Monday, January 14, 2019

इन फिल्मों ने दिखाई औरत की ताकत!


- हेमंत पाल 

    फिल्मों का ट्रेंड धीरे-धीरे बदल रहा है। सिनेमा देखने वाली दर्शकों की नई पीढ़ी की रूचि रोमांटिक या बदला लेने जैसी फिल्मों में नहीं है। उसे चाहिए नए ज़माने की नई सोच वाली ऐसी कहानियां जो वास्तविकता के नजदीक हो और सबसे ख़ास बात ये कि जीवन से जुडी हुई लगें! फिल्म का हीरो तिलस्मी पात्र न लगे जिसके लिए दुनिया का हर काम आसान हो! यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड में महिला केंद्रित फिल्मों की लहर आ गई! इन फिल्मों को देखकर महिलाएं गर्व महसूस करती हैं। साथ ही फिल्मों से प्रेरणा लेकर खुद के लिए लड़ने को भी तैयार रहती हैं। हाल के वर्षों में ऐसी कई फिल्में आईं जो महिला केंद्रित होने के बावजूद सुपरहिट रहीं। यही कारण है कि बीते 5 सालों में फिल्मों का नायकत्व वाला ट्रेंड बदल गया है। विषय वस्तु के स्तर पर, कलाकारों के स्तर पर और फिल्म निर्माण के स्तर पर होने वाला ये बदलाव साफ नजर आ रहा है। देखा जाए तो ये नया प्रयोग तो नहीं है, पहले भी ऐसा होता रहा है,पर महज बदलाव के लिए! अब लगातार ऐसी ही फिल्मों का आना ये दर्शाता है कि दर्शकों के मूड को फिल्मकारों ने भी भांप लिया है।   
    यदि बदलाव के दौर की शुरूआत की बात की जाए तो 2013 में आई फिल्म 'लंच बॉक्स' पहली ऐसी फिल्म थी जिसने दर्शकों को 'कुछ नया' दिया था। इसके बाद 'क्वीन' और 'तनु वेड्स मनु' ने दर्शकों का टेस्ट बदला। लेकिन, पिछले दो सालों में सिनेमा के चरित्र में जबर्दस्त बदलाव दिखाई दिया। छठे दशक सिनेमा में कुछ सामाजिक यथार्थ दिखाने की कोशिश राज कपूर और विमल रॉय ने भी की थी। वो ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों का दौर था, लेकिन यहीं से फिल्मकारों ने परदे पर सच दिखाने का साहस किया था। आज छः दशक बाद भी तकनीक बदली, कथानक में नए प्रयोग होने लगे और सिनेमा का कैनवास बड़ा हो गया! लेकिन, इन फिल्मों ने हाशिये पर पड़े जीवन के तत्वों को बड़ी सूक्ष्मता एवं गहराई के साथ पकड़ा है। इन फिल्मों को दर्शकों ने भी सराहा और समीक्षकों ने भी! एक ध्यान देने वाली बात ये भी कि इन सभी फिल्मों में नारी शक्ति को लेकर अलग से कुछ कहने की कोशिश की गई है। पहले भी नारी केंद्रित मदर इंडिया, बैंडिट क्वीन, लज्जा, डोर, अस्तित्व, अर्थ, कहानी, नीरजा, इंग्लिश-विंग्लिश में अभिनेत्रियां अपने अभिनय का जौहर दिखा चुकी हैं।
   जरा ध्यान दीजिए कुछ ऐसी फिल्मों पर जिसमें महिला पात्रों को अलग रंग दिया गया है। हाल ही में आई 'बधाई हो' जिसने भी देखी, उसने इसके नयेपन और महिला चरित्र को सराहा है। इससे पहले किसने ऐसे कथानक पर फिल्म बनाने की हिम्मत की थी? स्त्री, सुई-धागा और 'मंटो' के नयेपन को लेकर भी विचार किया जाना चाहिए। इससे पहले आई फिल्म 'अलीगढ़' के अलावा 'टॉयलेट : एक प्रेमकथा,पैडमैन तथा 'न्यूटन' भी ऐसी ही फिल्में थीं। 'टॉयलेट' मुख्यतः 'स्वच्छ भारत अभियान' से प्रभावित थी और 'पैडमेन' महिलाओं से जुड़ी एक परंपरागत समस्या से! इन सभी फिल्मों में जो बात कॉमन थी, वह है नारी शक्ति और उसके अधिकारों की स्वीकृति। 'सुई-धागा' में नारी की उद्यमिता क्षमता और उसका जुझारूपन झलकता है। यह फिल्म मल्टीनेशनल के सामने स्वदेशी को प्रोत्साहित करती नजर आती है। ख़ास बात ये कि इस आंदोलन की पताका नारी के हाथ में है। 
  'पद्मावत' में रानी पद्मावती की भूमिका में दीपिका पादुकोण ने न केवल सौंदर्य, बल्कि हिम्मत और वीरता का भी प्रदर्शन किया। आलिया भट्ट ने 'राजी' में अपनी अदाकारी से दर्शकों को चौंका दिया था। यह फिल्म साल की बेहतरीन फिल्मों में शामिल की गई। दमदार कहानी और आलिया के अभिनय के लिए इसे हमेशा याद किया जाएगा। 'वीरे दी वेडिंग' एक ऐसी फिल्म रही, जिसमें चार एक्ट्रेस मुख्य भूमिका में थीं। इस फिल्म ने उन लोगों का मुंह बंद कर दिया,  जो मानते थे कि महिलाएं अपने दम पर फिल्में नहीं चला सकती हैं। रानी मुखर्जी की 'हिचकी' भी पसंद की गई। ये एक ऐसी टीचर की कहानी थी, जिसे बिगड़े हुए बच्चों को पढ़ाना था। सबसे जरुरी है इस तरह की फिल्मों की प्रासंगिकता को समझा जाना। 'मंटो' में भी मुख्यतः 'नारी की निरीहता' व्यक्त हुई है. हालांकि, इसका मुख्य स्वर एक रचनाकार के असहमत होने के अधिकार का स्वर है, जिसकी राजनीतिक व्यवस्था की पृष्ठभूमि में जमकर चर्चा हो रही है। मुख्य बात यह कि फिल्मों के कथानक में आए इस बदलाव को दर्शकों ने भी सराहा है। उम्मीद की जाना चाहिए कि इसे आगे और बढ़ने का मौका मिलेगा। 
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Tuesday, January 8, 2019

हार के कारण ढूंढने के बजाए भाजपा आत्मचिंतन करे!


