Wednesday, February 27, 2019

कमलनाथ सरकार के फैसले दो महीने में ही रास आने लगे!


- हेमंत पाल

 
    जब भी किसी राज्य की सत्ता में बदलाव होता है, सभी की नजरें मुख्यमंत्री के चेहरे पर टिकती है। क्योंकि, सबकी उम्मीदों का केंद्र मुख्यमंत्री की सत्ताशैली होती है। इस नजरिए से मध्यप्रदेश में भाजपा से कांग्रेस को हुए सत्ता हस्तातंरण में लोगों का कमलनाथ से उम्मीदें बांधना स्वाभाविक था! कांग्रेस के लिए सुकून की बात ये रही कि दो महीने की कमलनाथ सरकार के फैसलों को सराहा जा रहा है। इस दौरान सरकार ने कई ऐसे फैसले किए, जो भविष्य में मील का पत्थर साबित होंगे! लेकिन, ये सच है कि सरकार के कामकाज में कमलनाथ का अनुभव साफ़ झलकता है। फिजूलखर्ची और मनमर्जी की घोषणाओं पर अंकुश लगाकर उन्होंने ये संकेत दे दिया कि उनकी सरकार की नीति क्या होगी! पिछली सरकार के बेतुके फैसलों को भी उन्होंने रोकने का साहस किया है। केबिनेट की बैठक में भी उनके सख्त फैसले और उनकी जवाबदेही तय करने के तरीके से भी नौकरशाही सकते में हैं। 
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   किसी भी सरकार को चलाने में सबसे बड़ी जरुरत होती है राजनीतिक इच्छाशक्ति की! उसमें भी खासकर मुख्यमंत्री की, जिनके फैसलों से सरकार का नजरिया और प्राथमिकताएं झलकती हैं! प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भले ही उम्र में 70 पार हैं, लेकिन फैसलों में उनकी चुस्ती, फुर्ती और तत्परता उनकी उम्र की चुगली करती है। पद संभालते ही उन्होंने जिस तरह के फैसले लिए, उससे उनकी इच्छाशक्ति का इशारा मिलता है। किसानों की कर्ज माफ़ी का फैसला भले ही 10 दिनों की समय सीमा में लिया जाना हो, पर बाकी फैसलों में उनका अनुभव और दूरदृष्टि झलकती है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि कमलनाथ जैसी प्रशासनिक और राजनीतिक समझने वाला कोई नेता प्रदेश में नहीं है। जब कमलनाथ को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया गया था, तब कई लोगों ने उनकी प्रादेशिक नेतृत्व क्षमता पर उंगली उठाई थी! राजनीति में ये सब स्वाभाविक भी हैं। सबसे बड़ा सवाल तो ये था कि करीब पौने दो लाख करोड़ के कर्ज में डूबे प्रदेश को उबारा कैसे जाएगा और उन चुनावी वादों का क्या होगा, जो कांग्रेस ने अपने मतदाताओं से किए हैं। लेकिन, सरकार जिस तरह संभल संभलकर कदम रख रही है, उससे लगता है कि उसे कोई जल्दबाजी नहीं है! 
   सरकार के मुखिया की कुर्सी संभालने के तत्काल बाद उन्होंने किसानों की कर्जमाफी के फरमान पर तो दस्तख़त किए ही, कन्या विवाह की अनुदान राशि भी 28 हज़ार बढ़ाकर 51 हजार रुपए कर दी। कमलनाथ ने सत्ता के विकेंद्रीकरण का भी पूरा ध्यान रखा। शिवराज सरकार के दौरान प्रदेश में जिस अफसरशाही के हावी होने की शिकायत की जाती थी, इस सरकार ने उस पर नकेल डालने में कसर नहीं छोड़ी! अपने सख्त लहजे का कमलनाथ ने नजारा दिखाते हुए अफसरों को स्पष्ट कह दिया कि गांव और जिलों की वे समस्याएं जो वहीं हल हो सकती हैं, राजधानी तक नहीं आना चाहिए! यदि ऐसा कुछ हुआ तो इसकी जिम्मेदारी अफसरों की होगी। उन्होंने सरकारी मशीनरी को समझाइश देते हुए एक बार कहा भी था कि 'उनकी चक्की देर से जरूर चलती है, मगर पीसती बारीक है!'
  मुद्दे की बात यह कि उन्होंने अपनी राजनीतिक शैली अपने पूर्ववर्ती शिवराज सिंह से बिल्कुल उलट बनाए रखी है। शिवराज सिंह को फिजूलखर्ची और मनमानी घोषणाओं की आदत थी, जबकि कमलनाथ को मुट्ठी बंद रहती है। सरकार के दो महीने के कार्यकाल के दौरान न तो उन्होंने कोई घोषणा की और न किसी मंत्री की ऐसा करने हिम्मत हुई! सरकार ने जो भी फैसले किए वे सब पूर्ववर्ती सरकार की नीतियों में फेरबदल करके ही किए गए। कन्या विवाह अनुदान राशि बढ़ाने के साथ ही उन्होंने ऐसा कोई सरकारी आयोजन न करने का फैसला किया। कंट्रोल की दुकानों से गरीबों को मिलने वाले राशन की पैचीदा नीति को आसान कर दिया। गायों के लिए हर पंचायत में गौशाला खोलने का फैसला भी भाजपा सरकार को चिढ़ाने वाला ही कहा जाएगा! मुख्यमंत्री ने पुलिसकर्मियों को नए साल से वीकली ऑफ देने का फैसला करके करीब एक लाख पुलिसकर्मियों के परिवारों को भी खुश कर दिया। उनके इन फैसलों से ये जनता में ये संदेश तो गया ही है कि उनके काम करने का स्टाइल थोड़ा अलग है। मुख्यमंत्री ने खर्चों पर अंकुश तो रखा, पर जनप्रिय फैसलों में कमी नहीं आने दी! क्योंकि, चार महीने बाद लोकसभा चुनाव होना है और मार्च के शुरूआती दिनों में आचार संहिता लगने से सरकार के हाथ बंध जाएंगे!     
  कमलनाथ ने शिवराज सरकार के कई बेहूदा फैसलों को भी बदल दिया, जिसके तहत भजन मंडलियों को 57 करोड़ रुपए जारी कर दिए गए थे। कलेक्टरों व जिला पंचायत के सीईओ के माध्यम से दी गई यह राशि भजन मंडलियों को ढोल-मंजीरे व अन्य वाद्य यंत्रों की खरीद में खर्च करनी थी। शिवराज सरकार ने जुलाई 2018 में प्रदेश की 22 हजार 824 ग्राम पंचायतों में भजन मंडलियों को प्रोत्साहन देने के लिए 57.60 करोड़ रुपए आवंटित किए थे। लेकिन, आचार संहिता लगने से ये बंट नहीं पाए! नई सरकार ने ये राशि वापस मांग ली है। इसके अलावा नई सरकार ने पूर्व सरकार के चरागाह की जमीन को गोल्फकोर्स बनाने के लिए आवंटित की जमीन को भी निरस्त कर दिया। तत्कालीन भाजपा सरकार ने भोपाल के नजदीक बुलमदर फार्म की 650 एकड़ जमीन के एक बड़े हिस्से को गोल्फ कोर्स के लिए आरक्षित करने का फैसला किया था। जबकि, कमलनाथ सरकार ने फैसले को उलट दिया। सरकार के मुताबिक प्रदेश में कहीं भी गायों के चरागाह की जमीन का अन्य कोई इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।
  जहाँ तक कमलनाथ की राजनीतिक शैली की बात है तो चुनाव लड़ने से लगाकर सरकार चलाने तक का उनका अंदाज सबसे जुदा है। वे तुरत-फुरत फैसले करने या जल्दबाजी वाले काम कम ही करते हैं! हर मामले में उनके सोचने का तरीका अलग होता है। वे न तो किसी के प्रति ज्यादा आसक्ति दर्शाते हैं और न किसी को नाराज करने में विश्वास करते हैं। वे कम बोलते हैं और जो बोलते हैं सोच-समझकर बोलते हैं! यही कारण है कि वे अपने बयानों को लेकर विवादों में नहीं उलझते! इसे उनकी राजनीतिक सफलता का राज भी कहा जा सकता है। यही कारण है कि कमलनाथ के स्तर की राजनीतिक और प्रशासनिक समझ का नेता फिलहाल राज्य में दूसरा आसानी से खोज सकना मुश्किल है। राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों के इस दौर में वे जिस तरह से सरकार चला रहे हैं, वो उनकी अपनी काबलियत और अनुभव है। बहुमत के किनारे पर बैठी उनकी सरकार के सामने चुनौतियाँ बहुत है और ऐसे में उन्हें एक-एक कदम संभलकर रखना है। खतरा इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि सत्ता खोने से बिफराती भाजपा किसी मौके की तलाश में है, पर उसे कोई मौका मिल नहीं रहा!   
  जिसे सरकार को विरासत में खाली खजाना खाली मिला हो, उसके बाद भी उसका आत्मविश्वास सर चढ़कर बोले तो लगता है कि नेतृत्व सही हाथों में है। कमलनाथ का कहना है कि भाजपा यह मानती है कि उसने कांग्रेस को खाली खजाना सौंपा है, मगर फिर भी कांग्रेस सरकार अपने वचन पर खरी उतरेगी! दरअसल, कमलनाथ की राजनीति का यही अंदाज उन्हें अन्य नेताओं से अलग करता है। कमलनाथ ने बाहर से आकर छिंदवाड़ा को अपना घर बना लिया और लोगों के दिलों उतर गए! उम्मीद की जानी चाहिए कि वे बहुत जल्द अपनी कार्यशैली से प्रदेश की जनता मन मोह लेंगे!
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परदे पर अभी कोई यादगार बाप नहीं जन्मा!


