 'छलिया' में मनमोहन देसाई ने 'डम डम डिगा डिगा मौसम भीगा भीगा' फिल्माकर बारिश में कल्याणजी-आनंदजी के संगीत का मजा दोगुना कर दिया था। इस गीत के साथ एक रोचक प्रसंग भी जुड़ा है। संगीतकार शंकर-जयकिशन को आपत्ति थी, कि गीत के बोलों में 'रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियां' सही लाइन नहीं है। क्योंकि, दिशाएँ तो चार होती थी। राज कपूर ने भी उनकी बात पर सहमति जताई! लेकिन, कहा कि जब शैलेंद्र ने लिखा है, तो कुछ कारण होगा। जब शैलेंद्र से पूछा गया तो उन्होंने दस दिशाएं गिनवा दी ऊर्ध्व-अधो, ईशान-नैऋत्य, आग्नेय-वायव्य, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण गिनवा दी। 
    राज कपूर ने 'श्री 420' में छतरी को रोमांटिक दृश्य में उपयोग किया, तो फिल्म 'बूट पॉलिश' में उन्होंने समाज के दो वर्गों में भेद दिखाने के लिए छाते का प्रसंग बनाया था। फिल्म के दृश्य में राशन की लम्बी कतार में समाज के गरीब और समृद्ध वर्ग के लोग खड़े हैं। अचानक बारिश होने लगती है और भगदड़ हो जाती है. साथ ही दोनों वर्गों का भेद भी स्पष्ट हो जाता है। छाते वाला समृद्ध वर्ग छाता खोलकर फिर कतार में लग जाता है, जबकि समाज का वंचित वर्ग कतार छोड़कर अपने आपको भीगने से बचाने के लिए कहीं दुबक जाता है। फिल्म में भले ही ये सामान्य सा दृश्य था, पर सामाजिक स्तर पर इसके गंभीर मायने निकाले गए थे। रजनीकांत की फिल्म 'काला' के एक दृश्य में नायक एक छतरी के सहारे अपने दुश्मनों से लड़ता है और सबको मार गिराता है। वैसे रजनीकांत की फिल्मों में कुछ भी यथार्थ नहीं होता, फिल्म के दृश्य में जिस तरह छतरी को हथियार बताया गया, वो देखने में ही अच्छा लगता है।  
     राज कपूर से पहले गुरुदत्त अपनी निर्देशित फिल्म 'बाजी' में गीता दत्त पर 'देख के अकेली मोहे' गीत फिल्मा चुके थे। इसमें गीता बाली क्लब डांसर थी, जो रेनकोट पहनकर हाथों में छाता लेकर गाती है। यह गीत बरसात में नहीं, बल्कि क्लब में होता है, जहां गीता बाली छींटे उड़ाकर आभासी बरसात का अहसास कराती है। 'बाजी' के बाद गुरुदत्त ने 'मिस्टर एंड मिसेज-55' में 'ठंडी हवा काली घटा' गीत में मधुबाला और उनकी सहेलियों के हाथों में छतरी पकड़ाई थी। लेकिन, यहां बारिश की जगह स्विमिंग पूल नजर आ रहा था। अशोक कुमार और नलिनी जयवंत की फिल्म 'समाधि' के गीत 'गोरे गोरे ओ बांके छोरे' में भी छाते का प्रयोग किया गया था। 
      जब फिल्मी छातों में छुपकर रोमांस का जिक्र हो, तो देव आनंद की चर्चा होना लाजमी है। उनकी फिल्म 'काला बाजार' का हिट गीत 'रिमझिम के तराने लेके आई बरसात' में देव आनंद बारिश से बचने के लिए अखबार सिर पर रख लेते हैं! जबकि, वहीदा रहमान छाते में होती है, बाद में दोनों छाते के नीचे थोड़ा भीगते हुए दिखाई देते हैं। देव आनंद ने एक बार फिर 1969 में फिल्म 'महल' में आशा पारेख के साथ रंग बिरंगी छातों में 'ये दुनिया वाले पूछेंगे' गाते दिखाई दिए थे। इसके अलावा फिल्म 'एक साल' में जाॅनी वाकर और मीनू मुमताज 'दिल तो किसी को दोगे' गाते हुए धूप में छाता थामें दिखाई दिए, तो 'दो झूठ' में विनोद मेहरा बारिश में रोमांस का मजा लेने के लिए मौसमी चटर्जी से कहते हैं 'छतरी न खोल उड़ जाएगी।' इसके बाद 'मान गए उस्ताद' में शशि कपूर और हेमा मालिनी छतरी थामे शिकायत करते हैं 'एक छतरी और हम हैं दो।' जबकि, 'चालबाज' में श्रीदेवी रेनकोट पहने छाताधारियों के लिए अबूझ पहेली बनकर सुनती रहती है 'ना जाने कहां से आई है!' आमिर खान की कालजयी फिल्म 'थ्री इडियट्स' के गीत 'जुबी जुबी' में भी छाता दिखाई दिया था।   
