Friday, December 30, 2016

रैलियों के सामने दुबका प्रशासन और सिमटी गाइड लाइन!


- हेमंत पाल 

  भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता और न कोई मर्यादा! इसी भीड़ का बदला चेहरा है सडकों पर निकलने वाली रैलियाँ! कभी ये रैलियाँ राजनीतिक होती है, कभी धार्मिक तो कभी सामाजिक! इंदौर में एक ऐसी ही राजनीतिक रैली का उत्साह एक बच्चे की जान पर बन आया! ज्ञान, शील, एकता और अनुशासन का दावा करने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की रैली के कारण हुए ट्रैफिक जाम कारण एक बीमार बच्चे को अस्पताल पहुँचाना मुश्किल हो गया! क्योंकि, सत्ताधारी भाजपा से जुड़े इस छात्र संगठन के सामने पूरा जिला और पुलिस प्रशासन शरणागत था! इंदौर में ये पहली बार नहीं हुआ! इससे पहले भी एक घटना में बीमार की जाम में फंसने से मौत हो चुकी है! दरअसल, ये समस्या सिर्फ इंदौर की नहीं है! प्रदेश के सभी छोटे-बड़े शहरों के वासियों को इस तरह की रैलियों से अकसर जूझना पड़ता है। कहने को इस तरह की रैलियों के लिए जिला प्रशासन ने गाइड लाइन बना रखी है! लेकिन, ये गाइड लाइन अकसर सत्ता की उँगलियों की कठपुतली बन जाती है! इंदौर में भी रैलियों के लिए गाइड लाइन तो है, पर उसका कभी पालन नहीं होता! कभी किसी नेता की रैली लोगों का रास्ता बंद कर देती है, कभी कोई धार्मिक यात्रा लोगों की दिनचर्या के आड़े आ जाती है! सवाल ये है कि प्रशासन की सारी कथित सख्ती इन शक्ति प्रदर्शन करने वाली भौंडी रैलियों के सामने दुबक क्यों जाती है?
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   रैलियों का चरित्र बड़ा विचित्र होता है! ये किसके लिए होती हैं, क्यों होती हैं और इससे क्या हांसिल होता है? इसका कोई ठीक-ठीक मकसद सामने नहीं आ पाया! इस तरह की रैलियों से कौन प्रभावित होता है, इसे लेकर भी कोई अध्ययन शायद आजतक नहीं हुआ! ये बात सिर्फ राजनीतिक रैलियों के लिए नहीं, उन सभी राजनीतिक और धार्मिक संगठनों पर भी लागू होती है, जो रैलियों के पक्षधर हैं! सभाओं का तो मकसद साफ़ है कि अपनी बात कहने और विरोधी की आलोचना के लिए ये सबसे सशक्त माध्यम है! पर, सड़क पर भीड़ इकट्ठा करके उद्दंडता दिखाना महज भौंडे शक्ति प्रदर्शन के अलावा और कुछ नहीं है! ऐसे प्रदर्शनों से सिर्फ वे ही लोग खुश होते हैं, जो इसका हिस्सा होते हैं! बाकी तो सारे लोग इसके खिलाफ ही हैं! क्योंकि, सड़कें मंजिल तय करने और गंतव्य तक पहुँचने के लिए होती हैं, शक्ति प्रदर्शन के लिए कदापि नहीं! रैलियों के कारण वे सारे लोग प्रभावित होते हैं, जो इन सड़कों से गुजरते हैं! आखिर स्कूल जाने वाले बच्चों, एम्बुलेंसों, ऑफिस जाने वाले लोगों और सड़क से गुजरने वालों का इन रैलियों से क्या वास्ता? अब तो ये रैलियाँ हादसों का भी कारण बनती जा रही हैं!     
 हाल ही में इंदौर के पश्चिमी इलाके का बड़ा हिस्सा करीब तीन घंटे तक ऐसी ही राजनीतिक रैली का बंधक रहा। इसी रैली के कारण एक बच्चा मौत के मुँह में जाते-जाते बचा जो तेज बुखार के बाद बेहोश हो गया था! उसे अस्पताल ले जाना था, लेकिन, रैली के कारण ट्रैफिक जाम था! उस बच्चे को गोद में उठाए उसकी बुआ वाहनों की भीड़ के बीच से रास्ता देने की गुहार लगाती रही। लेकिन, न तो वहां तैनात पुलिसवालों ने कोई पहल की और रैली के आयोजकों ने! ऐसे में कुछ संवेदनशील लोग सामने आए और उस बच्चे को वक़्त पर अस्पताल पहुँचाया! क्योंकि, हज़ारों उत्साही और उच्श्रृंखल युवाओं की भीड़ की वजह से चारों तरफ अराजकता का माहौल था! रैली में नारे लगाती भविष्य के नेताओं की भीड़ भी ये सब देखते हुए अपनी राह चलती रही! इस महिला की पीड़ा तो सामने आ गई! पर, शहर में जहां-जहां से ये रैली गुजरी, उस इलाके के लोग परेशान होते रहे! ये रैली एबीवीपी के देशव्यापी सम्मेलन की शुरुवात पर निकाली गई थी! देशभर से आए कार्यकर्ताओं को शहर की संस्कृति से परिचित कराने के लिए निकली इस रैली से शहर परेशान ज्यादा हुआ! पुलिस और प्रशासन को रैली की पूर्व सूचना भी थी! लेकिन, रैली शुरू होने के आधे घंटे में ही हालात बेकाबू हो गए। 
  आजकल हर शहर में ऐसी रैली निकलना आम बात है। कभी राजनीतिक पार्टियां, कभी धार्मिक संगठन तो कभी सांस्कृतिक रैलियों के कारण छोटे-बड़े शहर बंधक बन जाते हैं! व्यवस्था में लगे ट्रैफिक पुलिस के जवान प्रभावित लोगों को छोटी-छोटी गलियों में हकाल देते हैं! ये जाने बगैर कि क्या सडकों की भीड़ गलियों के रास्ते गंतव्य तक पहुँच सकेगी? नतीजा ये होता है कि सड़क पर रैलियों का उत्साह कुंचाले भरता है और गलियों में लोग गुत्थम-गुत्था होते रहते हैं! ये हर उस शहर की कहानी है, जो इस तरह की रैलियों की पीड़ा को झेलने के लिए अभिशप्त है! इंदौर अकेला शहर नहीं है, जहाँ राजनीतिक पार्टियों और धार्मिक संगठनों की रैलियां निकलती हैं। करीब सभी शहर ऐसी रैलियों और प्रदर्शनों को भोगते हैं! लेकिन, इस सबके बीच आम लोगों की परेशानियों से किसी को सरोकार नहीं! प्रशासन भी सत्ता के जोर के सामने खुद को असहाय पाता है। रैलियों के रुस्तम सड़कों को जाम करना अपनी शान समझते हों, लेकिन एंबुलेंस, स्कूल बसों, ज़रूरतमंदों और अपने काम पर जाते लोगों को घंटों एक जगह पर रोक देना क्या ठीक है? इसे लेकर प्रशासन पर भी उंगलियाँ उठती हैं। 
  आखिर क्यों शहर के बीचों-बीच या फिर व्यस्ततम रास्तों में रैलियों की इजाजत ही क्यों दी जाती है? शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को तोड़मरोड़ देने वाली इन रैलियों और प्रदर्शनों पर या तो रोक लगनी चाहिए या फिर रैलियां शहर के बाहर कम ट्रैफिक वाले रास्तों से होकर गुज़रें! ये संभव न हो तो प्रशासन इतनी मुस्तैद व्यवस्था करे कि रैली और गुजरने वाले लोग दोनों ही रास्तों से निकल सकें। जब रैली की आड़ में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता सड़क पर अपना जोश दिखाने उतरते हैं, तो लगता है जैसे पूरा शहर इनकी प्रजा है! आखिर एंबुलेंस, बीमार, स्कूल बस और आम आदमियों के सामने इस शोर-शराबे का क्या मतलब? 
   रैलियों और प्रदर्शनों की ख़बर सुनते ही लोगों के सामने से ट्रैफिक जाम में फंसने की आशंका उभरने लगती है। क्योंकि, इन रैली या प्रदर्शनों की विशालता और सफलता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जाता है कि उसमें कितने लोग शामिल हुए? सड़कों पर कितना लंबा ट्रैफिक जाम लगा और लोग कितना परेशान हुए? इस तरह के आयोजन जनता के मुद्दे उठाने के नाम पर किए जाते हों, पर परेशान भी जनता ही होती है! ये एक तरह से राजनीतिक संवेदनहीनता का लिटमस टेस्ट है। इस तरह के आयोजनों के गर्भ में वीआईपी कल्चर और आम आदमी के बीच फर्क बताने वाला सोच है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि नेता जब वोट मांगने आते हैं, तो वे आम आदमी के सबसे बड़े हितैषी होने का दावा करते हैं। लेकिन, वोट मांगने की प्रक्रिया में ही वे लोगों की ही मौत की वजह बन जाते हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं होती कि उनकी रैली की वजह से किसी की जान जा सकती है। क्योंकि, जब मरीज को ले जा रही एम्बुलेंस के पहिये थमते हैं, तो अंदर मरीज की साँसों के भी थमने का खतरा बढ़ जाता है!     
 वैसे भी हमारे देश में एंबुलेंस को रास्ता देने का कोई नियम नहीं है! एंबुलेंस को रास्ता देने की सोच ज़्यादातर लोगों में दिखाई नहीं देती। देश में एम्बुलेंस जैसे आपात वाहनों का रास्ता रोकने या रास्ता न देने पर अलग-अलग राज्यों में 500 रूपए से 2 हज़ार रूपए तक जुर्माने का प्रावधान है। शायद ही कोई इस नियम के बारे में जानता होगा! जानता भी होगा, तो इस कानून का सम्मान नहीं होता है। आम लोगों के लिए ये भले कानून हो, लेकिन संवेदनहीन नेताओं के लिए देश में कोई कानून नहीं होता! ऐसी तस्वीरें आम होती हैं, जब ट्रैफिक सिग्नल पर कोई एंबुलेंस रास्ता मिलने का इंतज़ार कर रही होती है। लेकिन, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता! एंबुलेंस को रास्ता देना सभी की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है, जिसका अहसास होना भी बहुत ज़रूरी है। लेकिन, उससे भी ज्यादा जरुरी है आम आदमी की तकलीफों का ध्यान रखकर रैलियों से तौबा करना! ये सबक राजनीति के साथ धार्मिक और सामाजिक संगठनों के ठेकेदारों के लिए भी उतना ही जरुरी है! यदि ये लोग आसानी से काबू में न आएं तो प्रशासन का दायित्व बनता है कि वे नियम-कानून के चाबुक से रैलियों को सड़कों से धकेलकर सड़कों को आम लोगों के लिए खाली करवाए!  
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Sunday, December 25, 2016