- हेमंत पाल
 
   विधानसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी में नीम सन्नाटा है। शिवराजसिंह चौहान के अलावा कोई नेता ज्यादा बोल नहीं रहा! लेकिन, ये सन्नाटा सतही है। क्योंकि, जो शांति दिखाई दे रही है, वो ऊपरी है! पार्टी के अंदर डेढ़ दशक की सत्ता खोने का गुस्सा खदबदा रहा है। चौथी बार सरकार बनाने के मंसूबे पूरे न होना पार्टी के नेताओं के गले नहीं उतर रहा! उन्हें लग रहा है कि सारी स्थितियां अनुकूल होते हुए भी कांग्रेस उनसे आगे कैसे निकल गई? यही कारण है कि भाजपा के बड़े नेता हार के उन कारणों को तलाशने में लगे हैं, जो उनके सीटों की गिनती में पिछड़ने का कारण बना! क्योंकि, यदि मतदाताओं की मानसिकता ऐसी ही बनी रही तो 5 महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा। लेकिन, यदि भाजपा अपनी हार के कारणों को ईमानदारी से तलाशे तो उन्हें सच्चाई का पता लग जाएगा। भाजपा ने चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया और अपनी जीत के अतिआत्मविश्वास में मनमानी करती रही! भाजपा ने मतदाताओं की मनःस्थिति को भी नहीं समझा, जो नेताओं से अहम् से नाराज थी। 
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   चुनाव में जीत का आत्मविश्वास होना जरुरी है, लेकिन अतिआत्मविश्वास नहीं रखा जाना चाहिए जो कि भारतीय जनता पार्टी ने रखा! यही कारण है कि पार्टी के नेताओं को हार हजम नहीं हो रही! वे हार के कारणों को खोजना में लगे हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में न तो कोई आँधी थी और न लहर! 2003 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी नाम का जो हव्वा खड़ा हुआ था, वो भी ठंडा पड़ गया था! यही कारण था कि अबकी बार मतदाता को सोचने, समझने और सही फैसला करने का मौका मिला। भाजपा की स्थिति बेहतर थी, पर एकतरफा बिल्कुल नहीं! यही कारण था कि भाजपा किनारे पर आकर डूबी! भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से लगाकर प्रदेश तक के नेताओं को समझ नहीं आ रहा कि फोटो-फिनिश में कांग्रेस उनसे आगे कैसे निकल गई? जबकि, कोई नेता इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं कर रहा कि भाजपा सरकार के दर्जनभर मंत्री चुनाव क्यों हारे? जो 5 साल सरकार चलाते रहे, वे ही अपना जनाधार खो चुके थे। 
   मध्यप्रदेश में भाजपा की हार के बड़े कारणों में प्रमुख कारण भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की मध्यप्रदेश को समझ न पाना भी रहा! उत्तरप्रदेश की तरह मध्यप्रदेश में कभी कोई चुनाव हिंदू-मुस्लिम या सवर्ण-दलित के आधार पर नहीं लड़े गए। जबकि, यहाँ इस बार उत्तरप्रदेश का फॉर्मूला अपनाया गया। हिन्दू-मुस्लिम की बातों से तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, पर सवर्ण और दलितों में दरार डालकर चुनाव जीतने का पार्टी का फार्मूला यहाँ भाजपा को धोखा दे गया! 'कोई माई का लाल आरक्षण ख़त्म नहीं कर सकता' जैसे जुमले भारी पड़ गए। सुप्रीम कोर्ट में दलित एक्ट का फैसला पलटकर उसे और ज्यादा कठोरता से लागू करने की कोशिश की गई। भाजपा को इसकी बड़ी कीमत चुकाना पड़ी। इस कारण भाजपा के पारंपरिक सवर्ण वोटर उससे खिसक गए और उन्होंने कांग्रेस को भी वोट न देकर 'नोटा' का पेट भरा! यदि भाजपा ने ऐसा नहीं किया होता, तो शायद नोटा वाले वोट उसे मिलते। मध्यप्रदेश के मतदाता ने हर उस पार्टी को नकारा है, जिसने शब्दों के तीखे बाण चलाए हो, और इस बार भाजपा को जो नुकसान हुआ उसमें एक बड़ा कारण ये भी है। 
   संगठन की कमजोरी भी भाजपा की विफलता का कारण बनी। कप्तान सिंह सोलंकी, अनिल माधव दवे, माखन सिंह और अरविंद मेनन जैसे कुशल  रणनीतिकारों के मुकाबले सुहास भगत का ठंडा रवैया भी पार्टी की हार में योगदान बना। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की नेतृत्व क्षमता पर शुरू से ही सवाल उठाते जाते रहे थे। ये आशंका सही साबित हुई! वे प्रदेश के जिस महाकौशल क्षेत्र का नेतृत्व करते हैं, वहीं से भाजपा पिछड़ गई। जबकि, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान पर भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ सेबोटेज के आरोप लगे।