    1982 की फिल्म 'नमक हलाल' में अमिताभ बच्चन और स्मिता पाटिल पर फिल्माया 'आज रपट जाएं तो' गीत में भी बारिश में स्मिता का छाता उड़ जाता है। बप्पी लहरी के संगीत से सजा यह गीत अपने समय में बहुत लोकप्रिय हुआ था। 'कोई मिल गया' में प्रीति जिंटा और रितिक रोशन छतरी लेकर 'इधर चला मैं उधर चला' गीत पर बारिश में झूमते दिखाई देते हैं। 'नाजायज' में 'अभी जिंदा हूं तो जी लेने दो भरी बरसात में पी लेने दो' और 'दरियादिल' में 'बरसे रे सावन कांपे मेरा मन' जैसे कई गीत बरसात और छाते की याद दिलाते हैं। 2006 में विशाल भारद्वाज ने बच्चों के लिए रस्किन बांड की कहानी 'द ब्लू अम्ब्रेला' पर आधारित फिल्म 'द ब्लू अम्ब्रेला' बनाई थी। अजय देवगन की आने वाली फिल्म 'मैदान' के पोस्टर में अजय देवगन फॉर्मल लुक में हाथ में छतरी और बैग लेकर फुटबॉल को किक मारते नजर आ रहे हैं। यानी अभी फिल्मों से छतरी का जमाना गया नहीं है। 
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Thursday, May 27, 2021

हिंदी फिल्मों में जासूसी कथानक

- हेमंत पाल

   हिंदी फिल्मों के इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो दिखने में आता है कि शुरुआती काल से अब तक ज्यादा प्रयोग नहीं किए गए। जिस विषय को दर्शकों ने पसंद किया, उसी ढर्रे पर फिल्म बनाई जाने लगी। फिल्मों के विषयों पर नजर दौड़ाई जाए तो अधिकांश फ़िल्में कुछ तय विषयों की मोहताज रही है। सफल और असफल प्रेम कहानियां, खून का बदला खून, पारिवारिक विवाद, अमीरी-गरीबी की लड़ाई, डाकुओं का आतंक, गुंडागर्दी, देशभक्ति, राज परिवारों के षडयंत्र, कॉमेडी और जासूसी यानी सीक्रेट एजेंटों पर ही ज्यादा फ़िल्में बनी और ये आज भी जारी है। इसके अलावा जो प्रयोग हुए वो दर्शकों को ज्यादा आकर्षित नहीं कर सके। श्याम बेनेगल और सत्यजीत रॉय ने जरूर फ़िल्मी विषयों की जड़ता को तोडा, पर इनकी फिल्मों के दर्शक सीमित रहे! ब्लैक एंड व्हाइट से अभी तक की फिल्मों पर नजर दौड़ाई जाए, तो प्रेम कथाओं के बाद जासूसी पर आधारित फिल्मों को सबसे ज्यादा पसंद किया गया। 
    जासूसों के बारे में आम धारणा है कि इन्हें हमेशा से देशभक्त और अपने कर्त्तव्य के लिए जान तक देने वाला जांबाज माना जाता है। दुश्मन के खिलाफ वो अपने हर मंसूबे में कामयाब होता है। लेकिन, ये धारणा फिल्मों के जासूसों के लिए ही ठीक है। वास्तविक जासूसों के कारनामे कभी फिल्मी कथाओं की तरह सामने नहीं आ पाते! लेकिन, फिल्मों में जासूसों की जो छवि बनाई गई है, वो सच्चाई से बहुत अलग है! फिर भी दर्शक ऐसी फिल्मों के दीवाने होते हैं। क्योंकि, इन विषयों पर बनने वाली फिल्मों में जमकर एक्शन के साथ और रोमांस और देशभक्ति का तड़का होता है। फिल्म का हीरो अपनी जासूसी के कर्त्तव्य के साथ देश के प्रति ऐसा समर्पण दिखाता है कि दर्शक में भी देशभक्ति का जज्बा कुंचाले भरने लगता है। जासूसी पर बनी फिल्मों में वो सारा मसाला होता है, जो फिल्म को हिट बनाने के लिए जरूरी है। खुफिया एजेंसी 'रॉ' और 'आईबी' से जुड़े एजेंटों पर कई फिल्में बनाई गई। ये एजेंट दुश्मन देश में घुसकर वहां जासूसी करते हैं और साजिशों को असफल करने का कोई मौका नहीं छोड़ते! जासूसी कहानियां हॉलीवुड का सबसे सफल विषय रहा है, इसलिए इसे बॉलीवुड ने भी इसे जमकर भुनाया! सीक्रेट एजेंट ऐसा हॉट केक विषय है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहता। सामाजिक फिल्मों बनाने वाले 'राजश्री' ने भी 1977 में महेंद्र संधु को लेकर 'एजेंट विनोद' बनाई। ये फिल्म एक विख्यात साईंटिस्ट को अपहर्ताओं से छुड़ाने पर बनी थी। बाद में 2012 में भी इसी नाम से फिल्म बनाई गई थी।     