- हेमंत पाल 

   समाज में पिता और संतान के बीच दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले संबंध हैं। इन पर बॉलीवुड निर्माताओं की नजर पड चुकी है। इसी के चलते कई फिल्मों में पिता की भूमिकाओं को जोरदार तरीके से सिल्वर स्क्रीन पर पेश किया। पचास से साठ के दशक के बीच बनी हिन्दी फिल्मों में पिता एक स्टीरियो टाइप कैरेक्टर हुआ करते थे। ऐसी भूमिकाओं को निभाने का जिम्मा नजीर हुसैन और मनमोहन कृष्ण ने बखूबी निभाया। इन दोनों कलाकारों ने उस दशक के सितारों राज कपूर, देव आनंद, शम्मी कपूर , दिलीप कुमार से लेकर राजेन्द्र कुमार के पिता की भूमिका खूब निभाई। इसके बाद हिन्दी फिल्मो में बाप की भूमिका में प्राण भरने वाले अभिनेताओं में मोतीलाल, कन्हैयालाल, जयंत और ओमप्रकाश का दौर आया। रहमान और सप्रू ने भी इस परम्परा को आगे बढाया। यदि 'मुगले आजम' में पृथ्वीराज कपूर ने एक दमदार बाप की भूमिका निभाई, तो वक्त में समय की मार झेल रहे बाप की भूमिका में बलराज साहनी ने गजब का परफार्मेस दिया।
  सत्तर और अस्सी का दशक आते आते हिन्दी फिल्मों के बाप भी बदले और उनकी भूमिकाएं भी समय के अनुसार बदली। जो सितारे साठ के दशक में नायक थे उनमे से कई 70 और 80 के दशक में फिल्मी बाप बनकर पर्दे पर दिखाई दिए। इसी क्रम में संजीव कुमार ने 'त्रिशुल' में अमिताभ के बाप बनकर जलवा बिखेरा तो दिलीप कुमार ने 'शक्ति' और 'कर्मा' में बाप की भूमिका को यादगार बना दिया। साठ के दशक के राजकपूर सत्तर के दशक में अपने ही बेटे की फिल्म कल आज और कल में उनके बाप बने तो शम्मी कपूर ने अपनी फिल्म जंगली की नायिका सायरा बानु के बाप बनकर जमीर से दूसरी पारी की शुरूआत की। उसके बाद वे 'बेताब' और 'प्रेमरोग' में प्रभावी बाप बनकर परदे पर छा गए। छठे दशक के विलेन प्राण उम्र की ढलान पर 'अमर अकबर एंथोनी' में बाप बने तो अमजद ने 'लावारिस' में उस अमिताभ के बाप की भूमिका की, जिसके साथ वह पहली बार 'शोले' में खूंखार विलेन बनकर आए थे। इस दौर में इन पुराने सितारों के साथ साथ ओम शिवपुरी, इफ्तेखार, एके हंगल और जगदीश राज ने कई फिल्मों में बाप बनकर फिल्मों को गति प्रदान की!
   महेश भट्ट की फिल्म 'सारांश' से एक दुखी बाप की यादगार भूमिका कर लोकप्रियता बटोरने वाले अनुपम खेर आज सबके चहेते बाप है। 'दिल' से लेकर 'दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे' में उन्होंने कभी नायक तो कभी नायिका के बाप बनकर अपने किरदार को स्वाभाविक बनाया है। आलोक नाथ तो लगता है बाप के किरदार के लिए ही पैदा हुए है। उन्होने हम साथ साथ है, मैने प्यार किया, हम आपके कौन हैं में बाप बनकर अपनी रोजी रोटी कमाई तो अमरीश पुरी ने जिस दबंगई से खलनायक की भूमिका की उतनी ही दबंगई से दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे सहित कई फिल्मों में बाप को दमदार बनाकर पेश किया। उनका साथ देने ओमपुरी, नसीरूद्यीन शाह,कादरखान, सईद जाफरी ने बाप बनकर हिन्दी सिनेमा के बापों की कमी पूरी की।
   इसके बाद उन सितारों ने बाप का लिबास ओढा जो कभी सिल्वर स्क्रीन पर बतौर सफल अभिनेता अपना डंका पिटने में माहिर थे। इसे समय का तकाजा कहा जाए या कुछ! लेकिन, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना , विनोद खन्ना और यहां तक कि बाल कलाकार की भूमिका से कैरियर आरंभ करने वाले ऋषि कपूर भी कुछ खट्टी कुछ मीठी राजू चाचा, हम तुम में बाप बनकर आए। सुनील दत्त ने मुन्ना भाई एमबीबीएस में संजय दत्त के पिता की भूमिका की तो धर्मेन्द्र भी अपने पुत्तरों के बाप बनकर बडे पर्दे पर दिखाई दिए।
हमारी फिल्मों में बाप बनकर अच्छे अच्छे सितारे आए, लेकिन अभी तक कोई ऐसी फिल्म अभी तक नहीं बनी जो इस बाप के चरित्र को उस ऊंचाई तक नहीं ले गया जो ऊंचाई 'मदर इंडिया' ने एक फिल्मी मां को दी थी। हालांकि, दिलीप कुमार ने 'शक्ति' में बाप की भूमिका को दमदार बनाया था। 'दंगल' में आमिर खान ने बच्चों की सेहत के लिए हानिकारक होते हुए भी एक यादगार बाप को रूपहले पर्दे पर पेश कर बाप की गरिमा को बढाने का काम जरूर किया है।
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Tuesday, February 5, 2019

मध्यप्रदेश के खाली खजाने को लेकर गरमाती सियासत!

