Monday, December 10, 2018

न तुम हारे, न हम हारे!


- हेमंत पाल

   देश के पाॅंच राज्यों में विधानसभा चुनाव पूरे होते ही पक्ष और विपक्ष की तरफ से परस्पर जीत और हार के दावे किए जाने लगे हैं। इस बार बाजी कौन मारेगा, यह तो नतीजों से ही पता चलेगा। लेकिन, हार-जीत के इन कयासों ने बॉलीवुड की फिल्म 'हार-जीत' की बरबस याद ताजा कर दी। नेताओं की हार-जीत का फैसला भले ही पांच साल में एक बार होता हो, लेकिन बालीवुड में हर शुक्रवार फिल्म के प्रदर्शन के साथ ही तनाव बढ़ता है! इसे बॉलीवुड में फ्राइडे-फीयर भी कहा जाता है, जो निर्माता, निर्देशक से लेकर कलाकारों और प्रदर्शकों सभी के चेहरे पर दिखाई देने लगता है। वैसे भी हार-जीत सिनेमा जगत का सबसे प्रिय विषय है, जो कमोबेश सभी फिल्मों में किसी न किसी रूप में दिखाई दे ही जाता है।
   आम फिल्में यही संदेश देती है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होती है। फिल्मों में अच्छाई का प्रतिनिधित्व हीरो-हीरोइन करते हैं, तो बुराई के प्रतीक का ठेका अकसर खलनायक और खलनायिकाओं को दिया जाता रहा है। शायद ही ऐसी कोई फिल्म होगी, जो नायक और खलनायक या 'हार' और 'जीत' के फॉर्मूले के बिना बनी और चली हो! बहरहाल, हिन्दी फिल्मों में हार-जीत का यह सिलसिला फिल्म के शीर्षक से लेकर गानों और विषयवस्तु तक में फैला है। वैसे देखा जाए तो हार और जीत का चोली दामन का साथ है। ऐसी शायद ही कोई फिल्म होगी, जिसका शीर्षक केवल 'हार' पर आधारित होगा! 
    जब भी फिल्मों में हार की बात हुई है, जीत ने हमेशा उसका दामन थाम रखा है। अलबत्ता 'जीत' पर भी कई फिल्में बन चुकी है। 1949 में मोहन सिन्हा ने 'जीत' शीर्षक से फिल्म बनाई थी, जिसमें देव आनंद, सुरैया, कन्हैयालाल, भगवान और मदनपुरी की मुख्य भूमिकाएं थी। 1972 में निर्माता, निर्देशक ए सुब्बाराव ने फिर 'जीत' शीर्षक से फिल्म का निर्माण किया। इसमें रणधीर कपूर और बबीता ने पहली बार साथ मे काम किया था। बबीता ही नहीं उनकी बेटी करिश्मा ने भी 'जीत' नाम की फिल्म में काम किया था। 1996 में राज कंवर के निर्देशन में बनी साजिद नडियादवाला की फिल्म 'जीत' में करिश्मा कपूर के साथ सनी देओल थे।   
  'जीत' की तरह ही 'हार-जीत' शीर्षक से भी एक से ज्यादा फिल्में बनी! 1972 में रेहाना सुल्तान और राधा सलूजा अभिनीत फिल्म 'हार-जीत' में दोनों अपने हीरो अनिल धवन को पाने के लिए एक दूसरे के आमने-सामने आती हैं। इसके बाद 1990 में फराह और कबीर बेदी की फिल्म 'हार-जीत' आई थी, जो प्रेम कहानी कम और थ्रिलर फिल्म ज्यादा थी। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 'जीत' फिल्म जितनी बार भी बनी, सफल रही! जबकि 'हार-जीत' जब भी बनी हमेशा असफल ही रही। शीर्षक में हार का होना तो इसका कारण नहीं है? इसके अलावा प्यार की जीत, जो जीता वो सिकंदर जैसी फिल्मों में 'जीत' को शामिल किया गया था। 
   फिल्म के शीर्षक ही नही हिन्दी फिल्मों के गानों में भी 'हार-जीत' का कई बार उल्लेख होता है। महबूब की फिल्म 'अंदाज' में राज कपूर के सामने गाते हुए दिलीप कुमार जब कहते हैं 'आज किसी की हार हुई है आज किसी की जीत गाओ खुशी के गीत' तो पता चलता है कि वह जीत के घोड़े पर सवार होकर राजकपूर को उनकी हार के लिए चिढ़ा रहे हैं। जबकि, आखिर में नर्गिस को जीतने में राजकपूर ही कामयाब होते हैं। राजेश खन्ना और मुमताज की फिल्म 'अपना देश' में राजनीतिक हार जीत पर आधारित गीत 'सुन चम्पा सुन तारा कोई जीता कोई हारा' खूब चला था। जीतने की आस को सजीव करता गीत 'जीत ही लेंगे बाजी हम तुम' आज भी लोकप्रियता की दौड़ में किसी से पीछे नहीं है। जबकि, आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में प्रमुख राजनीतिक दलों की हार-जीत की बराबरी का दावा करने वाला मीडिया वास्तव में राजकपूर की फिल्म 'दीवाना' के गीत 'तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय न तुम हारे न हम हारे' को  गुनगुनाता ज्यादा दिखाई दे रहा है। 
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Tuesday, December 4, 2018

इंदौर के मतदाताओं के इस मौन को नजरअंदाज मत कीजिए!


