Wednesday, November 25, 2015

छोटी फ़िल्मों के बड़े असर!


- हेमंत पाल 
   आजकल फिल्मों के 'अच्छे' होने को उनके बड़े बजट से आँका जाता है। जितना बड़ा प्रोडक्शन हाउस, जितना बड़ा निर्माता उतनी ही बड़ी फिल्म! 'मुगले आजम' से शुरू हुआ 'बड़ी' फिल्मों का दौर आज भी जारी है! करन जौहर, यशराज फिल्म्स, संजय लीला भंसाली और शाहरुख़ खान का रेड चिली प्रोडक्शन हॉउस ऐसे ही कुछ नाम हैं, जो बड़े बजट वाली 'बड़ी' फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं! आशय यह नहीं कि भारी भरकम बजट से बनने वाली फ़िल्में सफल हो ही जाती हैं! बड़े सितारों और महंगे सेटों वाली फिल्मों के बीच में कुछ ऐसी फिल्में भी आती हैं, जो दर्शकों पर खासा असर छोड़ती हैं और कमाई भी करने में पीछे नहीं रहती!
  याद कीजिए लंच बॉक्स, पानसिंह तोमर, शिप ऑफ़ थीसिस, गैंग ऑफ़ वासेपुर कुछ ऐसी ही कुछ फ़िल्में हैं, जिन्होंने थिएटर से बाहर निकलते दर्शकों को कुछ सोचने पर मजबूर किया! करण जौहर का धर्मा प्रोडक्शन बहुत बड़ा बैनर है! इस बैनर ने दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता है, अग्निपथ (रीमेक), स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर और ये जवानी है दीवानी जैसी बड़े बजट की फार्मूला फिल्में बनाई है! लेकिन, इसी प्रोडक्शन हॉउस ने 'लंच बॉक्स' जैसी छोटी फिल्म भी बनाई! इसके अलावा विक्की डोनर, फरारी की सवारी, शिरीन फरहाद की तो निकल पड़ी और 'कहानी' ऐसी ही छोटी फ़िल्में हैं जिन्होंने बड़ी-बड़ी फिल्मों को पानी पिला दिया! ये कम बजट की ऐसी फ़िल्में थी, जिनमें न तो बड़े सितारे थे और न हो महंगे सेट! फिर भी ये फ़िल्में चली और बजट से कई गुना ज्यादा कमाई भी की! इन फिल्मों के निर्माण में यू-टीवी, वॉयकॉम, पीवीआर पिक्चर्स और रिलायंस जैसे प्रोडक्शन हाउस और स्टूडियोज़ ने पैसा लगाया या डिस्ट्रीब्यूट किया!
   इस तरह की फ़िल्में हर दौर में बनती रही है। 80 के दशक में 'जाने भी दो यारो' जैसी कम बजट की कई फ़िल्में बनी और अच्छी चली! पेस्टनजी, मिर्च मसाला, सलाम बॉम्बे और चश्मे बद्दूर जैसी कई फ़िल्में बनी! ये आर्ट नहीं, ठेठ फार्मूला लेकिन अर्थपूर्ण फ़िल्में थी, जिन्होंने दर्शकों का जमकर मनोरंजन किया! पिछले कुछ सालों में मेट्रो शहरों में कई मल्टीप्लेक्स थिएटर बने और इनमे चलने वाली फिल्मों का एक नया दर्शक वर्ग तैयार हुआ। नया दर्शक वर्ग मतलब महँगी कारों से आने वाले लोग, सीमित और गद्देदार सीटें, हमेशा कोल्ड्रिंक पीते और पोप कॉर्न चबाते दर्शक! इन दर्शकों को सस्ती टिकट वाली बिना सितारों वाली फ़िल्में कभी रास नहीं आती!  
  बड़े और छोटे बजट वाली फिल्मों के बीच एक अघोषित जंग हमेशा चलती रहती है! छोटे बजट वाली फिल्मों को तो किसी बड़ी फिल्म से डर नहीं लगता! पर, महँगी फिल्मे बनाने वाले निर्माता हमेशा इस बात का ध्यान रखते हैं कि जब उनकी फिल्म रिलीज हो रही हो तो, दर्शक बांटने वाली कोई भी फिल्म मुकाबले में न खड़ी हो! क्योँकि, फिल्म का बजट जितना बड़ा होगा, उसका फ़ायदा भी उतनी देर से निकलेगा और नुकसान का अंदेशा भी ज्यादा होगा! 'लंच बॉक्स' जैसी छोटे बजट की फिल्मों में अपनी अदाकारी दिखाने वाले इरफ़ान खान भी मानते हैं कि 90 और 2000 के दशक की शुरुआत में जो दौर था, आज उससे कहीं बेहतर वक़्त है। मसाला फ़िल्मों का सौ करोड़ रुपए कमाना भी छोटी फ़िल्मों के लिए अच्छा है! क्योँकि, ये लो-बजट फ़िल्में बड़े बजट की फिल्मों से कॉम्पटीशन नहीं करती, बल्कि उनकी मदद करती हैं! इनकी वजह से ही छोटी फ़िल्में बॉलीवुड में सरवाइव कर पाएंगी!
  साल दो साल में एक शुक्रवार ऐसा भी आया, जब सिर्फ छोटी और कम बजट की फ़िल्में ही रिलीज हुई! पिछले साल का 26 सितंबर ऐसा ही दिन था, जब कोई बड़ी फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई! इसका फ़ायदा उठाते हुए उस शुक्रवार 8 कम बजट की फ़िल्में रिलीज़ हुई थी! ये फ़िल्मे थीं 3-एएम, बलविंदर सिंह फेमस हो गया, बियांड : द थर्ड काइंड, चारफुटिया छोकरे, डियर वर्सेस बर, देय सी कट्टे, मैनू एक लड़की चाहिए और मुंबई-देहली-मुंबई। इनमें चारफुटिया छोकरे, बलविंदर सिंह फेमस हो गया, देसी कट्टे और मुंबई-देहली-मुंबई ठीकठाक फ़िल्में रहीं। चारफुटिया छोकरे में सोहा अली ख़ान लीड रोल में थीं! जबकि, बलविंदर सिंह फेमस हो गया में मिक्का सिंह और शान थे। वहीं देसी कट्टे में सुनील शेट्टी, जय भानुशाली और अक्षय कपूर लीड रोल्स में दिखाई दिए! 'मुंबई-देहली-मुंबई' में शिव पंडित और पिया बाजपेयी ने लीड रोल किए! 60, 70, 80 और 100 करोड़ में बनने वाली फिल्मों के दौर के बाद अब लगता है 5, 10 और 15 करोड़ में बनने वाली फ़िल्में आएँगी! इसकी बानगी भी है! 5 करोड़ में बनी 'विक्की डोनर' ने 46 करोड़ कमाए! 10 करोड़ की 'फरारी की सवारी' ने करीब 15 करोड़  कारोबार किया! जबकि, 15 करोड़ में ही बनी 'शंघाई' ने 19 करोड़ कमाए! विद्या बालन जैसी कलाकार को लेकर सिर्फ 8 करोड़ रुपए के बजट से बनी 'कहानी' ने तो 104 करोड़ रुपए कमाकर रिकॉर्ड बनाया! इसी तरह 8 करोड़ की 'पानसिंह तोमर  का आंकड़ा रहा 30.36 करोड़ रुपए। फिर भी सलमान, शाहरुख़ और आमिर खान को तो 100 करोड़ वाले क्लब में शामिल होने का ही शौक है! हो भी क्यों नहीं? जब निर्माता किसी सितारे के साथ फिल्म बनाने के लिए 100 करोड़ का जुआं खेलेगा तो 200 करोड़ की उम्मीद तो करेगा ही!
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… ये है खामोश आदिवासियों का सटीक फैसला!

रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव 

- हेमंत पाल 
  जब से रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव की हलचल शुरू हुई, तभी से माहौल में एक अजीब सा असमंजस और सन्नाटा था! चुनावी शोर के बीच में भी आदिवासी मतदाता अपने दिल की बात नहीं बता रहा था! उसकी इसी खामोशी से भाजपा परेशान थी! अंत तक पार्टी मतदाता के मन की थाह लेने की कोशिश करती रही, पर समझ नहीं सकी! कांग्रेस ने इस ख़ामोशी की आवाज को सुन लिया था! तभी उसे जीत का भरोसा सा हो गया था! भाजपा इस आदिवासी इलाके के चुनाव को जीतकर देश में ये संदेश देना चाहती थी, कि बिहार हारने के बाद भी उसकी जमीनी पकड़ बरक़रार है! लेकिन, ये उसका भ्रम ही निकला! सत्ता और संगठन की सारी ताकत झोंकने के बाद भी भाजपा अपनी हार नहीं बचा सकी! ख़ास बात ये रही कि भाजपा ने यहाँ अपनी सीट खोई है। जबकि, कांग्रेस ने इस जीत ये साबित कर दिया बिहार जैसा अंडर करंट पूरे देश में है! नरेंद्र मोदी की जिस आँधी ने भाजपा को शिखर पर पहुंचा दिया था, वो जादू अब उतर गया! दिल्ली के बाद बिहार और अब रतलाम-झाबुआ में हार इसी का संकेत ही तो है।
   इस संसदीय क्षेत्र में दो अलग-अलग मूड वाले मतदाता हैं! झाबुआ और आलीराजपुर पूरी तरह आदिवासी मतदाताओं वाला इलाका हैं। यहाँ 85% मतदाता आदिवासी हैं! जबकि, रतलाम जिले की तीनों सीटें अमूमन शहरी है। इनमें रतलाम (शहर) को छोड़कर बाकी कि सभी 7 सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की है। रतलाम (शहर) में भी जीत का अंतर करीब 20 हज़ार कम हो गया! 2014 के लोकसभा चुनाव में यहाँ भाजपा को करीब 55 हज़ार की लीड मिली थी! नगर निगम चुनाव में ये बढ़त घटकर 24 हज़ार हो गई और अब ये उससे भी नीचे आ गई! झाबुआ और आलीराजपुर की आदिवासी बहुल सभी पाँचों विधानसभा क्षेत्रों से कांतिलाल भूरिया को बढ़त मिली! इसका सीधा सा अर्थ ये निकलता दिखाई दे रहा है कि आदिवासियों ने भाजपा को सिरे नकार दिया! आलीराजपुर ऐसा इलाका है जहाँ कांग्रेस को बढ़त मिलने की उम्मीद नहीं थी, पर वहाँ भी कांग्रेस ने 5 हज़ार से ज्यादा वोटो से भाजपा को पीछे छोड़ा!  
  कांग्रेस के लिए ये जीत आसान नहीं थी! क्योंकि, भाजपा ने सरकार और संगठन को चुनाव में पूरी तरह झौंक दिया था! इसके बावजूद नतीजे उसके पक्ष में नहीं आए! अब इस हार को कुतर्कों के साथ स्वीकारते हुए भाजपा नेता कई तर्क दे सकते हैं! पर वे शायद ये नहीं कहेंगे कि हमने आयातित बड़े नेताओं को चुनाव के मोर्चे पर लगाकर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया! पेटलावद हादसे के प्रभावितों पर मुआवजे का मरहम लगाने की कोशिश की! चुनाव क्षेत्र में कथा और घट-स्थापना जैसे धार्मिक आयोजन किए! पेटलावद हादसे के आरोपी राजेंद्र कांसवा को अब तक पकड़ा नहीं जा सका! हम जीत के अतिआत्मविश्वास में हार की कल्पना भी नहीं कर रहे थे! यदि ये सब नहीं किया जाता तो भाजपा की इतनी बुरी हार नहीं होती!
  ये एक तरह से भाजपा के 'इलेक्शन मैनेजमेंट' की भी हार है! किसी एक सीट को जीतने के लिए जिस तरह से 'संसाधन' झोंके गए थे, मतदाता उसे पचा नहीं सका! ये भी कहा जा सकता है कि ये चुनाव जीतने के तात्कालिक उपायों की हार नहीं, बल्कि भाजपा की उस विचारधारा की हार है, जिसके झाँसे में पिछली बार देशभर का मतदाता आ गया था! अब वो उससे मुक्त होने की कोशिश कर रहा है! भाजपा की हार का ये कारण भी माना जा रहा है कि कांतिलाल भूरिया को उसने कमजोर उम्मीदवार मानते हुए, सहानुभूति की खातिर निर्मला भूरिया पर दांव लगाया! लेकिन, सहानुभूति का समीकरण फेल हो गया। क्योंकि, आदिवासी इलाके की राजनीति में सहानुभूति के लिए कोई जगह नहीं होती! फिर यहाँ की कहानी भी अलग है! यहाँ की राजनीतिक जागरूकता को चुनावी प्रपंचों से भरमाया नहीं जा सकता! कांग्रेस ने दशकों तक इस क्षेत्र में अपनी पकड़ कायम रखी है! खुद कांतिलाल भूरिया करीब दो दशक से आदिवासी राजनीति कर रहे हैं! इस चुनाव के नतीजों से साबित भी हो गया कि स्थानीय राजनीति में उनकी धाक अभी कम नहीं हुई! कांग्रेस की जीत का आंकड़ा भले ही 88 हज़ार हो, पर इस जीत  कांग्रेस ने एक लाख से ज्यादा वोटों का गड्ढा भी भरा है! ये सिर्फ एक सीट की हार नहीं, भाजपा के लिए खतरे की घंटी है! यदि किसी मुगालते में न रहते हुए, उसे सुन लिया जाए तो ये पार्टी के लिए अच्छा है!
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Friday, November 20, 2015

झाबुआ-रतलाम संसदीय उपचुनाव : मुकाबला जमीनी पकड़ और कमजोर सहानुभूति में!