   फिल्मों में हीरो को सीक्रेट एजेंट बनाकर कथानक गढ़ने का काम आजादी के बाद बनी फिल्मों में ज्यादा दिखाई दिया। उसके बाद से अब तक ये विषय न तो पुराना पड़ा और न इस तरह की फिल्मों के प्रति दर्शकों का जुनून कम हुआ। रवि नगाइच ने 1967 में जितेंद्र को हीरो बनाकर 'फर्ज' बनाई थी। इसमें जितेंद्र ने सीक्रेट एजेंट-116 की भूमिका निभाई, जो अपने साथी एजेंट की हत्या का राज खोलता है। 'रामायण' जैसा सफल टीवी सीरियल बनाने वाले रामानंद सागर ने धर्मेंद्र को लेकर 1968 में 'आंखें' बनाई। ये देश के खिलाफ षड़यंत्र रचने वाले गिरोह को ख़त्म करने की कहानी थी। इसमें धर्मेंद्र ने देशभक्त जासूस की भूमिका निभाई थी। ये पूरी तरह फार्मूला फिल्म थी, जो सुपरहिट रही। मिथुन चक्रवर्ती के शुरूआती फिल्म करियर में जो फ़िल्में सफल हुई, उनमें एक 1979 में बनी 'सुरक्षा' भी है। ये फिल्म हॉलीवुड की जेम्सबांड जैसी फिल्मों की नकल थी। इसमें मिथुन का किरदार सीक्रेट एजेंट 'गनमास्टर जी-9' का था, जो देश के दुश्मनों के षड़यंत्र का राज खोलता है। 
    इसके बाद लम्बे अरसे तक इस विषय को लेकर फिल्मकारों ने उत्सुकता नहीं दिखाई! देशभक्ति की फ़िल्में तो बनी, पर उसमें जासूसी कहीं नहीं दिखाई दी। 2002 में मणिरत्नम ने इसी विषय पर '16 दिसंबर' बनाई। ये पाकिस्तान के आतंकवाद पर आधारित फिल्म थी। मिलिंद सोमन अभिनीत इस फिल्म का कथानक 1971 की हार के बाद पाकिस्तान की सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी की दिल्ली पर परमाणु बम से हमला करने की साजिश पर गढ़ा गया था। लेकिन, फिलहाल के दौर में सीक्रेट एजेंट विषय पर सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली फिल्म रही 2012 में आई 'एक था टाइगर' और 2017 में आई इसकी अगली कड़ी 'टाइगर जिंदा है!' इसकी आगे की कड़ियां आना बाकी है। सलमान खान और कैटरीना कैफ की इस फिल्म में सलमान रॉ एजेंट हैं, जिस पर एक एनआरआई वैज्ञानिक की गतिविधियों पर नज़र रखने का काम है। मोहब्बत और फर्ज के बीच झूलती इस फिल्म में वो सारे मसाले हैं, जो सलमान को चाहने वाले देखना। कहा जाता है कि यह फिल्म भारत के एक पूर्व रॉ एजेंट रविन्द्र कौशिक की सच्ची कहानी पर आधारित है। लेकिन, इसमें काफी बदलाव किए गए हैं। 
    हमारे देश में बनने वाली सीक्रेट एजेंट की कहानियों वाली फिल्मों में लीड रोल आमतौर पर पुरुष पात्र ही निभाते आए हैं। लेकिन, विद्या बालन ने 2012 में आई फिल्म 'कहानी' में इस धारणा को खंडित किया। इसमें उन्होंने जासूस की भूमिका निभाई थी। सुजॉय घोष के निर्देशन में बनी इस फिल्म में विद्या बालन ने ऐसी महिला का किरदार निभाया, जिसका पति गुम हो जाता है और वो उसकी खोज करती है। इसके बाद 2018 में आई 'राजी' में आलिया भट्ट ने रॉ एजेंट की भूमिका की। मेघना गुलजार की इस फिल्म में पिता के कहने पर राजी पाकिस्तानी सेना के अधिकारी के बेटे से शादी कर लेती है, जिससे वह दुश्मन देश के बारे में जानकारी ले सके। 'नाम शबाना' भी एक ऐसी ही फिल्म थी जिसमें महिला सीक्रेट एजेंट अपने कामयाब होती है। फिल्म में तापसी पन्नू ने शबाना का किरदार निभाया था।
   2013 में दो ऐसी फ़िल्में आई, जिनका कथानक जासूसी पर केंद्रित था। एक थी कमल हासन की 'विश्वरूपम' और दूसरी थी जॉन अब्राहम की 'मद्रास कैफे!' फिल्म 'विश्वरूपम' वैश्विक आतंकवाद के बढ़ते खतरे पर बनी थी। इसमें एक महिला अपने पति पर जासूस होने का शक करती है। लेकिन, बाद में निकलता कुछ और है। जबकि, शुजित सरकार की 'मद्रास कैफे' राजीव गांधी हत्याकांड पर बनी थी। इसमें जॉन ने रॉ एजेंट विक्रम सिंह का किरदार निभाया था। फिल्म में श्रीलंका के उस समय के हालात और लिट्टे की गतिविधियों को दर्शाया गया था। नीरज पांडे ने भी 2015 में अक्षय कुमार को लेकर 'बेबी' बनाई, जिसका कथानक आतंकवादी सरगना मौलाना की आतंकवादी हमले की साजिश रचने पर आधारित था। फिल्म में 'बेबी' भारत की ख़ुफ़िया टीम के मिशन का नाम होता है। नीरज पांडे ने बाद में इसी विषय पर 'अय्यारी' भी बनाई थी। इसी साल (2015) में बांग्ला के मशहूर प्राइवेट जासूस ब्योमकेश बख्शी पर आधारित फिल्म 'डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी' भी आई, जिसका निर्देशन दिबाकर बनर्जी ने किया था। इसमें दूसरे विश्व युद्ध के समय काल की कहानी को फिल्माया गया था। 40 के दशक ये फिल्म पूरी तरह जासूसी कलेवर में थी। 