  पार्टी इस बात को साफ़-साफ़ नहीं स्वीकारेगी, पर भाजपा में इस बात पर भी गहरी आपत्ति है कि शिवराजसिंह चौहान ने चुनाव के सारे सूत्र अपने हाथ रखे। टिकट बंटवारे से चुनाव प्रचार तक के काम में उन्होंने किसी नेता को नहीं जोड़ा! शिवराजसिंह का पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति उपेक्षा भाव भी भाजपाइयों को खला! इसका नतीजा ये हुआ कि कार्यकर्ता पार्टी के प्रति वफादार न होकर शिवराज की भक्ति में लगा रहा। भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर उनको साथ रखना भारी पड़ा। देखा जाता है कि भाजपा चुनाव जीतते ही अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को भूल जाती है। जो उसके लिए नि:स्वार्थ भाव से काम करते हैं, उन्हें किनारे कर दिया गया। अमूमन ये रवैया कांग्रेसियों में अपने आका के प्रति होता है, जो इस बार भाजपा में नजर आया। भाजपा ने इस बार का विधानसभा चुनाव पुरी तरह कांग्रेसी अंदाज में लड़ा!
   मध्यप्रदेश में 7 सीटों पर गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई उम्मीदवार जीते। इनमे दो सीटें बहुजन समाज पार्टी, एक सीट समाजवादी पार्टी और 4 सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीतीं। इन 7 में से 6 सीटों पर भाजपा दूसरे स्थान पर रही और कांग्रेस का दूर तक पता नहीं था। इन सात सीटों में से चार सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस के बागी नेताओं ने जीत दर्ज की। मध्यप्रदेश में 14 सीटों पर कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही और पांच सीटों पर तो इससे भी बुरा प्रदर्शन रहा। वहीं भाजपा सिर्फ 7 सीटों में तीसरे स्थान पर रही और सिर्फ एक सीट पर वो चौथे नंबर पर थी। मध्यप्रदेश में कई सीटों पर कांटे की टक्कर थी! 10 सीटों पर मार्जिन एक हज़ार वोट से भी कम था। कांग्रेस ने इनमें से 7 सीट जीतीं और भाजपा ने तीन। दो सीटों पर तो विजेता और उपविजेता में 500 से भी कम वोट का अंतर था और कांग्रेस ने ये दोनों सीटें जीतीं।
  मध्यप्रदेश में भाजपा को मिली सीटें देखकर नहीं लगता कि यहाँ सत्ता विरोधी लहर प्रबल थी। लेकिन, किसान आंदोलन कुछ हद तक चुनाव नतीजों पर प्रभाव डालने में सफल रहा! किसान आंदोलन के दौरान लाठियां चलवाना भी शिवराज सिंह को महंगा पड़ गया। कांग्रेस ने चुनावी वादों में फसल का दाम दुगुना करना और कर्ज माफी की बात की, इसमें वो सफल भी रही। कांग्रेस के वादे का असर ये हुआ कि घोषणा के बाद से ही किसानों ने अपना अनाज बेचना रोक दिया और सरकार बदलने तक का इंतजार करने लगे। कई मतदाता इससे नाराज़ होकर 'नोटा' की तरफ मुड़ गए। नोटा की वजह से 11 सीटों पर भाजपा का खेल बिगड़ा। ग्रामीण इलाकों और खासकर आरक्षित सीटों पर भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। इस बार लोगों में नाराजी के कारण कई जगह 'नोटा' में हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा में पड़े! ख़ास बात ये कि नोटा को ज्यादा वोट मिलने का असर भाजपा पर पड़ा।
   गुजरात और कर्नाटक में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए खतरे की घंटी थे। लेकिन, पार्टी ने इसे हल्के में लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कांग्रेस का इतिहास देश को सुनाते रहे। जबकि, गुजरात और कर्णाटक से मिले चुनाव नतीजों पर आत्ममंथन करके भाजपा आगे बढ़ती, तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हालात कुछ और होते! तीन राज्यों में पार्टी की हार लोकसभा चुनाव से पहले खतरे की बड़ी घंटी है। कांग्रेस क्यों जीती का प्रलाप करने के बजाए, भाजपा को इस बात पर आत्ममंथन करना चाहिए कि हम क्यों हारे? क्योंकि, यदि लोकसभा चुनाव में भी भाजपा मतदाताओं की नजर से उतरी तो फिर संभालना मुश्किल होगा! 
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समाज पर सवालों के पुरोधा मृणाल!


