Sunday, July 16, 2017

घरों में ये कैसा संस्कारहीन मनोरंजन?

- हेमंत पाल

  जब टीवी ने परिवारों के बीच एक कोने में अपने लिए जगह बनाई थी, तब समझा गया था कि इससे पारिवारिक संस्कारों की नई नींव पड़ेगी और दरकती परंपराओं को बचाया जा सकेगा! रिश्तों के प्रति विश्वास और श्रद्धा बढ़ेगी और एक नया समाज आकार लेगा! लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ! टीवी सीरियलों ने परिवारों के आपसी विश्वास को चकनाचूर करते हुए ऐसा आभासी संसार रच डाला जहाँ साजिश, अविश्वास और अपमान के अलावा और कुछ नहीं है। जबकि, तर्क ये दिया जाता रहा कि इन सीरियलों में सामाजिक संरचना में आ रहे बदलाव का प्रतिबिंब दिखाया जाता है। 

  आज तो हर कहानी में विवाह के पहले या विवाहेतर रिश्तों को सहज बताकर उसे स्थापित करने तक की कोशिश की जाती है। साजिश और हिंसा का वही अंदाज हर सीरियल में नजर आने लगा जो फिल्मों की पुरानी विषयवस्तु रहा है। अधिकांश सीरियल बड़े परिवारों और बिजनेस टाइकून लोगों के बीच चलने वाली प्रतिद्वंदिता पर केंद्रित होते है। जिसका आम दर्शकों से कोई सरोकार नहीं होता। करीब पचास-साठ साल पहले जब हिंदी फ़िल्में बेरंग हुआ करती थीं, तब इसमें पात्रों में स्पष्टतः दो चेहरे होते थे। एक प्रेम, त्याग और सहनशीलता की पराकाष्ठा था तो दूसरा साजिश, कपट और क्रूरता का प्रतिक! आज के कई सीरियलों में यही सब साफ देखा जाता है। 
 पारिवारिक रिश्तों की मधुरता और बुजुर्गों का सम्मान तो जैसे सीरियलों से गायब ही होता जा रहा है। इन सीरियलों में संयुक्त परिवारों का आदर्श रूप न दिखाकर उनके नकारात्मक पक्ष को ज्यादा उबारा जा रहा! टीवी पर जब सीरियलों का दौर शुरू हुआ था, तब परिवार के बुजुर्ग सदस्यों का सकारात्मक चेहरा सामने रखा गया था। ‘हम लोग’ की भागवंती जैसी मां और ‘बुनियाद’ के हवेली राम व लाजो जी जैसे बुजुर्ग अब किसी सीरियल में नजर नहीं आते! अब तो 'दिल से दिल तक' के दादाजी ज्यादा दिखाई देते हैं, जो दो प्रेमियों को मिलाने जुगत लगाते ज्यादा नजर आते हैं। सच्चाई ये है कि आज टीवी सीरियलों में समाज और परिवार की अलग तरह से व्याख्या होने लगी है।
  बुजुर्गों के सम्मान को भी इन सीरियलों ने ही सबसे ज्यादा मटियामेट किया। ‘हवन’ नाम के एक शो में बड़ी बहू अपने ससुर से इतना चिढ़ती है कि उसके सम्मान को कुचलने के लिए हमेशा साजिशों के जाल बुनती रहती है। उसकी करतूतों को समझने के बाद भी परिवार वाले असहाय बने रहते हैं? इसके पीछे कथानक कुछ भी हो, लेकिन ये सीरियल एक रिश्ते को तो कलंकित करता ही है। लम्बे समय तक चले सीरियल ‘दिया बाती और हम’ में भी सास को बहू के पढ़े लिखे होने और बेटे के अनपढ़ होने का दर्द सालता रहता है। बार-बार संस्कार और परंपराओं की दुहाई देने वाली सास बहू को प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती! 
  एक सीरियल ‘प्रतिज्ञा’ भी बना, जिसमें मुखिया एक लड़की को ब्याह लाता है तो उसकी पत्नी अपनी बहू को मारने के लिए साजिशें रचती रहती है। कुछ सालों में इश्कबाज, हिटलर दीदी, मधुबाला, कबूल है, सरस्वती चंद्र, अमृत मंथन और कुमकुम भाग्य जैसे सीरियलों ने रिश्तों की ऐसी विकृत परिभाषा गढ़ दी, जिसमें चाचा, बुआ या मामा जैसे रिश्ते ही नहीं मां, भाई व बहन तक भरोसे के लायक नहीं रह गए। टीवी को रचनात्मक अभिव्यक्ति की आजादी देने का मतलब ये कतई नहीं है कि परिवार की दादी सिर्फ अपना आधिपत्य बनाने के लिए परिवार के हर सदस्य को अपनी साजिश का मोहरा बना ले। जबकि, समाज में दादी को प्रेम और वात्सल्य का सबसे सही रूप माना जाता है। कल्पना कीजिए कि ये आभासी दुनिया एक दिन कैसा वास्तविक संसार रचेगी?
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Friday, July 14, 2017

बाबा, दीदी, भाभी और भिया पर कितनी दयालु होगी पार्टी

- हेमंत पाल 

  वे बाबा है पर अध्यात्म से कोई रिश्ता नहीं! वे दीदी हैं पर जगत दीदी! भाभी ने स्वच्छता की मिसाल कायम की है तो 'भिया' चमकाने दमकाने में आगे रहे। ये इंदौर शहर के विधायक जिनमें भोजन भंडारे से लेकर सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने की होड़ सी लगी रहती है। विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 5 की सुप्ताअवस्था को छोड़ दिया जाए तो बाकी विधानसभा सीटों को लेकर वर्तमान विधायक जीजान से अपनी छवि चमकाने में लगे है। उधर, मध्यप्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने की तैयारी करने वाली भाजपा ने नए सिरे से अपने विधायकों के फिर जीतने की संभावनाओं को तलाशना शुरू कर दिया है। संघ और पार्टी के साथ सरकार ने भी भाजपा के विधायकों की स्थिति का पता लगाना शुरू कर दिया। ऐसे में पूरे प्रदेश में किस भाजपा विधायक को अगली बार भी टिकट मिलेगा और किसका कटेगा! इस बारे में दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता! 