प्यार के इजहार की अमर दास्तान

- हेमंत पाल 

   वक़्त के साथ सब कुछ बदलता है। सिनेमा भी और समाज भी! जो नहीं बदलता उनमें से एक है 'प्रेम कहानियां!' जब से सिनेमा के परदे ने जन्म लिया, वो प्रेम के रंग में रंग गया। लेकिन, समाज के दौर के साथ सिनेमा के परदे पर प्रेम कहानियां भी बदलती रही। हर दौर की प्रेम कहानियां भी अलग-अलग होती है। हमने अपने हीरो भले सिनेमा से नहीं पाए हों, लेकिन प्यार का इजहार तो उन्हीं से सीखा! प्रेम के मामले में सिनेमा अनूठी दुनिया रचता रहा है। ये उन तमाम कल्पनाओं को असल रंग देता है, जिन्हें छोटे कस्बों और शहरों में जवान होते पूरा करना मुमकिन नहीं होता! सिनेमा और उसके सिखाए प्रेम के इस फलसफे का असल मतलब इस परदे ने ही सिखाया! सामाजिक व्यवस्थाओं के बंधनों के उलट दिलों में जन्म लेती हर प्रेम कहानी पर सिनेमा की छाप होती है। प्रेमी जोड़ों ने कभी पहली मुलाकात के लिए घर का पिछवाड़ा चुना, तो किसी ने महबूबा को देखकर रोमांटिक फ़िल्मी गीत गुनगुनाया!