- हेमंत पाल 

   मध्यप्रदेश में नई सरकार बनने के बाद से ही ये मामला तूल पकड़ रहा है कि प्रदेश सरकार के खाली खजाने का क्या होगा? किसानों के दो लाख तक के कर्ज को माफ़ करने की घोषणा तो कर दी, पर ये ये पैसा आएगा कहाँ से? सरकार का खर्च कैसे चलेगा? सरकारी कर्मचारियों का वेतन और भत्ते समय पर देने में कोई परेशानी तो नहीं होगी और बाकी खर्चों की पूर्ति का रास्ता कहाँ से निकलेगा! कमलनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही खर्चों में कमी का एलान तो किया, पर मितव्ययिता की भी एक सीमा होती है! नई सरकार के सामने वित्तीय संकट का सबसे बड़ा कारण ये रहा कि पहले वाली सरकार ने मुक्त हस्त से खजाना लुटाकर उसे खाली कर दिया! इस वजह से कमलनाथ को विरासत में जो सत्ता मिली उसकी तिजोरी लुटी हुई थी!   
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   विधानसभा चुनाव से पहले जो मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में था, वो मध्यप्रदेश सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर ही रहा है। पिछली शिवराज-सरकार ने चुनाव से पहले हर वर्ग को साधने की कोशिश की! इन कोशिशों का सीधा असर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय था और वही हुआ भी! चुनाव से पहले भी कांग्रेस ने इस स्थिति को लेकर सरकार पर निशाना साधा था। तब के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और आज के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था कि प्रदेश भीषण आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। प्रदेश पर ओवर ड्रॉफ्ट का खतरा मंडरा रहा है। प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर राज्य सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए! उन्होंने अपनी इस मांग को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा था, लेकिन इसका उन्हें कोई जबाव नहीं मिला! आज जब वे प्रदेश के मुखिया हैं, ये सारा संकट उनके सामने खड़ा हो गया! उस समय कमलनाथ का आरोप था कि प्रदेश पर करीब पौने दो लाख करोड़ का कर्ज है। वित्तीय वर्ष में तीन बार सरकार बाजार से कर्ज ले चुकी है। सरकार 11 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट भी लेकर आई थी। 
    मुख्यमंत्री कमलनाथ के पद संभालते ही सबसे बड़ा सियासी भूचाल ये आया कि किसानों की कर्ज माफ़ी का रास्ता कहाँ से निकलेगा? मुख्यमंत्री ने पार्टी के चुनावी वादे मुताबिक किसानों का 2 लाख तक का बैंक कर्ज को माफ़ करने के आदेश तो कर दिए, पर ये काम होगा कैसे? क्योंकि, उन्हें विरासत में सरकार का खजाना तो पूरी तरह से खाली मिला! जबकि, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का कहना है कि राज्य की वित्तीय स्थिति बेहतर है। उन्होंने ने तो ये भी कहा कि किसानों की कर्जमाफी नहीं चाहिए, वे अपने पसीने की पूरी कीमत चाहते हैं! लेकिन, मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हिम्मत नहीं हारी है! उन्होंने कहा कि मैं केंद्र में वाणिज्य और उद्योग मंत्री रह चुका हूँ! मुझे पता कि अर्थव्यवस्था कैसे चलती है! प्रदेश के 70% लोगों का जीवन-यापन खेती पर निर्भर है। मामला सिर्फ खेतों में उपज उपजाने का ही नहीं है। बहुत से ऐसे लोग हैं, जो गाँव में सब्जी बेचते या खेतिहर मजदूर हैं। उनका यह भी कहना था कि यदि उद्योगपतियों का कर्ज माफ़ हो सकता है, तो सरकार किसानों की कर्ज माफ़ी क्यों नहीं कर सकती!  
   कमलनाथ ने शपथ ग्रहण करने से पहले जब सरकार की प्राथमिकताएं एवं योजनाएं बताईं, तभी शिवराज-सरकार के वित्तमंत्री जयंत मलैया ने कह दिया था कि यदि किसानों का कर्ज माफ किया, तो कर्मचारियों को वेतन देने के लाले पड़ जाएंगे! कमलनाथ ने भी इसका जवाब दिया कि उन्हें पता है कि पैसा कहाँ से आएगा! प्रदेश सरकार का खजाना खाली पड़ा है, बड़ा कर्ज है। प्रदेश में वित्तीय संकट की स्थिति है। शीघ्र ही हम इस पर कोई निर्णय लेंगे। कर्ज माफी के लिए हम नई सोच से संसाधन जुटाएंगे। सरकार कमान संभालने से ही कमलनाथ प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन में कसावट लाकर विकास योजनाओं के लिए धन जुटाने की बात कहते रहे हैं। उन्होंने मीडिया का बजट रोककर कह दिया, कि मुझे अपनी छवि चमकाने की जरूरत नहीं है। हालांकि, ये बात भी सही है कि दो लाख करोड़ के बजट में मीडिया पर खर्च की जाने वाली राशि ऊंट के मुँह में जीरे की तरह होती है। जबकि सड़कों, फ्लाईओवर और अन्य योजनाओं पर खर्च की जाने वाली धनराशि हजारों करोड़ की होती है। इसके बावजूद मीडिया पर प्रहार करने से जनता को ये संदेश देने में सफलता जरूर मिली कि सरकार धीरे-धीरे अपना वित्तीय प्रबंधन सुधार रही है। लेकिन, नाराज मीडिया को संतुष्ट करना भी तो मुख्यमंत्री का ही काम है। 
   ये सच है कि किसानों की कर्ज माफ़ी से सरकारी खजाने पर बोझ जरूर आया है। यही कारण है कि किसानों की कर्ज माफी हमेशा ही चुनावों में बड़ा मुद्दा रही है। लेकिन, इस घोषणा पर अमल आसान नहीं होता! इसलिए कई पार्टियां किसानों की कर्ज माफ़ी के मुद्दे बचती हैं। भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री रहे शिवराजसिंह चौहान का ये कुतर्क कुछ अलग ही है! वे कहते हैं कि किसान कभी मुफ्त का कुछ भी नहीं चाहते, वे तो पसीने की पूरी कीमत चाहते हैं। किसानों कभी खैरात पसंद नहीं करते! किसानों की गरिमा का सम्मान करते हुए मैंने कई योजनाएं शुरू की, जिससे किसानों के खाते में पैसा जाए। दरअसल, ये शिवराज सिंह की वो राजनीतिक कुंठा है, जो चुनाव हारने के बाद निकल रही है। कांग्रेस की एक घोषणा से चुनाव न जीत पाने की अपनी नाकामयाबी को वे इस तरह जाहिर कर रहे हैं। 
   प्रदेश के खाली खजाने को लेकर जो सियासी तूफ़ान उठा वो धीरे-धीरे बवंडर बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सरकार के वित्तीय संकट को सियासी हथियार बनाया तो शिवराजसिंह ने राज्य की कंगाली की स्थिति का खंडन करते हुए कहा कि यह गलत है। खजाना में भरपूर भण्डार है। इसके लिए मैं कभी भी और कहीं भी बहस कर सकता हूँ। शिवराज ने यह भी कहा कि मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति किसी भी दूसरे प्रदेशों से बेहतर है। हम अपनी सरकार के दौरान कभी दूसरे राज्यों की तरह ओवरड्राफ्ट नहीं हुए। नई सरकार के लिए भरापूरा खजाना छोड़ा है। ये कितना सही है, ये बात जयंत मलैया के उस बयान से साबित होती है कि हमने खजाना खाली करके छोड़ा है! जिस सरकार में वित्त मंत्री रहे मलैया जब्व खजाने के खाली होने का दावा कर रहे हैं, तो शिवराज सिंह के इस दावे की कोई अहमियत नहीं रह जाती कि खजाना भरा है!
     पिछली सरकार के समय से ही प्रदेश पर कर्ज का बोझ बढ़कर करीब 2 लाख करोड़ रुपए है। जिस पर 6,000 करोड़ रुपए का सालाना ब्याज देना पड़ रहा है। पिछली सरकार के अंतिम शीतकालीन सत्र में शिवराज सरकार ने 8,000 करोड़ रुपए का दूसरा अनुपूरक बजट पेश किया था। इस पहले भी करीब 14 हजार करोड़ का एक अनुपूरक बजट पेश किया जा चुका था। जबकि, 1.58 लाख करोड़ रुपए का मूल सालाना बजट इसके अतिरिक्त था। अर्थशास्त्र के जानकारों के अनुसार अनुपूरक बजट का मतलब यही है कि प्रदेश का अर्थ-तंत्र कहीं न कहीं गड़बड़ा रहा हैं। इसके अलावा शिवराज-सरकार ने बाजार से भी करीब 15,500 करोड़ रुपए का कर्ज उठाया था। इन स्पष्ट खुलासों के बाद शिवराज सिंह के इन दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता कि खजाना भरापूरा है! हालात जो भी हों, पर सियासी झगड़ों ने सरकार के खजाने को खोलकर जनता को जरूर दिखा दिया!
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Sunday, February 3, 2019