   इंदौर के पाँचों विधायकों को उनके अभी तक के कामकाज के आधार पर कसौटी पर कसा जाए तो दावा नहीं किया जा सकता कि सभी को टिकट मिल पाएगा! पार्टी के भीतर खबरें हैं कि दो विधायकों के टिकट बदले जा सकते हैं! ये दो कौन हो सकते हैं, अभी इसे लेकर पार्टी चुप है। लेकिन, बीते करीब साढ़े तीन सालों में करीब सभी विधायकों ने जनता की उम्मीदों के मुताबिक खुद को सही जनप्रतिनिधि साबित नहीं किया। विवादों से बचकर रहने की कोशिश तक नहीं की गई! मुद्दे की बात ये है कि एक ही पार्टी के होते हुए भी इन पाँचो विधायकों के बीच आपस में कोई सामंजस्य नहीं है। यहाँ तक कि पार्टी के पार्षद और कार्यकर्ता भी विधायकों की इस खेमेबाजी में बंटकर रह गए हैं।      
   मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और भाजपा संगठन ने अपने विधायकों के कामकाज और पब्लिक इमेज की रिपोर्ट बनवाना शुरू कर दी है। सरकारी स्तर पर इंटेलीजेंस को भाजपा विधायकों की रिपोर्ट बनाने का काम सौंपा गया है। उधर, पार्टी भी एक प्राइवेट एजेंसी के जरिए विधायकों की अगले चुनाव में जीत की संभावनाओं की तहकीकात करवा रही है। जनता के बीच विधायकों की छवि, सामाजिक संगठनों की राय और पार्टी कार्यकतार्ओं के विचार भी इस रिपोर्ट का हिस्सा का अहम् हिस्सा होंगे। इस नजरिए से देखा जाए तो इंदौर शहर के पांचों भाजपा विधायकों में शायद ही कोई पार्टी और सरकार की कसौटी पर खरा उतरेगा! आपसी मनमुटाव, गुटबाजी की राजनीति, अफसरों पर अपने और अपनेवालों के काम करवाने का दबाव और विवादस्पद बयानबाजी इन पाँचों विधायकों की पहचान बन गई है। ये सभी विधायक तभी साथ भी दिखाई देते हैं, जब मुख्यमंत्री या पार्टी का कोई बड़ा नेता मौजूद होता है। शहर के विकास के मसले पर भी ये सभी विधायक कम ही एकमत दिखाई देते हैं। कोई भी इंदौर के लिए नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के बारे में ही ज्यादा सोचता नजर आता है।     सबसे पहले बात शुरू की जाए क्षेत्र क्रमांक-1 के विधायक सुदर्शन गुप्ता की! इनके लिए क्षेत्र के लोगों की दिखावटी चिंता ज्यादा मायने रखती है। अपने कामकाज को लेकर सुदर्शन गुप्ता कई बार विवादों में फँस चुके हैं। एक बार तो उन्होंने दादागिरी करते हुए विद्युत कंपनी के एक इंजीनियर को फोन पर बुरी तरह से धमकाया भी था। गुप्ता ने न केवल इंजीनियर को पीटने की धमकी दी, बल्कि ये भी कहा था कि उनके समर्थक उसे नंगा करके शहर में घुमा देंगे। विधायक का यह आॅडियो जब सामने आ गया तो उन्हें सफाई देने के लिए बाध्य होना पड़ा था। मामला ये था कि विद्युत कंपनी ने बकाया बिलों की वसूली का अभियान चलाया था। इस वसूली अभियान में सुदर्शन गुप्ता के कार्यकर्ता भी चपेट में आ गए। इस पर विधायक का पारा चढ़ गया था। ऐसा ही उनका एक वीडियो और सामने आया था, जिसमें वे एक महिला पार्षद के पति को धमका रहे थे। विधायक ने कहा था कि यदि आपने मेरे पोस्टर नहीं हटवाए तो मैं तो मर्द हूँ, मैं आपकी मिसेज के कार्टून गली-गली में लगवा दूंगा। इससे आपको तकलीफ हो जाएगी। हुआ ये था कि पार्षद अनिता तिवारी के पति सर्वेश ने अपने वार्ड में दो जगह पोस्टर लगाकर विधायक सुदर्शन गुप्ता को साउथ गाडराखेड़ी में लाने वाले व्यक्ति को इनाम देने की घोषणा की थी।
  इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-2 के विधायक रमेश मेंदोला हैं, जिनकी लोकप्रियता को चुनौती नहीं दी जा सकती। पिछला चुनाव वे 90 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे। पार्टी के कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय के सबसे नजदीक माने जाने वाले मेंदोला के पास कार्यकतार्ओं की बड़ी फौज है, जो उनके इशारे पर 'कुछ भी' कर गुजरने में पीछे नहीं हटती! लेकिन, उनकी शहर के किसी विधायक या भाजपा से नहीं बनती। खासकर क्षेत्र क्रमांक-4 की विधायक और शहर की महापौर मालिनी गौड़ से तो बिल्कुल नहीं! यूं तो इस दो नंबर खेमे से महापौर मालिनी गौड़ की तनातनी लम्बे समय से चली आ रही है। लेकिन, नगर निगम के एक अपर आयुक्त को उनके एक पार्षद समर्थक द्वारा तमाचा मार दिए जाने के बाद ये तनातनी और बढ़ गई! उसके बाद तो आरोपों-प्रत्यारोपों का लम्बा दौर चला। आज भी उनके इशारे पर समर्थक पार्षद नगर निगम की बैठकों में शामिल नहीं होते! रमेश मेंदोला ने महापौर मालिनी गौड़ को एक चिट्ठी लिखकर सड़क की बदहाल सड़कों की तरफ उनका ध्यान क्या आकर्षित किया, मामला और बिगड़ गया! जब महापौर का जवाब आया तो अफसरों को कठघरे में खड़ा करने वाले दो नंबर क्षेत्र ने सोशल मीडिया पर 'जय हो भाभी मां' आरती जारी कर दी। इन सारे विवादों बावजूद उन्हें बहुचर्चित सुगनीदेवी जमीन आवंटन मामले में हाईकोर्ट की डबलबैंच ने फैसला देते हुए उन्हें दोषमुक्त करार दिया है। इस फैसले से उनका कद जरूर बढ़ गया है।  
  शहर के क्षेत्र क्रमांक-3 की विधायक उषा ठाकुर की राजनीति का अपना अलग अंदाज है। उनकी छवि जन प्रतिनिधि की कम हिंदूवादी नेता की ज्यादा है। कभी वे किसी समर्थक का जब्त हाथ ठेला छुड़वाने थाने पहुँच जाती हैं तो दुर्गोत्सव पर गरबा पंडालों से मुस्लिम युवकों का प्रवेश वर्जित करने का फरमान जारी कर देती हैं। उनकी इस सार्वजनिक अपील के बाद काफी विवाद भी खड़ा हुआ था। इस बारे में उषा ठाकुर का कहना था कि जो लोग हिन्दू धर्म को नहीं मानते, उनका गरबा उत्सवों में केवल नाचने-गाने के लिए आना ठीक नहीं है। इसलिए मैंने अनुरोध किया है कि गरबा पंडालों में केवल हिंदू युवकों को उनके मतदाता पहचान पत्र के आधार पर प्रवेश दिया जाए। इस भाजपा विधायक ने बताया कि गरबा आयोजकों से यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि युवतियां गरबा पंडालों में 'शालीन' पोशाकें पहनकर आएं और गोदना (टैटू) तथा छोटे कपड़ों से परहेज करें। उषा ठाकुर को नए साल के मौके पर यौन शोषण के आरोपों से घिरे कथित संत आसाराम बापू के चित्र की आरती उतारने को लेकर भी आलोचना झेलनी पड़ी थी।
  शहर की महापौर और क्षेत्र क्रमांक-4 की विधायक मालिनी गौड़ के राजनीतिक खाते में सबसे बड़ी उपलब्धि सफाई के मामले में इंदौर को देश में नंबर-वन बनाना है। लेकिन, भाई भतीजावाद के आरोप उन पर भी कम नहीं हैं। दो नंबर क्षेत्र के भाजपा नेताओं से उनके विवाद चलते रहे हैं। उन्होंने इस क्षेत्र के हर कार्यक्रमों से दूरी बना रखी है, लेकिन दो नंबर विधानसभा में आने वाले नगर निगम के जोनल आॅफिस का निरीक्षण करने की इच्छा उनकी जरूर रहती है। उनका कहना है कि दो नंबर क्षेत्र के नाराज एमआईसी सदस्य और पार्षद इस दौरान आएं या नहीं, पर वे लोगों की समस्या सुनने जरूर जाती रहेंगी। रेडिसन चौराहे पर अपर आयुक्त रोहन सक्सेना के साथ हुए थप्पड़ कांड के बाद से महापौर और विधायक रमेश मेंदोला के बीच जो दरार पड़ी थी, वो अभी भी भरी नहीं है। इसलिए कि इस विवाद में महापौर ने निगम अफसरों का साथ दिया था। इस घटना के बाद से एमआईसी सदस्य चंदू शिंदे और राजेंद्र राठौर सहित दो नंबर इलाके का कोई भी पार्षद निगम में कदम नहीं रख रहा है।
  इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-5 के विधायक महेंद्र हार्डिया को शहर का सबसे शालीन और अंतमुर्खी नेता माना जाता है। सामान्यत: वे सार्वजनिक बयानबाजी और विवादों से बचकर रहते हैं, फिर भी कुछ मामलों में उनपर भी पक्षपात और दबाव बनाने के आरोप लग चुके हैं। मालवा मिल से जंजीरवाला चौराहे वाली सड़क के किनारे से अतिक्रमण हटाने को लेकर वे निगम अधिकारियों से कई बार भीड़ चुके हैं। मूसाखेड़ी में नगर निगम द्वारा बस्तियों को हटाकर बनाई जाने वाली मल्टी को लेकर उठे विवाद से भी वे बच नहीं सके थे। क्षेत्र के लोग उन पर अपने इलाके के पार्षदों पर काबू न कर पाने को लेकर भी नाराज हैं। कई पार्षद मनमानी कार्रवाई कर रहे हैं, पर हार्डिया उनपर सख्ती नहीं कर पा रहे! इस कारण इस इलाके में निगमकर्मी भी बहुत ज्यादा हावी है। एक बार तो विधायक महेंद्र हार्डिया को महापौर मालिनी गौड़ को पत्र लिखकर ये कहने पर मजबूर होना पड़ा कि दरोगा और स्वास्थ्य विभाग के सीएसआई लोगों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं, जो बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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फिर गुदगुदाएगा छोटा परदा