- हेमंत पाल 

लोकसभा उपचुनाव के लिए झाबुआ-रतलाम रणक्षेत्र में सेनाएं सजने लगी है! एक पार्टी का सेनापति लगभग तय है! दूसरी सेना ने अस्त्र-शस्त्र जमा कर लिए हैं, पर जंग किसकी अगुवाई में लड़ी जाएगी, अभी तय नहीं! दोनों ही एक-दूसरे की ताकत भाँपने की कशिश कर रहे हैं! अंदर ही अंदर रणनीति बन रही है। दोनों तरफ से जंग फतह करने के दावे किए जा रहे हैं! देखना है कि किसका दावा ज्यादा मजबूत है! कांग्रेस के मुकाबले भाजपा के लिए ये चुनाव नाक का सवाल ज्यादा है। क्योंकि, जिस नरेंद्र मोदी के 'अच्छे दिनों' के नारे की आँधी ने भाजपा के कई उम्मीदवारों की नैया पार लगा दी थी, अब वो आँधी ठंडी पड़ चुकी है। दिसंबर से पहले होने वाला ये उपचुनाव भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट की तरह होगा। ये भी देखना दिलचस्प होगा कि दिलीपसिंह भूरिया कि सहानुभूति की लहर अभी जीवित है या वो भी ठंडी हो गई! 
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  आदिवासी इलाके की राजनीति कि अपनी अलग ही कहानी है! बरसों तक यहाँ कांग्रेस ने अपना ख़म ठोंककर रखा! जब पूरे देश में कांग्रेस के तम्बू उखड़ रहे थे, तब भी झाबुआ में 'पंजा' मजबूत था! पर, अब वो माहौल नहीं है! लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार जीत का झंडा फहराया! सांसद दिलीपसिंह भूरिया की अचानक मौत ने फिर उपचुनाव के हालात निर्मित कर दिए! अभी तय नहीं है कि राजनीति कि ये रस्साकशी कब होगी, पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ने हर मोर्चे की ताकत का जायजा लेना शुरू कर दिया! 
   झाबुआ-रतलाम लोकसभा क्षेत्र उन नौ सीटों में शामिल है जहां कांग्रेस पिछला चुनाव डेढ़ लाख से कम वोटों से हारी थी। मोदी लहर के कारण कांतिलाल भूरिया दिवंगत भाजपा उम्मीदवार दिलीप सिंह भूरिया से 1 लाख 8 हजार 447 मतों से पराजित हुए थे। लेकिन, और कोई दमदार उम्मीदवार न होने से कांग्रेस की और से कांतिलाल भूरिया का नाम उम्मीदवारी के लिए लगभग फायनल है! पर भाजपा ने अब तक घोषित नहीं किया है कि उसका उम्मीदवार कौन होगा! फिर भी समझा जा रहा है कि स्व. दिलीपसिंह भूरिया की बेटी निर्मल भूरिया उम्मीदवारी की लिस्ट में सबसे ऊपर है! कांग्रेस का संभावित उम्मीदवार भील आदिवासी समाज का होगा! इसलिए भाजपा कोई भी भील जनजाति का ही उम्मीदवार मैदान में उतारना होगा! सोशल इंजीनियरिंग के इस फॉर्मूले में भी निर्मला भूरिया फिट बैठती है।
   जहाँ तक दोनों पार्टियों और उनके उम्मीदवारों का मामला है, उनकी अपनी पहचान है, पार्टी की छवि का भी चुनाव में अपना महत्व है। कांतिलाल भूरिया करीब दो दशक तक प्रदेश में आदिवासी राजनीति कि धुरी रहे हैं! लम्बे समय तक उनकी तूती बोलती रही! स्थानीय राजनीति में आज भी उनकी धाक कम नहीं हुई! जबकि, दिलीप सिंह भूरिया ने 5 बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता! इस बार वे भाजपा के झंडे तले चुनाव लड़े और जीते थे! झाबुआ-रतलाम संसदीय सीट पर दिलीपसिंह भूरिया10वीं बार और कांतिलाल भूरिया 5वीं बार मैदान में थे। दिलीपसिंह ने 1977 से 1996 तक लगातार छह बार कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ा और 1980 से 1996 तक पांच बार सांसद चुने गए। यदि दोनों भूरिया की तुलना कि जाए तो जमीनी पकड़ के मामले में कांतिलाल हमेशा ज्यादा मजबूत रहे! राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता के कारण दिलीपसिंह का पलड़ा जमीनी पकड़ को लेकर कमजोर ही रहा! अब, जबकि वे नहीं हैं, भाजपा के सामने फिर वही सवाल खड़ा हो गया है कि भाजपा के टिकट पर किसे चुनाव लड़ाया जाए? 
  जहाँ तक झाबुआ की राजनीति का इशारा है, दिलीपसिंह भूरिया की बेटी निर्मला भूरिया को टिकट दिए जाने की संभावना ज्यादा है! वे पेटलावद से विधायक भी हैं! शुरू में लगा था कि शायद पार्टी उन्हें मौका न दे, पर सहानुभूति वोटों की बात है, तो निर्मला सबसे सशक्त उम्मीदवार हैं! लेकिन, कहा ये भी जा रहा है कि निर्मला को टिकट देने से पेटलावद विधानसभा सीट पर फिर उपचुनाव की नौबत आ सकती है! पहले इशारा ये भी था कि भाजपा ने राजनीतिक जोड़-बाकी लगाकर झाबुआ-रतलाम के लिए भिंड और होशंगाबाद वाले फार्मूले का सुझाव दिया। तर्क यह दिया गया कि आदिवासी इलाके में कांग्रेस के पास जो सबसे दमदार नेता हो, उसे ही भाजपा में ले आओ! ये बात उड़कर सामने भी आई, पर शायद बात बनी नहीं!  
  कांतिलाल भूरिया ने कहा कि इस तरह कि अफवाह उड़ाकर भाजपा चुनाव से पहले उन्हें डैमेज करना चाहती है। भूरिया ने खुद के भाजपा में शामिल होने की बात को सिरे से खारिज कर दिया। कहा कि मेरे डीएनए में सिर्फ कांग्रेस है। उन्होंने इससे भी एक कदम आगे बढ़कर भाजपा को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और कहा कि दिलीपसिंह भूरिया की मौत स्वाभाविक नहीं थी। उनकी हत्या हुई है, इसकी सीबीआई से जांच कराई जाना चाहिए। 
   इस संसदीय क्षेत्र में झाबुआ के 5 और रतलाम के 3 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इसमें ताजा रुझान के मुताबिक थांदला, झाबुआ और सैलाना ही वो सीटें हैं, जहाँ कांग्रेस पकड़ के मामले में थोड़ा आगे है। आलीराजपुर, पेटलावद, जोबट, रतलाम लोकल और रतलाम ग्रामीण में फिलहाल भाजपा मजबूत है। पिछले विधासभा चुनाव में पेटलावद पर तो निर्मला भूरिया का कब्जा बरक़रार ही रहा! वे सबसे अधिक 18,668 वोटों से जीतीं। झाबुआ सीट से पवेसिंह पारगी ने 18,375 वोटों से अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया! आलीराजपुर में नागरसिंह चौहान की जीत 11,335 वोटों की रही! जबकि, जोबट से माधोसिंह डाबर 9,548 तथा थांदला से कलसिंह भावर ने जीत दर्ज की थी। 
  आलीराजपुर में भाजपा विधायक नागर सिंह के मुकाबले का कांग्रेस के पास कोई नेता नहीं है। इस कारण यहाँ लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को बढ़त मिलना तय है। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले जरूर नागर सिंह थोड़ा कमजोर लग रहे थे! लेकिन, नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस की जीत ने उन्हें सबक दिया और इसके बाद आलीराजपुर में भाजपा की जड़ें और मजबूत हो गई! लोकसभा उपचुनाव में यहाँ कांग्रेस को ज्यादा मेहनत करना पड सकती है। 
  आलीराजपुर जिले की दूसरी विधानसभा सीट जोबट में भी भाजपा को चुनौती देना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा! यहाँ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बागी उम्मीदवार को मात देकर माधोसिंह डावर ने कमल खिलाया था। 2008 के विधानसभा चुनाव में जोबट में कांग्रेस प्रत्याशी सुलोचना रावत से हारने वाले माधोसिंह डावर को जनता ने फिर से मौका दिया, आज डावर के सामने कांग्रेस बहुत कमजोर है। 
  यदि निर्मला भूरिया को भाजपा लोकसभा उपचुनाव का उम्मीदवार बनाती है, तो पेटलावद क्षेत्र में भाजपा ताकतवर होगी! क्योंकि, निर्मला भूरिया यहीं से विधायक है। झाबुआ में भाजपा ने सबसे पहले 2003 में पेटलावद सीट जीतकर ही अपना झंडा गाड़ा था। झाबुआ जिले में भाजपा का खाता जैसे भी खुला हो, पर माना यही जाता है कि इसके पीछे दिलीपसिंह भूरिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही! वे यदि कांग्रेस में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी रहे कांतिलाल भूरिया के कारण पार्टी नहीं छोड़ते और निर्मला को पेटलावद से भाजपा का उम्मीदवार नहीं बनाते, तो शायद भाजपा का खाता नहीं खुलता! 
   थांदला में कांग्रेस पहले भी बेहतर थी और आज भी उसकी स्थिति ठीक कही जा सकती है। यहाँ से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते कलसिंह भाबर विधायक हैं। उन्होंने भाजपा के बागी की तरह विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते! वे भले ही निर्दलीय माने जाते हों, पर भाजपा उन्हें अपना हो मानती आई है। यदि यहाँ कांग्रेस को बढ़त मिलती है तो आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए! 
  झाबुआ विधानसभा सीट भी कांग्रेस के लिए उम्मीदों से भरी है। यदि कांग्रेस मतदाताओं का मानस बदलने में कामयाब हुई, तो इस सीट से कांग्रेस को बढ़त मिलने के आसार है। विधानसभा चुनाव में कांतिलाल भूरिया की भतीजी कलावती भूरिया ने जेवियर मेड़ा को निपटाने के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। कलावती अपनी कोशिशों में सफल भी हुई! लेकिन, इस सीट पर पूर्व विधायक जेवियर मेड़ा को निपटाने के बजाए यदि कलावती चुनाव लडऩे से रोक लिया जाता, तो झाबुआ के नतीजे भाजपा के लिए चिंताजनक हो सकते थे। 
   रतलाम जिले की तीन विधानसभा सीटें इस संसदीय क्षेत्र में आती हैं रतलाम शहर, रतलाम ग्रामीण और सैलाना! इसमें सैलाना ही वो इलाका है जहाँ कांग्रेस भाजपा से आगे रही थी! रतलाम संसदीय सीट में सैलाना विधानसभा से भाजपा को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। यहां भाजपा के वोट बैंक में अप्रत्याशित गिरावट आई। प्रभुदयाल गेहलोत के दबदबे के कारण यहाँ भाजपा हमेशा ही कमजोर रही है।   
   रतलाम शहर कभी कांग्रेस के वोटों की फसल का गोदाम रहा है, पर अब इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का दबदबा है। कांतिलाल भूरिया के लिए नुकसान का एक बड़ा कारण ये भी है कि कभी उनके ख़ास सिपहसालार रहे राजेश शर्मा अब भाजपा के पाले में चले गए! इसके अलावा रतलाम में कभी प्रभावशाली रहे कांग्रेस के नेता खुर्शीद अनवर और मोतीलाल दवे परिवार भी कांतिलाल भूरिया के लिए मददगार होंगे, इसमें शक है। नगर निगम में भी 69 पार्षदों में कांग्रेस के 13 ही पार्षद हैं, उनमे भी 7 या 8 ही कांतिलाल भूरिया का साथ देंगे! कांग्रेस को यहां तभी फ़ायदा हो सकता है जब वो भाजपा की फूट में सेंध लगा ले! रतलाम ग्रामीण में भी भाजपा और कांग्रेस का मुकाबला बराबरी का नहीं कहा जा सकता! यहाँ भी भाजपा थोड़ा भारी है।   
  राजनीति के जमीनी आकलन और कागजों पर भाजपा भले ही ताकतवर नजर आ रही हो, पर आदिवासी मतदाता के मानस को भांप पाना आसान नहीं है। दशकों तक कांग्रेस की परंपरागत सीट रही झाबुआ आज कांग्रेस की झोली में नहीं हो, पर पांसा पलटते में देर नहीं लगती! संसदीय क्षेत्र की आठों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस और भाजपा में हार-जीत का अंतर भी इतना बड़ा भी नहीं था, कि उसे पाटा नहीं जा सकता! कांग्रेस यदि वोटर्स की मानसिकता बदलने में कामयाब रही तो इस लोकसभा उपचुनाव के नतीजे चौंका भी सकते हैं। 


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Sunday, November 15, 2015

दर्शक को जानदार कहानी चाहिए, शानदार सेट नहीं!