   इसके अलावा जासूसी पर जो फ़िल्में बनी, उनमें अमिताभ बच्चन की 70 के दशक में आई 'द ग्रेट गैम्बलर' भी थी, जिसमें उन्होंने अंडरकवर कॉप की भूमिका निभाई थी। 'डी डे' में इरफान खान रॉ के स्पेशल एजेंट की भूमिका में थे। श्रीराम राघवन ने सैफ अली खान को लेकर 'एजेंट विनोद' बनाई, जिसमें हीरो कोड क्रेक करते हुए पाकिस्तान पहुंच जाता है। सनी देओल ने भी 'द हीरो' में ऐसी ही भूमिका की थी, जो दुनिया को न्यूक्लियर हमले से बचाने का काम करते हैं। हुसैन जैदी की किताब 'मुंबई एवेंजर्स' पर बनी फिल्म 'फैंटम' में सैफ अली खान ने मुख्य भूमिका की थी। फिल्म में वे रॉ एजेंट थे, जो ऐसे कवर्ड ऑपरेशन को अंजाम देता है, जो 26/11 मुंबई हमले के पीछे मास्टरमाइंड था। 
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Sunday, May 23, 2021

सिनेमा और टीवी को खा जाएगी वेब सीरीज!

- हेमंत पाल

   भारतीय दर्शकों के दिमाग में सिनेमा को लेकर धारणा है कि ये बड़े परदे का मनोरंजन है। ये सौ साल से ज्यादा पुरानी धारणा है, इसलिए सही भी है। जब से सिनेमा की शुरुआत हुई, इसे बड़े परदे पर ही देखा गया। 70 के दशक में टेलीविजन ने मनोरंजन के नए आयाम के रूप में जन्म लिया और कुछ सालों में इसकी हर घर में घुसपैठ हो गई! बरसों तक सिनेमा और टेलीविजन को जीवन की जरूरत समझा जाने लगा! लेकिन, अब ये भ्रम खंडित होने लगा है। सिनेमा और टीवी के सामने ओटीटी (ओवर द टॉप) प्लेटफार्म मनोरंजन का एक नया विकल्प बनकर उभरा है। ओटीटी पर सिनेमा भी है, सीरियल भी और उससे आगे बढ़कर वेब सीरीज हैं। ये मनोरंजन का ऐसा माध्यम है, जिसके लिए ज्यादा जतन नहीं करना पड़ता। ये 'कभी भी-कहीं भी' मनोरंजन का पिटारा खोलकर बैठ जाता है। जबकि, फिल्म देखने सिनेमाघर जाना पड़ता है और टीवी मनोरंजन का समय तय है।  
    2020 की शुरुआत में जब कोरोना महामारी ने जोर पकड़ा, तो सरकार की सख्ती के कारण सबकुछ बंद हो गया। सिनेमाघरों पर ताले लग गए और सीरियल्स की शूटिंग बंद होने से छोटा परदे पर भी पुराने सीरियल दिखाने लगे। ऐसे में वेब सीरीज ने दर्शकों को घेरकर अपने सामने बैठाया और मनोरंजन की पंगत जमकर परोसी। दर्शकों को मनोरंजन की ये खुराक इतनी रास आई कि कहा जाने लगा कि कहीं वेब सीरीज का चस्का सिनेमा और टीवी को पूरी तरह खत्‍म न कर दे! ये सिर्फ कहने भर की बात नहीं है, ये संभव भी है। क्योंकि, सिनेमा और टीवी के साथ बाध्यता है कि इसके लिए दर्शक को उसके पास पहुंचना पड़ता है। जबकि, ओटीटी पर वेब सीरीज देखने के लिए ऐसा कुछ। इसे कंप्यूटर, लैपटॉप, टैब लेट या स्मार्ट फोन पर देखा जा सकता है। इसका सबसे बड़ा आकर्षण और ताकत है 'कभी भी कहीं भी' मनोरंजन। 
   इस समय ओटीटी प्लेटफार्म और उस पर चल रहे शो छाए हुए हैं। लोगों की बातचीत में भी इन शो ने सिनेमा और टीवी सीरियल्स की जगह ले ली। कहा जा सकता है कि दर्शकों को वेब सीरीज के मोहपाश ने पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया। ये ऐसा माध्यम है, जहां हर रुचि के दर्शकों का ध्यान रखा गया है। विदेशी ओटीटी पर भी हिंदी दर्शकों की रुचि का मसाला परोसा जाने लगा। भारतीय दर्शकों की पसंद का ध्यान रखते हुए ठेठ पारिवारिक और सामाजिक वेब सीरीज भी बनने लगी। टीवी पर सीरियल की रानी कही जाने वाली एकता कपूर ने तो अपना अलग ओटीटी प्लेटफॉर्म ही शुरू कर दिया। हर्षद मेहता के शेयर घोटाले पर 'स्कैम' जैसी सफल वेब सीरीज बनाई गई। कुछ और ऐसे विषयों को भी विस्तार से दिखाया, जो समय की बाध्यता के कारण सिनेमा के लिए संभव नहीं था और टीवी सीरियल के निर्माताओं में इसे बनाने का सब्र नहीं है।  