- हेमंत पाल 

  विधानसभा चुनाव का मतदान होने के बाद अब इस बात लगाए जा रहे हैं कि किस सीट पर किसका पलड़ा भारी है और क्यों? लोगों की बातचीत का विषय इस बात पर केंद्रित हो गया है कि इंदौर की 9 विधानसभा सीटों की स्थिति क्या होगी! ख़ास बात ये कि वास्तविक मतदाता मौन रहा! उसने खुलकर न तो किसी पार्टी का विरोध किया न समर्थन! मतदाताओं की ख़ामोशी ने कयास लगाने वालों के सामने सवालिया निशान लगा दिया है। लेकिन, निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि इस बार के नतीजे पिछले चुनाव जैसे एक तरफ़ा नहीं होंगे। पिछली बार भाजपा ने 8 सीटें जीती थी और कांग्रेस को सिर्फ राऊ की सीट जीतकर संतोष करना पड़ा था। इस बार लग रहा है, कि 9 में से 5 सीटें भाजपा को मिल सकती हैं, जबकि 4 पर कांग्रेस जीतेगी। हो सकता है, नतीजे इसके उलट भी हों! फिलहाल तो ये सिर्फ संभावना ही है। 
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  इंदौर का चुनावी माहौल, लोगों की बातचीत, मतदान के बढ़े प्रतिशत और उम्मीदवारों को कोशिशों को देखकर लग रहा है कि इस बार इंदौर की 9 में से 7 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा में कांटे की टक्कर है। भाजपा के नेता और कार्यकर्ता लाख दावे करें, पर जमीनी हकीकत बता रही है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस उतनी कमजोर नहीं है, जितना उसे आँका जा रहा है। कई सीटों पर कांग्रेस टक्कर की स्थिति में है और कई पर वो जीत भी रही है। भाजपा की झोली में जो दो सीटें साफ़-साफ जाती दिखाई दे रही हैं, वे हैं क्षेत्र क्रमांक-2 जहां से रमेश मेंदोला उम्मीदवार हैं और क्षेत्र क्रमांक-4 जहाँ से महापौर मालिनी गौड़ तीसरी बार मैदान में हैं। अब पड़ताल की जाए इंदौर की सभी 9 सीटों की, जहाँ कांग्रेस और भाजपा दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी। है   
   इंदौर की क्षेत्र क्रमांक-1 सीट से भाजपा उम्मीदवार सुदर्शन गुप्ता पिछले दो बार चुनाव जीते हैं। एक बार ऐसा भी अवसर आया जब वे मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले थे, पर एक वक़्त पर पांसा पलट गया और वे शपथ नहीं ले सके। लेकिन, इस बार के चुनाव में उनकी स्थिति कुछ कमजोर नजर आ रही है। कांग्रेस में बगावत थमने और विष्णु शुक्ला के खिलाफ सुदर्शन गुप्ता की बयानबाजी से माहौल पर असर पड़ा! माना जा रहा है कि ये सीट कांग्रेस उम्मीदवार संजय शुक्ला खाते में दर्ज हो सकती है। क्षेत्र क्रमांक-2 बरसों तक शहर का मिल मजदूरों का इलाका रहा है। यहाँ से पिछले कई विधानसभा चुनाव भाजपा के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय जीतते रहे हैं। लेकिन, दो चुनाव रमेश मेंदोला ने जीते और पार्टी ने मेंदोला को तीसरी बार फिर उम्मीदवार बनाया है। इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस के मोहन सेंगर हुआ! करीब महीनेभर लम्बे चुनाव प्रचार और माहौल देखकर संकेत मिलता है कि जीत तो रमेश मेंदोला की होगी, लेकिन पिछले चुनाव की तरह हार-जीत में 90 हज़ार वाला अंतर शायद न हो! क्योंकि, मोहन सेंगर ने भी पूरे जोश से चुनाव लड़ा है। इस क्षेत्र में मतदान कम होने से जीत का अंतर भी ज्यादा नहीं होगा। लेकिन, इस बार इस इलाके में कांग्रेस ने पूरी दमदारी से मैदान संभाला, इसमें कोई शक नहीं!  
  अब आते हैं,  इंदौर की क्षेत्र क्रमांक-3 सीट पर जो इस बार सबसे ज्यादा टक्कर और प्रतिष्ठा वाली मानी जा रही है। इसलिए कि यहां से भाजपा के उम्मीदवार आकाश विजयवर्गीय हैं, जो बड़े भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय के बेटे हैं। उनके सामने हैं कांग्रेस के अश्विन जोशी, जो तीन बार इसी क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। मुकाबला जितना कड़ा भी है, उतना ही प्रतिष्ठापूर्ण भी! यही कारण है सभी की नजरें इसी सीट के नतीजों पर टिकी है। अभी यहाँ किसी की हार-जीत के स्पष्तः कयास नहीं लगाए जा सकते। लेकिन, मुस्लिम इलाकों में ज्यादा मतदान को कांग्रेस अपने पक्ष में बता रही है, पर नतीजे ही बताएँगे कि पलड़ा किसके पक्ष में झुका। शहर का क्षेत्र क्रमांक-4 भी भाजपा के लिए प्रतिष्ठा वाली सीट है। यहां से भाजपा उम्मीदवार मालिनी गौड़ हैं, जो इंदौर की महापौर भी हैं। शहर को दो बार साफ़-सफाई में देश में नम्बर-वन बनाने की उपलब्धि उनके खाते में दर्ज है। लेकिन, स्मार्ट सिटी के नाम पर उनके क्षेत्र में हुई तोड़फोड़ भी उनके ही खाते में है। तोड़फोड़ वाला मामला उनके विपरीत जा सकता है। यहाँ उनके सामने कांग्रेस उम्मीदवार सुरजीतसिंह चड्ढ़ा हैं, पर उनसे किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद कम ही की जा रही है। चुनाव में जीत के दावे तो उन्होंने भी किए पर उनके दावों में भरोसा कुछ कम। उनके पिता उजागरसिंह चड्ढा भी शहर कांग्रेस के नेता रहे थे।  