रंग ज़माने लगी हॉलीवुड की फ़िल्में


- हेमंत पाल

  हॉलीवुड की फ़िल्में धीरे-धीरे भारतीय दर्शकों के दिल में उतरने लगी है। बेहतरीन प्रॉडक्शन, नए और अनोखे कथानक आइडियों और एक्शन वाली इन फिल्मों ने नई पीढ़ी के दर्शकों को सबसे ज्यादा आकर्षित कर रही है। जबकि, एक समय वो भी था, जब अंग्रेजी फ़िल्में देखने वालों को अच्छा नहीं समझा जाता था। समाज में उनके प्रति एक अलग ही तरह की धारणा बन गई थी कि ये वो कुंठित तबका है, जो अंग्रेजी फ़िल्में देखकर संतुष्ट होता है। लेकिन, अब समाज में उस तरह का सोच नहीं रहा! नई पीढ़ी के दर्शकों को हॉलीवुड फिल्मों की कहानियों के नए आइडिये और फ़ास्ट एक्शन काफी लुभाता है।       
  इन फिल्मों के प्रति भारत के दर्शकों बदली सोच और बढ़ती संख्या से ये साबित भी कर दिया है कि वे जब चाहें बॉलीवुड पर कब्ज़ा कर सकती हैं! धीरे-धीरे ये सब होने भी लगा है। स्थिति ये आ गई कि हॉलीवुड की फिल्में अब भारत में आसानी से 100 करोड़ का कारोबार कर लेती हैं, जबकि हिंदी फिल्मों को इस आंकड़े तक पहुँचने में सारे हथकंडे आजमाना पड़ते हैं। 2018 में ही हॉलीवुड की दो फिल्मों 'एवेंजर्स : इनफिनिटी वॉर' और 'जुरासिक वर्ल्ड' ने बॉक्स ऑफिस पर 222.69 करोड और 152 करोड का कारोबार किया। भारत के दर्शकों में हॉलीवुड फिल्मों का क्रेज किस तेजी से बढ़ रहा है इसका सुबूत है कि ‘एवेंजर्स : इनफिनिटी वॉर’ अमेरिका से दो हफ्ते पहले भारत में रिलीज की गई! इस फिल्म ने कमाई मामले में अभी तक के सारे रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिए। इस फिल्म ने सबसे तेज कमाई का भी रिकॉर्ड बनाया है। गनीमत थी कि जब ये फ़िल्में प्रदर्शित हुई, तब कोई बॉलीवुड फिल्म सामने नहीं थी। यदि कोई फिल्म प्रदर्शित भी होती तो उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ता। 2018 में पहली बार किसी हॉलीवुड फिल्म ने देश में 200 करोड के कारोबार  आंकड़ा पार किया! 
 लम्बे समय से ये बात कही जा रही है कि एक वक़्त ऐसा आएगा जब हॉलीवुड की फ़िल्में बॉलीवुड फिल्मों को चुनौती देंगी! लेकिन, इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया गया! अब, जबकि हॉलीवुड की फिल्मों के कारण बॉलीवुड की फिल्मों का बिजनेस प्रभावित होने लगा तो निर्माताओं को चिंता सताने लगी! 2015 से हालात बहुत तेजी से बदले जब जुरासिक वर्ल्ड, एवेंजर्स : एज ऑफ अल्ट्रॉन और फास्ट एंड फ्यूरियस-7 ने भारत में 700 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी। उससे पहले अनिल कपूर की भूमिका वाली 'मिशन इम्पॉसिबल : द घोस्ट प्रोटोकॉल' ने 40 करोड़ रुपए का बिजनेस किया। 2017 में भारत में हॉलीवुड फिल्मों की हिस्सेदारी करीब 20% थी। जबकि, दस साल पहले 2009 में यह आँकड़ा 7.2% ही था। थिएटर के अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी हॉलीवुड की फ़िल्में  बहुत देखी जा रही है।
  भारत में हॉलीवुड फिल्मों का कारोबार करीब 1000 करोड़ रुपए है। हिंदी फिल्मों से इसकी तुलना की जाए तो ये बॉक्स ऑफिस के मुताबिक करीब 15% होता है। ये आँकड़ा भले ही छोटा लगे, पर ये भी ध्यान देने वाली बात है कि हिंदी फिल्म के मुकाबले हॉलीवुड फिल्मों को बहुत कम थियेटर मिलते हैं। यदि थियेटरों के हिसाब से कमाई का औसत निकाला जाए, तो हिंदी सिनेमा कमजोर ही नजर आएगा! इन फिल्मों की सफलता का सबसे बड़ा राज है सुपर हीरो! हॉलीवुड की अधिकांश वही फ़िल्में भारतीय दर्शकों द्वारा पसंद की जाती है जिनमें सुपर हीरो होता है। अभी तक इस तरह की जो जितनी भी फ़िल्में रिलीज हुई, उन्होंने अच्छा कारोबार किया है।  
  ऐसी स्थिति में बॉलीवुड को हॉलीवुड फिल्मकारों की तरह सोचने की जरुरत है। नए ज़माने के भारतीय दर्शकों को हॉलीवुड फिल्मों में जो पसंद आ रहा है, वही सब बॉलीवुड फिल्मकारों को भी सीखना होगा! अब पुराने ढर्रे वाली प्रेम कहानियों और बदले की कहानियों के दिन लद गए। बॉलीवुड को नई सोच के मुताबिक बदलना होगा! हॉलीवुड यह सारे प्रयोग कर चुका है! हमें केवल उसे अपनाना है। भारतीय परिवेश में भी कई बेहतरीन कहानियां हैं, जिन्हें आज के दर्शकों के मनोरंजन के मुताबिक नया ट्रीटमेंट देना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन बॉलीवुड पर हॉलीवुड  होने में देर नहीं लगेगी! 
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Monday, January 28, 2019