- हेमंत पाल 

    किसी भी फिल्म की सफलता का फार्मूला क्या है, ये किसी को नहीं पता! दर्शकों को फिल्म की कहानी पसंद आएगी, कलाकारों की एक्टिंग को सराहा जाएगा, गी
त और संगीत फिल्म को हिट कराएँगे या फिर भव्य सेट और फिल्म का बड़ा बजट हिट कराने का फार्मूला बनेगा? ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब अभी तक कोई खोज नहीं पाया है। लेकिन, ये तय है कि कहानी, एक्टिंग या गीत-संगीत से तो फिल्म की सफलता की उम्मीद की जा सकती है, पर सेट की भव्यता और फिल्म का बड़ा बजट कभी किसी फिल्म के हिट होने का कारण नहीं बन सकता! इस बात को सलमान खान की नई फिल्म 'प्रेम रतन धन पायो' के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। राजश्री प्रोडक्शन की इस फिल्म की संभावित सफलता में इसके भव्य सेट और करोड़ों के बजट को आकलित किया गया और हाइप क्रिएट किया गया! पर, फिल्म देखकर निकलने वाले दर्शकों के चेहरे पर फिल्म से संतुष्ट होने जैसे भाव नहीं दिखे! ये फिल्म पैसे कमाने के नजरिए से भले ही सफल कही जाए! लेकिन, राजश्री की फिल्मों से दर्शक जो उम्मीद करते हैं, वो कुछ भी दर्शकों को इस फिल्म में शायद नजर नहीं आया!
  थोड़ा पलटकर देखा जाए, तो बड़े बजट और भव्य सेट वाली फिल्मों की सफलता हमेशा ही संदिग्ध रहती है। संजय लीला भंसाली की फिल्म 'देवदास' का बजट तब करीब पचास करोड़ आँका गया था। इसमें भव्‍य सेट, माधुरी दीक्षित का लाखों का लहंगा और गहने थे, जिसने फिल्‍म को भव्‍यता प्रदान की! इस फिल्‍म की कामयाबी का कारण शानदार अभिनय था, न कि भव्‍य सेट, महंगे गहने और कपडे! क्योंकि, फिल्‍म का बडा बजट और भव्‍यता ही किसी फिल्‍म की सफलता का कारण बने ये संभव नहीं है! 
   'देवदास' के कमर्शियली हिट होने के बाद तो बड़े बजट की फिल्‍मों का चलन शुरू हो गया। लेकिन, भ्रम जल्दी दूर हो गया! अनिल शर्मा की सौ करोड़ कि फिल्‍म 'द हीरो' औंधे मुंह गिरी! व्‍यवसाय के नाम पर फिल्‍म फ्लॉप रही। संजय लीला भंसाली की 'देवदास' ने रिकॉर्ड तोड़े, पर भंसाली की ही अगली बड़े बजट की फिल्‍म 'सांवरियां' ने बुरी तरह फ्लॉप हो गई! इसके बाद बड़े बजट की फिल्‍मों के इस हश्र से फिल्मकारों को समझ में आ गया कि किसी भी फिल्‍म के हिट होने का कारण सेट की भव्‍यता और बड़ा बजट नहीं होता! इसके लिए जरुरी है जानदार कहानी, शानदार एक्टिंग और सुमधुर गीत-संगीत! ये फैक्टर मिलकर ही फिल्‍म की सफलता की कहानी रचते हैं।
   इसलिए कि आज के दर्शकों के लिए फिल्मों की भव्यता ज्यादा मायने नहीं रखती! कम और औसत बजट की फिल्मों को दर्शक मिलने का कारण भी यही है।अब ये फिल्में अपनी लागत से कई गुना ज्यादा बिजनेस करने में भी समर्थ हैं। स्पष्ट है कि आज के दर्शक फिल्मों में भव्य सेट  लकदक नहीं, दमदार कहानी देखना चाहते हैं। आमिर खान की पत्नी किरण राव की 5 करोड़ में बनी फिल्म 'धोबी घाट' ने लागत का 3 गुना बिजनेस किया! यही स्थिति 'तनु वेड्स मनु' और इसकी सीक्वल 'तनु वेड़्स मनु रिटर्न्स' की रही! राजकुमार गुप्ता की 9 करोड़ में बनी 'नो वन किल्ड जेसिका' ने 28 करोड़ रुपये की कमाई की। उड़ान, पीपली लाइव और लंच बॉक्स' ने भी अपनी लागत से कहीं ज्यादा कमाई करके निर्माता को मालामाल कर दिया!
  कम बजट की इन फिल्मों की सफलता बताती है कि आज के दर्शक मनोरंजन के साथ गुणवत्ता भी देखते हैं। यही कारण है कि अनजान चेहरों वाली पर सशक्त कहानी और कसी हुई पटकथा वाली कई कम बजट की फिल्मों को सराहना मिलती है, पर बेंग-बेंग, जोधा अकबर, वीर जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो पाती! क्योंकि, दर्शक आज बड़े बजट की बेकार फिल्मों को देखने की बजाए कम बजट की अच्छी फिल्में देखकर ज्यादा खुश होते हैं। सूरज बड़जात्या ने 'प्रेम रतन धन पाया' की सफलता के लिए जबरदस्त हाइप बनाया था! हफ्तेभर पहले एडवांस बुकिंग शुरू कर दी, प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी, आज के सबसे चमकते सितारे सलमान खान को डबल रोल में फिल्म में उतारा फिर भी क्या वे उम्मीद के मुताबिक फिल्म बनाकर दर्शकों को ख़ुशी दे पाए? शायद नहीं! फिल्म देखकर थिएटर से बाहर आता दर्शक सबसे अच्छा समीक्षक होता है। उसके कमेंट ही फिल्म का सही आकलन होते हैं! ' प्रेम रतन धन पायो' देखकर निकले दर्शकों ने भी फिल्म के प्रति अच्छी भावना व्यक्त नहीं की! भव्य सेट और ढेर सारे कलाकारों भीड़  बावजूद वो कहानी गुम थी, जिसकी तलाश में दर्शक थिएटर तक गया था!   

Saturday, November 14, 2015

शाब्दिक हिंसा से लहूलुहान होती राजनीति!