  शहर का क्षेत्र क्रमांक- 5 आधुनिक इंदौर का चेहरा है। यहाँ से पिछले तीन बार से भाजपा के महेंद्र हार्डिया विधायक चुने जाते रहे हैं। अबकी बार उनके सामने कांग्रेस ने सत्यनारायण पटेल को मैदान में उतारा है। पटेल की इस क्षेत्र में बस यही उपलब्धि है, कि उनका क्षेत्र में पुराना और बड़ा स्कूल है और इस नजरिए से उनके कई परिवारों से जीवंत संपर्क हैं। राजनीतिक परिवार से जुड़े सत्यनारायण पटेल को यदि कोई लाभ मिला तो भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी का ही मिल सकता है। इस इलाके में भी बड़ी मुस्लिम बस्तियाँ हैं, जहाँ काफी अच्छा मतदान हुआ है। यदि इसे संकेत माना जाए तो हार-जीत का अंतर काफी काम हो सकता है।  
   इंदौर की 9 में से 4 विधानसभा सीटें ग्रामीण हैं। राऊ को भी ग्रामीण कहा जाता है, जबकि इस विधानसभा क्षेत्र का बड़ा इलाका शहर में आता है। मोदी लहर में भी यहाँ से पिछला चुनाव जीतने वाले कांग्रेस उम्मीदवार जीतू पटवारी फिर मैदान में हैं। उनके सामने भाजपा ने मधुकर वर्मा को उम्मीदवार बनाया है। लेकिन, जीतू पटवारी की स्थिति बहुत ज्यादा दमदार नजर नहीं आ रही। भाजपा उम्मीदवार का संघ परिवार से जुड़ा होने के कारण प्रचार के दौरान यहाँ संघ की काफी सक्रियता देखी गई, जो नतीजों को प्रभावित कर सकती है। इंदौर की यही एक सीट है जहाँ संघ के कार्यकर्ताओं ने काम किया है। जीतू पटवारी की वाचालता और अनर्गल बयानबाजी से कुछ लोग नाराज भी हुए! जबकि, भाजपा उम्मीदवार मधुकर वर्मा अपेक्षाकृत सौम्य हैं।  
  ग्रामीण इलाके की दूसरी सीट महू है। यहाँ से लगातार दो बार कैलाश विजयवर्गीय विधायक रहे हैं। उनके राजनीतिक कद के कारण बाहरी होते हुए भी उनका विरोध नहीं हुआ। लेकिन, इस बार यहाँ से पिछला चुनाव इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-3 से जीतने वाली उषा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया गया है, जिससे महू के स्थानीय नेता नाराज हैं। इस वजह से महू में भाजपा का पलड़ा काफी हल्का नजर आ रहा है। क्योंकि, स्थानीय नेता को उम्मीदवार न बनाए जाने का विरोध बाहर से तो नजर नहीं आ रहा, पर सेबोटेज की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। यहां से उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार के अंतरसिंह दरबार से कड़ी चुनौती मिली है। मतदान के दो दिन बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए उषा ठाकुर के एक वीडियो ने इस आशंका की पुष्टि कर दी कि नतीजे उनके पक्ष में नहीं होने वाले! उन्होंने भाजपा में वंशवाद और खुद को इंदौर से महू धकेले जाने पर अपना रोष व्यक्त किया है। 
   ग्रामीण इलाके की एक सीट देपालपुर भी है, जिस पर कलौता समाज का वर्चस्व रहा है। यहाँ से भाजपा ने दो बार के विधायक रहे मनोज पटेल को तीसरी बार मैदान में उतारा है। उनके सामने कांग्रेस ने विशाल पटेल पर दांव लगाया और ये सही भी लग रहा है। मनोज पटेल को लेकर क्षेत्र में चुनाव से पहले ही काफी विरोध देखा गया, ऐसे में उनकी जीत के आसार कम ही दिखाई दे रहे हैं। जबकि, पहली बार चुनावी राजनीति में उतरे विशाल पटेल का पलड़ा भारी है। जिले की सांवेर भी ग्रामीण इलाके में आती है। जहाँ से कांग्रेस ने पिछले कई चुनाव में तुलसी सिलावट को ही अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार भी वही मैदान में हैं। उनके सामने हैं, पिछले विधायक और भाजपा उम्मीदवार डॉ राजेश सोनकर। प्रचार के दौरान यहाँ जो माहौल नजर आया उसके मुताबिक इस सीट पर कांग्रेस भारी है। यहाँ के किसानों में भाजपा के प्रति नाराजी होने के साथ उम्मीदवार के व्यवहार से भी शिकायत है। इस कारण डॉ सोनकर को प्रचार के दौरान कई जगह विरोध का सामना भी करना पड़ा। जबकि, तुलसी सिलावट को वहां के लोग उनके व्यवहार के कारण ज्यादा पसंद करते हैं।  महीनेभर के चुनाव प्रचार के हंगामे और जिले की जमीनी हालात को देखकर लगता है कि मतदाता की ख़ामोशी अपना असर जरूर दिखाएगी। मतदाता का मौन को सुना जाए तो आने वाले नतीजों का अंदाजा हो जाता है।    
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Sunday, December 2, 2018