   कोरोना संकट के चलते सिनेमाघरों के दरवाजे साल भर से पूरे नहीं खुले। एक वक़्त ऐसा आया कि दरवाजे खुले, पर आधे दर्शकों के लिए!  लेकिन,बाद में वे भी बंद हो गए। यह भी पता नहीं कि ये दरवाजे कब पूरी तरह खुलेंगे और उसे दर्शक भी मिलेंगे या नहीं! सिनेमा इंडस्ट्री की हालत वैसे भी साल भर से खस्ता है। 2020 में करीब पूरे साल ही फिल्मों का निर्माण बाधित रहा। सिनेमाघर भी ठीक से नहीं खुल पाए और न कोई नई बड़ी फिल्म रिलीज हुई। यदि समय ने करवट ली और स्थिति सामान्य हुई तो यशराज की शाहरूख खान स्टारर फिल्म 'पठान' लाइन में है। इसके अलावा रोहित शेट्टी की 'सूर्यवंशी' भी बनकर अटकी पड़ी है। सलमान खान ने तो ना-नुकुर करते-करते 'राधे'  ओटीटी पर रिलीज कर दी। जबकि, करण जौहर, आशुतोष गावरीकर, शशांक खेतान, अयान मुखर्जी और फरहान अख्‍तर जैसे फिल्मकारों की फ़िल्में लाइन में खड़ी है। लेकिन, ये सब कोरोना के काबू में आने के बाद ही संभव हो सकेगा, पर ये कब होगा कोई नहीं जानता। 
     वेब सीरीज का सबसे सशक्त पक्ष है, इसकी विषय वस्तु! फिल्मों या सीरियल की तरह वेब सीरीज का अंत दर्शक को खुश करने के लिए नहीं होता! इसकी प्रेम कहानियां भी सुखांत नहीं होती, बल्कि उसमे भी कोई पेंच डालकर दर्शक में अगला सीजन देखने की उत्सुकता जगाई जाती है। वेब सीरीज की एक खासियत यह भी है, कि इसमें फिल्मों की तरह बड़े हीरो नहीं चलते! फिल्मों के चर्चित चेहरों को लेकर भी जो वेब सीरीज बनी, वो उतनी पसंद नहीं की गई जितनी नए चेहरों को लेकर। सुष्मिता सेन और अभिषेक बच्चन की वेब सीरीज ज्यादा पसंद नहीं की गई। क्योंकि, फिल्मों की मज़बूरी है कि उसमें स्‍टार कास्‍ट चलती है। टीवी सीरियल में भी पहचाने चेहरों की मांग की जाती है। जबकि, वेब सीरीज में उसका कंटेंट ही हीरो होता है, इसलिए नया चेहरा भी चलता है। वेब सीरीज ने राधिका आप्टे जैसी एक्ट्रेस को नई ऊंचाई दी। ओटीटी के कंटेंट में प्रतिभा की कद्र होती है! फिर वो कलाकार हो, लेखक हो, निर्देशक हो या कोई और विधा का व्यक्ति! इस माध्यम में काम का स्तर ही पसंद किया जाता है। क्योंकि, दर्शक के पास देखने के लिए बहुत सारे विकल्प खुले हैं। 
  ओटीटी पर सालभर में कई फ़िल्में रिलीज की गई! इनमें अमिताभ बच्चन और सलमान खान जैसे बड़े सितारों की फ़िल्में भी हैं। वास्तव में ये फिल्मकारों की मज़बूरी कहा जाना चाहिए कि उन्हें ऐसा करना पड़ा! पर, सारी कोशिशों के बाद भी इन फिल्मों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ये इस बात का प्रमाण भी है कि ओटीटी पर वहीं चलता है, जो दर्शकों की पसंद पर खरा उतरे! यदि ओटीटी पर इसी तरह दर्शक बढ़ते रहे, तो आश्चर्य नहीं कि सिनेमा और सीरियल का जमाना लद जाए। इस बात से इंकार नहीं कि वेब सीरीज का बाजार कोरोना के कारण उफान पर आया! लेकिन, इसके जोरदार कंटेंट ने भी फिल्मों को चुनौती दी है। सिनेमाघरों के बंद होने से मनोरंजन का कोई विकल्प भी नहीं है। लेकिन, जब सिनेमाघरों के दरवाजे पूरे खुलेंगे, तब असली परीक्षा होगी कि मैदान में कौन टिकता है! क्योंकि, हिंदी दर्शक बदलाव पसंद करता है और बहुत जल्दी ऊबता भी है। दर्शकों की इसी सोच पर सिनेमा का भविष्‍य टिका है। स्थिति सामान्य होने पर भी यदि उसका दिल वेब सीरीज में अटका रहा, तो समझ लिया जाएगा कि अब सिनेमा का भविष्य अच्छा नहीं है। लेकिन, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा। 