इन दिनों पूरे देश में शाब्दिक हिंसा का दौर है! जिसे, जब मौका मिलता है शब्दों के तीर चलाने में देरी नहीं करता! इस काम में सबसे आगे हैं देश के निरंकुश नेता! प्रतिद्वंदी नेताओं पर बयानबाजी करते-करते ये नेता भूल जाते हैं कि उन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना है! अभिनेता शाहरुख़ खान के असहिष्णुता वाले बयान पर इतना उबाल आया कि कई नेता उसके पीछे पड़ गए! इधर, मध्यप्रदेश में भी कई नेता जुबानी बवासीर से पीड़ित होते जा रहे हैं! कभी ये बयान राजनीतिक होते हैं, कभी कुछ और! बाद में खंडन-मंडन या बयान वापसी की बात  जाती है! क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जुबान खोलने से पहले नेता दो पल सोच लें कि वे क्या बोलें और क्या नहीं?
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  - हेमंत पाल 
   शब्दों से किसी पर वार करने की मंशा भी हिंसा कहलाती है और ऐसी किसी इच्छा का न होना अहिंसा! अहिंसा का सीधा सा तात्पर्य शारीरिक हिंसा न करना! क्योंकि, यह स्पष्ट रूप में दिखाई देती है। लेकिन, ये भी सच है कि शरीर पर लगी चोट के निशान तो वक़्त के साथ धूमिल हो जाते हैं, पर वाचिक हिंसा सबसे ज्यादा आघात करती है! इस तरह की हिंसा सीधे दिल पर वार करती है। कहा जाता है कि वाणी किसी भी व्यक्ति के अंतर्मन को समझने का सबसे अच्छा माध्यम है। यानी जिसकी जैसी सोच होती है, वैसे ही उसके बोल होते हैं! ये बात जीवन के हर मोर्चे पर लागू होती है! निजी जीवन में भी, व्यवहार में भी और कर्म में भी! कुछ इसी तरह की शाब्दिक हिंसा आजकल मध्यप्रदेश के कुछ मंत्री और संगठन जुड़े लोग कर रहे हैं। प्रदेश की पशुपालन मंत्री कुसुम महदेले एक बच्चे को लात मारने के बाद 'राजनीतिक किरकिरी' का सामना कर रही हैं। शिवराज-सरकार में ऐसे कई मंत्री हैं, जो गाहे-बगाहे अपनी हरकतों या अटपटे बयानों के कारण विवादों में घिर जाते हैं।
  लोग जनप्रतिनिधियों से ये उम्मीद नहीं करते कि उनके मुँह से अनर्गल शब्द निकले! इसलिए कि जनप्रतिनिधियों को जनता खुद चुनती है, इसलिए लोग नहीं चाहते कि उनका कोई प्रतिनिधि उनसे ऐसा व्यवहार करे! कुसुम महदेले ने पन्ना में जो किया वो इसीलिए अक्षम्य हैं कि वे जनता द्वारा चुनी हुई प्रतिनिधि हैं, पर मंत्री होने के गुरुर में चूर होकर लात मारने जैसा कृत्य कर बैठी! आश्चर्य इस बात पर कि एक रूपए के लिए गिड़गिड़ाते बच्चे पर इस महिला मंत्री को दया नहीं आई! अपने अक्खड़ व्यवहार के लिए पहले भी कुसुम महदेले विवादों में रही हैं! कुछ दिनों से मंत्रियों की बयानबाजी पर अंकुश न होने से जब भी किसी मंत्री को मौका मिलता है, कुछ भी बोल देता है!  प्रदेश में सूखे और कर्ज की स्थिति से परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं! लेकिन, इस मामले संवेदना दिखाने बजाए कई मंत्रियों के बेतुके बयान सामने आ रहे हैं! किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर महदेले ने कहा था 'बेटे की मौत पर नहीं करते सुसाइड, फसल बर्बादी पर कैसे मर गए?' इस महिला मंत्री ने कुछ दिनों पहले किसानों से मुलाकात के दौरान कई बार अपने तीखे तेवर दिखाए थे। सोयाबीन की फसल बर्बाद होने पर उन्होंने किसानों को डांटते हुए कहा था कि 'उन्हें क्या किसी डॉक्टर ने कहा कि वो हर साल सोयाबीन की फसल बोएं और अपनी जमीन का कबाड़ा कर लें।
  ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने प्रदेश सरकार की शराब नीति का बचाव करते हुए दावा किया कि गुजरात में शराब पर पाबंदी के बावजूद वहाँ शराब के कस्टमर कई गुना बढ़ गए! गुजरात में बड़े-बड़े शराब किंग तैयार हो गए, जिनकी करोड़ों-अरबों की जायदाद है। गोपाल भार्गव सरकार के उस फैसले का बचाव कर रहे थे, जिसमें राज्य सरकार ने देसी शराब ठेकों पर अंग्रेजी शराब बेचने की मंजूरी दी है। इसी कोशिश में भार्गव अपनी ही पार्टी की दूसरी राज्य सरकार की विफलता पर भी इशारों-इशारों में उंगली उठा बैठे! देखा जाए तो ये सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी पर ही ऊँगली उठाई गई है। इससे पहले इसी मंत्री ने कहा था 'महात्मा गांधी मेरे सपने में आए थे! एफडीआई पर कांग्रेस के रवैये को लेकर वे रो रहे थे! जिन अंग्रेजों से गांधीजी ने लड़ाई लड़ी, पिछले दरवाजे से फिर वे देश में एफडीआई के जरिए प्रवेश कर रहे हैं। आज यदि गांधीजी जिंदा होते तो गोडसे उनकी हत्या नहीं करते, बल्कि वे ही अपनी कनपटी में गोली मारकर आत्महत्या कर लेते।' ये प्रतिद्वंदी पार्टी पर कैसी शाब्दिक हिंसा है? चीन की यात्रा से लौटकर भी भार्गव ने वहाँ के अनुभव भी ख़ास अंदाज में सुनाए और कहा कि चीन तो भारत से चीन 100 साल आगे निकल गया। भारत न लड़ सकता है और न सियाचिन वापस ले सकता है। किसी मंत्री से क्या इस तरह के बयान की उम्मीद की जाना चाहिए?
  विवादास्पद बयान देने में शिवराज-मंत्रिमंडल के मंत्रियों में सबसे आगे हैं गृह मंत्री बाबूलाल गौर! वो किसी विरोधी नेता या पार्टी पर तो ऊँगली नहीं उठाते पर जो बोलते हैं, वो मजाक जरूर बन जाता है! उन्होंने एक बार शराब पीना शान की बात बताया और कहा कि शराब पीना स्टेटस सिंबल है, इससे अपराध नहीं बढते! कहा कि जब कोई पीकर डगमगाता है, तब अपराध बढते हैं जब कोई समझकर पीता है तो उससे अपराध नहीं बढता! उन्होंने तो शराब पीने को लोगों का संवैधानिक अधिकार तक बताया! इसके पहले गौर ने कहा था कि बलात्कार एक सामाजिक अपराध है, जो पुरुष और महिला पर निर्भर करता है।' 
   बात यहीं तक नहीं! बाबूलाल गौर की एक कार्यक्रम के दौरान जुबान फिसली तो फिसलती चली गई। रूसी महिलाओं के साथ हुए मुलाकात का जिक्र उन्‍होंने कुछ इस अंदाज में किया कि कोई भी खुद को हंसने से रोक नहीं पाया! उन्होंने कहा कि एक बार कुछ रूसी महिलाओं ने उनसे पूछा कि वे बिना चेन और बेल्‍ट की मदद से धोती कैसे पहनते हैं? मैंने कहा कि मैं खोलकर कैसे दिखाऊं? इस तकनीक को सीखने के लिए आपको अकेले मुझसे मिलना होगा! रूसी यात्रा के अनुभव का जिक्र करते हुए गौर ने बताया कि रूस की औरतें काफी मोटी होती हैं। उन्‍होंने मुझे गले लगा लिया। वो मुझे चूमने लगीं। मैंने उनसे कहा कि अगर ये फोटो बीजेपी वाले देख लेंगे तो मुझे टिकट ही नहीं देंगे। उन्‍होंने बताया कि रूस में सम्मान देने का तरीका है, भारत में ऐसा होता तो हंगामा खड़ा हो जाता। अपने यहां अगर कोई ऐसे सम्‍मान करे तो जूते खा ले! यह उनकी परंपरा है। मुझे इस पर बहुत हैरानी हुई। एक बार उन्‍होंने कहा था कि महिलाओं को ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, जिससे कोई आकर्षित हो! वहीं, गौर साहब ने व्यापमं मामले में आरोपियों की लगातार हो रही मौतों के बारे में विवादित बयान दिया था कि आरोपियों की मौत सामान्य है, जो दुनिया में आता है उसे जाना ही है! 
  मौसम की मार और सराकर की बेरूखी से एक ओर किसान परेशान है, तो दूसरी ओर इस मसले पर राजनीति रूकने का नाम नहीं ले रही। अधिकांश मंत्री आत्महत्या पर नई थ्योरी दे रहे हैं! मंत्रियों के मुताबिक किसान खेती खराब होने की वजह से नहीं, बल्कि परिवारिक कारणों से मौत को गले लगा रहे हैं। वन मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार भी ऊल-जुलूल बयानबाजी में किसी से पीछे नहीं हैं। उन्होंने टाइगर की गिनती से जुड़े मीडिया के एक सवाल पर टका-सा जवाब देते हुए कहा था कि क्या टाइगरों को लाइन से खड़ा करके गिने! जैसे गणना होती है करते हैं। कोई प्रतिस्पर्धा तो है नहीं है! यह बयान उन्होंने अपने विभाग की रिपोर्ट पेश करते हुए दिया था। 
  मंत्रियों की बयानबाजी तो अपनी जगह है, पर प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान भी अपने विवादास्पद बयानों के कारण हमेशा ही सुर्खियों में बने रहते है। उनके अनमोल वचनों का भी लम्बा लेखा-जोखा है! नरसिंहपुर के करेली में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि भाजपा के उम्मीदवार को जिताइए! अगर नहीं जीता तो विकास के लिए धन कहाँ से आएगा? अगर आप सत्‍तारुढ़ पार्टी के प्रत्‍याशी को जिताएंगे, तो ही विकास के लिए धन भी अधिक मिलेगा! अध्यापकों आंदोलन के बारे में अध्यक्षजी ने कहा था कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इतना दिया है उसके बाद भी अध्यापकों का पेट नहीं भरता है। इतना तो किसी ने नहीं दिया था! व्यापमं मामले की जांच सीबीआई से कराने की बात पर नंदकुमार सिंह चौहान ने कहा कि 'सीबीआई हाई कोर्ट से बड़ी संस्था नहीं है। अभी जांच कोर्ट की देख-रेख में हो रही है। कोर्ट यदि एसटीएस, एसआईटी के अलावा सीबीआई या किसी दूसरी एजेंसी से जांच कराए तो संगठन और सरकार को इसमें कोई आपत्ति नहीं है।' 
   नंदकुमार चौहान सिर्फ बयान ही विवादस्पद नहीं देते, कुछ सामान्य बोलते हैं तो वो भी सुरखी बन जाता है। सागर जिले की खुरई विधानसभा में कार्यकर्ताओं के अभ्यास वर्ग में भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में नंदकुमार चौहान ने इतने कसीदे गढ़े कि सारी सीमाएं लांघ गए! उन्होंने मोदी को असाधारण व्यक्ति बताते हुए कहा कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद हमारी इमेज विश्व स्तर पर कहाँ से कहाँ पहुंच गई! मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले देश भिखमंगा था, उनके आने के बाद देश तरक्की का रहा है। इसी मंच पर उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की भी जमकर तारीफ की! कहा कि शिवराज का मुख्यमंत्री बनना ईश्वर का चमत्कार है। उन्होंने प्रदेश की सात करोड़ जनता की जिंदगियों में खुशियों का रंग भरा है। सरकार और संगठन दोनों ही तरफ से जब ऐसे 'बोल वचनों' की बौछार होती रहती हो, तो माना जा सकता है कि किसी की भी जुबान पर लगाम लगाने का कोई इंतजाम नहीं किया गया! इसी वाचिक हिंसा ने प्रदेश में माहौल बिगाड़ रखा है! 
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Friday, October 30, 2015