- हेमंत पाल

  मनोरंजन की दुनिया का बाजार बहुत अनोखा होता है। इस बाजार में वही ज्यादा बिकता है, जिसे दर्शक पसंद करते हैं। मनोरंजन बेचने वालों को दर्शकों की पसंद का पता भर चल जाए वे उसकी नई-नई रेसिपी बनाकर परोसने में देर नहीं करते! ये ट्रेंड फिल्मों में हमेशा चलता रहा है और अब टीवी में भी वही सब होने लगा! जब एकता कपूर ने सास-बहू के झगड़ों पर सीरियल बनाना शुरू किया और उसे पसंद किया जाने लगा तो ऐसे सीरियलों की भरमार हो गई! इसके बाद संगीत और डांस के रियलिटी शो पसंद किए गए तो हर चैनल ने ऐसे शो शुरू करने में देर नहीं की! 

  इसके बाद छोटे परदे पर स्टैंडअप कॉमेडी का शो 'लॉफ्टर चेलैंज' क्या आया, हर चैनल पर हंसी के ठहाके गूंजने लगे! इसके बाद ऐसे शो का एक बड़ा अंतराल आ गया। बरसों बाद कपिल शर्मा अपने नाम से स्टैंडअप कॉमेडी शो लाए! लेकिन, लम्बे अरसे तक किसी और चैनल पर कॉमेडी शो इसलिए नहीं आया कि कपिल से मुकाबले वाला कोई स्टैंडअप कॉमेडियन नहीं था। कृष्णा-अभिषेक और भारती को लेकर कुछ कोशिशें जरूर हुई, पर ये कामयाब नहीं हो सकीं!
  कुछ दिनों पहले कपिल शर्मा की उनके साथी कलाकारों से अनबन क्या हुई, संभावनाओं के नए दरवाजे खुल गए! सुनील ग्रोवर और अली असगर समेत कुछ स्टैंडअप कॉमेडियन ने दूसरे चैनलों पर नए शो की तैयारियां शुरू कर दी! इसके अलावा भी कुछ कॉमेडी-शो के प्रोमो दिखाए जाने लगे! आशय यह कि छोटा परदा फिर दर्शकों को गुदगुदाने वाला है। कभी कपिल से मुकाबला करने उतरे कृष्णा-अभिषेक फिर एक नए कॉमेडी शो दिखाई देंगे। इसमें उनके साथ अली असगर, सुगंधा मिश्रा, सुदेस लहरी और डॉ संकेत भौंसले के नाम सामने आए हैं। इस शो के प्रोमो में मिथुन चक्रवर्ती भी दिखाई दिए, पर ये तय नहीं है कि उनकी भूमिका क्या होगी!
 ये दावा नहीं किया जा सकता कि कपिल शर्मा की लोकप्रियता को प्रभावित कर सकेगा! क्योंकि, कपिल के खिलाफ पहले भी कई बार मोर्चेबंदी हुई, पर सफल नहीं हो सकी! सुनील ग्रोवर पहले भी एक बार कपिल से अलग होकर अकेले शो होस्ट करके मात खा चुके हैं। हाल ही में सलमान खान की फिल्म 'ट्यूबलाइट' के लिए भी सुनील ग्रोवर ने अलग से एक शो ‘सुपरनाइट विद ट्यूबलाइट’ बनाया था, पर उसमें भी उन्होंने बुरी तरह मात खाई! 'बीएआरसी रिपोर्ट' में कपिल के शो को 10वां स्थान मिला, तो 'ट्यूबलाइट’ के शो को 16वां। फिलहाल कॉमेडी को लेकर टीवी पर इतना हंगामा कि प्रोड्यूसर बॉलीवुड के सबसे व्यस्त और महंगे कलाकार अक्षय कुमार को भी कॉमेडी शो में ले आए। 'खतरों के खिलाड़ी' के बाद वे एक बार फिर टीवी पर वापसी कर रहे हैं।
  सिर्फ कॉमेडी शो ही नहीं, कुछ कॉमेडी सीरियल भी नया अवतार लेकर छोटे परदे पर उतरने वाले हैं। लोकप्रिय कॉमेडी शो 'हम पांच' एक बार फिर आने वाला है। इस बार इसका नाम होगा 'हम पांच फिर से।' 1995 से 99 तक ये शो 'हम पांच' नाम से टेलिकास्ट हुआ था। इसमें अशोक सराफ, प्रिया तेंडुलकर, राखी टंडन, भैरवी रैचुरा, वंदना पाठक और विद्या बालन जैसे कलाकार थे। इस शो में एक परिवार की कहानी को कॉमेडी के रूप में दिखाया गया था! इसका दूसरा सीजन 2005 में आया था। अब इसका तीसरा सीजन आने वाला है। एक और कॉमेडी सीरियल 'साराभाई वर्सेज साराभाई' के नए सीजन के टेलीकास्ट की भी तैयारी है। वैसे ऑनलाइन पर इसकी वेब सीरीज शुरू हो गई है। कॉमेडी की वेब सीरीज का भी बहुत बड़ा बाजार है, जो धीरे-धीरे अपना आकार लेता जा रहा है।
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Friday, July 7, 2017

सेनापति बदलकर अगली जंग में दांव लगाएंगी कांग्रेस और भाजपा!