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Saturday, May 15, 2021

फिल्मों में भी गुदगुदाती रहती हैं यादें

- हेमंत पाल 

   यादें भी बड़ी अजीब होती हैं। कभी यह गुुदगुदाती हैं, तो कभी रूलाती हैं। कभी किसी की याद बरसों नहीं आती, तो कभी अचानक किसी की याद मन-मस्तिष्क पर दस्तक देने लगती हैं। इंसानों का यादों से लम्बा वास्ता होता है, यही कारण है कि फिल्मों में भी यादों का सिलसिला काफी पुराना है। यादों की जंजीर को जोड़कर फिल्मकारों ने कई प्रयोग किए। कभी कहानी में यादों को शरीक किया, तो कहीं यादों के तार छेड़कर कानों में रस घोलने का काम किया है। हिन्दी फिल्मों और यादों का ताना-बाना जितना पुराना है, उतना ही सुहाना भी है। यादों को लेकर हिंदी फिल्मों में कई तरह से प्रयोग किए गए। पहले जब श्याम-श्याम फिल्मों का जमाना था, तब भी फिल्मकारों ने नायक या नायिका की यादों के साथ छेड़छाड़ कर फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाया! जब समय के साथ फ़िल्में रंगीन हुई, तो यादें भी रंगीन होकर पर्दे पर रंग बिखेरने लगी।
    यह तो पता नहीं कि फिल्मों में यादों को कब और किसने याद किया, लेकिन इतना तो सभी जानते हैं कि फिल्मकारों ने सफलता के टोटके के रूप में इसे गाहे-बगाहे परदे पर उतारने का कारनामा किया। यदि श्वेत-श्याम फिल्मों की बात की जाए, तो इन फिल्मों की कहानियों में यादों का एक ऐसा दृश्य होता था, जब किसी दुर्घटना, हादसे या चोट से नायक और नायिका की याददाश्त चली जाती थी। जब लौटती थी, तो पहला सवाल यही होता था कि मैं कौन हूँ? कहां हूँ? अपनी भूली बिसरी यादों को ताक पर रखकर वह नए संबंध बना लेते थे और जब याददाश्त वापस आती, तो कहानी में अचानक मोड़ आ जाता! यह सिलसिला लगातार चलता रहता था। याददाश्त के आने-जाने या ऑन-ऑफ वाले फिल्मकारों ने तरह तरह के जुगाड़ किए। याददाश्त गुम करने या वापस लाने के लिए सिर पर डंडा मारने, सीढ़ियों से लुढ़काने, भगवान के दरबार में घंटियां बजने, बचपन में गाये या सुने गीत या फ्लैशबैक के फार्मूले जब पुराने पड़ गए तो 'गजनी' में लुपझुप करती याददाश्त को वापस लाने के लिए आमिर खान के पूरे शरीर को ही गुदवा दिया गया।
   गुजरे कल की फिल्में जिनमें यादों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनमें देव आनंद की फिल्म 'अमरदीप' याद आती है। इसमें वैजयंती से प्यार करने वाला देव आनंद सिर पर चोट खाकर अपनी याददाश्त भूल जाता है और फिर पद्मिनी के प्यार में नए नए स्वांग रचता है। जब वैजयंती माला उसे देखकर 'हमें आवाज न देना' गाना गाकर उसकी याददाश्त वापस लाती है, तो वह पद्मिनी को भुलाकर वैजयंती माला का दामन थाम लेता है। इसके बाद कथानक में उतार-चढाव आता है और आखिर में निर्माता को याद आता है कि फिल्म समाप्त करना है और वह वैजयंती माला और पद्मिनी को बिछड़ी बहनें बताकर एक का बलिदान लेकर दूसरी से मिलवा देता है।
   याददाश्त गुम होने और लौटकर आने पर आधारित फिल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना' का नायक एक सैन्य अधिकारी है, जो एक बम के धमाके में अपनी याददाश्त भुलाकर साधना से प्यार करने लगाता है। जब दूसरे धमाके में उसकी याददाश्त वापस आती है, तो साधना को भूल जाता है। फिर 'आप यूँ ही अगर हमसे मिलते रहे' गाकर उसकी याददाश्त लाने की कवायद करती है। इससे यह तो तय है, कि फिल्म के नायक या नायिका की याददाश्त वापस लाने में चाहे डॉक्टर असफल रहे गीतकार और संगीतकार मिलकर ऐसा गीत रचते हैं कि याददाश्त को वापस लौटना पड़ता है।