आमिर को इस फ्लॉप फिल्म पर अफ़सोस क्यों?


- हेमंत पाल

  फिल्म एक अनिश्चय वाला व्यवसाय है, जिसके बारे में कोई दावा नहीं किया जा सकता! कब कौनसी फिल्म दर्शकों के दिल को लुभा जाए और कौनसी दिल से उतर जाए, कहा नहीं जा सकता! सौ साल से ज्यादा पुरानी इस फ़िल्मी दुनिया में ऐसे कई उदाहरण है, जो इस व्यवसाय की अनिश्चितता को साबित करते हैं! इस साल ऐसी ही एक फिल्म आई यशराज बैनर की 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान।' इस फिल्म को लेकर काफी संभावनाएं जगाई गई थी। 'यशराज' जैसा बड़ा बैनर, आमिर खान और बच्चन जैसे जाने-माने कलाकारों के होते उम्मीद की जा रही थी, कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धमाल करेगी! लेकिन, पहले दिन रिकॉर्ड कमाई करने के बाद ये फिल्म जिस तरह दर्शकों के दिल से उतरी, वो मिसाल है।   
      आमिर खान को फ़िल्मी दुनिया में 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' कहा जाता है, जो बहुत सोच समझकर फिल्म में काम करने का फैसला करते हैं और जब काम शुरू करते हैं, तो कोई खामी की गुंजाइश नहीं रखते! इसके बाद भी 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' का बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकामयाब होना एक अचरज वाली बात है। खुद आमिर खान ने भी इस बात को स्वीकारा कि इस बार वे दर्शकों की उम्मीद पर खरे नहीं उतर पाए, जबकि उन्होंने कोशिश पूरी की! उन्होंने फिल्म के फ्लॉप होने की पूरी जिम्मेदारी भी ली। लेकिन, ये पहली बार हुआ कि आमिर ने किसी फिल्म की असफलता के लिए खुद को दोषी माना है। जबकि, इससे पहले भी उनकी फ़िल्में फ्लॉप हुई हैं।       
  आमिर खान ने अपने करियर इससे पहले भी बड़ी फ्लॉप फ़िल्में दी है। लेकिन, ये पहला मौका  है, जब उन्होंने 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' के लिए अफ़सोस जाहिर किया। पहले भी उनकी कई फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर पानी नहीं माँगा! थोड़ा पीछे जाकर उनकी फिल्मों को याद किया जाए तो 2000 में आई आमिर की फिल्म 'मेला' ऐसी फिल्म थी, जो ऐसे ही बुरी तरह फ्लॉप हुई थी। अब 18 साल बाद 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' की नाकामयाबी भी वैसी ही है। जबकि, बीते 18 सालों में आमिर खान ने सुपर स्टार का दर्जा हांसिल किया है। ये आमिर ही हैं जिनकी फिल्म 'गजनी' ने 100 करोड़ क्लब की, 'थ्री इडियट्स' ने 200 करोड़ क्लब की और 'पीके' ने 300 करोड़ क्लब की शुरुआत्त की थी। 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' के बारे में अनुमान था कि ये फिल्म बॉलीवुड में 400 करोड़ क्लब की शुरूआत करेगी। लेकिन, सबकुछ होते हुए भी अपनी लचर कहानी के चलते फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आई! 
  ऐसे हादसे आमिर खान के साथ पहले भी हुए हैं, जब उनकी एक फिल्म ने बड़ी शुरुआत की और बाद में वह धड़ाम से ऐसी गिरी कि उठ ही नहीं सकी। 'मंगल पांडे' ऐसी ही फिल्म थी। वो भी अंग्रेजी शासन से जुड़ी ऐतिहासिक फिल्म थी, 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' की कहानी भी अंग्रेजी राज की है। 2000 में आई 'मेला' इस मिलेनियम यानी 2000 की पहली रिलीज़ फिल्म थी, लेकिन, चली नहीं! आमिर की फ्लॉप फिल्मों में 'धोबी घाट' भी है। इसे आमिर की पत्नी किरण राव ने बनाया था। इस फिल्म के ब्लॉक बस्टर होने की तो किसी को उम्मीद नहीं थी। लेकिन, दुर्भाग्यवश ये बेहद बोरिंग फिल्म निकली। 
  डायरेक्टर मंसूर खान ने 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिकंदर' जैसी फ़िल्में बनाई हैं। लेकिन, आमिर को लेकर जब उन्होंने ;अकेले हम-अकेले तुम' बनाई तो बात बनी नहीं! आमिर और मनीषा कोइराला ने अच्छी एक्टिंग भी की। इसके बावजूद दर्शक फिल्म से ऊब गए थे। आशुतोष गोवारीकर की एक्शन फिल्म 'बाजी' एक ठीक-ठाक फिल्म थी। लेकिन, दर्शकों ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं ली। 'अंदाज़ अपना अपना' भी इसी फेहरिस्त की फिल्म है, जो एक क्लासिक फिल्म थी, पर दर्शकों के दिल में नहीं उतर सकी थी। '1947 : पृथ्वी' फिल्म उस समय आई थी, जब आमिर खान ने लगातार तीन हिट फ़िल्में राजा हिन्दुस्तानी, इश्क और 'ग़ुलाम' दी थीं। लेकिन, इस फिल्म को लेकर दर्शकों में कोई उत्सुकता नहीं थी। बाद में आसानी से इस फिल्म को भुला भी दिया गया। ऐसी ही एक और फिल्म थी 'आतंक ही आतंक' जो काफी हद तक 'गॉडफादर' से प्रेरित थी। इस फिल्म की ओपनिंग काफी खराब थी। क्योंकि, फिल्म का निर्देशन भी ठीक नहीं था। जल्दबाजी में बनी इस फिल्म की रिलीज़ भी ठीक से अच्छी नहीं हुई थी। 
  इस फेहरिस्त की आमिर की आखिरी फ्लॉप फ़िल्म भी 'यशराज' की ही बनाई हुई है। फिल्म 'परम्परा' को आदित्य चोपड़ा ने लिखा था और यश चोपड़ा ने डायरेक्ट किया था। आमिर खान, सैफ अली खान और सुनील दत्त जैसी स्टार्स के साथ बनी ये फिल्म बुरी तह फ्लॉप हुई थी। इसलिए 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' के लिए जिम्मेदारी लेने का आशय ये नहीं कि अभी तक आमिर खान ने हमेशा हिट फ़िल्में ही दी है! 'ठग्स और हिंदुस्तान' उनकी पहली फ्लॉप फिल्म नहीं है और न आखिरी! हो सकता है आगे आमिर इससे भी बड़ी फ्लॉप फ़िल्में दर्शकों को परोसें!      
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Monday, November 19, 2018