- हेमंत पाल

   भारतीय सिनेमा को वैश्विक फलक पर शुरुआती पहचान दिलाने वाली तिकड़ी सत्यजीत रे, ऋत्विक घटिक और मृणाल सेन में से मृणाल सेन को प्रयोगात्मक फिल्म बनाने वाले फिल्मकार के रूप में पहचाना जाता है। लेकिन, कम ही लोग जानते हैं कि भारतीय सिनेमा में समानांतर सिनेमा के इस पुरोधा को सिनेमा से ज्यादा साहित्य सुहाता था। भौतिक शास्त्र की पढाई और मेडिकल रिप्रेजेंटिव के करियर के बावजूद मृणाल दा ने साहित्य को अपना साथी बनाया। साहित्य की तरफ उनका झुकाव कुछ ऐसा था, जिसे खालिस साहित्य प्रेम नहीं कहा जा सकता! क्योंकि, उन्होंने काल्पनिक साहित्य के बजाए यर्थाथवादी और सौंदर्यवादी साहित्य से प्रेम किया।
  इसी दौरान उनके हाथ रूडोल्फ अर्नहाइम की पुस्तक 'फिल्म एज आर्ट' लगी! इसे पढ़ते-पढ़ते वे सिनेमा के सौंदर्य से इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने एक के बाद एक सिनेमा पर उपलब्ध दुनियाभर की पुस्तकें पढ़ डाली। यह अपने आपमें अजीब सा विरोधाभास है कि बांग्ला सिनेमा की इस त्रिमूर्ति का फिल्मों में प्रवेश अलग-अलग माध्यमों से हुआ। तीनों की विचारधाराओं में कभी मेल नहीं रहा। फिर भी तीनों एक-दूसरे के लिए सम्मान का भाव रखते थे। ऋत्विक घटक थिएटर से आए थे, लिहाजा उनके सिनेमा में थिएटर की लाउडनेस ज्यादा दिखाई देती है। सत्यजीत रे एक जमींदार परिवार से आए थे, इस कारण उनके सिनेमा मे सामंतवादी ठसक नजर आती है। लेकिन, इन दोनों से इतर मृणाल सेन के सिनेमा में सौंदर्यबोध के दर्शन होते हैं। यह बात अलग है कि      साम्यवादी प्रभाव के चलते सामाजिक आक्रोश भी उनकी फिल्मों में एक अनिवार्य घटक की तरह मौजूद रहा है।
    ऐसी बात भी नहीं है कि मृणाल सेन आरंभ से ही अपने आपको सिनेमा में स्थापित करने की कोशिश में लगे रहे! उनकी सिनेयात्रा संघर्ष से भरपूर रही है। उनकी पहली फिल्म रात 'भोरे घोर' असफल रही। लेकिन, इस फिल्म की असफलता ने उन्हें इस विधा का गंभीर छात्र जरूर बना दिया। इसके बाद मृणाल सेन ने फिल्म विधा को बहुत गंभीरता से लेते हुए इसे पूरे मनोयोग से सीखना शुरू किया। इसका नतीजा यह हुआ कि 1959 में प्रदर्शित 'आकाशेर नीचे' ने उन्हें न केवल सफलता के शिखर पर स्थापित कर दिया, बल्कि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई! 
  1969 में आई फिल्म 'भुवन सोम' के साथ दुनियाभर में मृणाल सेन के सिनेमा की धूम मच गई। दर्शकों के साथ ही दुनियाभर के आलोचकों ने इस फिल्म की तारीफ की। यदि किसी ने तारीफ नहीं की, तो सत्यजित रे ने! उन्होंने इस फिल्म को औसत बताया और कहा कि यह बस एक ब्यूरोक्रेट के गाँव की लड़की का साथ पाकर हृदय परिवर्तन हो जाने की साधारण कहानीभर हैं। जबकि, 'भुवन सोम'  में दो बातें खास थीं। पहली ये कि मृणाल सेन ने यह फिल्म हिंदी में बनाई थी और दूसरी, उन्होंने कहानी को सौराष्ट्र (गुजरात) में फिल्माया था।
   मृणाल सेन के लिए भाषा बाधा नहीं, बल्कि प्रसार का जरिया थी। उन्होंने बांग्ला के साथ ही हिंदी, ओड़िया और तमिल में भी फिल्में बनाईं। इतना ही नहीं तीनों की फिल्मों के बैकड्रॉप में बंगाल ही ज्यादातर मौजूद रहा। लेकिन, अपनी फिल्मों में सबसे ज्यादा बंगाल से बाहर फिल्माने वाले भी मृणाल सेन ही थे। वे किसी भी चीज से खुद को बोझिल नहीं रखते थे। अपनी फिल्म मेकिंग के साथ भी उन्होंने बहुत से प्रयोग किए। 'भुवन सोम' में मोंटाज, जम्पकट और कार्टून का जबरदस्त प्रयोग करके दर्शकों को चौंका दिया था। बाद में उनके आलोचक सत्यजीत ने 'शतरंज के खिलाड़ी' में यही प्रयोग दोहराया था।
   मृणाल सेन ने कुछ बेहतरीन एक्टर्स की खोज भी की। जिसमें मिथुन चक्रवर्ती, अंजन दत्त, ममता शंकर, श्रीला मजूमदार और माधबी मुखर्जी आदि हैं। इसके अलावा उन्होंने स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और ओमपुरी के साथ भी कई फ़िल्में बनाई! तीन बार 'बेस्ट एक्टर' का नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले मिथुन चक्रवर्ती को मृणाल सेन ने अपनी 1977 की फिल्म 'मृगया' में लांच किया था। मिथुन को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार भी इसी फिल्म के लिए मिला था। 
  जहां आज तक तमाम फिल्मकार मनोरंजन और मसाले को फिल्मों का अहम हिस्सा मानकर इसे दोहराते रहे हैं, मृणालसेन की फिल्में समाज के सामने सामाजिक स्थितियों से जुडे कुछ सवालों को विचारणीय अंदाज में रखते थे। उदाहरण के लिए 'मृगया' के नायक को नरभक्षी शेर के शिकार के लिए ईनाम मिलता है! जबकि, नर पिशाच को मारने पर उसे सजा मिलती है? इन्हीं सवालों को उन्होंने हर बार अलग-अलग फिल्मों में रखने का बेहद ईमानदारी प्रयास किया। लेकिन, अब ऐसे सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।
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Tuesday, January 1, 2019