सुमित्रा महाजन की नौवीं दावेदारी पर उठे सवाल!

   इंदौर की लोकसभा सीट से भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा, इसकी दावेदारी शुरू हो गई! बीते 30 सालों में हुए 8 लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सबसे सुरक्षित सीटों में एक इंदौर सीट भी रही है। यहाँ की सांसद सुमित्रा महाजन (ताई) ही इस बार चुनाव लड़ेंगी या फिर किसी नए चेहरे को मौका दिया जाएगा, यह सवाल अभी जवाब का इंतजार कर रहा है। 'ताई' 9वीं बार अपनी किस्मत आजमाना चाहती हैं। उन्होंने पिछले दिनों चुनाव लड़ने के संकेत भी दे दिए। वे इस बारे में विधानसभाओं की बैठकें भी कर चुकी हैं। जबकि, इससे 2014 वाले चुनाव में उन्होंने साफ कहा था कि यह उनका आखिरी चुनाव होगा। 'ताई' के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी लोकसभा चुनाव के लिए सक्रिय हो गए! उन्होंने भी कार्यकर्ताओं की बैठकें लेना शुरू कर दी। इस सीट की तीसरी दावेदार महापौर मालिनी गौड़ हैं। उनके पक्ष में भी कुछ सशक्त कारण हैं, जो उनकी दावेदारी को मजबूत बनाते हैं।   
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- हेमंत पाल 
      लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन क्या अगला चुनाव लड़ेंगी? ये सवाल सिर्फ इंदौर ही नहीं, मध्यप्रदेश की राजनीति में गरमागरम मुद्दा बना हुआ है। भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार के तौर पर इंदौर से आठ बार लोकसभा चुनाव जीत चुकी सुमित्रा ताई के बारे में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। भाजपा के कई बड़े नेता उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सुमित्रा महाजन उर्फ़ 'ताई' अगला लोकसभा चुनाव न लड़ें! इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं! ये कयास भी लगाए जा रहे हैं कि संभवतः पार्टी आलाकमान ही उन्हें उम्र के फॉर्मूले के आधार पर टिकट देने से इंकार कर दे! इसके अलावा भी कई ऐसे कारण हैं, जो अब 'ताई' की राजनीति के सूर्यास्त की तरफ संकेत कर रहे हैं।
   मध्यप्रदेश भाजपा की बड़ी महिला नेता सुषमा स्वराज, उमा भारती ने अगले लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी से इंकार कर दिया! दोनों ने इसके पीछे अपनी सेहत को कारण बताया है! लेकिन, इंदौर की आठ बार की सांसद और फिलहाल लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन (ताई) ने ऐसा कोई एलान नहीं किया! यहाँ तक कि उन्होंने पिछले चुनाव के दौरान कही गई अपनी बात को भी झुठला दिया कि वे अब चुनाव नहीं लड़ेंगी! अब अगला लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए 'ताई' न सिर्फ तैयार हैं, बल्कि इसके लिए तैयारी भी शुरू कर दी!
   सुमित्रा महाजन ने पिछले लोकसभा चुनाव साढ़े चार लाख के अंतर से जीता था! लेकिन, अब राजनीति की वो कहानी बदल गई! 8 विधानसभा सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों में वोट अंतर भी घटकर 95 हज़ार पर आ गया! ये आंकड़ा 'ताई' के लिए अच्छा संकेत नहीं दे रहा! कुछ लोगों का ये भी मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष के पद पर रहने के बाद 'ताई' को चुनावी राजनीति से खुद अलग हो जाना चाहिए। लगातार आठ बार सांसद रहने के बाद भी वे पार्टी की नंबर दो की लाइन आगे बढ़ ही नहीं पाई। इंदौर में भी उनके पास कोई लॉबी नहीं है। इसका खामियाजा पार्टी को अगले चुनावों में भुगतना पड़ सकता हैं। राजनीतिक जानकारों का भी अंदाजा है कि यदि 'ताई' को फिर मैदान में उतारा गया, तो उनकी स्थिति सत्यनारायण जटिया और लक्ष्मीनारायण पांडेय जैसी हार हो सकती है। मध्यप्रदेश में सरकार भी बदल गई, ये भी एक कारण है कि लोकसभा चुनाव पर असर होगा। सारे हालात देखते हुए पार्टी को मैदान में कोई नया चेहरा उतरना चाहिए।
   इंदौर में लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी के दूसरे सबसे सशक्त दावेदार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय यानी 'भाई' हैं। 'ताई' यानी सांसद सुमित्रा महाजन और 'भाई' यानी कैलाश विजयवर्गीय के बीच तनातनी के किस्से बहुत पुराने हैं। इंदौर की राजनीति में ऐसे कई प्रसंग हैं, जब इन दोनों के बीच राजनीतिक छापामारी की जंग चली। ये जंग अभी बंद नहीं हुई। इस बार 'ताई' की जगह कैलाश विजयवर्गीय को लोकसभा का उम्मीदवार बनाए जाने की बात उठने लगी है। लेकिन, अब इंदौर में भाजपा राजनीति में गुटबाजी और मतभेदों की एक और नई कथा का वाचन होने लगा। इस कथा की प्रमुख पात्र सांसद सुमित्रा महाजन और महापौर मालिनी गौड़! राजनीतिक अनुभव में इंदौर के क्षेत्र क्रमांक-4 की विधायक और इंदौर नगर निगम की महापौर मालिनी गौड़ और सांसद सुमित्रा महाजन में कोई साम्य नहीं है। लगातार 8 बार की सांसद और लोकसभा अध्यक्ष महाजन उस कुर्सी पर हैं, जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उन्हें सम्मान देना पड़ता है। लेकिन, स्वच्छता के मामले में इंदौर के दो बार देश में नम्बर होने से महापौर के तौर पर मालिनी गौड़ का रुतबा बढ़ गया। दिल्ली में भी उनका सिक्का चलने लगा। उनके बढ़ते क़दमों की आहट से सबसे ज्यादा प्रभावित यदि कोई हुआ तो वो सांसद महाजन ही हैं। क्योंकि, मालिनी गौड़ को अगले लोकसभा चुनाव में सांसद की कुर्सी का प्रबल दावेदार माना जाने लगा है।
   महापौर मालिनी गौड़ को पूर्व मुख्यमंत्री के खेमे का नेता समझा जाता रहा है। लेकिन, दोनों महिला नेत्रियों के बीच तलवारें तब निकली, जब देश में 'स्वच्छ इंदौर' का तमगा पाने के बाद होने वाले एक कार्यक्रम को लेकर दोनों ने अड़ीबाजी की। इंदौर को जब पहली बार स्वच्छता का खिताब मिला, तब महापौर ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को स्वच्छ इंदौर पर आयोजित एक कार्यक्रम 'प्रणाम इंदौर' के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन, कहते हैं कि ये कार्यक्रम सांसद सुमित्रा महाजन ने निरस्त करवा दिया था। सांसद सुमित्रा महाजन ने तत्कालीन केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू से बात करके उन्हें इंदौर आमंत्रित किया। सुमित्रा महाजन की योजना अपने इस कार्यक्रम में महापौर, निगम आयुक्त और उनकी पूरी टीम का सम्मान करना था। लेकिन, महापौर ने उनकी प्लानिंग बिगाड़ दी। स्थिति यहाँ तक आ गई कि शिवराज सिंह को इसमें दखल देना पड़ा था। अंततः नई तारीख तय की गई, लेकिन, जिस दिन कार्यक्रम होना तय हुआ था, उस दिन घनघोर बारिश हुई और कार्यक्रम नहीं हो पाया। यही कारण है कि इन सारे समीकरणों के बीच मालिनी गौड़ और सुमित्रा महाजन के बीच तालमेल गड़बड़ा गया।
  इंदौर लोकसभा सीट से सुमित्रा महाजन 1989 से लगातार चुनाव जीतती आ रही है! पार्टी में उनके वर्चस्व को किसी ने चुनौती भी नहीं दी! क्योंकि, उनके कामकाज का तरीका आक्रामक नहीं रहा कि वे किसी का रास्ता काटें! लेकिन, उन्होंने अपनी 'चौकड़ी' में कभी किसी को घुसने भी नहीं दिया! वे चंद गैर-राजनीतिक लोगों से घिरी रहती हैं! वे ही उनके राजनीतिक सलाहकार की भूमिका निभाते हैं और वे ही उनके लिए बयानबाजी भी करते हैं! 'ताई' ने अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में ऐसी कोई उपलब्धि भी इंदौर के लिए नहीं जुटाई कि लोग उसके नाम से याद उन्हें याद करें! लेकिन, कुछ मामलों में दखल देकर काम बिगाड़ने का काम जरूर किया! उनकी सारी सक्रियता रेलवे को चिट्ठी लिखने तक ही दिखाई देती रही है। सक्रियता से बचकर रहना 'ताई' की आदत रही है! लोग भी उनकी इस राजनीतिक शैली से कभी खुश नहीं रहे, पर मज़बूरी है कि सामने कोई विकल्प भी नहीं रहा! प्रकाशचंद्र सेठी के बाद कांग्रेस के पास इंदौर में कोई ऐसा नेता नहीं रहा, जो शहर की राजनीति कमांड कर सके! महेश जोशी ने कोशिश जरूर की, पर वे भी गुटबाजी से बाहर नहीं निकल सके!
  'ताई' ने तीन दशक के अपने राजनीतिक जीवन में कभी किसी नेता को पनपने नहीं दिया! बल्कि, कुछ आगे बढ़ते नेताओं को रोकने की कोशिश जरूर की! उनके होते हुए सिर्फ कैलाश विजयवर्गीय 'भाई' ही अकेले ऐसे नेता रहे, जिन्होंने भाजपा में अपनी अलग राह बनाई! पहले महापौर और बाद में लगातार मंत्री बनते रहे! यही कारण रहा कि जिस भाजपा नेता की पटरी 'ताई' से नहीं बैठी उसने 'भाई' का हाथ थाम लिया! इसके बाद इंदौर में भाजपा की राजनीति दो ध्रुवों पर केंद्रित हो गई! कई बार अपने समर्थकों के लिए दोनों के बीच विवाद भी हुए, पर कभी दोनों आमने-सामने आए हों, ऐसा नहीं हुआ! लेकिन, अब लगता है वो समय आ गया है, जब 'ताई' और 'भाई' आमने-सामने होंगे! इंदौर की लोकसभा सीट से भाजपा की उम्मीदवारी का सवाल भी तभी हल होगा! 
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Monday, January 21, 2019