  जब भी परदे की अमर प्रेम दास्तान का जिक्र होता है 'मुगले आजम' के बिना बात पूरी नहीं होती! फिल्म में सामंती व्यवस्था के गढ़ में प्रेम का खुला इजहार करती अनारकली का गाना 'प्यार किया तो डरना क्या' कौन भूल सकता है! ये फिल्म सामंती समाज के सामने विरोध स्वरूप खड़े 'प्रेम' का अमर दस्तावेज भी है। ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने की ऐसी ही एक फिल्म थी 'जिस देश में गंगा बहती है!' इसमें नायक राजकपूर का नायिका वैजयंती माला से प्रेम का इजहार करने का अंदाज आज भी उस ज़माने के लोगों को याद होगा! फिल्म के एक सीन में नायक का ये कहना 'कम्मो, शिवजी की कृपा रही तो एक दिन मेरा एक फूल सा लल्ला होगा! क्या आप मेरे उस लल्ला की माँ बनेंगी?' जबकि, नए दौर में क्या कोई अपने  प्रेम का इस तरह इजहार करेगा? बीते ज़माने एक फिल्म थी 'तेरे घर के सामने' जिसमें कुतुब मीनार के भीतर देव आनंद से नूतन पूछती हैं कि क्या तुम्हें खामोशी की आवाज सुनाई देती है? देव आनंद अपने अंदाज में नूतन से कहते हैं 'हमें तो बस एक ही आवाज सुनाई देती है, दिल की आवाज!' इसके साथ ही एसडी बर्मन का रचा गीत बज उठता है 'दिल का भंवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो!'
 मारधाड़ से भरी फिल्म 'शोले' में वीरू और बसंती के मुँहफट प्रेम का जो भी अंदाज था, पर असल प्रेम कहानी तो जय (अमिताभ बच्चन) और राधा (जया) ने रची! इन दोनों के बीच जो भी बंधन था, उसमें जय के माउथऑर्गन का संगीत घुला था। इसे सिनेमा संसार की सबसे खामोश प्रेम कहानी भी कहा जा सकता है। बरामदे में बैठे अमिताभ माउथऑर्गन बजा रहे हैं, जया ऊपर लैंप बुझाती हैं। उस वक़्त दोनों की आँखों की कशिश बहुत कुछ कहती है। अमिताभ की मौत के बाद जया वो खिड़की बंद कर देती है, जो जय के कमरे की तरफ खुलती है। आमिर खान, प्रीति जिंटा की फिल्म 'दिल चाहता है' को नई पीढ़ी के लिए ट्रेंड सेटर समझा जाता है। इसमें प्यार को कविता के अंदाज में प्रदर्शित किया गया है। नई पीढ़ी के लिए ये फिल्म आज भी लव-एंथम जैसी है। मोहब्बत के रंग में रंगी एक और फिल्म है 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जिसका हर सीन प्यार का इजहार ही था! इस फिल्म का ये दृश्य कौन भूल सकता है! 'राज, अगर ये तुझे प्यार करती है तो पलट के देखेगी, पलट ... पलट!' 
  सई परांजपे की फिल्म 'स्पर्श' में भी प्लेटोनिक प्रेम था। ब्लाइंड स्कूल के प्रिंसिपल अनिरुद्ध (नसीरुद्दीन शाह) खुद देख नहीं सकते! वे कविता (शबाना आजमी) से जानना चाहते हैं कि वो कैसी दिखती हैं? कविता उन्हें खुद की सुंदरता के बारे में बताती हैं। आंखों के बारे में, जुल्फों के बारे में, रंग के बारे में! लेकिन, अनिरुद्ध कहते हैं कि तुम मेरे लिए इसलिए सुंदर हो, क्योंकि तुम्हारे बदन की सुगंध निषिगंधा के फूलों जैसी है। तुम्हारी आवाज सितार की झंकार की तरह और तुम्हारा स्पर्श मखमल की तरह। परदे की दुनिया के ऐसे रूमानी किस्सों की कमी नहीं है। परदे पर प्रेम के इजहार के ये प्रसंग हिंदी सिनेमा में 'प्रेम' को ऐसे आयाम पर ले जाते हैं, जहाँ सारे रिश्ते गौण हो जाते हैं। 
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Friday, December 23, 2016

बड़े मुद्दे छोड़ आलू, प्याज की राजनीति में उलझी कांग्रेस

- हेमंत पाल    

   मध्यप्रदेश में राजनीति की मुख्यधारा पूरी तरह भाजपा केंद्रित हो गई! विपक्ष के रूप में कांग्रेस की भूमिका कहीं नजर नहीं आ रही! कुपोषण और व्यापम जैसे बड़े मुद्दों को अनदेखा करके कांग्रेस आलू, प्याज की राजनीति में उलझ गई! लेकिन, जनता ने जिस विपक्ष को चुना था, वो कहाँ गया? ये सिर्फ इंदौर की बात नहीं, पूरे प्रदेश में यही हालत है। कांग्रेस के गिने-चुने विधायक या तो सुप्त अवस्था में कहीं दुबके पड़े हैं या उन छोटे मुद्दों को राजनीतिक रंग दे रहे हैं, जिनका कोई भविष्य नहीं है! पिछले तीन सालों में विपक्ष के रूप में कांग्रेस ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिसके लिए उसकी पीठ थपथपाई जाए। सरकार का विरोध करके नकारात्मक राजनीति के सहारे खुद को मीडिया में जिंदा रखने वाले कांग्रेसी नेता अभी तक आम लोगों को प्रभावित करने में असमर्थ रहे हैं! उन्हें इसका मौका भी मिला तो वे खामोश रहे।    