बैंक कर्ज माफ़ करने से कुछ नहीं होगा, किसान को मारते हैं सूदखोर!


- हेमंत पाल 

   मध्यप्रदेश की नई कमलनाथ सरकार ने अपना चुनावी वादा पूरा करते हुए किसानों के 2 लाख तक का कर्ज माफ़ कर दिया। ये अलग बात है कि इस घोषणा से कितने किसानों का कर्ज माफ़ हुआ और किसे इसका लाभ नहीं मिला! लेकिन, सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वास्तव में किसान बैंक कर्ज से ही परेशान होते है? प्रदेश में किसानों की ख़ुदकुशी के कारण क्या सिर्फ बैंक कर्ज है? इन सवालों का जवाब खोजा जाए तो निष्कर्ष निकलता है कि किसान बैंक कर्ज के कारण ही ख़ुदकुशी के लिए मजबूर नहीं होते! किसानों को सबसे ज्यादा त्रस्त सूदखोरों से होते हैं। वे ज्यादा ब्याज पर तो कर्ज देते ही हैं, खेत और उनके घर के कागजात तक रहन में रख लेते हैं। प्रदेश में किसानों की ख़ुदकुशी का एक बड़ा कारण ये भी है। क्या कांग्रेस की कमलनाथ सरकार प्रदेश के साहूकारी कानून को सख्त बनाकर किसानों को राहत देगी, जो शिवराज-सरकार घोषणाके बावजूद नहीं कर सकी!  
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     बैंक से कर्ज लेने के अलावा सूदखोरों से भी कर्ज लेना किसानों की मज़बूरी है। साल में कम से कम दो बार ऐसे मौके आते हैं, जब किसानों को इन सूदखोरों के चंगुल में फंसना पड़ता है। इसी वक़्त का फ़ायदा उठाकर सूदखोर किसानों 4 से 6 और कभी-कभी 8 फीसदी ब्याज पर कर्ज देते हैं। कर्ज देने के साथ ही वे अपना ब्याज भी काट लेते हैं। ब्याज पर रुपए देने के बदले किसान की जमीन, मकान की रजिस्ट्री, वाहन, सोने-चांदी के जेवर तक अपने पास रख लेते हैं। इसके बाद तय समय पर रुपए नहीं लौटाने पर पेनल्टी लगाई जाती है। पेनल्टी 10 से 25 फीसदी तक वसूली जाती है। जो रुपए नहीं देता उसकी उसकी जमीन, मकान, वाहन तक ये सूदखोर हड़प लेते हैं। उसे बेइज्जत भी किया जाता है। ऐसे में ब्याज लेने वाला व्यक्ति प्रताड़ित होने लगता है। उसके घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है और वह आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है। ब्याज पर रुपए देने के साथ ही हुंडी-चिट्ठी का कारोबार भी किसानों से किया जाता है। इसमें ब्याज पर रुपए देने के बाद चिट्ठियों से हिसाब-किताब रखा जाता है।
   प्रदेश में किसान सूदखोरों से ज्यादा परेशान हैं। इसी से परेशान होकर किसान मजबूर होकर ख़ुदकुशी कर लेते हैं। शिवराज सरकार ने दूसरे कार्यकाल में 'साहूकारी कानून' में बदलाव करने की घोषणा की थी, लेकिन नहीं कर पाई! साल 2010-11 में भी प्रदेश में ऐसे ही हालात बने थे, जब सूदखोरी के चलते 89 किसानों की आत्महत्या की थी। तब, शिवराज-सरकार ने स्वीकारा था, कि किसानों की ख़ुदकुशी का कारण सूदखोरी है। किसानों की ख़ुदकुशी पर जब हंगामा हुआ तो शिवराजसिंह चौहान ने 15 जनवरी 2011 को 'साहूकारी कानून' में बदलाव की घोषणा की। उन्होंने राजस्व विभाग को संशोधन का ड्राफ्ट जल्द तैयार करने के निर्देश भी दिए थे। विभाग को कानून में संशोधन का ड्राफ्ट तैयार करने में 4 साल लगे। दो बार ये ड्राफ्ट मुख्यमंत्री के सामने रखा गया, लेकिन अंतिम फैसला नहीं हुआ। इसके बाद 8 सितंबर 2015 को मुख्यमंत्री सचिवालय से प्रक्रिया को यथास्थिति रखने के निर्देश आ गए। तब से इस कानून में बदलाव की फाइल अलमारी में ही बंद है। 
   'साहूकारी कानून' में बदलाव के तहत ब्याज पर लेन-देन करने वाले सूदखोरों को लाइसेंस देने और गैर-लाइसेंसी सूदखोरों द्वारा दिए गए कर्ज को शून्य घोषित करने का प्रावधान रखा जाना था। सूदखोरों द्वारा दिए जाने वाले खेतीहर कर्ज की ब्याज दर का निर्धारण भी किया जाना था, ताकि सूदखोर मनमाने तरीके से ब्याज न वसूल सकें। प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने किसानों की ख़ुदकुशी से संबंधित आंकड़े विधानसभा के सामने रखे थे। इस रिपोर्ट के मुताबिक 6 नवंबर 2010 से 20 फरवरी 2011 के बीच 89 किसान और 47 कृषि श्रमिक ने सूदखोरों के कारण ही ख़ुदकुशी की। वहीं 58 मामले ख़ुदकुशी की कोशिश के भी दर्ज हुए। 2010 में सरकार ने किसानों द्वारा की गई ख़ुदकुशी के मामलों की जांच कराई गई थी। जांच में पता चला था कि फसल खराब होने के कारण किसान कर्ज नहीं लौटा पा रहे हैं। किसानों ने बैंकों के अलावा सूदखोरों से भी 2 से 6 फीसदी ब्याज पर कर्ज ले रखा था, जिसकी वसूली के लिए सूदखोर लगातार तकादा लगा रहे थे।
  मानवाधिकार आयोग ने भी मध्यप्रदेश में किसानों की ख़ुदकुशी के बढ़ने मामलों पर टीम का गठन किया था। इस टीम ने जाँच के बाद आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें खुलासा हुआ कि प्रदेश में किसानों की मौत का का बड़ा कारण सूदखोर ही हैं। इनके दबाव में ही किसान ख़ुदकुशी करते हैं। आयोग ने शिवराज सरकार के राजस्व विभाग को भी ये जाँच सौंपी थी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा था कि प्रदेश सरकार साहूकारी कानून का पालन कराने में नाकाम साबित हुई है।
   क़रीब आठ साल पहले 'कृषि लागत एवं मूल्य आयोग' (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ घटनाओं के आधार पर किसानों की ख़ुदकुशी की वजह जानने की कोशिश की थी। इसमें भी सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई। साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं। लेकिन, यह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई! असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है।
     किसानों के बढ़ते संकट का एक कारण किसानों को ज़्यादा कर्ज़ की वकालत करने की बजाए किसान कर्ज़ माफ़ी की बात उठना भी है। अधिकांश राजनीतिक दल इसकी वकालत करते हैं। लेकिन, यह कोई स्थायी उपाय नहीं है। अगर ऐसा होता तो 2008 की 60 हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद किसानों की ख़ुदकुशी बंद हो जातीं। अतः इस समस्या का हल किसानों की आय बढ़ाने में है, न कि कर्ज़ माफ़ी में! लेकिन, सरकार शायद अभी इस दिशा में कुछ सोच नहीं रही है। माना जा रहा है कि मध्यप्रदेश में किसान कर्जमाफी योजना से लगभग 34 लाख किसानों को फायदा होगा। लेकिन, इससे पहले 1,87000 करोड़ के कर्ज में डूबी राज्य सरकार को योजना के लिए लगभग 50 हज़ार करोड़ जुटाने होंगे। मध्यप्रदेश में 2013 से 2016 के बीच किसानों की खुदकुशी दर 21% की दर से बढ़ी! हालांकि, केन्द्र सरकार ने लोकसभा में दिए जवाब में हाल ही में कहा कि इसके बाद के आंकड़े उसके पास उपलब्ध नहीं हैं। 5 बार कृषि कर्मण अवॉर्ड जीतकर रिकॉर्ड बनाने वाले राज्य के नए हुक्मरानों को भी अब सिर्फ उत्पादन नहीं उत्पादक पर भी ध्यान देना होगा ताकि इन आंकड़ों में कमी आए। राज्य सरकार का दावा है, कि राज्य ने पिछले कुछ सालों में कृषि में अभूतपूर्व प्रगति की है, तो फिर राज्य के किसान क़र्ज़ में क्यों हैं और वे ख़ुदकुशी क्यों कर रहे हैं? अब ये कमलनाथ सरकार की जिम्मेदारी है कि वो किसानों के बैंक कर्ज माफ़ करने की वाह-वाही लूटने के बाद अब साहूकारों की गर्दन पर हाथ रखे! क्योंकि, जब तक किसानों को साहूकारों से मुक्ति नहीं मिलेगी, उनकी चिंताएं दूर नहीं होने वाली। 
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Sunday, December 30, 2018

दो राजनीतिक चरित्रों का सिनेमाई चेहरा!