- हेमंत पाल 

मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा और विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने 'मिशन 2018' की तैयारियां तेज कर दी है। भाजपा जीत का चौका लगाने के लिए कमर कस रही है, वहीं डेढ़ दशक से सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस ने भी सत्ता हांसिल करने के लिए जुगत लगाना शुरू कर दिया है। दोनों ही पार्टियों में प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारियों को बदले जाने की अटकलें भी जोर पकड़ने लगीं। ये बदलाव किसी भी दिन हो सकता है। कांग्रेस को तो प्रदेश अध्यक्ष के लिए कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी एक का नाम तय करना है। लेकिन, भाजपा में अभी असमंजस बरकरार है। भाजपा में अध्यक्ष नंदकुमारसिंह चौहान के अलावा प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को बदले जाने की भी सुगबुगाहट है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी मोहन प्रकाश को लेकर भी पार्टी के भीतर माहौल गरमाया हुआ है। उन पर कुछ नेताओं को प्रश्रय देने के आरोप लम्बे समय से लग रहे हैं। 
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  मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों दो ख़बरें गरम हैं। एक, मध्यप्रदेश कांग्रेस की नई जिम्मेदारी कमलनाथ को सौंपी जाएगी ज्योतिरादित्य सिंधिया को? दूसरी खबर है भाजपा का अगला प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा? क्योंकि, नंदकुमारसिंह चौहान को हटाया जाना करीब-करीब तय है! लेकिन, दोनों ही पार्टियों में ये फैसले अभी अटके हुए हैं। कांग्रेस हाईकमान मध्यप्रदेश को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं कर पाई हो, लेकिन अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर प्रदेश की कमान किसके हाथ में दी जाना है, वो दो नाम उसके सामने हैं। तीसरे किसी के नाम पर कोई विचार भी होगा, ऐसे आसार बिल्कुल भी नहीं हैं। कुछ दिनों पहले चर्चा चली थी कि कमलनाथ को प्रदेश का दारोमदार सौंपा जाना अंतिम रूप से तय हो गया है। लेकिन, यदि ऐसा होता तो ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका का निर्धारण भी होना जरुरी है। क्योंकि, युवाओं में सिंधिया की लोकप्रियता को नजरअंदाज करके यदि ये फैसला किया जाता है तो नतीजे उलटे पड़ सकते हैं। हाल ही में किसान आंदोलन में भी सिंधिया की सक्रिय भूमिका से प्रदेश कांग्रेस के समीकरण बदले हैं, ऐसे में यदि हाईकमान जनभावनाओं के विपरीत फैसला लेती है तो जिंदा होती कांग्रेस एक बार फिर कोमा में जा सकती है।     
   एक समय स्थिति ये आ गई थी कि कमलनाथ के नाम पर हाईकमान फैसला चुका था! लेकिन, अचानक मामला थम गया! सारी गतिविधियां रुक गईं! क्योंकि, प्रदेश में युवा वोटर्स में ज्योतिरादित्य सिंधिया की पकड़ को देखते हुए, हाईकमान को लगा कि कहीं कमलनाथ के नाम से नए वोटर्स बिदक न जाएँ! दरअसल, पार्टी कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच समन्वय बनाने का ऐसा फार्मूला तलाश रही है कि कोई भी नाराज न हो और पार्टी में एकता भी दिखाई दे! साथ ही बदलाव का संदेश भी अच्छा जाए। इस बीच सिंधिया और दिग्विजयसिंह पर भाजपा ने जिस तरह के हमले किए, वो भी एक कारण था कि कमलनाथ का नाम आगे आ गया था। क्योंकि, पार्टी मान रही थी कि यदि विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह के अनुभवों का उपयोग करना है, तो कमलनाथ को आगे लाना होगा! उनके साथ दिग्विजय सिंह की पटरी बैठ सकती है। लेकिन, ज्योतिरादित्य सिंधिया को हाशिए पर रखकर कोई फैसला होगा, इस बात की उम्मीद नहीं हैं।   
  प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष के साथ ही कांग्रेस में प्रदेश प्रभारी मोहन प्रकाश को बदले जाने के भी पूरे आसार है। क्योंकि, आरोप है कि वे संकट समय में प्रदेश कांग्रेस को उबारने में कोई योगदान नहीं दे पाए। उनके करीब चार साल के कार्यकाल के दौरान जितने भी उपचुनाव या नगरीय निकाय चुनाव हुए, उनमें पार्टी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सकी। एक लोकसभा उपचनाव (झाबुआ-रतलाम) और एक विधानसभा उपचुनाव (अटेर) की जीत क्रमशः कांतिलाल भूरिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया की मानी जाती है। इसके अलावा सभी उपचुनाव कांग्रेस हारी है। प्रदेश में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की किसी भी कोशिश में मोहन प्रकाश की भूमिका गौण ही रही! उन पर अपने नजदीकी लोगों को उपकृत करने और पार्टी में गुटबाजी बढ़ाने के आरोप भी कई बार लगे! 
 उधर, भाजपा में भी बदलाव की बयार चलने की खबर है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार चौहान के बारे में तो जगजाहिर है कि वे शिवराजसिंह चौहान की छाया की तरह काम करते हैं। उनकी प्रतिबद्धता भी संगठन के प्रति कम मुख्यमंत्री के प्रति ज्यादा दिखाई देती है। अपनी अनर्गल बयानबाजी को लेकर भी नंदकुमार हमेशा ख़बरों में बने रहते हैं। हर पार्टी में संगठन को ज्यादा तवज्जो दी जाती है, क्योंकि संगठन से ही सत्ता की प्राप्ति होती है। पर, मध्यप्रदेश में भाजपा अध्यक्ष जिस तरह सत्ता के सामने फर्शी सलाम करते नजर आते हैं, पार्टी की छवि पर ऊँगली उठने लगी है। भाजपा के दिल्ली दरबार का रुख भी अगले चुनाव से पहले संगठन में बदलाव के पक्ष में लग रहा है। किसान आंदोलन से पार्टी खिलाफ जो नकारात्मकता सामने आई है, उसे संतुलित करने में भी भाजपा का प्रदेश संगठन सफल नहीं रहा! 
  सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को बदले जाने की भी सुगबुगाहट है। क्योंकि, जैसी उनके कामकाज में पहले जैसी गंभीरता का अभाव देखा जा रहा है। भाजपा में चल रही हलचल से अंदाजा लगाएं तो पार्टी के केंद्रीय संगठन ने जल्द ही सहस्त्रबुद्धे का विकल्प खोजना शुरू कर दिया है। भाजपा का दिल्ली दरबार मध्यप्रदेश के प्रभारी के लिए ऐसा नेता खोज रहा है, जो यहाँ की राजनीतिक बारीकियों को जानता हो और संतुलन बैठाकर 'मिशन-2018' के लिए काम कर सके। सहस्त्रबुद्धे को पार्टी ने लगातार दूसरी बार प्रदेश का प्रभार सौंपा था। पहली बार के कार्यकाल में तो वे काफी सहज रहे। पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ता की उन तक आसान पहुंच थी। किन्तु, दूसरे कार्यकाल में वे कुछ लोगों तक केंद्रित हो गए। राज्यसभा में लिए जाने के बाद मध्यप्रदेश में उनकी रूचि भी कम ही दिखाई देती है।  
  भाजपा के सामने सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के अलावा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान, प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और प्रदेश संगठन मंत्री सुहास भगत तीनों ही पदों पर बैठे नेता आत्ममुग्धता के शिकार हैं। प्रदेश अध्यक्ष तो जब भी कुछ बोलते हैं नए विवाद को जन्म देते हैं! जबकि, प्रदेश संगठन मंत्री की तो कहीं भूमिका ही नजर नहीं आती! अरविंद मेनन के कार्यकाल में पार्टी की सक्रियता और ऊर्जा का अंदाज कुछ अलग ही था, पर सुहास भगत न तो कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध दिखाई देते हैं न कहीं उनके होने का संकेत ही लगता है। ऐसे में प्रदेश प्रभारी का प्रदेश से मोहभंग होना भाजपा के लिए अच्छा नहीं है। 
  भाजपा ने भले ही ज्यादातर उपचुनाव में जीत हांसिल की हो, पर उसे मिले वोटों का प्रतिशत तेजी से घटा है। करीब सभी उपचुनाव में भाजपा को मिले वोट इसका प्रमाण हैं। किसान आंदोलन से भी भाजपा को जो नुकसान हुआ, उसकी भी पूर्ति होती दिखाई नहीं दी! सरकार ने फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया और प्याज की 8 रूपए किलो खरीद कर ली! फिर भी किसानों की नाराजी दूर करने में सरकार को सफलता मिल गई, इस बात का दावा नहीं किया जा सकता! तीन महीने पहले मध्यप्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता का जो ग्राफ था, उसमें तेजी से गिरावट आई, इस बात को कोई नकार नहीं सकता! जबकि, किसान आंदोलन ने कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम किया और वो फिर खड़ी होकर मुकाबले में आ गई!  
 प्रदेश के इन सारे हालातों को देखते हुए लगता है कि दोनों ही पार्टियों में मंथन का दौर तेजी से चल रहा है। कोई भी ये मौका चूकना नहीं चाहता! 'मिशन-2018' के लिए दोनों ही पार्टियों ने अपने प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी दोनों को बदलने की तैयारी कर ली है। ये बदलाव कब होगा, इस बात का दावा नहीं किया जा सकता! लेकिन, ये होना अवश्यम्भावी है। क्योंकि, दोनों ही पार्टियां जिसे भी कमान सौंपेगी, उन्हें चुनावी तैयारी और रणनीति बनाने के लिए पर्याप्त समय देना भी जरुरी होगा। भाजपा प्रदेश की सत्ता में है, इसलिए उसके सामने संगठन को संवारना बड़ा संकट नहीं है! लेकिन, कांग्रेस को फेरबदल में गुटीय संतुलन बनाने के साथ चुनाव जीतने वाले चेहरों को भी खोज करना है। आने वाले कुछ दिन प्रदेश में दोनों ही पार्टियों के लिए तलवार की धार पर चलने जैसे हैं! कारण कि हर बदलाव यदि किसी को खुश करता है तो नाराज होने वाले भी कम नहीं होते! ऐसे में संतुलन बनाकर अपने फैसलों को सही साबित करना दोनों पार्टियों के हाईकमानों के लिए चुनौती होगा!
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परदे पर गाली बको, फिल्म चलेगी!