भाजपा में क्या नाराज नेताओं को मनाने वाले नहीं बचे?


- हेमंत पाल 

 
    इस बार का विधानसभा चुनाव कई मामलों में कुछ अलग है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों में टिकट के लालायित नेताओं की संख्या इतनी ज्यादा रही कि स्थिति बगावत तक पहुँच गई! भाजपा ने 53 बागी उम्मीदवारों को पार्टी से बाहर कर दिया। क्योंकि, इन सभी ने पार्टी के नियम-कायदों का पालन नहीं किया और अधिकृत उम्मीदवार सामने ख़म ठोंककर खड़े हो गए! भाजपा ने इन बागियों को मनाने की कोशिश भी की, पर इसका कोई असर नहीं हुआ। बगावत के आरोप में पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया, सरताज सिंह, केएल अग्रवाल, तीन पूर्व विधायक और एक पूर्व महापौर को बाहर कर दिया गया। मसला ये है कि क्या भाजपा में अब ऐसे कद्दावर नेता नहीं बचे, जो बागियों को मना सकें या फिर इस असंतोष को दूर करने की कोशिश ही नहीं की गई? भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा असंतोष का सामना नहीं करना पड़ा! कांग्रेस ने सिर्फ 12 सीटों पर बगावत झेली।
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   असंतोष हर पार्टी में होता है! ये स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, सवाल ये कि असंतुष्ट नेताओं को भाजपा ने मनाया क्यों नहीं? भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले मध्यप्रदेश में क्या अब ऐसे नेता नहीं बचे, जो रूठों को मनाने का दम रखते हों? इस चुनाव में ऐसे नेता की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है! भाजपा का हर कार्यकर्ता इस कमी को समझ भी रहा है। टिकट वितरण के बाद पार्टी में बड़े पैमाने पर हुई बगावत ने पार्टी की रीति-नीतियों में आए बदलाव को भी उजागर किया। प्रदेश के हर जिले में टिकट बंटवारे के बाद नाराजी नजर आई! क्योंकि, पंद्रह साल सरकार में रहने का बाद भाजपा का चेहरा अब पूरी तरह बदल गया है। 2003 के चुनाव के समय पार्टी में ऐसे नेता थे, जो नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं को आसानी से समझाइश देकर शांत करके काम पर लगा देते थे। 
  पिछले तीन चुनावों में पार्टी के संकट मोचक रहे अनिल माधव दवे की इस चुनाव में काफी महसूस की गई! दवे ने तीन विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी के वॉर रूम में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनके बाद पार्टी में इस जगह को कोई और नहीं ले पाया। उनसे पहले यही काम कुशाभाऊ ठाकरे किया करते थे। पर, अब न तो अनिल माधव दवे हैं और न कुशाभाऊ ठाकरे! आज पार्टी कार्यकर्ता इस बात को जानते हैं कि दवे की रणनीति के कारण ही 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में बगावत को उभरने से पहले ही ठंडा कर दिया गया था। यहाँ तक कि नाराजी कमरे से बाहर भी नहीं आ सकी! वास्तव में इस बार की बगावत का मुख्य कारण ये रहा कि पार्टी का टिकट चाहने वाले कार्यकर्ताओं को बड़े नेताओं की बात पर भरोसा नहीं रहा! बागियों को जिस तरह के प्रलोभन देकर चुनाव से अलग किया जाता है, वो फार्मूला इस बार फेल हो गया। इन बागियों का कहना है कि पिछले चुनावों में जिस तरह के वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए!  
   विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी होते ही भाजपा में बग़ावतियों ने मोर्चा संभाल लिया। बुंदेलखंड, विंध्य, महाकौशल और भोपाल इलाके में ये बागी काफी असरदार भी हैं। पार्टी के लिए दमोह सीट सबसे बड़ी चिंता बन गई। यहाँ से वित्त मंत्री जयंत मलैया भाजपा उम्मीदवार हैं। जबकि, भाजपा से बागी रामकृष्ण कुसमरिया ने दमोह और पास की पथरिया सीट से निर्दलीय नामांकन भरा है। कुसमरिया पांच बार सांसद और दो बार विधायक रहे हैं। कुसमरिया ने जयंत मलैया पर टिकट कटवाने का आरोप लगाया! मलैया ने कहा कि इस इलाके में अपना अकेले का दबदबा चाहते हैं, जिसके चलते मुझे टिकट नहीं दिया गया। हमने यहां पार्टी को खड़ा करने के लिए डाकुओं से लड़ाई लड़ी, अब हम जैसे लोगों को ही हाशिए पर डाल दिया! सरकार में कृषि मंत्री रहे कुसमरिया ने कहा कि दमोह से जयंत मलैया के खिलाफ खड़े होकर वे पार्टी की ही मदद कर रहे हैं! क्योंकि, दमोह और पथरिया दोनों सीटें भाजपा हार रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव जीतकर वे भाजपा का ही समर्थन करेंगे। 
  मध्यप्रदेश में भाजपा को लगातार दो चुनाव जिताने वाले शिवराजसिंह चौहान के सामने पार्टी की बगावत बड़ी चुनौती है। इस चुनौती का अंदाजा टिकट का फैसला होने से पहले ही होने लगा था। विरोध और बगावत की आवाजें भाजपा मुख्यालय में सुनाई देने लगी थीं। वहाँ होने वाली खुलेआम नारेबाजी को रोकने का साहस किसी में नहीं था। इसलिए कि पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता या तो खुद टिकट की जुगाड़ में थे या अपने बेटे, पत्नी या परिवार के किसी सदस्य के लिए कोशिश में लगे थे। जबकि, प्रदेश में भाजपा की पहचान अनुशासित कार्यकर्ताओं से है। यहाँ फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने की परंपरा रही है। लेकिन, इस बार का नजारा बदला हुआ लगा! कार्यकर्ताओं में असंतोष पहले भी कई बार दिखाई दिया, पर वो कभी विद्रोह की सीमा तक नहीं पहुंचा! 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष नरेंद्र तोमर ने असंतोष को किनारे करने में अहम भूमिका अदा की थी। इस बार नरेंद्र तोमर की भूमिका उस रूप में नहीं थी और अध्यक्ष राकेश सिंह को इस तरह की स्थितियों से निपटने का अनुभव नहीं है। पिछले एक दशक में प्रदेश में भाजपा के कई ऐसे नेता हाशिए पर चले गए, जो ऐसे हालात निपटने माहिर थे। 
       चुनाव में कार्यकर्ताओं नाराजी को बाबूलाल गौर और सरताज सिंह ने ज्यादा हवा दी। इन दोनों को शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल से दो साल पहले ही उम्रदराज होने का हवाला देकर मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया था। कहा गया था कि पार्टी ने 70 पार कर चुके नेताओं को घर भेजने का निर्णय लिया है। लेकिन, जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भोपाल आए तो उन्होंने 70 साल वाले इस फार्मूले को नकार दिया। उसके बाद से ही शिवराजसिंह चौहान इन दोनों नेताओं के निशाने पर थे। चुनाव के समय इन दोनों नेताओं को विश्वास था कि पार्टी उनके साथ न्याय करेगी! टिकट को लेकर बाबूलाल गौर का भरोसा इसलिए बढ़ा था कि कुछ दिन पहले नरेंद्र मोदी ने भोपाल में मंच पर ही उनसे हाथ मिलाकर कहा था 'गौर साहब एक बार और!' इसके बाद ये कयास लगाए जाने लगे थे कि अब गोविंदपुरा सीट से बाबूलाल गौर को टिकट मिलना तय है! लेकिन, ऐसा नहीं हुआ तो वे कोप भवन में चले गए। पार्टी की पहली सूची आने के बाद तो गौर और सरताज सिंह का गुस्सा फट पड़ा! लेकिन, अंततः गौर की बहू को टिकट देकर मामले  ठंडा किया गया! लेकिन, सरताज सिंह की नाराजी पर जब भाजपा ने कान नहीं धरे, तो कांग्रेस ने उन्हें साधकर होशंगाबाद से अपना उम्मीदवार बना दिया।   
  बरसों बाद इन चुनावों से ये सच पुख्ता हो गया कि राजनीति में संभावनाएं अनंत हैं। यहां कब, कहाँ और कौन कैसे पलटी मार दे, कहा नहीं जा सकता। यहाँ किसी भी क्षण बाजी पलट सकती है। कौन सोच सकता था कि शिवराजसिंह के साले संजय मसानी जीजा जी की पार्टी से बगावत करके कांग्रेस की गोद में बैठ जाएंगे? लेकिन, ये अनपेक्षित घटना भी हुई! कांग्रेस के लिए संजय मसानी अभी तक विवादास्पद हुआ करते थे। उनपर कर आरोप भी लगाए गए थे! लेकिन, कांग्रेस में आते ही वे दूध से धुलकर पवित्र हो गए। उनकी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी कांग्रेस के निशाने पर थी। अजय सिंह ने तो यहाँ तक आरोप लगाया था कि संजय मसानी ने फर्जी दस्तावेजों से मध्यप्रदेश में अपनी कंपनी का रजिस्ट्रशन करवाया था। उन पर अवैध खनन, फिल्मों में बेनामी धन लगाने जैसे कई आरोप लगाए गए। लेकिन, अब सब कुछ कबूल करते हुए कांग्रेस ने उन्हें वारासिवनी से टिकट दे दिया। अब सबकी नजरें चुनाव के नतीजों पर टिकी है कि भाजपा में हुआ उभरा यह असंतोष कहाँ, कैसा असर दिखाता है!   
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Sunday, November 18, 2018

इतिहास बचेगा या कुछ रचेगा?