   याददाश्त खोकर पाने वाले नायकों में देव आनंद और जॉय मुखर्जी के अलावा ऋषि कपूर भी है, जिन्होंने 'हीना' सहित कई फिल्मों में यादें गुम की थी। इसके अलावा कभी विश्वजीत तो कभी राजेश खन्ना अपनी यादें गुम कर फिल्म की कहानी को नया मोड़ देने में कामयाब रहे हैं। ऐसी बात नहीं कि केवल नायकों की याददाश्त जाती हैं। नायिकाओं ने भी परदे पर याददाश्त गंवाने का काम किया है। इस फिल्म में साधना का नाम सबसे ऊपर आता है, जिसने 'मेरा साया' और 'अनिता' सहित कई सस्पेंस फिल्मों में याददाश्त खोने के बावजूद अपनी अदाओं से दर्शकों को रिझाया है। नायक और नायिकाओं के अलावा कभी नायक के बाप और कभी नायक की मां ने भी याददाश्त खोने और पाने के खेल में हाथ बंटाया है। नासिर हुसैन की फिल्म 'प्यार का मौसम' में निरूपा रॉय की याददाश्त चली जाती है और 'तुम बिन जाऊं कहां' सुनकर लौट आती है।
    सफल फिल्मों की लेखक जोड़ी सलीम जावेद ने भी यादों का सहारा लेकर 'जंजीर' और 'यादों की बारात' जैसी सफल फिल्में लिखी। बपचन में अपने मां-बाप की हत्या देखकर बच्चा अपनी याददाश्त भूल जाता है। फिर कभी लॉकेट तो कभी ब्रेसलेट देखकर उसकी याददाश्त लौट आती है और वह बदला, बदला, बदला चिल्लाने लगता है। 70 के दशक के बाद बनी तमाम फिल्मों में यादों को कुछ इस तरह से ही इस्तेमाल किया गया। यादों से केवल फिल्म की कहानी ही आगे नहीं बढ़ती, बल्कि यादों पर आधारित गीत भी खासे लोकप्रिय हुए हैं। याद किया दिल ने कहां हो तुम, जब आती होगी याद मेरी, तुझे याद करूं या भूल जाऊं ,वो जब याद आए, वो दिन याद करो, याद में तेरी जाग कर हम, यादों की बारात, तेरी याद दिल से भुलाने चला हूं। 'याद न जाए बीते दिनों की' और 'तुझे याद किया तेरा नाम लिया' जैसे यादगार गीत आज भी कानों में शहद घोलते हैं।
   यादों ने फिल्मों के टाइटल को भी नहीं छोडा है। यादों की बारात, यादों की जंजीर, वो दिन याद करो, तेरी याद आई और 'यादगार' के अलावा यादें नाम से भी दो फिल्में बनी। जिनमें एक के नायक सुनील दत्त थे तो दूसरी के रितिक रोशन। लेकिन, 'यादें' शीर्षक वाली इन फिल्मों के बारे में एक बात याद रखने लायक है कि दोनों ही बाॅक्स ऑफिस पर इतनी बुरी तरह पिटी, कि कोई आज इन्हें याद भी नहीं रखना चाहता।  
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जब कोई बात बिगड़ जाए!

- हेमंत पाल

    यह शाश्वत सत्य है कि जब जीवन में कोई दवा काम नहीं आती, वहाँ दुआ अपना असर दिखाती है। ये सिर्फ निजी जीवन में ही नहीं होता, फिल्मों में भी होता है। क्योंकि, हिन्दी फ़िल्में कहीं न कहीं लोगों के जीवन से जुड़ी होती है। फिल्मों में शुरुआत से अब तक ऐसे दृश्यों, संवादों और गीतों की भरमार है, जिसमें आपात स्थिति में कभी नायक तो कभी नायिका मंदिर का दरवाजा खटखटाते हैं और भगवान से कुछ अच्छा होने की उम्मीद करते हैं। सिनेमा हाल में बैठे दर्शक भी किसी चमत्कार की आशा करते हैं और चमत्कार होने पर तालियां बजाते हैं।
  अमिताभ बच्चन की सफल फिल्मों में से एक 'दीवार' फिल्म को ही लीजिए। फिल्म का नायक हमेशा मंदिर की सीढ़ियों के बाहर बैठा मिलता है। वह नास्तिक है, भगवान को नहीं मानता। लेकिन, फिल्म के अंत में जब उसकी मां की जान पर आन पडती है, वह भी लड़खड़ाते हुए, गिरते पड़ते मंदिर का घंटा थामकर जब कहता है 'आज खुश तो बहुत होगे' तो सिनेमाहाल में सन्नाटा छा जाता है। नाटकीय संवादों की अदायगी के बाद जब अमिताभ मंदिर से बाहर निकलता है तो ईश्वर की दुआ साथ लेकर जाता है।