लोकसभा चुनाव पर भी असर डालेगी कांग्रेस की ये जीत!


    मध्यप्रदेश में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा से सिर्फ प्रदेश की सत्ता ही नहीं छीनी, बल्कि लोकसभा चुनाव की रणनीति को भी झकझोर दिया है। कांग्रेस को जो सफलता मिली, उससे भाजपा की 12 लोकसभा सीटों पर भी सीधा असर पड़ा! इनमें से 8 पर तो कांग्रेस को काफी ज्यादा वोट मिले हैं! जबकि, 4 सीटों पर लाखों वोटों का अंतर घटकर हज़ारों में सिमट गया! प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, इनमें से सिर्फ 3 कांग्रेस के पास हैं और 26 पर भाजपा का कब्ज़ा है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने कांग्रेस के कब्जे वाली छिंदवाड़ा, गुना और झाबुआ सीटों को छीनने की तैयारी की थी! लेकिन, लगता है अब भाजपा को अपना लक्ष्य बदलना पड़ेगा! उसे कांग्रेस से सिर्फ तीन सीट ही नहीं छीनना है, अपनी भी 12 सीटें बचाने जुगत भी लगाना पड़ेगी! भाजपा की खतरे वाली सीटों में भाजपा के दिग्गज नेता नरेंद्र तोमर, फग्गनसिंह कुलस्ते, अनूप मिश्रा और नंदकुमार सिंह चौहान की सीटें भी है!   
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- हेमंत पाल 
   चार महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा आराम की स्थिति में नहीं है! विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिस तरह भाजपा की बराबरी का मुकाबला किया है, उसका असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ना तय है। 2013 के विधानसभा चुनाव 56 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के पास इस चुनाव में 114 सीटें हैं। निश्चित रूप से वोटों का ये गणित भाजपा के चुनावी समीकरण बिगाड़ेगा! प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का होना भी कहीं न कहीं चुनाव पर प्रभाव तो डालेगा ही! नरेंद्र मोदी की आंधी की वजह से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की 29 में से 27 सीटें जीती थीं। लेकिन, सालभर में ही झाबुआ-रतलाम लोकसभा सीट के सांसद दिलीपसिंह भूरिया के निधन के कारण यहाँ उपचुनाव हुए! भाजपा को पहला झटका तभी लग गया था, जब इस उपचुनाव में कांग्रेस ने ये सीट फिर जीत ली।     
  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जिस तरह बढ़त मिली है, उससे भाजपा की 12 लोकसभा सीटें सीधे-सीधे खतरे में नजर आ रही हैं। ग्वालियर के सांसद और भाजपा के दिग्गज नेता नरेंद्रसिंह तोमर की सीट भी डेंजर झोन में हैं। अनूप मिश्रा, फग्गन सिंह कुलस्ते, भागीरथ प्रसाद, प्रहलाद पटेल, रोडमल नागर, सुमित्रा महाजन और सावित्री ठाकुर को भी सीट बचाने के लिए जोर लगाना पड़ेगा। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह भी जबलपुर सीट पर चक्रव्यूह में घिरे नजर आ रहे हैं। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की खंडवा सीट भी अब उनके लिए आसान नहीं दिख रही।
   नरेंद्र तोमर ने पिछला लोकसभा चुनाव ग्वालियर सीट से 29,699 वोट से जीता था। लेकिन, 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहाँ की 7 विधानसभा सीटें जीत ली। जबकि, संसदीय क्षेत्र में भाजपा 5 विधानसभा सीटों से लुढ़ककर एक पर आ गई! भाजपा ने सिर्फ ग्वालियर ग्रामीण पर पार्टी का परचम लहराया है। जबकि, कांग्रेस ने ग्वालियर, ग्वालियर-पूर्व, ग्वालियर-दक्षिण, भितरवार, डबरा, करेरा और पोहरी सीटें जीती है। वोटों के अंतर से देखा जाए तो यहाँ कांग्रेस 1,33,936 वोट से आगे है। चंबल इलाके की ही भिंड लोकसभा सीट पर भी भाजपा की हालत खस्ता है। यहाँ से सांसद भागीरथ प्रसाद की सीट खतरे में पड़ गई! यहाँ की 8 में से 4 विधानसभा सीटें इस बार भाजपा ने गँवाई है, उसे सिर्फ दतिया और अटेर सीटों पर ही जीत हांसिल हुई! जबकि, कांग्रेस ने लहार, मेहगांव, गोहद, सेवढ़ा और भांडेर सीटें जीती! भिंड की सीट बसपा के खाते में गई! विधानसभा में वोटों के अंतर परखा जाए तो इस लोकसभा सीट पर कांग्रेस 99,280 वोटों से आगे है। भाजपा के ही एक बड़े नेता अनूप मिश्रा की मुरैना सीट से भी खतरे की घंटी सुनाई दे रही है। यहाँ कांग्रेस ने श्योपुर, सबलगढ़, जौरा, सुमावली, मुरैना, दिमनी और अंबाह को मिलाकर 7 सीटों पर कब्ज़ा जमाया है। भाजपा को सिर्फ विजयपुर की जीत से संतोष करना पड़ा। यहाँ कांग्रेस 1,26,842 वोटों से आगे है।
  विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा के एक और बड़े नेता और सांसद फग्गनसिंह कुलस्ते की चिंता भी बढ़ा दी। क्योंकि, मंडला संसदीय क्षेत्र की 6 सीटों शाहपुर, डिंडोरी, बिछिया, निवास, लखनादौन और गोटेगांव पर कांग्रेस जीती है। भाजपा के हिस्से में मंडला और केवलारी सीटें आई! इस लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस 1,21,688 वोटों से आगे है। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की खंडवा भी अब सुरक्षित नहीं रही! यहाँ कांग्रेस 26,294 वोटों से आगे है। 2013 के विधानसभा चुनाव में 7 सीटें जीतने वाली भाजपा 3 सीटों (खंडवा, पंधाना, बागली) पर सिमट गई! जबकि, कांग्रेस ने 4 सीटें नेपानगर, भीकनगांव, बड़वाह और मंधाता पर झंडा गाड़ा! बुरहानपुर सीट कांग्रेस के बागी उम्मीदवार ने जीतकर भाजपा सरकार मंत्री रही अर्चना चिटनिस को हरा दिया!
  धार की लोकसभा सीट 2014 के चुनाव में भाजपा की सावित्री ठाकुर ने जीती थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के पास 6 सीट थीं। अब इतनी ही सीटें कांग्रेस के पास है। कांग्रेस के पास सरदारपुर, कुक्षी, गंधवानी, मनावर, बदनावर और धरमपुरी सीटें हैं! जबकि, भाजपा को सिर्फ धार और महू सीटों पर ही जीत हांसिल हुई! इस लोकसभा सीट पर कांग्रेस 2,20,070 वोटों से आगे है। यही स्थिति राजगढ़ लोकसभा सीट की है, जहाँ से 2014 का चुनाव भाजपा के रोडमल नागर ने जीता था। इस बार यहाँ से कांग्रेस ने 5 सीटें राजगढ़, खिलचीपुर, चांचौड़ा, ब्यावरा और राधौगढ़ जीती है। भाजपा के हिस्से में नरसिंहगढ़ और सारंगपुर ही आए! कांगेस के बागी ने सुसनेर सीट पर कब्ज़ा जमा लिया! यहाँ भी कांग्रेस 1,85,010 वोटों से आगे है। बैतूल लोकसभा की सांसद ज्योति धुर्वे की भी लुटिया सलामत नहीं लग रही! 2013 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में भाजपा के खाते में 6 सीटें थीं, जो अब घटकर अब 4 (अमला, हरदा, हरसूद, टिमरनी) रह गई हैं। कांग्रेस के खाते में भी मुलताई, बैतूल, घोड़ाडोंगरी और भैंसदेही सीट आई है। बैतूल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस 40676 वोटों से आगे है। 
  ये तो वो लोकसभा सीटें हैं, जहाँ भाजपा की हालत स्पष्ट खस्ता नजर आ रही है। लेकिन, इंदौर, जबलपुर, दमोह और उज्जैन ऐसी सीटें हैं जहाँ विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट बहुत ज्यादा घटे हैं। इंदौर सीट से पिछला लोकसभा चुनाव साढ़े 4 लाख से जीतने वाली सुमित्रा महाजन की इस सीट पर अब वोटों का अंतर घटकर 95,380 वोट रह गया है। यहाँ पिछले विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक सीट जीतने वाली कांग्रेस के पास अब 4 सीटें हैं। जबलपुर लोकसभा सीट से 2 लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव जीतने वाले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की भी हालत पतली नजर आ रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में यहाँ भाजपा के पास 6 सीटे थीं और कांग्रेस के पास 2 थी। लेकिन, इस बार दोनों पार्टियों में सीटें आधी-आधी बंट गई है। वोट का अंतर भी भाजपा के पक्ष में घटकर 37,833 रह गया!
    दमोह लोकसभा सीट के सांसद प्रहलाद पटेल भी मुश्किल में हैं। क्योंकि, 2 लाख से ज्यादा वोटों से चुनाव जीतने वाले इस दिग्गज भाजपा नेता के पास अब सिर्फ 11 हज़ार वोटों की लीड बची है। इस संसदीय क्षेत्र की 8 में से 4 सीटें (बंडा, देवरी, मलहरा, दमोह) कांग्रेस ने जीत ली! भाजपा के खाते में रेहली, जबेरा और हटा गई! जबकि, पथरिया सीट बसपा ने जीती। उज्जैन लोकसभा सीट 3 लाख से जीतने वाले चिंतामणी मालवीय के सामने भी राह आसान नहीं है। मालवीय 3 लाख वोट से जीते थे। 2013 में आठों सीट भाजपा जीती थी, अब कांग्रेस ने 5 सीटें छीन लीं। यहाँ वोटों का अंतर 14,643 रह गया है। पिछले विधानसभा चुनाव में सभी 8 सीटें जीतने वाली भाजपा को इस बार उज्जैन-उत्तर, उज्जैन-दक्षिण और महिदपुर सीट मिली। कांग्रेस ने 5 (बड़नगर, नागदा-खाचरौद, तराना, घटिया, आलोट) पर जीत दर्ज की है।
  भाजपा ने विधानसभा चुनाव में शाजापुर-देवास से सांसद मनोहर ऊंटवाल को आगर, खजुराहो के सांसद नागेंद्रसिंह को नागौद व मुरैना के सांसद अनूप मिश्रा को भितरवार से टिकट दिया था। ऊंटवाल व नागेंद्रसिंह ने तो विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की। वहीं, अनूप मिश्रा विधानसभा चुनाव हार गए। विधानसभा चुनाव से बदले समीकरणों ने भाजपा के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया। जिन लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा के वोट घटे हैं, क्या वहाँ उम्मीदवारों को बदला जाएगा? ऐसे में नए उम्मीदवारों को खोजना भी आसान नहीं होगा! भाजपा इस मुश्किल से कैसे निकलती है, इसका जवाब कुछ दिन बाद मिलेगा।
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परदे से उतरती 'खान' सल्तनत!