- हेमंत पाल

    भारतीय इतिहास की पृष्ठभूमि वाली दो अहम फिल्में इस साल आईं! 'पद्मावत' और 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान।' तीसरी फिल्म 'मणिकर्णिका' भी इसी साल आने वाली थी, जो अगले साल तक बढ़ गई। वास्तव में 'पद्मावत' को 2017 में रिलीज होना था, परंतु इससे जुड़े विवादों के कारण ये फिल्म खिंचकर इस साल रिलीज हुई। 'पद्मावत' के साथ जो कुछ हुआ उससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या फिल्मकारों को वास्तव में इतिहास के अँधेरे में झांकने का जोखिम उठाना चाहिए? क्योंकि, सेंसर सिर्फ बोर्ड नहीं रह गया है? अब तो गली, मोहल्लों तक के लोग और जेबी संगठन भी कैंची लेकर फिल्मों को कतरना चाहते हैं। 'पद्मावत' बॉलीवुड में 200 करोड़ रुपए के बजट से बनी पहली फिल्म थी। लेकिन, उसका भविष्य लम्बे समय तक अधर रहा! 
   'रंगून' और 'सिमरन' के फ्लॉप होने के बाद कंगना रनौत को अब अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म 'मणिकर्णिका' से बहुत उम्मीदें हैं। क्योंकि, यह फिल्म देश की आजादी से जुड़ी एक महान योद्धा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बायोपिक है। 'पद्मावत' के विरोध देखते हुए इसके लेखक, निर्देशक की टीम ने लक्ष्मीबाई से जुड़े इतिहास को काफी खंगाला! ये जरुरी भी था, क्योंकि अब लोग किसी भी ऐतिहासिक फिल्म को महज फिल्म की तरह नहीं देखते! बल्कि, उससे जुड़े सामाजिक दृष्टिकोण को भी परखते हैं। इसके बाद भी 'मणिकर्णिका' पर से खतरा टला नहीं है। फिल्म के ट्रेलर को लेकर भी उंगली उठ चुकी है।
  एक और ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनना शुरू हुई है, जो 1897 में तत्कालीन भारत-अफगान सीमा पर सरागढ़ी में हुई लड़ाई पर आधारित है। ये फिल्म राजकुमार संतोषी और रणदीप हुड्डा को लेकर बना रहे हैं। यह फिल्म दस हजार अफगानों के खिलाफ 21 भारतीय जवानों के भीषण युद्ध की दास्तान है। हाल ही में रिलीज हुई आमिर खान और अमिताभ बच्चन की फिल्म 'ठग्स ऑफ हिंदुस्तान' को लेकर दर्शकों में काफी उत्सुकता थी, पर फिल्म ने बहुत निराश किया। इस फिल्म में भारत में 18वीं सदी के ठगों के कारनामे हैं। फिल्म के प्रति दर्शकों की उत्सुकता का प्रमाण ये है कि फिल्म ने पहले ही दिन सर्वाधिक 50 करोड़ की कमाई की! लेकिन, बाद में फिल्म ने पानी नहीं माँगा! 
   फिल्मकारों के नजरिए की बात की जाए, तो कहा जा सकता है कि सिनेमा कलापूर्ण अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, अतः फिल्मकार को थोड़ी छूट लेने का अधिकार होना चाहिए। यह तर्क सही भी है। समझा जाना चाहिए कि ऐतिहासिक फिल्में उस समय के इतिहास को नहीं, बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में एक कहानी को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती हैं। इसलिए प्रस्तुति का स्तर सिनेमा को देखने का मुख्य आधार होना चाहिए। लेकिन, ऐसा कहने से इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता कि ऐतिहासिक, इतिहास की बड़ी घटनाओं या किरदारों पर फिल्म बनाने के मामले में हिंदी सिनेमा इतना स्तरहीन और पिछड़ा क्यों है? एक भी ऐसी फिल्म का नाम याद नहीं किया जा सकता, जो पूरी तरह इतिहास या किसी महान चरित्र पर आधारित हो। चेतन आनंद की 'हकीकत' (1964) और एस राम शर्मा की 'शहीद' (1965) ही ऐसी फ़िल्में थीं, जो इस मापदंड के काफी करीब मानी जाती हैं। इसके बाद जेपी दत्ता की 'बॉर्डर' (1997) एक बेहतरीन फिल्म थी, जिसमें पाकिस्तान से जंग लड़ रही एक बटालियन की कहानी को बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया गया था। 
 आशुतोष गोवारिकर की 'मोहन जो दाड़ो' और टीनू सुरेश देसाई की 'रुस्तम' भी ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्में थीं। जहां गोवारिकर ने हजारों साल पहले की हड़प्पा सभ्यता में अपनी कहानी को बुना था। वहीं देसाई ने 1950 के दशक की एक बहुचर्चित अपराध कथा को परदे पर चित्रित किया। कथानक, अभिनय और प्रस्तुति को लेकर इन दोनों फिल्मों को जो भी प्रशंसा या आलोचना मिली है, वह तो अलग विषय है, परंतु कथा के कालखंड और इतिहास के साथ समुचित न्याय नहीं करने के लिए दोनों की बड़ी निंदा हुई! 
 पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक घटनाएं और लोक में प्रचलित कहानियां हमेशा ही सिनेमा के पसंदीदा विषय रहे हैं। पहली हिंदुस्तानी फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) को दादा साहेब फाल्के ने बनाया था। अर्देशर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' (1931) में बनाई। सबसे लोकप्रिय फिल्में 'मुगले आजम' (1960) में के आसिफ ने बनाई। एस राम ने 1965 में 'शहीद' और आशुतोष गोवारीकर ने 2001 में 'लगान' बनाई! एसएस राजामौली ने 2015 में 'बाहुबली' का खाका भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की तरह बना। ऐसे में हातिम ताई (1990) और 'बाहुबली' जैसी फिल्में 'मोहन जो दाड़ो' या 'मुगले आजम' से कहीं ज्यादा ईमानदार फिल्में रहीं, जो एक अनजाने मिथकीय वातावरण में ले जाकर दर्शकों का मनोरंजन तो करती हैं! ऐसी फ़िल्में इतिहास का प्रतिनिधि होने का ढोंग भी नहीं रचती! अब, जबकि तकनीक है, दर्शक हैं, धन है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे फिल्मकार इतिहास को लेकर अधिक संवेदनशील होंगे और विगत को ईमानदारी से पेश करने का जोखिम उठाएंगे। 
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Monday, October 29, 2018

टिकट के दावेदारों ने समीकरण गड़बड़ाए



  इन दिनों मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियाँ अपने-अपने उम्मीदवारों के कटघरे में खड़े हैं! दोनों पार्टियों को समझ नहीं आ रहा कि उनके लिए चुनाव जीतने वाला चेहरा कौनसा है! चुनाव से पहले लगा था कि दोनों के लिए उम्मीदवारों का चयन ज्यादा बड़ी मुश्किल नहीं बनेगा। भाजपा ने दर्जनभर सर्वे जरिए पता कर ही लिया था, कि उसका कौनसा विधायक फिर चुनाव लड़ने लायक है और कौनसा नाकारा! इसलिए जो नाकारा है, वो किनारे कर दिया जाएगा और उसकी जगह कोई नया आ जाएगा! उधर, कांग्रेस को तो 180 करीब नए चेहरे ढूँढना है, इसलिए उसके लिए भी ज्यादा मुश्किल नहीं आएगी! पर, जमीन पर ये सारे अनुमान गलत साबित हुए! दोनों पार्टियों में टिकट को लेकर जमकर घमासान मचा है। 100 से ज्यादा विधायकों के टिकट काटने का दावा करने वाली भाजपा को एक-एक टिकट काटने में पसीना आ गया। ऐसे में चुनाव समिति को समझ नहीं आ रहा, कि किसका टिकट काटे? उधर, कांग्रेस इस मुसीबत में है कि दावेदारों की भीड़ में किसे टिकट दें! जीत के दावों के बीच कौनसा चेहरा वास्तव में दांव लगाने लायक है! दोनों के सामने मुश्किल एक ही है कि किसे टिकट दें और किसे नहीं! टिकट चाहने वालों की भीड़ ने कांग्रेस, भाजपा की सारी चुनावी रणनीति पर पानी फेर दिया। दिल्ली से लगाकर भोपाल तक चले मंथनों के कई दौर भी धरे रह गए। 
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- हेमंत पाल