- हेमंत पाल 

  फ़िल्में हमेशा से आम लोगों का मनोरंजन रहा है। यही समाज का दर्पण।  शायद इसी वजह से फिल्मों की भाषा और कभी-कभी तो उनके शीर्षकों में भी अपशब्दों और गालियों का इस्तेमाल होता है। आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में अपशब्द या गालियों का इस्तेमाल आज समाज में बहुत सामान्य बात हैं। यही कारण है कि फिल्मों में भी गालियों का इस्तेमाल नई बात नहीं! ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने में आजादी के संघर्ष से जुडी फ़िल्में ज्यादा बनती थी। तब भी कई बार फिल्मों में अपशब्द सुनाई देते थे। फिल्म के किसी किरदार की पहचान यदि नकारात्मक दर्शाना हो तो गालियां और अपशब्द उस कैरेक्टर ज्यादा जल्दी स्थापित कर देते हैं। 
   ताजा प्रसंग सुशांतसिंह राजपूत और कृति सैनन की फिल्म ‘राब्ता’ का है, जिसपर सेंसर ने कैंची चलाई थी। सेंसर बोर्ड ने फिल्म के कई दृश्यों पर आपत्ति जताते हुए कट लगाए थे। बोर्ड ने फिल्म देखने के बाद फैसला किया गया था कि फिल्म के कुछ दृश्य हटा देना चाहिए। क्योंकि, इस फिल्म में गालियों का इस्तेमाल किया गया था। बोर्ड ने कहा था कि लव स्टोरी पर आधारित फिल्मों में गालियों की कोई जरुरत ही नहीं है। 
  फिल्मों में गालियों का इस्तेमाल होने के प्रमाण ढूंढ़ना मुश्किल नहीं है। 'नो वन किल्ड जेसिका' में टेलीविजन पत्रकार की भूमिका निभाने वाली रानी मुखर्जी ने इस फिल्म में जमकर गालियां दी हैं। 'पीपली लाइव' और सलमान खान की सफल फिल्म 'वांटेड' में भी दर्शकों ने अपशब्द सुने थे। 'ओमकारा' फिल्म में अजय देवगन और सैफअली खान दोनों ने जमकर गालियाँ दी! इसके अलावा इश्किया, खट्टा मीठा, तेरे बिन लादेन और उड़ता पंजाब के संवादों में भी अपशब्दों का इस्तेमाल हुआ। संवाद  अब तो फिल्मों के शीर्षक भी गालियों वाले बनाए जाने लगे हैं। 'कमीने' और 'ये साली जिंदगी' इसी का नमूना है। आज का समाज जिस दौर में रहता हैं, उसमें गालियों का इस्तेमाल सामान्य सी बात है। फिल्मों का परिदृश्य बदलने और उनके अधिक वास्तविक होने के साथ फिल्मकार और अभिनेता शब्दों के इस्तेमाल में आजादी बरत रहे हैं। बोलचाल की भाषा में गालियों का इस्तेमाल सामान्य है।
  फिल्मों में इस नये चलन की शुरूआत फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ से अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने शुरू की थी। इस फिल्म में रानी एक तेज तर्रार टीवी पत्रकार की भूमिका में थी, जो जमकर सिगरेट पीती है और धड़ल्ले से गालियां देती है। फिल्म के साथ रानी ने अपनी मासूम सी छवि के साथ प्रयोग करते हुए अपनी छवि बदली। फिल्म में उनका सबसे प्रचलित संवाद था ‘आई एम ए बिच।’ 'देल्ही बेली' भी बोल्डनेस और गालियों के प्रयोग के मामले में आगे रही। इस फिल्म में भी जमकर गालियों का और द्विअर्थी गानों का प्रयोग किया गया था!
 लव रंजन ने भी अपनी एडल्ट कॉमेडी फिल्म ‘प्यार का पंचनामा’ में भी अपशब्दों वाली भाषा का प्रयोग किया। था इस तरह की भाषा और विषयों से फिल्म की सफलता सुनिश्चित भले न होती हों, लेकिन रिलीज से पहले दिखाए जाने वाली झलकियों की वजह से फिल्म से विवाद जुड़ जाते हैं और फिल्म को अपेक्षित चर्चा मिल जाती है। फिल्म ‘रा-वन’ में अभिनेत्री करीना कपूर को अपने पति की भूमिका निभा रहे शाहरुख खान को अपशब्द कहते दिखाया गया था। इसी तरह की भाषा का प्रयोग करीना ने फिल्म ‘जब वी मेट’ और ‘गोलमाल थ्री’ में भी किया था। 'मोहल्ला अस्सी' के ट्रेलर तक में गालियां सुनकर लोग हैरान थे। जब फिल्मों को समाज से प्रभावित समझा जाता है तो सीधा सा मतलब कि समाज के अंदर भी इतना ही आक्रोश है जो गालियों की भाषा में बाहर आता है।  
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सरकार के गले में फँस गई प्याज राजनीति