- हेमंत पाल

   बॉलीवुड में हमेशा ही कलाकारों का एक दौर चलता रहा है। जिसका दौर रहता है, उसकी हर फिल्म हिट होती है। सौ सालों से ज्यादा पुरानी फ़िल्मी दुनिया में दर्शकों की पसंद, नापसंद भी बदलती रहती है। लेकिन, ये बात महिला कलाकारों से ज्यादा पुरुष कलाकारों पर ज्यादा लागू होती है। पिछले कई सालों से परदे की दुनिया में तीन खानों का बोलबाला रहा है। लेकिन, अब धीरे-धीरे हालात बदल रहे हैं। शाहरुख़, सलमान और आमिर तीनों ही खान दर्शकों की पसंद की फेहरिस्त से बाहर होते जा रहे हैं। अभी ये नहीं कहा जा सकता कि दर्शकों ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया, पर खानों के किले में दरारें तो पड़ने लगी हैं।
   अभी तक सलमान, आमिर और शाहरुख की फिल्मों को सफलता की गारंटी माना जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। पिछले कुछ सालों में तीनों खानों की फ़िल्में बुरी तरह पिटी हैं। आमिर, सलमान और शाहरुख ने वैसी ही सफलता हांसिल की, जैसी कभी राज कपूर, दिलीप कुमार और देवआनंद की त्रिमूर्ति ने की थी। ये तीनों खान पुराने कलाकारों जैसी कालजयी फिल्में तो नहीं दे पाए, लेकिन सफल फिल्मों के जरिए अपने दबदबे को जरूर बनाए रखा। इनकी फ़िल्में तो आई, लेकिन वो बॉक्सऑफिस पर कोई कमाल नहीं कर पाई, जितनी की उम्मीद की गई थी।
    इन तीनों खानों ने तीन दशकों से बॉलीवुड पर कब्ज़ा जमा रखा है। लेकिन, अब लगने लगा है कि ये दर्शकों के दिलों-दिमाग से उतरने लगे हैं। इसका कारण रणवीर सिंह, आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव और विक्की कौशल जैसे नए कलाकारों का उभरना है। दूसरा कारण डिजिटल प्लेटफार्म के प्रति दर्शकों की रूचि बढ़ना है। आज के युवा दर्शक मनोरंजन का मतलब ज्यादा ही अच्छी तरह समझते हैं। उन्हें मनोरंजन का मौलिक स्वरुप पसंद आता है, न कि बनावटीपन! इन दर्शकों को कुछ नया और अलग चाहिए जो आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव जैसे कलाकारों से उन्हें मिल रहा है।
  फिल्म इंडस्ट्री के लिए बीता साल (2018) खास रहा है। इस साल कम बजट में नए कॉन्सेप्ट वाली फिल्मों को पसंद किया गया। इससे ये भी साफ़ हो गया कि समय के साथ-साथ दर्शकों की पसंद भी तेजी से बदल रही है। ये साल आयुष्मान खुराना, विक्की कौशल और राजकुमार राव के नाम रहा और ये तीनों बॉलीवुड पर बरसों से ख़म ठोंककर बैठे तीनों खान्स पर भी भारी पड़े। खान्स की तिकड़ी को भी अब अच्छी कहानी, बड़े निर्देशक और भव्य सेटअप की जरूरत पड़ने लगी है। अब ये अपने स्टारडम के बूते पर हल्की फिल्म को हिट कराने का कमाल नहीं कर पाते! 
  सलमान खान की ट्यूबलाइट, रेस-3 का फ्लॉप होना उनके लिए खतरे की घंटी है कि अब उन्हें खुद की ब्रांड वेल्यू को समझना चाहिए! कहानी अच्छी होगी, तभी फ़िल्में चलेंगी! एक दौर ऐसा था, जब सलमान खान का किसी फिल्म में होना ही सफलता की गारंटी था! लेकिन, अब ऐसा नहीं रहा। ईद और सलमान की सफलता वाला मिथक भी टूट गया। सलमान की पिछली पांच में से दो फ़िल्में फ्लॉप रही। शाहरुख़ खान की फैन, हैरी मेट सेजल और हाल ही में 'ज़ीरो' का धराशाई होना उनके स्टारडम के ध्वस्त होने का इशारा है। तीनों खानों में शाहरुख खान का प्रदर्शन सबसे कमजोर हो गया है और वे इस तिकड़ी के सबसे कमजोर सितारे हैं।
  बॉलीवुड में आमिर खान को मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहा जाता है। वे सोच-समझकर फिल्में करते हैं! लेकिन, 'ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान' का जो हश्र हुआ, उसने इस भरोसे को तोड़ दिया। ये निहायत बेतुकी फिल्म रही! लगातार हिट फिल्म दे रहे आमिर के लिए 'ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान' करारा झटका है। आमिर की पिछली पांच में से दो फ़िल्में फ्लॉप रही! लेकिन, तीन फिल्मों की ऐतिहासिक सफलता से उनका पलड़ा शाहरुख और सलमान से आज भी भारी है। इन तीन खानों के बाद दर्शकों की पसंद में आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव और विक्की कौशल के अलावा रणवीर सिंह और वरुण धवन का भी दबदबा बढ़ रहा है। रणबीर कपूर के साथ रणवीर सिंह भी हिट फिल्म दे चुके हैं। 'अक्टोबर' और 'सुई-धागा' जैसी फिल्मों से वरुण धवन तेजी से उभरे हैं।
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