   मध्यप्रदेश कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है। बीते तीन सालों में प्रदेश सरकार ने ऐसी कई गलतियां की है, जो उन्हें कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी थी! लेकिन, कांग्रेस के नाकारा नेताओं ने कोई पहल नहीं की! न तो विधानसभा में सरकार को घेरने की कोशिश की और न सड़क पर! व्यापम के भर्ती कांड के बाद बाल कुपोषण ऐसा ज्वलंत मुद्दा है, जो सरकार को परेशान कर सकता था। किन्तु, विपक्ष के रूप में कांग्रेस की अनदेखी से सरकार की हिम्मत बढ़ गई! ये सच किसी से छुपा नहीं है कि इस साल कुपोषण को लेकर दो आंकड़े सामने आए। जनवरी 2016 में प्रदेश सरकार के मासिक प्रतिवेदन में प्रदेश में 17 प्रतिशत बच्चे कम वज़न के होना बताया गया! लेकिन, फ़रवरी 2016 में चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के अनुसार मध्यप्रदेश में 42.8 प्रतिशत बच्चे कम वज़न के हैं। इस कुपोषण के कारण क्या हैं और इसके लिए दोषी कौन है, ये सभी को पता है! लेकिन, कांग्रेस इस मुद्दे से बचकर क्यों निकल गई, ये सवाल जिंदा भी है और अहम् भी!
  सरकार ने प्रदेश में कुपोषण में कमी के दावे को सही साबित करने जैसे महत्वपूर्ण काम में भी गड़बड़ी की! इसे सीधे शब्दों में ये निगरानी का भ्रष्टाचार कहा जा सकता है। सरकार की इतनी हिम्मत इसलिए बढ़ी कि उसकी निगरानी करने और उसे कटघरे में खड़ा करने वाला विपक्ष कोने में कहीं दुबका पड़ा है! वास्तव में कुपोषण को लेकर कांग्रेस ने कभी होमवर्क तक नहीं किया। मध्यांह भोजन और आंगनवाड़ियों झांकने तक की जहमत नहीं उठाई कि वहाँ क्या चल रहा है? आरोप तो यहाँ तक हैं कि कांग्रेस को जो मुद्दे बिना किसी मेहनत के बाहर से मिलते हैं, उनको लेकर भी कांग्रेस का रवैया ढीलपोल वाला रहा! वे मसले भी सरकार के सामने न उठाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया जाता है। इसका नतीजा ये हुआ कि सरकार के खिलाफ जो गुप्त मोर्चा सक्रिय था, उसने भी कांग्रेस पर भरोसा करना छोड़ दिया! विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ कांग्रेस ने भी चुनाव घोषणा पत्र में मध्यप्रदेश को कुपोषण मुक्त बनाने का वादा किया था। लेकिन, सरकार के ढीले प्रशासन तंत्र और कमजोर इच्छाशक्ति के कारण हर साल अरबों रुपए बहाने के बाद भी कुपोषण की समस्या मौजूद है। जबकि, कांग्रेस के नाकारापन ने सरकार को लापरवाह बना दिया! जहाँ विपक्ष कमजोर होगा, वहाँ स्वाभाविक है कि सरकार लापरवाह हो ही जाएगी!
  यही सब व्यापम भर्ती घोटाला मामले में भी हुआ! इसमें कौन दोषी है, ये सच अभी सामने नहीं आया! पर, इसमें कांग्रेस की ख़ामोशी और मामले की अनदेखी ने हमेशा संदेह ही पैदा किया है। मेडीकल कॉलेज में फर्जी एडमीशन से सामने आया ये मामला इतना बड़ा हो सकता है, ये सोचा नहीं गया था। लेकिन, इसमें भी कांग्रेस की कोशिश हमेशा बचकर निकलने की ही रही! सवाल उठता है कि कांग्रेस उन बड़े मुद्दों पर चुप क्यों हो जाती है, जिनमें वो सरकार की घेराबंदी कर सकती है? विधानसभा में भी तार्किक आधार पर कांग्रेस कभी मुखर नहीं होती! विपक्ष की इससे ज्यादा ख़राब हालत क्या हो सकती है कि विधानसभा में प्रतिपक्ष का कोई औपचारिक नेता ही नहीं है! कांग्रेस की यही स्थिति संगठन के स्तर पर है! अरुण यादव का इतना दबदबा ही नहीं बन पाया कि वो मुखिया की तरह कांग्रेस को संचालित कर सकें! विधायक भी अपनी मर्जी से मुद्दों का दोहन करते रहते हैं! जीतू पटवारी इंदौर के ऐसे ही कांग्रेसी विधायक हैं जो पूरी तरह बेलगाम लगते हैं।   नोटबंदी के मुद्दे पर कांग्रेस किस तरह राजनीति चमकाने की कोशिश में लगी है, इसका सबूत कुछ दिन पहले इंदौर में दिखाई दिया। इंदौर के इकलौते कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी ने अपने कुछ समर्थकों के साथ कलेक्टर ऑफिस के बाहर सड़क पर आलू फेंके! प्रचारित किया गया कि ये आंदोलन उन आलू उत्पादक किसानों के लिए किया गया, जिन्हें आलू के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा! आरोप था कि नोटबंदी के कारण किसानों का आलू थोक में एक से दो रुपए किलो बिक रहा है। इससे किसान परेशान हैं और उनके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई चारा नहीं! ये तो वो नकली सच था, जो इस प्रदर्शन के लिए दिखाया गया। जबकि, सच्चाई इससे अलग है। हुआ ये कि बड़े आलू उत्पादकों और आलू व्यापारियों ने नोटबंदी का फ़ायदा उठाने के लिए बड़ी मात्रा में आलू का स्टॉक कर लिया था। उन्हें उम्मीद थी कि आलू जब महंगा होगा, तो वे चाँदी काटेंगे! लेकिन, उनकी चाल उल्टी पड़ गई।
  देशभर में आलू की कीमतें नहीं बढ़ी और बाजार में नई फसल आ गई। ऐसे में इन जमाखोर किसानों और व्यापारियों को घाटा होने लगा! यही सब 6 महीने पहले प्याज की फसल को लेकर हुआ था! तब सरकार ने 6 रुपए किलो प्याज खरीदकर किसानों की मदद की थी। लेकिन, सरकार को इस भलमनसाहत से बड़ा घाटा झेलना पड़ा! प्याज से किसानों को नुकसान की बात सही थी! पर इस बार कांग्रेस ने जिस मुद्दे को तूल देने की कोशिश की, वो महज आलू उत्पादक गरीब किसानों से नहीं जुड़ा है। ये मुसीबत उन जमाखोर बड़े किसानों और व्यापारियों की है, जिन्होंने मुनाफे के लिए हज़ारों बोरे आलू महंगे होने की आशंका के चलते स्टॉक कर लिया था। इनकी इच्छा तो बाद में महंगे दाम पर आलू बेचने की थी! लेकिन, आलू के सस्ते दामों ने दांव पलट दिया। इसे जब कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी का साथ मिला। नोटबंदी के बाद परेशान कथित आलू उत्पादक किसानों की लड़ाई लड़ रहे विधायक जीतू पटवारी ने इंदौर जिला जेल में तीन ट्रैक्टर आलू भी पहुंचाए। दरअसल, पटवारी ने जब प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जिला जेल भेज दिया था। जेल से रिहा होने के अगले दिन बाद वे आलू लेकर जिला जेल पहुंचे और परिसर में रख दिए।
   इसी साल मई में जीतू पटवारी ने इसी तरह का प्रदर्शन प्याज उत्पादकों के लिए किया था। प्रदेश में प्याज का उत्पादन इतना अधिक हो गया था, कि किसान लागत नहीं निकल पाने के कारण प्याज को 20 से 30 पैसे किलो बेचने को मजबूर हो गए थे। तब भी विधायक पटवारी के साथ किसान प्याज की गिरती कीमतों के विरोध में प्रदर्शन करने कलेक्टर ऑफिस पहुंचे थे। प्रदर्शन के दौरान किसानों ने कलेक्टर ऑफिस के बाहर सड़क पर प्याज फैंका! वे किसान भी राऊ विधानसभा क्षेत्र के बिजलपुर के थे। किसानों ने साथ लाया प्याज सड़कों पर बिखेर दिया था। कुछ देर में कलेक्टर ऑफिस के आसपास की पूरी सड़क प्याज के ढेर से पट गई! कलेक्टर ऑफिस के आसपास की बस्तियों में रहने वाले लोगों और कई राहगीरों में सड़क पर बिखरी इस प्याज को उठाकर अपने साथ ले जाने के लिए होड़ मच गईं। लेकिन, तब मुद्दा सही था इसलिए सरकार ने भी उसे गंभीरता से लिया और मदद के लिए आई! जीतू पटवारी को लगा कि उनका पुराना फार्मूला फिर काम कर जाएगा, पर ऐसा नहीं हुआ! इस मामले में विधायक के साथ कांग्रेस  को भी बट्टा लगा है!
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Tuesday, December 20, 2016