    कमलनाथ जब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे, तब दावा किया गया था कि अब कांग्रेस एक है। पार्टी में गुटबाजी और 'अपना आदमीवाद' की राजनीति बिल्कुल ख़त्म हो गई। इस बार टिकट उसी मिलेगा, जो वास्तव में जीतने की कूबत रखता होगा! ये बात कहने और सुनने में बहुत अच्छी लगती है। कांग्रेस का ये दावा भी अच्छा लगा, पर ऐसा हुआ नहीं! एक-एक सीट के लिए खींचतान चल रही है। विधायकों की 45-50 सीटें छोड़ जाएं, तो बची हुई अधिकांश सीटों पर घमासान मचा है। न तो कोई टिकट के दावेदार पार्टी की बात समझने को तैयार हैं, न पार्टी के नेता आपसी गुटबाजी से उभरे! टीवी सर्वे पर कांग्रेस की संभावित जीत ने पार्टी को इतना उत्साहित कर दिया कि पार्टी के सारे आका अपने मोहरों पर दांव लगाने पर तुले हैं। हर बड़ा नेता इस कोशिश में है कि जीत वाली सीटों पर उसके ही समर्थक को टिकट मिले ताकि उसका पलड़ा भारी रहे। लेकिन, इस पूरी कवायद में दिग्विजय सिंह की 'संगत में पंगत' वाली रणनीति कामयाब होती दिखाई दे रही है। वही एक नेता हैं, जिन्हें पूरे प्रदेश की जमीनी हकीकत पता है।    
     कांग्रेस ने भले ही दिग्विजय सिंह को किनारे करने का नाटक किया हो, पर टिकटों की इस मारामारी से ये बात सामने आ गई कि अभी उनकी ताकत चुकी नहीं है। यदि वे नेपथ्य में हैं, तो ये भी उनकी ही कोई रणनीति का कोई हिस्सा है। उन्होंने इस बार स्वयं ही चुप रहने और मंच पर दिखाई न देने की भूमिका चुनी है। दिग्विजय सिंह के पीछे रहने का ही नतीजा है, कि कई सीटों पर बिना किसी विवाद के सहमति बनने की बातें कही गई! कांग्रेस का दावा है कि शुरुआती 70 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम अंतिम रूप से तय हो गए हैं। लेकिन, ऐसा सभी सीटों के लिए हो सकेगा, ऐसा नहीं लगता। पिछले चुनावों की ही तरह इस बार भी अंतिम समय तक नाम उलझे रहेंगे। पहले माना जा रहा था कि टिकटों का फैसला कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की पसंद-नापसंद पर निर्भर करेगा, पर ऐसा नहीं हुआ और न ऐसा होना संभव था। दिग्विजय सिंह पार्टी में एक बड़ा फैक्टर है, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
   ये बात सभी जानते हैं कि प्रदेश की कांग्रेसी सियासत तीन-चार नेताओं के प्रभाव क्षेत्र में बंटी है। ग्वालियर-चंबल इलाके में ज्योतिरादित्य सिंधिया, महाकौशल में कमलनाथ और मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड में दिग्विजय सिंह का दबदबा है। जबकि, बघेलखंड में नेता विपक्ष अजय सिंह का असर है। पहले इन नेताओं के प्रति निष्ठा रखने वाले लोगों को ही टिकट मिलते थे! लेकिन, इस बार कहा जा रहा था कि अब यह फॉर्मूला अब नहीं चलेगा! एजेंसियों से कराए जा रहे कई सर्वे पर भी पार्टी काफी हद तक भरोसा कर रही है। यही प्रयोग गुजरात और कर्नाटक में भी किया गया था, जिसके अच्छे नतीजे रहे। पार्टी ने इस बार के सर्वे का सैंपल साइज भी हर विधानसभा में 5 हज़ार वोटर्स से बढ़ाकर 15 हज़ार कर दिया था। इसलिए कि जो आकलन निकले वो ज्यादा सटीक हो। क्योंकि, इस बार सर्वे के नतीजों को ही टिकट का आधार बनाया गया है। उम्मीदवारी का अंतिम फैसला किसी नेता के प्रति निष्ठा से नहीं होगा! कांग्रेस की योजना भाजपा से पहले ही टिकट फाइनल करने की थी। लेकिन, ऐसा हो नहीं सका। पहले यहाँ तक कहा गया था कि जिन 50 सीटों पर कांग्रेस पिछले पाँच विधानसभा से चुनाव नहीं जीत सकी थी, वहाँ उम्मीदवारों की घोषणा सितंबर में कर दी जाएगी! लेकिन, ये काम अक्टूबर अंत तक भी नहीं हुआ! 
  भाजपा में भी हालात काबू में नहीं हैं। वहाँ भी एक-एक नाम पर जमकर छिड़ी हुई है। पार्टी ने भले ही पहले 100 से ज्यादा टिकट काटने की बात कह दी हो, लेकिन अब ये संभव नहीं लग रहा। अब घटते-घटते बात 60-65 टिकटों पर आ गई! जिस भी विधायक को अपने टिकट पर संकट नजर आ रहा है, वो विद्रोह की भूमिका में नजर आने लगता है। पार्टी ने 2008 और 2013 में टिकट का फार्मूला बनाया था 'मिनिमम रिक्स-मैक्सिमम रिजल्ट।' इसके अच्छे नतीजे निकले थे। दोनों बार 50 से ज्यादा टिकट बदले गए थे। इस बार ये गाज किस पर गिरेगी, कहा नहीं जा सकता। जबकि, कुछ विधायकों की सीटें बदलने की भी कोशिश की जा रही है। इनमें विधायकों के अलावा कुछ मंत्री भी शामिल है। 
   ये भी सही है कि मौजूदा विधायकों के टिकट कटने की खबरों ने भी पार्टी के अंदर भूचाल सा ला दिया है। पार्टी का तर्क है कि सर्वे में जिनके जीतने के आसार नहीं हैं, उन्हें टिकट नहीं दिया जाएगा! लेकिन, कोई भी ये मानने को तैयार नहीं है! संघ का तर्क है कि नेतृत्व को लेकर लोगों में गुस्सा नहीं है, लेकिन विधायकों के प्रति लोगों में जबरदस्त नाराजी है। यदि इस गुस्से ठंडा करना है, तो चेहरे बदलना ही होंगे! लेकिन, ये कोई मानने को तैयार नहीं कि उसके नीचे से जमीन खिसक रही है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि टिकट काटते हैं, तो विद्रोह का खतरा है! यदि टिकट देते हैं, तो लोगों की नाराजी झेलना पड़ेगी! एक तरफ कुंआ है और दूसरी तरफ खाई! पर इसी संकट से निकलना ही तो चुनाव प्रबंधन में परीक्षा की असली घड़ी है!
    भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भले ही प्रदेश संगठन पर इस बार 200 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा हो, पर हालात ऐसे नहीं है कि पार्टी इस लक्ष्य तक पहुँच पाएगी! किसानों की नाराजी, एंटी इनकम्बैंसी, एट्रोसिटी एक्ट, सवर्णों का गुस्सा भाजपा को शायद ही टारगेट तक पहुंचने दे! परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी भी संभल संभलकर फैसले कर रही है। जबकि, भाजपा की कमजोरी को ही कांग्रेस ने अपनी ताकत बनाया है। प्रदेश सरकार की 15 साल की खामियों, किसानों की नाराजी, बेरोजगारी, अफसरशाही और सरकार के अधूरे वादों को कांग्रेस ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया है। लेकिन, सारा दारोमदार इस बात पर है कि पार्टी का चेहरा बनने वाले उम्मीदवार कौनसे हैं। क्योंकि, दोनों पार्टियां जिसे चुनाव में उतारेगी, वही उसकी जीत का आधार बनेंगे!  
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फिल्मों में हिट रहा 'चोर' फार्मूला!