आत्महत्या करते किसान, पिकनिक मनाती सरकार!


 बीते कुछ सालों में महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की तरह मध्यप्रदेश के किसानों में भी आत्महत्या की प्रवृत्ति ज्यादा बढ़ी है। इन राज्यों में ज्यादातर इलाकों में किसान वर्षा जल से होने वाली सिंचाई पर निर्भर है। महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों के आत्महत्या करने वाले किसान नकदी फसल मसलन, कपास, सूरजमुखी, मूंगफली और गन्ना उगा रहे थे। जबकि, मध्यप्रदेश में बेमौसम बरसात और सूखे के कारण ख़राब हुई फसल के अलावा उत्पादन की बढ़ी हुई लागत के कारण किसानों को कर्ज लेना पड़ा। जब वे कर्ज न चुका पाने की स्थिति में आए तो हताशा में आत्महत्या जैसी कायरता करने को मजबूर हो रहे हैं! ऐसे में सरकार को जो कदम उठाए जाना थे, उनमें देरी की गई! संवेदना के नकली आँसू बहाए गए और नौकरशाही ने तो स्थिति की गंभीरता को मजाक ही बना दिया! 
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हेमंत पाल  

  मध्यप्रदेश इन दिनों की किसानों की आत्महत्याओं को लेकर माहौल गरमाया हुआ है। जो घटनाएँ पहले आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में आम थी, अब मध्यप्रदेश भी उस लिस्ट में शामिल हो गया। लगातार तीन सालों से बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और पाले से बर्बाद हो रही फसलों के कारण किसानों को राहत नहीं मिल पा रही है। यही कारण है कि वे हताशा में आत्महत्या कर रहे हैं। किसान संघ का दावा है कि मध्यप्रदेश में पिछले 6 महीने में 2200 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की! जबकि, एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो) ने भी तीन महीने पहले जारी अपने आंकड़ों में 700 किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा बताया था। इसके बाद से कई किसानों ने मौत को गले लगा लिया! सवाल उठ रहा है कि इन किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है? सरकार या फिर भगवान, जिसने मौसम के चक्र को इतना बिगाड़ दिया कि बारिश के मौसम में आग बरसती है। 
  मध्यप्रदेश में अभी तक कितने किसानों ने आत्महत्या की, इसका कोई वास्तविक सरकारी आंकड़ा सामने नहीं आया! आएगा भी नहीं, क्योंकि सरकार अपनी किरकिरी कराने  लिए ऐसा कोई आंकड़ा सामने आने देना भी नहीं चाहेगी! इसका पता लगाना कठिन भी है! क्योंकि, रोज ही किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं। पर सरकार मानने को तैयार नहीं कि इन सभी किसानों ने फसल की बर्बादी के कारण ही आत्महत्या की है। किसानों की मज़बूरी को मुख्यमंत्री ने जिस गंभीरता और संवेदना लिया उससे इंकार नहीं, पर सरकार के मंत्रियों की अनर्गल बयानबाजी कम नहीं हो रही! इन मंत्रियों को आत्महत्या भी मजाक लग रही है। फिर, अफसरों ने जिस तरह मुख्यमंत्री के आदेश को हवा उड़ाया वो भी सरकारी संवेदनहीनता का सबूत है। किसानों की समस्याएं जानने के लिए गांव जाकर रात बिताने के मुख्यमंत्री के आदेश को अफसरों ने 'कैंपिंग' या 'सूखा पर्यटन' की तरह लिया! चंबल एवं बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें सबसे ज्यादा हैं। भिंड जिले में रोज कोई खबर आ रही है। एक कलेक्टर ने विवादित बयान तक दे दिया कि किसान ज्यादा बच्चे पैदा कर लेते हैं और उनका पालन-पोषण नहीं कर पाते हैं, तो आत्महत्या करके सरकार को बदनाम करते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा का कहना है कि 'खुद को किसान पुत्र कहने वाले मुख्यमंत्री किसानों के प्रति कितने संवेदनशील हैं, ये अफसरों के रवैये से जाहिर हो गया! मुख्यमंत्री शाब्दिक जुगाली से किसानों को राहत देना चाहते हैं, जो संभव नहीं है।' 
  कहा जा रहा है कि प्रदेश सरकार अनाज उत्पादन में 'केंद्रीय-सम्मान' लेकर किसानों की बदहाली को छुपा रही है। किसानों को समय पर मुआवजा तक नहीं दिया जा रहा है। किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह है खेती में लगातार घाटा होना और कर्ज से दबना ही है! उधर, प्रदेश में एशियाई विकास बैंक के कर्जे से चल रहे बिजली सुधारों की स्थिति सुधरने के बजाए बिगड़ ज्यादा रही है। अनाप-शनाप बिजली के बिल और कुर्की की घटनाएं सामने आ रही हैं। किसानों की मोटर साइकल बिजली का बिल न भरने पर कुर्की वाले उठाकर ले जा रहे हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि किसानों पर ज्यादतियां किस हद तक बढ़ रही हैं। बढ़ती लागत, घटती उपज, खाद-बीज का गहराता संकट, बिजली-पानी की समस्या और उपज का वाजिब मूल्य न मिलने से किसान परेशान हैं। ऐसे में किसान विरोधी नीतियां और बेरहम बाजार के चक्रव्यूह में फंसे किसानों के पास जान देने के अलावा कोई चारा नहीं बचता! कर्ज माफी के वादों के बावजूद किसान लगातार कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। कर्ज वसूली, कुर्की की आशंका से परेशान हैं और आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर है। आत्महत्याएं तो कुछ किसानों ने ही की, लेकिन संकट सभी किसानों पर हैं। 
  किसानों की आत्महत्या को लेकर सरकार गंभीर नहीं है, ये बात नहीं! इस दिशा में देश में कई पहल हुई है। किसानों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को लेकर डॉ ऋतम्भरा हैब्बर (सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीजस, स्कूल ऑव सोशल साईंसेज, टीआईआईएस) द्वारा प्रस्तुत 'ह्यूमन सिक्युरिटी एंड द केस ऑव फार्मर ऐन एक्सपोलेरेशन (2007) नामक शोध के अनुसार किसानों की आत्महत्या की घटना को मानवीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखने की जरुरत है। अगर इस कोण से देखा जाए तो पता चलेगा कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं ठीक उस वक्त हुईं, जब देश के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक और सामाजिक रुप से मददगार साबित होने वाली बुनियादी संरचनाएं ढह रही हैं। हरित क्रांति, वैश्वीकरण और उदारीकरण की वजह से ढांचागत बदलाव आए हैं! मगर अधिकारी किसानों की आत्महत्या की व्याख्या के क्रम में इन बदलावों की अनदेखी करते हैं। साधारण किसानों की आजीविका की सुरक्षा के लिए फौरी तौर पर उपाय किए जाने चाहिए थे! लेकिन, इस पहलू की उपेक्षा हुई। आत्महत्या की व्याख्या करने के क्रम में ज्यादा जोर मनोवैज्ञानिक कारणों पर दिया गया।
  कुछ साल पहले 'ऑल इंडिया बॉयोडायनेमिक एंड ऑर्गेनिक फार्मिंग एसोसिएशन' ने महाराष्ट्र के जालना जिले के किसानों की आत्महत्या की खबर पर चिन्ता जताते हुए मुंबई हाईकोर्ट को एक पत्र लिखा था! इस पत्र पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने 'टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज' को एक सर्वेक्षण करने को कहा! इस सर्वेक्षण के आधार पर कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से किसानों की आत्महत्या की घटना पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए कहा। टाटा इंस्टीट्यूट ऑव सोशल साईंसेज की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया था कि किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह उत्पादन लागत में हुई असहनीय बढ़ोत्तरी और कर्जदारी है। दूसरी तरफ 'इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑव डेपलपमेंट रिसर्च' (आईजीडीआर) के शोध में किसानों की आत्महत्या का संबंध सरकार या उसकी नीतियों से नहीं जोड़ा गया था! आईजीडीआर की शोध रपट में कहा गया कि सरकार को ग्रामीण विकास योजनाओं के जरिए गांवों में ज्यादा हस्तक्षेप करना चाहिए। साथ ही वहाँ गैर-खेतिहर कामों का विस्तार किया जाना चाहिए।
  सीपी चंद्रशेखर और जयति घोष द्वारा प्रस्तुत एक रपट 'बर्डेन ऑव फार्मरस् डेट' में कहा गया था कि किसानों के ऊपर कर्जदारी उनकी आत्महत्या के बड़े कारणों में एक है। बच्चों की शादी-ब्याह के की वजह से लिया जाने वाला कर्ज उनकी पैदावार से होने वाली आवक से जुड़ा होता है! लेकिन, किसानों द्वारा लिए गए कुल कर्ज में इस कारण से लिए कर्ज की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम (11 फीसदी) है। यानी किसानों पर जो कर्ज है वो उनकी खेत की जरुरत से ज्यादा जुड़ा है। देश के किसानों की बड़ी संख्या सूदखोरों से कर्ज लेने के लिए बाध्य होती है। इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश जैसी सरकार की कोशिशें आग लगने पर पानी डालने जैसी ज्यादा दिखाई देती हैं। इस दिशा में जो ठोस कार्रवाई  की जरुरत है, उसका भारी अभाव नजर आता है। 
(लेखक 'सुबह सवेरे' के राजनीतिक संपादक हैं)
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Thursday, October 29, 2015