     फिल्मकार मनमोहन देसाई ऐसे चमत्कार दिखाने में उस्ताद थे। उन्हें दर्शकों की नब्ज पकडना आता था। वे जानते थे कि हिंदी फिल्मों का दर्शक चमत्कार को स्वीकारता है और उसे नमस्कार भी करता था। यही कारण है कि 'अमर अकबर एंथोनी' में उन्होंने 'आया है तेरे दर पर सवाली' जैसा साईं भक्ति गीत जोड़कर चमत्कार दिखाया था। बरसों से अंधी निरूपाराय को आंख के साथ बेटा भी मिल जाता है। देव आनंद जैसे ग्लैमरस स्टार की फिल्मों में इस तरह के चमत्कारिक दृश्य कम ही देखे गए। लेकिन, 'गाइड' में पानी न बरसने से उसके साथ उपवास करते ग्रामीणों की परेशानी देखकर ईश्वर से सवाल कर बैठता है 'यह जिंदगी रहे ना रहे, मैं नहीं जानता कि तू हैं या नहीं, यदि तू है तो अपने बच्चों की सुन!' इसके बाद ईश्वर वाकई 'अल्लाह मेघ दे पानी दे' सुनकर अकालग्रस्त गांव को अपने आशीर्वाद की बौछारों से सराबोर कर देता है।
    भगवान को न मानने वाले नायक का भगवान के दरवाजे पर आकर दुआ मांगने का दृश्य पहले हर दूसरी फिल्म में शामिल किया जाता था। दर्शक भी समझ जाते थे, कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन दीवार, अमर अकबर एंथोनी और 'गाइड' जैसे दृष्य कभी कभार बन पाते हैं। ऐसे दर्जनों गीत हैं जिसमें थक हारकर ईश्वर से प्रार्थना के बोल होते हैं। ऐसे प्रार्थना गीत हर समय से दर्शकों को पसंद रहे हैं और गाहे-बगाहे सुनाई दे जाते हैं। देव आनंद की तरह ही शम्मी कपूर को भी पर्दे पर अक्सर नास्तिक ही दिखाया गया। लेकिन, उन्होंने भी 'उजाला' में 'अब कहां जाएं हम' फिल्म 'सच्चाई' में 'ओ मेरे खुदा ओ मेरे परमात्मा' जैसे गीत गाए हैं। 'तुमसे अच्छा कौन है' में अपनी अंधी बहन के बलात्कारी को खोजने में हताश शम्मी कपूर जब मंदिर जाकर अपने को कोसते हुए प्रार्थना करता है, तो उसे खलनायक का लॉकेट मिल जाता है और उसके साथ दर्शक भी राहत सांस लेते हैं।
    इस तरह के प्रार्थना गीतों में 'दो आंखे बारह हाथ' का गीत 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' आज भी परेशानी में हौंसला बढ़ाता है। दिलीप कुमार की फिल्मों में भगवान और दिलीप कुमार के बीच के संवाद दृश्य बहुत पसंद किए जाते थे। उनकी फिल्म 'दिल दिया दर्द लिया' भले ही असफल रही हो, पर फिल्म में दिलीप कुमार और भगवान शंकर के बीच फिल्माए गए संवाद बहुत लोकप्रिय हुए थे। वैसे तो परदे पर 'आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है, भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है' और 'इंसाफ का मंदिर है ये भगवान का घर है' जैसे गीतों के जरिए दर्शकों को भावनाओं में बहाने में कामयाब रहे हैं।
    निराशा और हताशा के समय में हमारे फिल्मी गाने प्रेरक साबित होकर वैक्सीन या बूस्टर की भूमिका निभाते हैं। इन दर्जनों गीतों में मोला मेरे मोला, तेरे दर पर आया हूं कुछ करके जाऊंगा, तेरे द्वार खड़ी दुखियारी, अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम, ना मैं धन चाहूँ ना रतन चाहूं, इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना, तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो, हमको मन की शक्ति देना, ओ पालन हारे निर्गुण और न्यारे तुमरे बिन हमरा कोनू नाही जैसे प्रार्थना गीत न केवल मन की शांति देते हैं, बल्कि परेशानी से जूझते हुए आगे बढ़ने और मुसीबत को हराकर उसे जीतने की प्रेरणा भी देते हैं।
   दरअसल, प्रार्थना निर्बल और सभी तरह से हताश इंसान की सबसे बड़ी शक्ति है। प्रार्थना के स्वर में गुथी तडप धरती से होकर सीधे आसमान पर बैठे ईश्वर तक पहुंचती है । जब आज की तरह कोरोना से लड़ते इंसान के सारे उपाय निष्फल हो रहे हैं और आस की डोर टूटने लगी है, तो अनायास वह सबकुछ भूलकर उस पर विश्वास कर कहने लगा है 'जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए तुम देना साथ मेरा' ऐसे में उसे यकीन भी है, कि उसकी प्रार्थना भगवान तक जरूर पहुंचेगी। 
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