सौ करोड़ की दौड़ में पीछे छूटे गाँव



हेमंत पाल 

   याद कीजिए, बीते कुछ सालों में आपने कोई ऐसी नई फिल्म देखी है जिसमें ठेठ गाँव नजर आया हो? 'लगान' के बाद तो शायद ऐसी कोई फिल्म आई भी नहीं, जिसकी पूरी कहानी गाँव पर केंद्रित हो! 'पीपली लाइव' जरूर आई, पर उसमें किसानों के लिए बनी योजनाओं को बाबुओं और अफसरों द्वारा हड़पने का जिक्र ज्यादा था! अभी जो फ़िल्में आ रही हैं, वो हाई-फाई सोसायटी के आसपास घूमती हैं। उसमें कारपोरेट कल्चर होता है, कंपनियों को टेकओवर करने की चालें होती हैं, पर कहानी मेट्रो शहरों से बाहर नहीं जाती! 
  अब तो गाँव की जिंदगी और परंपराओं पर फ़िल्में बनाने के लिए पहचाने जाने वाले 'राजश्री' भी बड़े परिवारों की कहानियों पर मल्टीस्टारर फ़िल्में बनाने लगे हैं! नदिया के पार, बालिका वधु और गीत गाता चल जैसी कालजयी फ़िल्में बनाने वाली ये फिल्म निर्माण कंपनी भी गाँवों से शहर पहुँच गई! सारा मामला व्यावसायिक है। सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने की अंधी दौड़ से कौन पिछड़ना चाहेगा? इस नजरिए से देखा जाए तो सिनेमा के परदे से गाँव की मिट्टी की सौंधी महक और लोकगीत तो गायब हो गए! ये दौर आज-कल में नहीं आया! 80 के दशक के बाद से ही फिल्मकारों ने धीरे-धीरे गाँवों की धूलभरी पगडंडी को छोड़ दिया था!
  हिंदी फ़िल्मी दुनिया की सर्वाधिक सफल मानी जाने वाली रमेश सिप्पी की 'शोले' रामगढ़ नाम के गाँव की ही कहानी थी! लेकिन, वास्तव में इस फिल्म से भी गाँव नदारद था। जो गाँव था वो डाकू गब्बर सिंह और बदले पर उतारू ठाकुर साहब के बीच कहीं गुम था। यहाँ तक कि फिल्म के गीतों में भी गाँव नहीं झलका! फिल्म में कोई लोकधुन सुनाई नहीं दी! गब्बर सिंह भी अपने अड्डे पर अरबी धुन वाला 'महबूबा ओ महबूबा' गाना सुनता है। याद किया जाए कि 'शोले' की सफलता ने फ़िल्मी गाँव की जिंदगी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया! इससे पहले जो फ़िल्में गाँव के जीवन पर बनी, उनमें एक अलग सी महक होती थी! गाँव हमारा-शहर तुम्हारा, दो बीघा जमीन, आक्रोश को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। 
  1980 में गोविन्द निहलानी ने गाँव पर केंद्रित फिल्म 'आक्रोश' आई थी। यह फिल्म एक लोमहर्षक सच्ची घटना पर बनी थी। कहानी लहनिया भीकू नाम के एक किसान की है, जो ज़मींदार के अत्याचारों से त्रस्त है। उसकी पत्नी के साथ ये लोग गैंगरेप करते हैं, लेकिन जेल होती है लहनिया को! पत्नी लक्ष्मी शर्म से ख़ुदकुशी कर लेती है। जेल नई निकालकर उसे पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए लाया जाता है। वहाँ गैंगरेप करने वाले उसकी बहन को ही ललचाई नज़रों से देखते हैं। वह पास पड़ी कुल्हाड़ी उठा लेता है और उन गुंडों को काट डालता है। ये था गाँव और वहाँ का दर्द! इसी दौर में डाकुओं पर भी फ़िल्में बनी उनमें भी गाँव था, अत्याचार था और डाकू बनने की एक संवेदनशील कहानी थी! 
 आज का दर्शक तो परदे पर देश कम, विदेश ज्यादा देखता है। परदे से गाँव नदारद होने का सबसे ज्यादा असर ये हुआ कि अपनत्व की भावना गायब हो गई! आज की कहानियों में तो काल्पनिक प्रेम और मौज मस्ती ही ज्यादा होती है। जबकि, सिनेमा का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं है। सिनेमा समाज का आईना भी है। दर्शकों को सामाजिक समस्याओं और उनके निवारण की राह भी दिखाई जाना चाहिए। हमारे देश की 60 फीसदी आबादी गाँवों में रहती है। ऐसे में परदे पर गाँव का प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है! इसके साथ ही आज तो सिनेमा हॉल में किसी सीन पर दर्शकों की आँखें तक नहीं भीगती! क्योंकि, ऐसे दृश्यों में आज के  फिल्मकार भावनाएं नहीं डाल पाते! अब तो सिनेमा हॉल में सिक्के भी उछलते नहीं दिखते! शायद ही बरसों से किसी ने सिनेमा हॉल में किसी दर्शक को गाने पर डांस करते देखा हो! इसलिए कि अब न तो फ़िल्मी कथानकों में भावनात्मकता है और मिट्टी की वो महक जिससे हिंदी का फिल्मलोक रोशन था! 
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आलू के जमाखोरों के लिए सड़क पर उतरी कांग्रेस!

- हेमंत पाल 

 बड़े मुद्दों से मुँह फेरकर बैठी कांग्रेस अब छोटे-छोटे मामलों पर राजनीति करने लगी! इंदौर में कांग्रेस विधायक ने पहले प्याज को मुद्दा बनाकर राजनीति की रोटियाँ सेंकने का काम किया था! अब सड़क पर आलू बिखेरकर राजनीति गरमाई! तीन दिन पहले कलेक्टरेट के सामने आलू फैंके थे, आज इसी मुद्दे पर चोइथराम मंडी बंद करवाई! जबकि, असलियत में आम आदमी के लिए आलू सस्ता नहीं हुआ, फिर ये मुद्दा कहाँ से पनपा? वास्तव में आलू के बड़े किसानों और स्टॉकिस्टों के दबाव में कांग्रेस सड़क पर उतरी है! 
   इंदौर जिले की आठ विधानसभा सीटों में से सात पर भाजपा के विधायक हैं। अकेली राऊ सीट कांग्रेस के पास है! इसी एक सीट के विधायक जीतू पटवारी के बारे में चर्चित है कि वे बेसिरपैर के मुद्दों हवा देकर माहौल बनाते हैं! तीन दिन पहले उन्होंने आलू उत्पादकों की अगुवाई की और प्रशासन के सामने तीन ट्रॉली आलू बिखेर दिए! वास्तव में ये आलू के किसानों की समस्या जैसा मसला नहीं है! ये आलू का स्टॉक करने वालों को कांग्रेस के समर्थन से जुड़ा मुद्दा है। असल बात ये है कि कुछ बड़े किसानों और आलू व्यापारियों ने आलू के भाव बढ़ने की आशंका से आलू की जमाखोरी की थी! लेकिन, देशभर में आलू के भाव नहीं बढे! जब इन जमाखोरों को नुकसान हुआ, तो उन्होंने विधायक को साथ ले लिया और 16 दिसम्बर को ये तमाशा किया! पटवारी ने अपने साथ इंदौर के बड़े कांग्रेसी नेताओं को भी इस जमावड़े में बुलाया था, पर असलियत सामने आने पर सभी खिसक लिए! इंदौर में आलू राजनीति सोमवार को भी हुई! विधायक जीतू पटवारी ने चोइथराम मंडी बंद कराई और धरना देते हुए सरकार से मांग की कि आलू का समर्थन मूल्य 8 से 10 रूपए निर्धारित करे! सरकार ने जिस तरह प्याज खरीदे, वैसे आलू भी खरीदे! 
  इंदौर से आलू देशभर की मंडियों में सप्लाई होता है! इसके अलावा इंदौर में ब्रांडेड वेफर्स निर्माताओं के भी प्लांट हैं! लेकिन, ये नई फसल के वक़्त ही सौदा कर लेते हैं। नोटबंदी के बाद अंदाजा लगाया गया था कि आलू के भाव आसमान छुएंगे! इसी लालच में बड़े आलू उत्पादक किसानों और स्टाकिस्टों ने भारी स्टॉक कर लिया! लेकिन, थोक में आलू एक से दो रुपए किलो पर आ गया और नई फसल भी बाजार में आ गई। ये सीधे-सीधे बड़े नुकसान का संकेत था। आलू गले पड़ते देख राऊ के बिजलपुर इलाके के कुछ बड़े आलू उत्पादकों ने विधायक जीतू पटवारी को आगे करके ये धमाल किया! विधायक ने भी इसे राजनीतिक रंग देने में कसर नहीं छोड़ी! जबकि, फुटकर में आज भी आलू करीब 20 रुपए किलो है। थोक में 2 रुपए किलो बिकने वाला आलू लोगों को फुटकर में 20 रुपए किलो खरीदना पड़ रहा है! कांग्रेस विधायक उनके पक्ष में आवाज उठाने के बजाए उन बड़े किसानों और आलू का स्टॉक करने वालों के समर्थन में खड़े हो गए, जिन्होंने बड़े फायदे के लालच में स्टॉक किया था।           
ये लालच नतीजा 
* ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच में आलू के बड़े किसानों और स्टॉकिस्टों ने माल रोक रखा था। जब देशभर में आलू के भाव नहीं बढे और नई फसल आने लगी तो नुकसान से घबराकर इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया! आलू, प्याज के बाद लहसुन में भी यही स्थिति आना है। क्योंकि, मौसम अच्छा है, तो फसल भी बम्पर होगी। 
- मुरली हरियाणवी (अध्यक्ष, आलू, प्याज, लहसुन होलसेल व्यापारी एसोसिएशन, इंदौर) 
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Friday, December 16, 2016