पेटलावद हादसे के बाद भी भाजपा का पलड़ा भारी!



रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव
   
रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव और देवास विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के सामने खुद को स्थापित आदिवासी नेता साबित करने की चुनौती है। जबकि, मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को झाबुआ में एक बार फिर भाजपा की पकड़ साबित करना है। यहाँ भाजपा की संभावित उम्मीदवार निर्मला भूरिया को मुख्यमंत्री की इसी छवि का फ़ायदा मिलने का भरोसा है। पेटलावद हादसे के बाद शिवराज सिंह ने जो सक्रियता और संवेदनशीलता दिखाई उससे भाजपा के पक्ष में पलड़ा झुकता दिखाई दे रहा है। इसके अलावा देशभर में चर्चित व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच के बाद यह पहला चुनाव है, जिससे व्यापमं घोटाले के असर का अनुमान लगाया जा सकेगा! मध्यप्रदेश के सबसे चर्चित व्यापमं घोटाले का सबसे ज्यादा असर भी इस क्षेत्र में हैं। उधर, देवास विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा में परिवारवाद खिलाफ शरद पाचुनकर के विद्रोह की आशंका से नए समीकरण बनने के आसार दिखाई दे रहे हैं।  
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 - हेमंत पाल 
 सांसद दिलीपसिंह भूरिया के निधन के बाद से ही रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट के उपचुनाव की हलचल है। चुनाव की औपचारिक घोषणा के बाद अब ये हलचल जंग में तब्दील हो जाएगी! दोनों ही बड़े दलों ने अपनी चुनावी तैयारियों के लिए ताल ठोंक ली है। कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया ने तो जनसम्पर्क एक एक दौर भी पूरा कर लिया! जबकि, ये नितांत भी सच है कि भाजपा के पास डंके की चोट पर ये चुनाव जीत सकने वाला ताकतवर दावेदार नहीं है। भाजपा अपने संगठन और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के दम पर ही चुनाव जीतने का दावा कर सकती है। यही कर भी रही है। जबकि, कांग्रेस के पास भी एक ही उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया के अलावा कोई और नाम नहीं है। केंद्र में मंत्री रह चुके कांतिलाल पिछला चुनाव हार चुके हैं! पर, कांग्रेस की मजबूरी है कि इस आदिवासी इलाके में उसके पास और कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसकी पूरे इलाके में पकड़ हो! भाजपा की तरफ से दिलीपसिंह भूरिया की पुत्री और विधायक निर्मला भूरिया ही सबसे प्रमुख दावेदार दिखाई दे रही है। पेटलावद हादसे के बाद शिवराज सरकार ने जो काम किए उससे भाजपा की पकड़ इस सीट पर और ज्यादा मजबूत हुई है। 
  भाजपा के पास निर्मला भूरिया को उम्मीदवार बनाना एक तरह से फायदे का सौदा है। इसके पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक कारण भी हैं! जैसे स्व. दिलीपसिंह भूरिया को श्रद्धांजलि के रूप मे वोट मांगे जा सकेंगे। निर्मला पांच बार की विधायक हैं और पिता के कारण उनका नाम लोकसभा के हर इलाके में परिचित करवाने में दिक्कत भी नहीं आएगी! निर्मला भी उसी भील जनजाति की हैं, जिससे कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया आते हैं।
   शिवराज अपने हर दौरे मे निर्मला भूरिया को साथ में लेकर घूमते हैं, और स्व. दिलीपसिंह की बेटी के रूप मे परिचय भी करवाते रहे। राखी से पहले पेटलावद मे शिवराज ने निर्मला से राखी बंधाई, जिससे यह साफ  हुआ कि अब भाई बनकर निर्मला के लिए वोट मांगेंगे। ताजा हालात के मुताबिक झाबुआ और आलीराजपुर जिले मे कांग्रेस कड़ी टक्कर देने की स्थिति में है। जबकि, झाबुआ विधानसभा में भाजपा बेहद कमजोर है। पेटलावद में भी मुकाबला करीब बराबरी का ही है। यही हाल थादंला में भी है। संसदीय क्षेत्र के तीसरे जिले रतलाम में कांग्रेस की हालत ख़राब है। रतलाम की दोनों विधानसभाओं शहर और ग्रामीण में भाजपा प्रतिद्वंदी कांग्रेस से बहुत आगे है। यदि कांग्रेस रतलाम को सँभालने में कामयाब हुई, तो ये उपचुनाव बराबरी पर आ सकता है! 
  पेटलावद में हुए विस्फोटक कांड के बाद जिस तरह के हालात बने थे, एक बार ये लगा था कि भाजपा को इस घटना से बड़ा नुकसान हो सकता है! इसके दो बड़े कारण थे! एक तो यह कि जिस राजेंद्र कासवां को इस घटना का सबसे बड़ा दोषी माना जा रहा है, उसके बारे में ये कहा गया कि वो भाजपा से जुड़ा है। इस कारण एक बारगी लोगों में जमकर रोष भी उभरा! फिर, ये खबर भी जंगल में आग की तरह पसरी कि उसे किसी भाजपा नेता ने ही फरार होने में मदद की है। लेकिन, वक़्त के साथ ये बात दब गई! दूसरा बड़ा कारण ये था कि गांव के बीच इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक जमा था और प्रशासन को पता नहीं चला, ये कैसे संभव है! इसे लेकर भी लोग बेहद नाराज हैं! राजेंद्र काँसवा आज भी फरार है और बीच शहर में विस्फोटकों के जखीरे के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार है, इन दोनों सवालों के जवाब आज भी  नहीं मिले हैं? पर, हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने पेटलावद आकर स्थिति तरह काबू में किया, वो तारीफ़ के काबिल है! जिस गांव में करीब 100 लोग एक विस्फोट की घटना में मारे गए हों, वहां हालात को नियंत्रित करना आसान नहीं था! लेकिन, शिवराज सिंह अपनी सूझबूझ से लोगों को ये समझाने में कामयाब रहे, कि जो हुआ वो एक दुर्घटना थी! मुख्यमंत्री को अहसास हो गया था कि यदि स्थिति को तत्काल संभाला नहीं गया, तो इससे बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है! प्रभावितों को राहत, आर्थिक मदद और बीमा क्लैम के मामले निपटाने में सरकार ने जिस तरह की तत्परता दिखाई, उसके पीछे छुपे राजनीतिक कारणों को आसानी से समझा जा सकता है! 
   जहाँ तक राजनीतिक नुकसान-फायदे की बात है, कांग्रेस इस दुर्घटना को भी राजनीतिक नजरिए से भुना नहीं सकी! इलाके में इतना बड़ा हादसा हो गया और कांग्रेस सरकार और प्रशासन को ठीक से कटघरे में भी खड़ा नहीं कर सकी! प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया ने कोशिश तो की, पर वे अपनी रणनीति में सफल नहीं हो सके! प्रदेश सरकार के मदद के पैकेज और चुस्ती-फुर्ती के आगे कांग्रेस का विरोध का पैंतरा फीका पड़ गया! आश्चर्य नहीं कि इस घटना से भाजपा को फ़ायदा मिले और कांग्रेस पर उसकी निष्क्रियता भारी पड़ जाए! 
   जहाँ तक चुनावी आंकड़ेबाजी का सवाल है, 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने भाजपा के दिलीपसिंह भूरिया को 57,780 वोटों से हराया था। भाजपा उम्मीदवार दिलीपसिंह भूरिया को 2,51,255 वोट मिले थे! वहीं, कांतिलाल को 3,08,923 वोट! 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने दिलीपसिंह भूरिया और कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया को चुनाव लड़ाया गया। इस चुनाव में दिलीपसिंह भूरिया ने 1 लाख 8447 वोटों से जीत हासिल की। कांग्रेस के कब्जे में रहने वाली यह लोकसभा सीट मोदी लहर में कारण पहली बार भाजपा के पास आई थी। 