- हेमंत पाल

  प्याज की बम्पर पैदावार और किसानों के आक्रोश ने मध्यप्रदेश सरकार को ऐसा उलझा दिया कि उसे समझ नहीं आ रहा कि कौनसा रास्ता सही रहेगा! आनन-फानन में सरकार ने किसानों से 8 रुपए किलो प्याज खरीदने का एलान तो कर दिया, पर इस हज़ारों टन प्याज का होगा क्या, ये कोई नहीं जानता! कंट्रोल की दुकानों पर ये प्याज कोई 2 रुपए किलो भी कोई खरीदने तैयार नहीं है। हालात ये हैं कि खरीदा हुआ प्याज बरसात में ख़राब हो रहा है। अब प्याज की राजनीति सरकार के गले पड़ गई! न पीछे हटा जा सकता है न आगे कोई रास्ता दिखाई दे रहा! फसलों का अर्थशास्त्र समझने वालों का कहना है कि भले ही सरकार ने प्याज 8 रुपए किलो खरीदा हो, पर ये अंततः सरकार को 19 से 20 रुपए किलो पड़ेगा। सरकार के प्याज खरीदने के एलान का असर ये हुआ कि खेरची में 5 से 6 रुपए बिकने वाला प्याज 15 से 20 रुपए किलो तक पहुँच गया। ऐसे में आम आदमी परेशान है कि किसान को फौरी राहत देने के लिए सरकार ने पूरे प्रदेश के लोगों को मुसीबत में क्यों डाला? चुनावी साल के ठीक पहले सरकार को इस सवाल से भी जूझना पड़ेगा।             
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  किसानों से 8 रुपए किलो प्याज खरीदने वाली सरकार अब उस प्याज को 2 रुपए किलो में बेचने पर आमादा है। नीलामी से लगाकर कंट्रोल की दुकानों तक पर प्याज बेचने की जुगत लगाई जा रही है। जून माह में अभी तक मंडियों में जो प्याज खरीदी गई, उसमें करीब 20 फीसदी से ज्यादा प्याज बारिश के कारण खराब हो गई! प्याज कच्ची फसल है इसलिए इसका भंडारण भी नहीं हो सकता। प्याज के परिवहन, गोदामों में रखरखाव, ब्याज और नुकसानी का आकलन करने के बाद सरकार को यह प्याज 19 रुपए किलो से ज्यादा महंगी पड़ेगी! यही स्थिति पिछले साल भी थी जब सरकारी एजेंसी 'मध्यप्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ (मार्कफेड) ने प्याज खरीदी के लिए बैंक से कर्ज भी लिया! उसे इसका ब्याज भी देना पड़ा था। तब भी प्याज खरीदी में सरकार को करोड़ों रुपए का घाटा उठाना पड़ा था! इस बार भी वही कहानी दोहराई गई। न पिछले साल सबक लिया न इस बार कुछ सोचा गया! इसके बावजूद किसान खुश नहीं है। 
   सरकार ने प्याज का रकबा, उत्पादन और भंडारण को लेकर जो भी अनुमान लगाए थे, सब फेल हो गए। इस बार प्रदेश में प्याज का रकबा 1.37 लाख हेक्टेयर बताया गया है, जो पिछले साल के 1.40 लाख हेक्टेयर से कम है। लेकिन इस बार प्याज की पैदावार अधिक हुई। बीते साल 32.54 लाख मीट्रिक टन प्याज हुआ, इस साल रकबा घटने के बावजूद 34.46 लाख मीट्रिक टन पैदावार हुई। प्याज की यही पैदावार सरकार के लिए मुसीबत बन गई है। हर जिले में पूरा प्रशासन इस समय प्याज की खरीदी, ट्रांसपोर्टेशन और भंडारण में लगे हैं।
  पिछले साल की तरह इस साल भी प्याज की जबरदस्त पैदावार के बाद मई में ही थोक मंडियों में प्याज के भाव इसने गिर गए थे कि किसानों ने इसे सड़कों पर फेंकना शुरू कर दिया था। प्याज की फसल की पैदावार ने किसानों की खुदकशी का प्लेटफार्म तैयार कर दिया। हालात इतने खराब हैं कि किसान जब मंड़ी में अपनी प्याज की उपज लेकर पहुंचे तो इसके खरीददार नहीं मिले! जब डेढ़ रूपए किलों में भी प्याज नहीं बिका तो किसानों का गुस्सा फट पड़ा। क्योंकि, खेती-किसानी का सारा अर्थतंत्र बैंक या साहूकारों से लिए कर्ज पर टिका होता है। किसान फसल बेचने से मिलने वाले पैसे से ही सारी उम्मीद लगाता है, लेकिन मंडी में जब प्याज को मंडी तक लाने का भाड़ा तक नहीं निकल पाया तो किसान उग्र हुए! सवाल है कि ऐसे में वे अपना कर्ज कैसे चुका पाएंगे? अब तो यह तय हो चला है कि किसान एक बार फिर कर्ज के दुष्चक्र में फंसने वाले हैं। सरकार की घोषणा के बाद भी किसानों की आत्महत्या का क्रम जारी है। 
   मध्यप्रदेश में प्याज की कीमतें जब एक रुपए किलो हो गई थी, तब भी देश की कई मंडियों में प्याज 20 रुपए किलो के करीब था! ऐसी स्थिति में सरकार के सलाहकार अफसरों को ये नहीं लगा कि इस प्याज को वहाँ बिना लाभ-हानि के बेचने की कोशिश की जाए? सरकार मुनाफा कमाने के लिए व्यापारिक सोच नहीं रख सकती, पर इस तरह अपना मूलधन तो वापस पा ही सकती थी! किसानों से प्याज खरीदकर सड़ा देना तो और फिर आने-पौने दाम पर बेचने की कोशिश करना समझदारी तो नहीं कही जा सकती! किसानों से प्याज खरीदकर गोदामों में भरने की कोशिश हो रही हैं जैसे गेहूं का भंडारण किया जाता है। इस कारण गीला प्याज उगने लगा और सड़ने लगा! यही स्थिति पिछले साल भी हुई थी। अब इस सड़े प्याज को ठिकाने लगाने के लिए सरकार हरसंभव जोर लगा रही है। इसकी 2 से ढाई रुपए किलों में कुछ बड़ी एजेंसियों को ये प्याज नीलामी में बेचा भी गया, पर लाखों क्विंटल अभी भी सरकार के गले में फंसा है! सरकार के सामने जमा प्याज को ठिकाने लगाना आज सबसे बड़ा सरदर्द है।
  किसान आंदोलन से डरकर मुख्यमंत्री ने प्याज 8 रुपए किलो खरीदने की घोषणा तो कर दी, पर अब ये प्याज सरकार के गले पड़ गया! किसानों को मदद देने के लिए की गई मुख्यमंत्री की घोषणा सरकार के खजाने को बड़ी चोट दे गई! जबकि, होना ये था कि प्याज खरीदी की योजना के साथ ही, इसके निपटान के इंतजाम भी किए जाते! यदि इस प्याज का भंडारण करना था, तो उतनी क्षमता के वेयरहाउस भी होना चाहिए, जो नहीं हैं! फिलहाल प्रदेश में 212 शीत भंडार गृह हैं जिनकी मौजूदा क्षमता करीब 9.5 लाख टन है। सरकार अगले दो सालों में क्षमता बढ़ाकर 14.5 लाख टन पर पहुंचाना चाहती है। लेकिन, आज तो इसके अभाव को सरकार ने भोग ही लिया! किसानों से प्याज खरीदी और फिर इसका निपटान न हो पाना, ऐसी घटना है जिससे सम्बद्ध विभाग और अफसरों को सबक लेना चाहिए!
  किसान आंदोलन से भयभीत सरकार ने पूरे प्रदेश में प्याज की सरकारी खरीद तो शुरू करा दी, लेकिन, किसानों को पुचकारने की कोशिश में सरकार अर्थशास्त्र भूल गई। जिस तरह के हालात हैं, उसे देखकर लगता नहीं किसान 8 रुपए किलो प्याज बेचकर भी सरकार से खुश हैं! इधर, सरकार की राजनीति भी कितनी सधेगी, ये स्पष्ट नहीं है। लेकिन, सरकारी खजाने को नुकसान कितना होगा, ये साफ़ नजर आ रहा है। 8 रुपए किलो का प्याज सरकार को 19 से 20 रुपए किलो का फटका लगाएगा! फसल का अर्थशास्त्र समझने वालों का मानना है कि सरकार कितनी भी संभाल कर ले, 25 से 30 प्रतिशत प्याज की नुकसानी होना तो तय है।
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राजनीति, सिनेमा और विरोध बहाने