- हेमंत पाल

  सिनेमा की दुनिया हमेशा ही राजनीति से बचकर चलती है। क्योंकि, सिनेमा का मकसद सिर्फ लोगों का मनोरंजन होता है। लेकिन, इसे संयोग माना जाना चाहिए कि आने वाले दिनों में दो ऐसी फ़िल्में रिलीज हो रही है, जो पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है या इन फिल्मों को इसी नजरिए से देखा जाएगा! ये वो समय होगा, जब राजनीतिक पार्टियाँ लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस रही होंगी, तभी ये फ़िल्में परदे पर आएंगी। जनवरी में ही रिलीज होने वाली राजनीतिक मकसद वाली इन दो फिल्मों का कथानक कहीं न कहीं मौजूदा राजनीतिक हालात को प्रभावित करता है। दो फिल्मों 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' और 'ठाकरे' के ट्रेलर भी साथ ही रिलीज हुए हैं। इन दोनों फिल्मों के कथानक भारतीय राजनीति के दो बड़े नेताओं की लाइफ स्टाइल बताते हैं। जनवरी में ही रिलीज वाली दो अन्य फ़िल्में हैं सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी फिल्म 'उड़ी' और देशभक्त‍ि की भावना वाली फिल्म 'मणि‍कर्णि‍का' जिसका कथानक झाँसी की रानी पर आधारित है।
    'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' मनमोहन सिंह की अर्थशास्त्री से प्रधानमंत्री बनने की कहानी है और 'ठाकरे' महाराष्ट्र के शिव सेना नेता बाल ठाकरे की जिंदगी पर बनी है। ये दोनों फ़िल्में बायोपिक हैं, पर एक-दूसरे के विपरीत! जहाँ बाल ठाकरे को हिंदूवाद और क्षेत्रीयता का कट्टर समर्थक और अपने विरोधियों पर जोरदार प्रहार के लिए जाना जाता है, वहीं मनमोहन सिंह पूरी तरह अराजनीतिक चेहरा थे। 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में यही साबित करने की कोशिश की गई है कि उनका प्रधानमंत्री पद तक पहुँचना महज एक हादसा था।
 जहाँ तक फिल्म की बात है ट्रेलर देखकर लगता है कि 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में अनुपम खेर ने मनमोहन सिंह की भूमिका पूरी शिद्दत से निभाई है। अनुपम को भाजपा के प्रति निष्ठावान माना जाता है, लेकिन बतौर एक्टर उन्होंने मनमोहन सिंह को पूरी जीवंतता से परदे पर उतारा है। फिल्म का ट्रेलर इस संवाद के साथ शुरू होता है 'महाभारत में दो फैमिली थीं, इंडिया में तो एक ही है।' इस संवाद के भी अपने कई मायने निकाले जा सकते हैं। सफ़ेद दाढ़ी और नीली पगड़ी में अनुपम खेर ने दर्शकों को यह संदेश देने की भी कोशिश की है कि 2004 से 2014 के बीच मनमोहन सिंह पर गाँधी-परिवार ने किस तरह का अत्याचार किया। ये फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइजर रहे संजय बारू की किताब पर उसी नाम से बनी है। फिल्म का अधिकांश हिंसा सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के आसपास घूमता है।
     दूसरी फिल्म 'ठाकरे' में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बाल ठाकरे का किरदार बहुत जोरदार तरीके से निभाया है। फिल्म में अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के दिए बाल ठाकरे के कुछ बयानों और दक्षिण भारतीयों के लिए दिए गए उनके कुछ बयानों को लेकर सेंसर बोर्ड को आपत्ति थी। इसमें शक नहीं कि इस फिल्म के जरिए शिव सेना को अपने को हिंदूवाद और मराठा मानुष समर्थक पार्टी के रूप में स्थापित करने का मौका मिलेगा।
   राजनीति पर पहले भी कई फ़िल्में बन चुकी हैं। सबसे पहले इस तरह की जिस फिल्म का ध्यान आता है. वह है गुलजार की 'आंधी' जिसके बारे में प्रचारित किया गया था कि ये फिल्म इंदिरा गाँधी के जीवन से प्रभावित थी। ये फिल्म ज़बरदस्त चर्चा में रही, इस पर प्रतिबंध भी लगा! सालभर पहले 'इंदू सरकार' नाम से भी एक फिल्म आई थी, इसके बारे में भी कहा गया था कि ये इंदिरा गाँधी पर बनी थी। 'द  एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर' के चर्चित होने का एक कारण ये भी है कि इस फिल्म के ट्रेलर को भाजपा ने अपने अधिकृत ट्विटर हेंडल पर डाला है। ये ट्रेलर दिलचस्पी भी जगाता है, क्योंकि, इसमें सोनिया गाँधी को खलपात्र बताने की कोशिश की गई है। लेकिन, इस फिल्म से किसी राजनीतिक पार्टी को फ़ायदा होगा और किसी को नुकसान, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता! क्योंकि, फिल्म दर्शकों के लिए होती है उससे राजनीति के शतरंज का खेल नहीं खेला जा सकता! इसलिए थोड़ा इंतजार तो करना होगा!
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Tuesday, December 25, 2018

भाजपा की हार की कहानी मालवा-निमाड़ ने लिखी!

  मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि बहुमत जुटा ले! उसने अपने 4 बागी, जो निर्दलीय चुनाव जीते उनके अलावा बसपा और सपा विधायकों के सहयोग से सरकार बनाई है। 2013 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले कांग्रेस को लगभग दोगुनी सीटें मिली है। पिछली बार कांग्रेस ने जितनी सीटें पाई थी, उतनी ही सीटें इस बार भाजपा ने गंवा दी! पिछले चुनावों में कांग्रेस को 58 और भाजपा को 165 सीटें मिली थीं। इस बार कांग्रेस की सीटों में 56 की बढ़ोतरी हुई और उसकी सीटें 114 हो गई! वहीं, भाजपा की सीटें 165 से घटकर 109 हो गई! मुद्दे की बात ये कि भाजपा अपने सबसे बड़े गढ़ मालवा-निमाड़ में ही कांग्रेस से पिछड़ गई! पिछली बार 66 में से 57 सीटें जीतने वाली भाजपा 27 पर ही सिकुड़ गई!  
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- हेमंत पाल

    मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों की घट-बढ़, प्रदेश में कांग्रेस के उदय और भाजपा के पतन के पीछे क्या कारण रहे, सबसे अहम् सवाल है! मतदान के पहले भाजपा और खुद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 'अबकी बार 200 पार' का जोरदार नारा लगाया था! पर, वो 100 के पार जाते ही थम गई! कांग्रेस का 'इस बार 150 पार' का नारा भी उसे बहुमत के लायक सीट नहीं दिला सका? इसका सीधा सा आशय यही है कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता जरूर दी, पर लगाम लगाकर और भाजपा को सबक सिखाया कि वो हवा में उड़ना छोड़े!
   मध्यप्रदेश में 230 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस को 114, भाजपा को 109 और 7 सीटें अन्य को मिली हैं। प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने 27 सीटें और कांग्रेस को 2 सीटें जीती थी। बाद में दिलीपसिंह भूरिया के निधन से खाली हुई, झाबुआ-रतलाम सीट कांतिलाल भूरिया ने भाजपा से छीन ली थी। लेकिन, विधानसभा चुनाव में जिस तरह के नतीजे आए हैं, यदि उसके हिसाब-किताब को समझा जाए तो 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 16 और भाजपा के खाते में 13 सीटें जा सकती हैं। पिछली बार मध्यप्रदेश में आज कांग्रेस के खेवनहार बने कमलनाथ और उनके सामने मुख्यमंत्री पद के तगड़े दावेदार बनकर खड़े हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ही लोकसभा का मुंह देख पाए थे। बाकी सारे रणबांकुरे खेत रहे थे। फिलहाल के अनुमान के मुताबिक कांग्रेस मालवा-निमाड़ में ही भाजपा से उज्जैन, खरगोन, धार और इंदौर जैसी लोकसभा सीटें छीन सकती है। क्योंकि, उज्जैन की 8 में 5 विधानसभा सीटें कांग्रेस के खाते में गई है। खरगोन की सभी 5 सीटें और धार की 7 में से 6 सीटें कांग्रेस ने जीती हैं। खंडवा समेत निमाड़ के चार आदिवासी जिलों खरगोन, बड़वानी, धार, झाबुआ में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया। भाजपा सरकार के दो मंत्रियों को भी हार का मुँह देखना पड़ा। कुल मिलाकर प्रदेश में अब कांग्रेस का पलड़ा पहले के मुकाबले काफी भारी हो चुका है।
   अब जरा भाजपा का गढ़ रहे मालवा-निमाड़ पर नजर दौड़ाई जाए जो इस बार प्रदेश में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा आधार बना! भाजपा को पिछले चुनावों की अपेक्षा 27 सीटों का नुकसान हुआ और कांग्रेस ने 26 सीटें ज्यादा जीती। निर्दलियों के खाते में भी इस बार 3 सीटें गई। इस बार भाजपा को 27 और कांग्रेस को 35 सीटें मिली। इस क्षेत्र में 66 में से 31 सीटें एससी, एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। 2013 के चुनाव में भाजपा ने 24 जीती थीं, पर कांग्रेस के खाते में मात्र 6 सीट गई थीं, एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती थी। अबकी बार भाजपा 14 सीट हार गई। भाजपा को 10 सीटें मिली, तो कांग्रेस ने 20 जीती। 31 में से 9 सीटें एससी के लिए हैं। पिछली बार भाजपा ने इस वर्ग की सभी 9 सीटें जीती थीं। जबकि, इस बार उसे 4 जगह ही जीत मिली, 5 सीटें कांग्रेस ने छीन ली। एसटी आरक्षित यहाँ 22 सीटें हैं! 2013 में 15 सीटों पर भाजपा का झंडा गड़ा था और 6 पर कांग्रेस का, पर इस बार 15 सीट कांग्रेस ने जीती और 6 भाजपा ने। एससी सीटों पर भाजपा को जातीय समीकरणों ने बड़ा नुकसान पहुंचाया। भाजपा के राज में दलितों पर हमले बढ़े, जिससे दलित खफ़ा रहे! दूसरी तरफ एट्रोसिटी एक्ट में भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार के संशोधन ने सवर्णों को उससे खफ़ा कर दिया। इलाके में एससी सीटों पर दोनों ही वर्गों का मतदाता उससे नाराज़ रहा।
   यहां कि 42 ग्रामीण सीटों में से 21 कांग्रेस ने जीती! भाजपा की गलती ये रही कि उसने मालवा-निमाड़ को अपना गढ़ समझकर जीतने का पूरा दम नहीं लगाया! 2013 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा ने मालवा-निमाड़ के शहरी और ग्रामीण की कई सीटें गंवाईं हैं। यही कारण था कि सत्ता उसके हाथ से निकल गई थी। इस बार कांग्रेस ने ग्रामीण इलाके में 24 सीटों पर जीत का झंडा गाड़ा! पिछले चुनाव में भाजपा ने 66 में से 57 सीटें जीती थीं। भाजपा को सबसे बड़ा झटका खरगोन और बुरहानपुर जिले में लगा, जहाँ से भाजपा पूरी तरह ही साफ़ हो गई। इंदौर जैसे भाजपा में गढ़ में भी भाजपा 9 में से 4 सीटें हार गई! जबकि, 2013 में यहाँ उसने 8 सीट जीती थी।
  ग्वालियर-चंबल की 34 सीटों में से शहरी क्षेत्र की 7 और ग्रामीण क्षेत्रों में 8 सीटों का कांग्रेस को फायदा हुआ। बुंदेलखंड में तो कांग्रेस को शहरी इलाकों में एक और ग्रामीण इलाके की 2 सीटों का फायदा हुआ। विंध्य के परिणाम जरूर भाजपा के पक्ष में गए। यहां भाजपा ने दस साल पुराने प्रदर्शन को दोहराया और 24 सीटें जीती! मध्य क्षेत्र की बात की जाए, तो 36 सीटों में से शहरी इलाकों में कांग्रेस को 7 और ग्रामीण इलाकों में एक सीट का फायदा हुआ। कांग्रेस को सबसे बड़ा नुकसान रीवा-सीधी और सतना में हुआ। जबकि, कांग्रेस को ग्रामीण क्षेत्रों में 8 सीटों का नुकसान हुआ। महाकौशल में जरूर कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया। यहां शहरी क्षेत्र में कांग्रेस को 11 सीटों का फायदा हुआ। जबकि, भाजपा ने यहाँ शहरी इलाके की 11 सीटें गंवा दी।
   इस चुनाव के बाद अब अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच मंथन शुरू हो गया है। कांग्रेस ने जिस तरह भाजपा से तीन राज्यों में सत्ता छीनी है, उसने भाजपा के नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी, बल्कि पार्टी को भी ये सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि, अगले साल होने वाले चुनाव में उसकी सत्ता में वापसी होगी या नहीं! यदि वापसी करना है तो पार्टी को क्या रणनीति अपनाना होगी! कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर भाजपा हमेशा से ही सवाल उठाती रही है। लेकिन, तीन राज्यों के चुनाव नतीजों ने इस सोच में बड़ा बदलाव किया। अब भाजपा ये कहने की स्थिति में भी नहीं है, कि वो अपनी गलतियों से हारी है और न ये कह सकती है कि कांग्रेस की रणनीति ने उसे हराया! यही कारण है कि भाजपा अपनी हार को पचा नहीं पा रही है! अभी भी भाजपा के नेता सत्ता पाने की जुगत में लगे हैं और इसी पाँच साल में फिर सरकार बनाने का दावा भी करने लगे! 
    गौर करने वाली बात ये भी है कि इस बार दोनों ही पार्टियों के नामी नेताओं के अनुमान फेल हो गए! जहाँ शिवराजसिंह चौहान ने एग्ज़िट पोल के नतीजों के बाद ख़ुद को सबसे बड़ा सर्वेयर बताकर सरकार बनाने का दावा किया था! वहीं वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने 142 एयर दिग्विजय सिंह को 132 सीटों का अनुमान था। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय जो मालवा-निमाड़ के प्रभारी थे, उन्होंने भी 'अबकी बार 200 पार' का नारा बुलंद किया था, पर अंत में वे भी खिसककर 130 पर आ गए थे। लेकिन, इन सारे अनुमानों का ध्वस्त होना, अगले साल के मध्य में होने वाले लोकसभा चुनाव पर खासा असर डाल सकता है, इसमें शक नहीं! कांग्रेस अपने प्रदर्शन में और ज्यादा सुधार करेगी, जो लग भी रहा है! लेकिन, भाजपा के दिल्ली दरबार को भी अब संभलकर कदम उठाना होंगे! क्योंकि, बात सिर्फ मध्यप्रदेश में सरकार न बना पाने की नहीं, बल्कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी खोने की है।   
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अँधेरे कमरे में रोशनी का भ्रम!


