Sunday, November 13, 2016

सिनेमा, समाज और बदलाव की बयार


हेमंत पाल 

  फिल्मों पर अकसर ये आरोप लगते रहे हैं कि ये अपराध को बढ़ावा देते हैं। कई अपराधियों ने भी पकडे जाने के बाद किसी फिल्म से अपराध की प्रेरणा लेना बताया। इसका सीधा सा मतलब है कि फ़िल्में जनमानस के इतने निकट होती हैं कि दर्शक फिल्म के नायक में अपनी छवि देखने लगता है। लेकिन, ये बात सिर्फ बुराई तक ही सीमित नहीं होती! कई कालजयी फ़िल्में ऐसी भी हैं, जिन्होंने समाज में सोच बदलने में भी प्रेरक का काम किया। दर्शक जब फिल्म की कहानी से एकाकार हो जाता है, तो खुद को अपने पसंदीदा किरदार के बीच पाता है। फिर उस किरदार द्वारा अभिनीत भावनाओं से तादात्म्य बैठाकर उसी के अनुरूप आचरण करने लगता है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब फिल्मों ने समाज पर सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों तरह असर डाला। कुछ फ़िल्में तो ऐसी भी आईं, जिन्होंने समाज पर गहराई तक प्रभाव डाला और बदलाव की राह बनाई!  
  महात्मा गाँधी ने भी कई संदर्भों में अपने जीवन पर ‘सत्यवादी हरिश्चन्द्र' फिल्म के असर होने का जिक्र किया था। ये असर उनके पूरे जीवनकाल में उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करता रहा। इस फिल्म से प्रभावित होकर गाँधीजी ने जीवनभर सत्य बोलने का संकल्प लिया था। ‘दो आँखें बारह हाथ’ और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ भी उन फिल्मों में शुमार है, जिसे देखकर कई अपराधियों का हृदय परिवर्तन हो गया था। फिल्म देखकर उन्होंने अपराध से तौबा ही कर ली थी। इसके बाद भी ऐसी कई फ़िल्में आईं, जिन्होंने दर्शकों को विचारधारा के स्तर पर प्रभावित किया। अभी भी ये क्रम बंद नहीं हुआ है।  
  हिन्दी में लोकजीवन से जुड़ी पहली फिल्म बनाने का श्रेय निर्माता हिमांशु रॉय तथा निर्देशक फ्रेंज ऑस्टिन को दिया जाता है, जिन्होंने 1936 में 'अछूत कन्या' बनाई! इस फिल्म में दलित की बेटी कस्तूरी (देविका रानी) का ब्राह्मण के बेटे प्रताप (अशोक कुमार) से प्यार दिखाया गया था। फिल्म में मूल प्रगतिशील विचार यह था कि ब्राह्मण अपने बेटे का विवाह दलित कन्या से करने को तैयार हो जाता है। लेकिन, बाद में अफवाह और सामाजिक कटुता का वातावरण बहुत ज्यादा कलुषित हो जाता है, जिससे ये प्रयास निष्फल हो जाता है। ऐसी ही एक फिल्म 'जीवन नैया' आई थी, जिसमें एक वेश्या की बेटी का जीवन संघर्ष था। 
  1957 में आई वी शांताराम की फिल्म 'दो आँखें बारह हाथ' को भी सामाजिक बदलाव प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने कुख्यात अपराधियों को सुधारने का एक अभिनव तरीका दिखाया था। इसी धारा पर 1960 में राजकपूर ने 'जिस देश में गंगा बहती है' बनाई थी। कहा जाता है कि इस फिल्म की विचारधारा से प्रेरित होकर बाद में विनोबा भावे, वीपी सिंह तथा अन्य समाजसेवियों एवं नेताओं ने डाकुओं के आत्मसमर्पण का विचार सामने रखा। ये भी कहा जाता है कि जब किरण बेदी तिहाड़ जेल की मुखिया थी, तब उन्होंने कई खूंखार कैदियों को सुधारने के लिए वी शांताराम के ही मानवतावादी मनोविज्ञान फार्मूले आजमाए थे। 
  1953 में बिमल रॉय ने 'दो बीघा जमीन' बनाई थी, जो वास्तव में किसान के जीवन की कारुणिक गाथा थी। 'गोदान' के बाद यदि किसानों की व्यथा भयावह स्वरूप में सामने आई, तो वह इसी फिल्म में देखने को मिली। महबूब खान की 1957 में आई कालजयी फिल्म 'मदर इंडिया' को भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर कहा जाता है। इस फिल्म को 'दो बीघा जमीन' का विस्तार कहा जा सकता है। साहूकार के शोषण तले कराहते किसान परिवार की वेदना को नरगिस ने जिस संवेदना से निभाया, उससे किसान की आवाज़ सरकार तक पहुँची थी! कहा जाता है कि किसानों की हालात के इस फ़िल्मी चित्रण के बाद ही देश में हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ! राजकपूर की फिल्म 'आवारा' ने भी इस धारणा को झुठलाया था कि अपराधी तथा अच्छे लोग जन्मजात होते हैं। किसी भी व्यक्ति को अच्छा या बुरा हालात नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि बनाती है। 'टाइम पत्रिका' ने तो इसे दुनिया की श्रेष्ठ 20 फिल्मों में स्थान दिया था। आज भी ऐसी फ़िल्में बनना बंद नहीं हुई है, बस उनका कलेवर बदल गया। जरुरत है, उन्हें इस नजरिए से देखने की! पा, कहानी, रुस्तम और पिंक जैसी फिल्मों में भी देखने के लिए बहुत कुछ है।
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Thursday, November 10, 2016

'पंडितजी' के बहाने भी इंदौर में कांग्रेस ने 'अमृत' नहीं मिला!