- हेमंत पाल 

   फिल्मकारों को हमेशा नए कथानकों की खोज रहती है। इसी खोज में वे कभी हॉलीवुड की कहानियां चुराते हैं तो कभी रीजनल सिनेमा हिट कहानियों को बदलकर परोसते हैं। कई बार तो एक ही सफल कहानी को कलेवर बदलकर बार-बार फिल्माया जाता है! लेकिन, राजनीति ऐसा वर्जित विषय है जिसे फिल्मकार छूने से भी परहेज करते हैं। जबकि, राजनीति का परिदृश्य इतना परिमार्जित है, जिसमें किसी फार्मूला फिल्म के सारे मसाले मिलते हैं। इसके बाद भी फिल्मकार ऐसी कहानियों से बचते रहते हैं, जिनमें राजनीति का जरा भी तड़का लगा होता है। क्योंकि, जिसने भी इस काजल की कोठरी में घुसने की कोशिश की, वो साफ़ सुथरा बाहर नहीं निकल सका!    

  हिंदी फिल्मों के इतिहास के पन्ने पलटे जाएं, तो आजादी के बाद असल राजनीति पर गिनी-चुनी फ़िल्में ही बनी है। अमृतलाल नाहटा, गुलजार और प्रकाश झा जैसे कुछ निर्माताओं को छोड़ दिया जाए तो किसी ने भी राजनीति की जलती लकड़ी को पकड़ने की कोशिश नहीं की! किंतु, अब फिर कुछ फिल्मकारों ने सुलगते अंगारों को हाथ में उठा लिया! मधुर भंडारकर ने संजय गाँधी पर केंद्रित फिल्म 'इंदू सरकार' बना डाली और मिलन लूथरिया ने 'बादशाहो।' दोनों ही फिल्मों की कहानी 1975 के इमरजेन्सी के दौर को छूती है।
  'बादशाहो' की कहानी पर तो अभी कोई उंगली नहीं उठी! पर 'इंदू सरकार' के बारे में कांग्रेस ने चेतावनी दे दी कि वह इस फिल्म का पूरे दम खम से विरोध करेगी! कांग्रेस का कहना है कि इस फिल्म में गाँधी परिवार को लेकर कई आपत्तिजनक टिप्पणी की गई है। फिल्म के ट्रेलर में ही गांधी परिवार पर निशाना साधा गया। कांग्रेस को आशंका है कि फिल्म में इंदिरा गांधी और संजय गांधी को इमरजेन्सी के बहाने गलत परिप्रेक्ष्य में दिखाया गया होगा! जबकि, मधुर भंडारकर का कहना है कि फिल्म को लेकर अभी कोई धारणा न बनाएं। पहले फिल्म देखें फिर विरोध की तलवार तेज करें!
 दरअसल, भारतीय राजनीति में इमरजेंसी ऐसा युग है, जिसके काले अध्याय पर कई कहानियां गढ़ी जा चुकी है। सबसे पहले अमृतलाल नाहटा ने 'किस्सा कुर्सी का' बनाई थी। उसके बाद सुधीर मिश्र ने 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' बनाकर चर्चा पाई! लेकिन, बांग्ला फिल्म 'गणशत्रु' और 'कलकत्ता-71' की तरह मौलिकता और गहरी राजनीति दिखाने का साहस कोई नहीं कर पाया। गोविंद निहलानी ने जरूर टेली फिल्म 'तमस' बनाकर दर्शकों को प्रभावित किया था। सिनेमा की दुनिया में राजनीति हमेशा ही सिमटा सा विषय ही रहा है। मणिरत्नम की 'रोजा', गोविंद निहलानी की 'द्रोहकाल' के बाद नई दिल्ली टाइम्स, बाम्बे, और 'दिल से' जैसी फिल्मों में जरूर राजनीति और अपराध के समीकरण दिखाई दिए। 
  अपनी फिल्मों में राजनीति का तड़का मणिरत्नम, मृणाल सेन की तरह गुलजार ने भी लगाया और पारिवारिक रिश्तों में राजनीति को मिलाकर 'आंधी' का प्लाट रचा था। इस फिल्म का कथानक कहीं भी इंदिरा गाँधी जिंदगी से मेल नहीं खाता था, पर सुचित्रा सेन का मेकअप और ड्रेसअप जरूर इंदिरा गाँधी जैसा था। इसके बाद राजनीतिक साजिशों के कॉमिक हालातों पर ‘हु तू तू’ और आतंकवाद को पनपाती 'माचिस' भी गुलजार ने ही रची थी। लेकिन, आज का दर्शक प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीति' के अलावा युवा, रंग दे बसंती, पार्टी या ‘ए वेडनेसडे’ और ‘ब्लैक फ्राई डे’ जैसी फ़िल्में पसंद करता है। राजनीतिक फिल्मों के बारे में एक सटीक टिप्पणी है 'समस्या यह नहीं कि राजनीतिक फिल्में कैसे बनाई जाएं, बल्कि समस्या फिल्मों को राजनीतिक बनाने की है।' बॉलीवुड यदि हॉलीवुड की तरह पहचान बनाना चाहता है तो उसे अमेरिकी फिल्मकारों की तरह दिमाग को खुला रखना होगा! साथ ही सेंसर कैंची की धार को भी भोथरा करना होगा, जिसने राजनीतिक कहानियों वाले सिनेमा को अछूत बना रखा है।     
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