- हेमंत पाल 

  सिनेमा का परदा सच्चाई से बहुत दूर होता है। इस परदे पर दिखाई देती छवियां सच नहीं, छलावा होती हैं। जो सच्चाई से दूर भ्रम का आभामंडल खड़ा करके एक कहानी रचती हैं। ख़ास बात ये कि परदे की इन छद्म छवियों को गढ़ने वाले भी हमारे और आपके जीवन से ही आते है। कहानी की मांग के मुताबिक कुछ देर के लिए ये कथानक के उस पात्र में उतरते हैं और किरदार को जीवंतता देते हैं। दर्शक उस वास्तविक कलाकार को नहीं जानता, बल्कि उसके उस काल्पनिक रूप को याद रखता है, जो उसने परदे पर देखा है। वह उसे ही आदर्श मानकर आचरण करने लगता है। इस वजह से वह काल्पनिक किरदार अनजाने में ही दर्शकों के बड़े वर्ग के लिए जीवन मूल्य तय कर बैठते है! किरदार का नायकत्व दर्शक के मन, मस्तिष्क पर इस तरह छा जाता है, कि वह उसे ही अपना आदर्श मानता है, जबकि यथार्थ में ये छद्म किरदार जीवन मूल्यों को ध्वस्त भी करते हैं।
   पिछले कुछ दशकों में लोगों ने इस बात को साबित किया है कि राजनीति, क्रिकेट और सिनेमा का जूनून सबकी रगों में बहता है। वे कम खाएंगे, हल्का पहनेंगे पर इन तीन जुनून के लिए समय और पैसा जरूर निकालेंगे। समाज में इन तीनों क्षेत्रों के नायकों को उनकी मानवीय कमजोरियों के बावजूद सिर-माथे पर बैठाने की परंपरा का अनुसरण किया जाता रहा है। दक्षिण भारत में तो फिल्म कलाकारों और नेताओं को मंदिर बनाकर उन्हें पूजने तक की परंपरा है। दरअसल, ये अपरिपक्व मानवीय मानसिकता का ही नतीजा है। जबकि, इन मंदिरों में विराजित मूर्तियां किसी समय आर्थिक और चारित्रिक दुर्बलताओं के दाग धब्बों से लांछित होती रही होंगी! इन कथित नायकों के वास्तविक जीवन के कारनामों को नजरअंदाज करने का भाव देश के एक बड़े वर्ग की सामूहिक सोच में बदल चुका है। वे भूल जाते हैं कि इनके छद्म आवरण के पीछे का सच कुछ अलग ही है। 
  इस तरह की सोच का परिणाम ये हुआ कि अपराधिक और बदनाम पृष्ठभूमि के लोग नेतृत्व की भूमिका निभाने लगे। आज कोई क्रिकेट खिलाड़ी मैच फिक्सिंग फँस जाता है, तो वो शर्मिंदा नहीं होता, लांछित भी नहीं किया जाता, बल्कि अपनी लोकप्रियता को भुनाने का नया रास्ता खोज लेता है। वह टीवी के रियलिटी शो का हिस्सा बन जाता है। असलियत में उसे नकारा जाना चाहिए था, पर वह दर्शकों में लोकप्रिय हो जाता है। कुछ साल पहले एक टीवी चैनल के 'कास्टिंग काउच' पर किए स्टिंग ऑपरेशन से कई फिल्मकारों के चेहरों पर से नकाब उतरा था। लेकिन, उससे क्या हुआ, कुछ भी तो नहीं! उजागर उसे फिल्म जगत के नामचीन चेहरे आज भी वहीं जमे हैं। उनके करियर पर इस घटना ने कोई बड़ा असर ही नहीं डाला! क्योंकि, दर्शकों ने उन्हें नकारने की कोशिश ही नहीं की। उनके वास्तविक कारनामों को भी परदे का किरदार ही समझा गया!
  अभी तक के अनुभवों से एक सच तो साफ़ नजर आता है कि हमारे समाज के एक बड़े समूह की याददाश्त बहुत कमजोर है। वे सच को भी अनदेखा करने की अपनी आदत से मजबूर है। बात सिर्फ परदे, क्रिकेट या राजनीति की दुनिया तक ही सीमित नहीं है। अपनी करनी से सजा के इंतजार में जेलों कैद धर्म गुरुओं के अनुयायी भी कम नहीं हुए! ऐसे नेताओं की साख भी नहीं घटी, जिन पर करोड़ों के घोटालों के आरोप हैं।
   जबकि, इसके विपरीत हॉलीवुड फिल्मों के दर्शक नायकत्व से प्रभावित नहीं होते! वे मनोरंजक कहानी के मुरीद होते हैं न कि उस कहानी के किरदार निभाने वाले कलाकारों से! वहाँ यौन उत्पीड़न के मामलों के बाद नामचीन हार्वे विन्स्टीन, बिल कॉस्बी और केविन स्पेसी को जिस तरह बहिष्कृत करके जेल भेजा गया वो इस बात का संकेत है कि हॉलीवुड में पूजने की कोई परंपरा नहीं है! लेकिन, ऐसे उदाहरण हमारे यहाँ कभी क्यों दिखाई देते! हाल ही में उजागर हुए महिला शोषण के 'मीटू' मामले में उठाए सवालों ने कई महिलाओं को अपनी पीड़ा व्यक्त करने की हिम्मत दी है। इसी का नतीजा है कि परदे पर सकारात्मक भूमिका निभाने वाले आलोक नाथ, कलाकार नाना पाटेकर, नामी पत्रकार एमजे अकबर, निर्माता-निर्देशक सुभाष घई, गायक कैलाश खेर, संगीतकार अन्नू मलिक और निर्माता विकास बहल जैसे कुछ नाम सतह पर आए।
  यह तूफ़ान आकर थम भी गया। तात्कालिक प्रतिक्रिया अच्छी हुई, पर धीरे-धीरे उठे गुबार की धूल थम गई! चौंकाने वाले जो भी खुलासे हुए, उनकी काट ढूंढ ली गई! कुछ ऐसे भी आरोप जरूर सामने आए, जिनके सच होने में संदेह भी हुआ, पर सबकुछ गलत नहीं था और न है! इसके बाद भी फ़िल्मी दुनिया खामोश है। जो लोग हर मामले में प्रतिक्रिया व्यक्त करने से नहीं चूकते और जिनकी बातों को गंभीरता से लिया जाता है, वे भी इन दागदार लोगों के बारे में बोलने से बचते रहे! दरअसल, यही परदे का सच भी है। जो परदे पर जिस तरह के किरदार अदा करता है, उसकी वही छवि बन जाती है और जीवनभर वो उसी पहचान को भुनाता भी है। ये सब इसलिए कि सिनेमा अँधेरे का मनोरंजन है, तो यहाँ उजालों की क्या जरुरत? 
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