बिन 'कैलाश' इंदौर में लावारिस सी हो गई भाजपा?



- हेमंत पाल 

   मध्यप्रदेश की राजनीति में कैलाश विजयवर्गीय के होने का अपना एक मतलब है। उनकी राजनीतिक शैली से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, पर उनको पसंद करने वाले उससे कहीं ज्यादा है। प्रदेश की राजनीति से अलग होकर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बने उनको डेढ़ साल हो गए! इन डेढ़ सालों में प्रदेश की राजनीति तो अपनी गति से चल रही है, पर इंदौर में भाजपा की राजनीति ठंडी पड़ गई! शहर की राजनीति पूरी तरह टुकड़ों में बंटकर रह गई! माना कि इंदौर में कांग्रेस का अस्तित्व नहीं बचा, पर भाजपा भी तो लावारिस जैसी हो गई! शहर की छह विधानसभा सीटों में से पांच पर भाजपा विधायक हैं, पर सभी ने अपने आसपास लक्ष्मण रेखा खींच ली! सब मुख्यमंत्री से अपने चुनाव क्षेत्र को लेकर बात करते हैं! इंदौर की बात करने वाला कोई नहीं बचा! आज प्रदेश के इस सबसे बड़े शहर में कोई एक भी भाजपा नेता ऐसा नहीं है, जिसकी बात राजधानी में गंभीरता से सुनी जाती हो! इसका असर ये हो रहा कि इंदौर में नौकरशाही हावी हो गई! नेता दुबक गए, अफसर हावी हो गए। लेकिन, कैलाश विजयवर्गीय की एक खासियत है कि उन्हें शहर में अपनी पकड़ का प्रदर्शन करना भी आता है! नोटबंदी के मुद्दे पर उन्होंने इंदौर में जो रैली निकाली और अपना दम दिखाया उसने एक बार फिर शहर में उनकी पकड़ अंदाजा करा दिया!
   इंदौर की अपनी अलग ही राजनीतिक शैली है। उपनगरों में बसते जा रहे इस शहर के नेता भी उपनगरीय हो गए! विधायकों की भी उतनी चलती है, जितना उनका इलाका है! आज एक भी भाजपा नेता ऐसा नहीं है जिसमें सभी को साथ लेकर चलने का सामर्थ्य हो! जिसकी आवाज में दम हो और जो सिर्फ इंदौर की बात करे! जब प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता थी, तब भी यहाँ हमेशा एक नेता ऐसा रहा जो मुखिया होता था! बाकी नेता उसके सहयोगी होते थे! मतभेद उनमें भी थे, पर शहर के लिए सब एकजुट होते थे! दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में महेश जोशी की स्थिति इसी तरह की थी! उससे पहले कृपाशंकर शुक्ला ने अपना ख़म ठोंक रखा था! भाजपा के सत्ता में आने के बाद कैलाश विजयवर्गीय ने भी वही भूमिका निभाई! पिछले डेढ़ साल छोड़ दिए जाएं, तो एक दशक तक तो शहर में कैलाश का सिक्का खनकता रहा! उससे पहले वे इंदौर के महापौर थे, तब कांग्रेस की सत्ता होते हुए भी राजनीति का रिमोट उनके हाथ में ही था! लेकिन, उनके पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में जाने के बाद इंदौर में भाजपा भटकाव के मोड़ पर है! विजयवर्गीय के साथी और क्षेत्र क्रमांक 2 के विधायक रमेश मेंदोला को छोड़ दिया जाए, तो बाकी के चारों विधायक के रास्ते अलग-अलग हैं! सभी के पास अपनी शिकायतें हैं और एक-दूसरे से मुँह फेरकर राजनीति करने के अपने कारण!  
  प्रदेश की सत्ता पर तीसरी बार भाजपा के काबिज होने के बाद ताकतवर मंत्री रहे कैलाश विजयवर्गीय ने सत्ता छोड़कर केंद्रीय संगठन में काम करने की राह चुनी! वे डेढ़ साल से प्रदेश और इंदौर की सक्रिय राजनीति से बाहर हैं। लेकिन, मौके-बेमौके वे अपनी मौजूदगी दिखाते रहते हैं। कई मौकों पर उन्होंने सरकार और अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर भी सार्वजनिक रूप से नाराजी दर्शाई! जबकि, ये भी जगजाहिर है कि इंदौर में विजयवर्गीय-मेंदोला खेमा जिला प्रशासन और नगर निगम के अफसरों की उपेक्षा का शिकार है। विजयवर्गीय से जुड़े पार्टी कार्यकर्ताओं और निगम पार्षदों की उपेक्षा किसी से छुपी नहीं है। इसी का नतीजा था कि इस खेमे के एक पार्षद के साथी कार्यकर्ता ने निगम अधिकारी के साथ मारपीट की थी! इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया था कि अफसर की पिटाई और पार्षद की गिरफ्तारी वाला मुद्दा किनारे हो गया और महापौर मालिनी गौड़ और विधायक रमेश मेंदोला में सीधी जंग छिड़ गई! इसी के बाद रमेश मेंदोला ने महापौर चिट्ठी लिखी थी! 
  अभी तक इंदौर के दूसरे भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय के प्रभाव की वजह से अपनी ताकत नहीं दिखा पाते थे! उन्हें लगता था कि विजयवर्गीय के कारण उन्हें मौका नहीं मिलता! अब जबकि, वे इंदौर में नहीं है और सबके लिए मैदान खुला है! फिर भी कोई और नेता आगे बढ़कर नहीं आ पाया! सभी विधायक अपने-अपने इलाके तक सीमित होकर रह गए! क्षेत्र क्रमांक 4 की विधायक मालिनी गौड़ शहर की महापौर हैं, उनके पास ये जगह लेने का मौका और संसाधन दोनों हैं! पर, वे भी निगम के कामकाज में बंधकर रह गईं! उनके पास कार्यकर्ताओं की वो टीम भी नहीं है, जो किसी नेता को बड़ा बनाती है। वे अपने परिवारवाद के मोह से ही मुक्त नहीं हो पाई। जहाँ तक निगम की सक्रियता का मामला है तो निगम कमिश्नर ने सारे सूत्र अपने हाथ में ही रखे हैं!  