   दिलीपसिंह भूरिया लंबे समय तक कांग्रेस से चुनाव लड़ते रहे है। कांग्रेस शासन काल में केन्द्रीय मंत्री भी रहे। एनडीए शासन काल में कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल हुए और जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाए गए थे। 2005 में दिलीप सिंह भूरिया भाजपा का दामन छोडक़र अजय भारत पार्टी और गोंडवाना गणतंंत्र पार्टी में भी पदाधिकारी रहे। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की डूबती नैया देखकर वे एक बार फिर 2008 में भाजपा में शामिल हो गए थे। इस दौरान कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने इस क्षेत्र में मजबूत जनाधार तैयार कर लिया था। यह बात अलग है कि 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के सामने कांतिलाल नहीं टिक सके थे। 
    इस बार रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया के सामने खुद को स्थापित और पकड़वाला आदिवासी नेता साबित करने की चुनौती है। जबकि, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने प्रदेशभर में अपने विजय रथ को आगे बढऩे की चुनौती है। देशभर में चर्चित व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच के बाद यह पहला चुनाव है, जिससे व्यापमं घोटाले के असर का अनुमान लगाया जा सकेगा! मध्यप्रदेश के सबसे चर्चित व्यापमं घोटाले का सबसे ज्यादा असर भी इस क्षेत्र में हैं। भाजपा यदि भूरिया की बेटी को टिकट देती है तो कुछ सहानुभूति वोट मिलने की संभावनाएं हैं, लेकिन ये सहानुभूति व्यापमं के असर को कितना कम कर पाएगी यह तो वक्त ही बताएगा! लोकसभा चुनाव के लगभग 22 माह बाद होने वाले इस चुनाव में राजनीतिक हालात भी बदले हैं। क्षेत्र में दिलीपसिंह भूरिया की निष्क्रियता से मतदाता और कार्यकर्ता काफी परेशान रहे है। समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को बार-बार भोपाल के चक्कर लगाने पड़े है।
    भाजपा ने काफी पहले से अपने मतदाताओं को साधने के प्रयास हर स्तर पर तेज कर दिए हैं। पिछले दो माह से भाजपा ने इस क्षेत्र में संगठनात्मक आयोजनों का सिलसिला तेज कर दिया है। संगठन महामंत्री अरविन्द मेनन प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान एवं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भी इस क्षेत्र के दौरे  किए है। झाबुआ की इस सीट पर खुद मुख्यमंत्री पैनी नजर बनाए हैं। इस सीट पर दो दर्जन से अधिक विधायकों को भाजपा ने तैनात किया है। बाद में तीन दर्जन विधायकों और आधा दर्जन मंत्रियों को भी यहां लगाया जाएगा। प्रदेश संगठन मंत्री अरविंद मेनन सीट से जुड़े तीनों जिलों झाबुआ, आलीराजपुर और रतलाम की बैठकें ले चुके हैं। संगठन ने मुख्यमंत्री की सभाएं तीनों जिलों की सभी विधानसभाओं में कराने का प्लान तैयार किया है। झाबुआ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा कराए जाने की भी तैयारी है। हाल ही में कनकेश्वरी देवी की कथा के आयोजन ने भी भाजपा के एक्शन प्लान  मजबूती दी है। 
  कांग्रेस ने अभी कोई बड़ा आयोजन इस क्षेत्र में नहीं किया है। लेकिन, कांग्रेस के संभावित प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने भी अपनी सक्रियता इस क्षेत्र में बढ़ा दी है। रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव के परिणाम भाजपा और कांग्रेस की भावी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होंगे। भाजपा की तैयारी और क्षेत्र में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की सक्रियता को देखते हुए कांग्रेस ने भी चुनाव का होमवर्क शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने अपने करीब दो दर्जन विधायक, पूर्व विधायक और पूर्व सांसदों को यहां पर लगा दिया। इस टीम को कई जिम्मेदारी दी गई। पार्टी ने औपचारिक घोषणा तो नहीं की पर कांतिलाल भूरिया को उम्मीदवार बनाए जाने की लगभग हरी झंडी दे चुकी है। प्रत्याशी बनाए जाने का भरोसा मिलने ही भूरिया भी क्षेत्र में जनसम्पर्क करने में जुट गए हैं। 
देवास में भाजपा का परिवारवाद 
   देवास महाराजा स्व. तुकोजीराव पवार की मृत्यु के बाद देवास विधानसभा सीट के लिए भी रतलाम-झाबुआ लोकसभा उपचुनाव के साथ मतदान होना है। भाजपा ने यहाँ से स्व. पवार की पत्नी गायत्री राजे पवार के चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं। जबकि, कांग्रेस ने अभी तक उम्मीद्वार को लेकर पत्ते नहीं खोले! लेकिन, अब ये मुकाबला इसलिए दिलचस्प हो गया, क्योंकि यहाँ से मराठा सरदार और भाजपा के ही पूर्व नेता शरद पाचुनकर ने चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। पाचुनकर कहा कि वे वशंवाद और परिवारवाद का दंश देवास को नहीं झेलने देंगे। देवास इलाके के सभी भाजपा विधायक किसी न किसी परिवार की देन हैं। उन्होंने आरोप लगाया की पार्टी अपने सिद्धांतों पर नहीं चल रही। सोनकच्छ से भाजपा विधायक राजेंद्र वर्मा के पिता पूर्व सांसद रहे हैं। हाटपिपलिया से पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी वंशवाद की देन हैं। खातेगांव-कन्नोद से विधायक आशीष शर्मा के पिता भी भाजपा से जुड़े हैं। यह सब परिवारवाद ही तो है! पाचुनकर के चुनाव लड़ने की घोषणा से भाजपा की संभावित उम्मीदवार गायत्री राजे पवार की परेशानी बढ़ सकती हैं। उनका पुत्र हत्या के एक मामले में फरार है। ऐसे में मराठा सरदार का विरोध चुनाव में मुश्किलें पैदा कर सकता है। क्योंकि, पार्टी में गायत्री राजे को लेकर बहुमत जैसी स्थिति नहीं है। क्योंकि, वे पार्टी की प्राथमिक सदस्य भी नहीं है। जहाँ तक सहानुभूति की बात है तो अब देवास में फिलहाल ऐसा कोई माहौल नहीं है।  
   यहाँ कांग्रेस टिकट को लेकर दिग्गज नेताओं के कारण परेशान दिख रही है। प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव टिकट को लेकर कई बैठकें कर चुके हैं! लेकिन, तीन-चार नामों की दावेदारी के कारण टिकट को लेकर तकरार है। यहाँ दिग्विजय सिंह, कमलनाथ अपने अपने समर्थकों की उम्मीदवारी लेकर जोर लगा रहे हैं। ऐसी स्थिति में प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के लिए फैसला लेना मुश्किल है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव का कहना है कि टिकट का अंतिम निर्णय कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का होगा। लेकिन, इस कड़वे सच को भी स्वीकारना होगा कि देवास में कांग्रेस पूरी तरह मुकाबले से बाहर है। शरद पाचुनकर ने यदि भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ विरोध कर भी दिया, तो भी कांग्रेस इस विद्रोह से कोई फ़ायदा ले सकेगी, ऐसी उम्मीद नहीं है। 
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(लेखक 'सुबह सवेरे' के राजनीतिक संपादक हैं)
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