- हेमंत पाल 

    इन दिनों तमाम टीवी चैनलों और राजनीतिक रैलियों में 'चोर' शब्द की धूम है। हर राजनीतिक पार्टी प्रतिद्वंदी को ज्यादा बड़ा चोर साबित करने पर तुली है। राजनीति में तो ये फार्मूला ज्यादा सफल नहीं रहा! लेकिन, फिल्मों के लिए 'चोर' फार्मूला हमेशा से हिट रहा है। फिल्मों का इतिहास टटोलकर देखा जाए, तो 'चोर' शीर्षक से बनी अधिकांश फिल्में या गाने हिट हुए हैं। बाॅलीवुड की पहली हिट फिल्म कहलाने का श्रेय 1943 में प्रदर्शित अशोक कुमार की फिल्म 'किस्मत' को जाता है, जिसने कोलकाता के एक सिनेमा हाॅल में लगातार साढ़े तीन साल चलने का रिकार्ड बनाया था। 1975 में मुंबई के मराठा मंदिर में प्रदर्शित 'शोले' का भी लगातार पांच साल से ज्यादा चलने का रिकॉर्ड 32 साल तक कायम रहा। 'किस्मत' में अशोक कुमार ने चोर का चरित्र निभाया था, वहीं शोले के दोनों नायक धर्मेन्द्र और अमिताभ चोर बने थे।  
   हिन्दी फिल्मों में 'चोर' का चरित्र ब्लेक-शेड वाला न होकर ग्रे-शेड वाला होता है, जो नायिका से लेकर दर्शकों का दिल जीतकर बाॅक्स ऑफिस को लूटने में कामयाब होता है। कई फिल्में ऐसी भी बनी, जिनमें क्लाइमेक्स से पहले तक तो नायक को चोर दिखाया जाता है, लेकिन अंतिम रील आते-आते वो पुलिस वाला बन जाता है। 'ज्वैल थीफ' इस तरह की सबसे ज्यादा मनोरंजक फिल्म थी, जिसमें दर्शक आखिरी तक देव आनंद को चोर ही समझते हैं, लेकिन क्लाइमेक्स में अशोक कुमार को चोर के रूप में देखकर सब चौंक जाते है। 
  अशोक कुमार ने आरंभिक दिनों कई अपराधिक फिल्मों में चोर की भूमिका निभाई। उसके बाद देव आनंद लगभग हर दूसरी फिल्मों में चोर ही नहीं महिला दर्शकों के चितचोर भी बनें। राजकपूर ने 'आवारा' में चोर की भूमिका निभाकर दुनियाभर में वाहवाही लूटी, तो उनके भाई शम्मी कपूर भी ज्यादातर फिल्मों में चोर बने। सबसे छोटे भाई शशि कपूर तो इससे एक कदम आगे निकले। वह एनसी सिप्पी की एक फिल्म में न केवल चोर बने, बल्कि चोर बनकर उन्होंने 'चोर मचाए शोर' में खूब शोर मचाया और बाॅक्स आफिस पर पैसा भी बटोरा!
   हिन्दी फिल्मों के कई निर्माता-निर्देशकों को 'चोर' विषयों पर फिल्में बनाने या निर्देशित करने में महारथ हांसिल थी। गुरूदत्त गंभीर फिल्मकार बनने से पहले 'चोर' विषय पर सीआईडी, 12'ओ क्लाॅक जैसी सफल फिल्म बना चुके थे। विजय आनंद, शक्ति सामंत, राज खोसला जैसे फिल्मकारों ने हिन्दी फिल्मों में चोरों का जमकर महिमा मंडन किया। ऐसे ही निर्देशकों की बदौलत हिन्दी फिल्मों के चोरों पर दर्शकों का खूब प्यार उमड़ा है। हिन्दी फिल्मों में शायद ही कोई अभिनेता हो, जो कभी चोर न बना हो। मनोज कुमार जैसा कलाकार भी 'बेईमान' में चोर का चरित्र निभा चुके हैं। अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, देव आनंद, शत्रुघ्न सिंहा, राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र जैसे पुराने नायकों ने कई फिल्मों में चोर बनकर दर्शकों को लुभाया। अब शाहरूख, सलमान और आमिर भी इस दौड में पीछे नहीं हैं। 'धूम' सीरिज की सारी फिल्मों का कथानक चोरों के इर्द गिर्द ही घूमता रहा। 
   'चोर' शीर्षक से बनी फिल्मों में ज्वैल थीफ, चोरी मेरा काम, चोर-चोर, दो चोर, तू चोर में सिपाही, हम सब चोर हैं, अलीबाबा चालीस चोर, चोर मचाए शोर, बम्बई का चोर, चोर और चांद, थीफ आफ बगदाद, बैंक चोर, नामी चोर, महाचोर, चोर बाजार प्रमुख है। कुछ ऐसी फिल्में भी हैं, जिनमें नायक तो शरीफ होता है लेकिन नायिकाएं चोर होती हैं। जीनत अमान, मुमताज, हेमा मालिनी और श्री देवी ऐसी भूमिकाओें में खूब फबती रही है। नीतू सिंह की एक फिल्म का शीर्षक ही 'चोरनी' था। 
   हिन्दी फिल्मों के 'चोर' केवल शीर्षक तक ही सीमित नहीं रहे। ऐसे कई हिन्दी गीत हैं जिन्हें 'चोर' शब्द के प्रयोग ने हिट बनाया है। ऐसे गीतों में चुरा के दिल मेरा, चुरा लिया है तुमने जो दिल तो, मैं एक चोर मेरी रानी, शोर मच गया शोर, आया बिरज का बांका चोर, मेरी गली में आया चोर, इस दुनिया में सब चोर चोर, जब अंधेरा होता है आधी रात को एक चोर निकलता है। मैं एक चोर मेरी रानी गीत को भी लोगों ने खूब सुना और गुनगुनाया है। सलीम जावेद ने तो अपनी फिल्म 'दीवार' में अमिताभ के हाथ पर 'मेरा बाप चोर है' लिखकर हिन्दी सिनेमा में चोर को न केवल अमर कर दिया, बल्कि बाॅलीवुड को चोर विषय पर हिट फिल्म बनाने का एक फार्मूला भी बता दिया है। 
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