  इंदौर के अफसरों से कैलाश विजयवर्गीय और उनके खेमे का शीत युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है! लेकिन, इसी बहाने विजयवर्गीय प्रदेश सरकार पर भी अपरोक्ष हमले करने से नहीं चूकते! पिछले दिनों उनके दो ट्वीट ने प्रदेश के राजनीतिक माहौल को अच्छा खासा गरमा दिया था! विजयवर्गीय ने 'मेट्रो' के बहाने पहले सरकार और बाद में अफसरों पर निशाना साध दिया था! उधर, मेंदोला ने शहर में विकास नहीं होने के आरोपों के मामले में चिट्ठी लिखकर महापौर को कटघरे में खड़ा किया था। डेढ़-दो साल की राजनीतिक उपेक्षा के बाद इस खेमे के अचानक मुखर होने के अपने कारण थे! लेकिन, इन दो घटनाओं ने शहर की राजनीति को झकझोर दिया! इसका असर ये हुआ कि हावी होती नौकरशाही पर नियंत्रण करने की संगठन के स्तर पर बातचीत का मुद्दा उठा! लेकिन, कुछ हुआ भी होगा, ये बात सामने नहीं आई! 
  एक गौर करने वाली बात ये भी है कि इंदौर में भाजपा नेताओं ने बीते सालों में एकजुट होकर कभी अपनी ताकत दिखाई हो, ऐसा नहीं हुआ! कैलाश विजयवर्गीय को हाशिए पर रखकर ऐसा करना तो शायद उनके लिए संभव भी नहीं है! लेकिन, विजयवर्गीय खुद अकेले ये सब करने में समर्थ हैं! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले के समर्थन और कालेधन के खिलाफ कैलाश विजयवर्गीय ने पिछले दिनों सड़क पर प्रभावी प्रदर्शन किया। भाजपा के इस प्रदर्शन में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल भी शामिल हुए। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक नोटबंदी के विरोध को बेअसर करने के लिए पहली बार देश में इतनी बड़ी रैली हुई! इस रैली से विजयवर्गीय ने पार्टी नेतृत्व को सड़क पर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास भी करा दिया है। भाजपा के इस प्रभावी आयोजन के सूत्रधार रमेश मेंदोला ही थे। इस तरह की रैली इंदौर का कोई और विधायक कर सकता है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता! 
  कैलाश विजयवर्गीय के जितने समर्थक हैं, उससे ज्यादा उनके विरोधी! लेकिन, आजतक कोई ये नहीं समझ सका कि पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से वे इंदौर के एक छत्र नेता कैसे बने हुए हैं? जबकि, उनके बारे में प्रचारित किया जाता है कि वे नकारात्मक राजनीति ज्यादा करते हैं! फिर भी उनके इलाके में कोई और नेता सिर नहीं उठा सका! उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत भी रमेश मेंदोला को सौंपी, जिन्हें उनका हनुमान कहा जाता है! मेंदोला के लिए सीट सुरक्षित करने बाद ही वे महू से चुनाव लड़े! इसमें भी शक़ नहीं कि विजयवर्गीय की राजनीतिक पकड़ के अपने अलग ही मायने हैं! जमीन से जुड़कर और कार्यकर्ताओं के सुख-दुःख में शरीक होकर कैसे लोगों का दिल जीता जाता है, ये उनसे सीखने वाली बात है! वे जब इंदौर में होते हैं, जीवंतता दिखाई दे जाती है। कभी वे किसी गली में क्रिकेट खेलते नजर आते हैं! कभी किसी के स्कूटर के पीछे बैठकर दिखाई देते हैं! विवाह के हर निमंत्रण को भी वे बहुत संजीदगी से लेते हैं! उनके इंदौर में होते हुए, शायद ही कोई निमंत्रण होगा जहाँ वे नहीं गए हों! कई बार तो वे रात 2 या 3 बजे भी विवाह वाले परिवार में पहुंचे! यही स्थिति शोक वाले परिवारों को लेकर भी उनकी रही है। एक बहुत छोटी सी, पर ध्यान देने वाली बात है कि हर साल धनतेरस पर परम्परा का निर्वाह करते हुए वे अपनी पुश्तैनी किराने की दुकान पर बैठते हैं! ग्राहकों को बाकायदा सामान भी देते हैं। 'केशव किराना स्टोर' नाम की इस दुकान को वे अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत का पहला ठिकाना मानते हैं। आशय यही कि आज उनके न होने से यदि इंदौर में भाजपा नेतृत्व विहीन है, तो उसके पीछे सिर्फ राजनीतिक कारण नहीं है! इलाके पर कैसे पकड़ बनाकर रखी जाती है और कैसे नौकरशाही पर नकेल डाली जाती है, ये उनसे मतभेद होते हुए भी सीखने वाली बात तो है!  
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Friday, December 9, 2016

इंदौर में कांग्रेस टुकड़ों में बंटकर बिखरने लगी

- हेमंत पाल 

   प्रदेश कांग्रेस के संगठन प्रभारी ने इंदौर शहर कांग्रेस की पूरी कार्यकारिणी भंग कर दी! अध्यक्ष प्रमोद टंडन के अलावा अब शहर कांग्रेस में कोई पदाधिकारी नहीं है। कारण बताया गया कि सारे पदाधिकारी निष्क्रिय थे, इसलिए उन्हें हटा दिया! जबकि, असल बात शाहनवाज खान को शहर कांग्रेस में पदाधिकारी बनाना था! इस नेता ने प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए उनका पुतला जलाया था! एक दिन पहले शाहनवाज खान की नियुक्ति रद्द की गई, दूसरे दिन प्रमोद टंडन की पूरी कार्यकारिणी ही भंग कर दी गई! अब तलवार प्रमोद टंडन पर लटकी है! वे 9 साल से अध्यक्ष हैं, पर अब कितने दिन और इस पद पर रह पाते हैं, ये तय नहीं है! वे लगातार दो कार्यकाल से पद पर हैं, पर पार्टी रसातल चली गई। इंदौर में कांग्रेस विधानसभा क्षेत्र के बजाए मोहल्लों में बंटी ज्यादा लगती है। बीते सालों में कांग्रेस न तो शहर में कोई आंदोलन खड़ा कर सकी और न भाजपा के सामने किसी चुनाव में चुनौती ही बन सकी है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि प्रदेश के हर बड़े नेता ने अपने समर्थकों की अलग फ़ौज खड़ी  कर रखी है! ये फ़ौज कांग्रेस की नहीं दिग्विजय सिंह की है, सिंधिया की है या कमलनाथ की! जब दिग्गज नेता ही एक नहीं हैं, तो शहर कांग्रेस में कैसे एकता होगी?      
 
  इंदौर की शहर कांग्रेस कमेटी में मनमर्जी से होने वाली नियुक्तियों से नाराज प्रदेश कांग्रेस ने इंदौर शहर की कार्यकारिणी भंग कर दी। प्रदेश संगठन प्रभारी महामंत्री चंद्रिका प्रसाद द्विवेदी ने शहर कांग्रेस अध्यक्ष प्रमोद टंडन को छोड़ 535 सदस्यों की कार्यकारिणी को एक आदेश से सप्ताहभर पहले हटा दिया। कहा गया कि अब नई सक्रिय कार्यकारिणी गठित की जाएगी। ये शायद पहली घटना है, जब किसी शहर की पूरी कार्यकारिणी एक झटके में भंग कर दी गई हो! आश्चर्य इस बात का कि हटाने को लेकर सभी 535 पदाधिकारियों पर एक ही आरोप लगा! ये बात किसी के गले नहीं उतर रही! जबकि, एक बड़ा कारण शाहनवाज खान को महामंत्री बनाया जाना है। कांग्रेस के नेता इकबाल खान और पार्षद रूबीना खान के बेटे शाहनवाज खान ने प्रदेश अध्यक्ष यादव पर ही टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए उनका पुतला तक फूंका था। इसकी शिकायत प्रदेश अध्यक्ष को मिली थी! इसके बाद पहले उसे और बाद में सभी पदाधिकारियों को हटा दिया गया।  
   प्रमोद टंडन को हटाने की कोशिशे भी लंबे समय से चल रही है। वे 9 साल से शहर कांग्रेस के अध्यक्ष हैं! उनकी जगह नए नाम पर विचार के लिए कई बार कवायद हो चुकी है। पर, नतीजा कुछ नहीं निकला। प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव भी कई बार नए अध्यक्ष की बात कर चुके हैं, पर कर कुछ नहीं सके! हमेशा आश्वासन दिया गया कि नया शहर कांग्रेस अध्यक्ष जल्दी ही बनाया जाएगा। ऐसे दावे पहले भी कई बार किए जा चुके हैं। इस बार भी शहर को स्थाई अध्यक्ष मिलेगा, इसमें संशय है। नई नियुक्ति भी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में ही होगी! फिलहाल किसी नेता को प्रभारी बनाया जा सकता है। 
   कांग्रेस के अपने विधान के मुताबिक शहर कांग्रेस की कमेटियों में 21 पद होते हैं। लेकिन, इंदौर में ये संख्या 535 हो गई थी! अपने समर्थकों को पदाधिकारी बनाने के लिए बड़े नेता शहर अध्यक्ष पर दबाव बनाते रहते हैं। पार्षद और विधानसभा चुनाव लड़ने वाले नेता भी अपने समर्थकों को कार्यकारिणी में पद दिलवाने के लिए बड़े नेताओं से दबाव बनवाते थे। यही कारण है कि इंदौर में कार्यकारिणी की संख्या बढ़ते-बढ़ते पांच सौ से ऊपर निकल गई थी! इनमें कुछ नियुक्तियों में तो प्रदेश कांग्रेस से अनुमति तक नहीं ली गई। 535 में से अधिकांश पदाधिकारी सिर्फ मोहल्ला राजनीति और होर्डिंग में फोटो लगवाने तक सीमित थे! मंत्री, महामंत्री, उपाध्यक्ष, प्रवक्ता बने कांग्रेस पदाधिकारी कभी न तो किसी आंदोलन का हिस्सा बनते और न पार्टी को सक्रिय बनाने की ही कोशिश करते थे! जिस बड़े नेता की सिफारिश से उनको पद मिलता, उसी के इंदौर आने पर ये नजर भी आते! टंडन की भंग कार्यकारिणी में ऐसे भी कई लोग थे, जिनके पास विधि, पिछड़ा वर्ग, झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के पद भी थे। हमेशा पदों की दौड़ में लगे रहने वाले ये नेता नए अध्यक्ष की नियुक्ति पर फिर उसकी परिक्रमा लगाने लगेंगे! 
  ये बात तो राजनीति के जानकारों को समझ में आ रही है कि इंदौर में भाजपा के ताकतवर होने का बड़ा कारण कांग्रेस का कमजोर होना है। 13 सालों में कांग्रेस के जो नेता विधानसभा चुनाव जीते, ये उनकी अपनी उपलब्धि है। इसमें पार्टी का कोई योगदान नहीं है। भाजपा उम्मीदवार के सामने आश्विन जोशी दो बार विधानसभा चुनाव जीते और और पिछले चुनाव में जीतू पटवारी ने राऊ जीता! लेकिन, इसमें कहीं शहर कांग्रेस का योगदान होगा, ऐसा नजर नहीं आया! अपने आका के इंदौर आगमन पर ही एयरपोर्ट पर भीड़ लगाने वाले पदाधिकारी कभी कांग्रेस के दफ्तर गाँधी भवन में भी दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि बरसों से कांग्रेस प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन नहीं कर पाई!      
  इंदौर में कांग्रेस की राजनीति का अपना इतिहास रहा है। इंदौर में प्रकाशचंद्र सेठी, महेश जोशी और कृपाशंकर शुक्ला ने जिस तरह की राजनीति की, वो अभी तक कोई नहीं कर सका! इन नेताओं ने शहर में बरसों तक कांग्रेस को बाँधे रखा! प्रकाशचंद्र सेठी ने तो उज्जैन छोड़कर इंदौर की राजनीति की और केंद्र तक पहुंचे। अब तो महेश जोशी ने अपने आपको पूरी तरह राजनीति से अलग ही कर लिया! कृपाशंकर शुक्ला जरूर राजनीतिक और सरकारी आयोजनों में नजर आ जाते हैं। इनके मुख्यधारा की राजनीति से हटने और किसी दमदार बड़े नेता के न होने से शहर में कांग्रेस गुटों में बंट गई! जो नए नेता उभरे उन्होंने पार्टी को ताकत देने के बजाए घर की फ़ौज मारना शुरू कर दिया। आज इंदौर में कांग्रेस टुकड़ों में नजर आती है। कांग्रेस की राजनीतिक में सन्नाटा है। लगता है कांग्रेस हमेशा ही इस स्थिति को भोगने को अभिशप्त है! शहर में कोई नया नेतृत्व उभर नहीं पा रहा और जो बचे हैं वो भी विलुप्त होने लगे!  
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