- हेमंत पाल 

 मध्यप्रदेश में इंदौर की राजनीति का एक अलग ही अंदाज है। भोपाल भले राजधानी है और प्रदेश से जुड़े सारे फैसले वही होते हैं, पर नेताओं और अफसरों की पसंदीदा जगह इंदौर ही है। फिर सत्ता चाहे जिस पार्टी की हो, इंदौर का दबदबा कभी कम नहीं होता! सिर्फ प्रदेश में ही नहीं, केंद्र की सत्ता में भी इंदौर की छाप बनी रहती है। लेकिन, मुद्दा ये कि इतने महत्वपूर्ण शहर में किसका सिक्का चलता है? ऐसा कौनसा नेता है, जिसके नाम की तूती बोलती है? आज भले ही ऐसा कोई नाम याद नहीं आता हो, पर इंदौर लंबे अरसे तक कांग्रेस के नेता महेश जोशी और कृपाशंकर शुक्ला उर्फ़ 'पंडितजी' के नाम का डंका बजता रहा! इनमें भी 'पंडितजी' की आवाज की अपनी अलग खनक और अंदाज रहा, जैसा कभी किसी और किसी नेता में नहीं दिखा! 75 साल के इस नेता का जोश आज भी कम नहीं हुआ! कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा पर उंगली नहीं उठाई जा सकती! लेकिन, जिंदगीभर राजनीति करने वाले इस नेता के 'अमृत महोत्सव' पर भी जमकर राजनीति हुई! हाशिए पर खड़ी कांग्रेस के नेताओं ने इस बहाने अपनी एकता दिखाने के बजाए सिर फुटव्वल को ही उजागर किया! इसके बाद भी 'पंडितजी' को शुभकामना देने वालों की कमी नहीं थी! कांग्रेस के बड़े नेता नदारद थे, पर 'पंडितजी' को चाहने वाले मौजूद थे। 


    जब कभी इंदौर में कांग्रेस की राजनीति का जिक्र होता है, बात दो नाम पर आकर टिक जाती है। ये नाम हैं महेश जोशी और कृपाशंकर शुक्ला यानी 'पंडितजी।' इन नेताओं ने जिस दमदारी से राजनीति की है, ऐसा कभी कोई दूसरा नहीं कर सकता! दोनों नेताओं ने अपने दम पर कई सालों तक कांग्रेस को बाँधे रखा! इनके ज़माने में न तो कोई गुटबाजी थी न सिर फुट्टवल जैसे हालात! महेश जोशी की राजनीतिक शैली का आलम तो ये था कि हर बड़े अफसर को इंदौर में ज्वाइन करने के बाद उनके यहाँ हाजरी लगाने जाना पड़ता था। इसी धारा पर 'पंडितजी' की राजनीतिक शैली विकसित हुई। ये दोनों नेता चुनावी राजनीति में अपना ख़म भले न ठोंक पाए हों, पर इन्होंने कई नेताओं को गढ़ा! महेश जोशी तो चुनाव जीते और मंत्री भी बने, पर कृपाशंकर शुक्ला चुनाव लड़े तो पर जीत नहीं सके! महेश जोशी ने अब तो एक तरह से खुद को राजनीति से अलग ही कर लिया है। लेकिन, पंडितजी इस उम्र में भी सक्रिय हैं। हर सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रम में पंडितजी कहीं न कहीं दिख ही जाते हैं।
  महेश जोशी और कृपाशंकर शुक्ला के बाद तो इंदौर की कांग्रेस राजनीति ध्वस्त सी हो गई! इस कद का और कोई नेता उभर ही नहीं सका! गुटों और क्षत्रपों के सिपहसालारों में बंटी कांग्रेस के पास आज न तो सर्वमान्य नेता है और न कोई इच्छाशक्ति! इंदौर में किसी नए नेता के उभर न पाने का ही नतीजा है कि सुमित्रा महाजन लगातार 8 बार से लोकसभा चुनाव जीत रही है। महेश जोशी के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने वाले कृपाशंकर शुक्ला ने पार्टी के अलावा दोस्ती में भी अपनी निष्ठा नहीं बदली। महेश भाई साथ कई बार उनके मतभेद सामने आए, पर मनभेद की स्थिति कभी नहीं बनी! अभी तक कभी सुनने में नहीं आया कि पंडितजी की किसी नेता से ऐसी ठनी हो कि उससे बातचीत ही बंद हो गई हो! जबकि, आज इंदौर में कांग्रेस आधा दर्जन खेमों में बंटी है।  
 इसी माहौल में 6 नवम्बर को इंदौर में कृपाशंकर शुक्ला के अमृत महोत्सव का आयोजन हुआ। जब इस कार्यक्रम की घोषणा हुई, तो कई बड़े नेताओं के आने की ख़बरें सामने आई। लगा कि इंदौर में अंतिम साँस गिन रही कांग्रेस को इस बहाने ऑक्सीजन भी मिलेगी! पार्टी के कुछ नेताओं ने इस बहाने आगे की रणनीति भी जमा ली थी, कि इस मौके के कैसे भुनाना है! लेकिन, अमृत महोत्सव के दौरान जो कुछ हुआ उसने पार्टी को आगे बढ़ाने के बजाए पीछे धकेल दिया! इस महोत्सव में कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह समेत कई बड़े नेताओं को आमंत्रित किया गया था! लेकिन, इनमें से कोई नहीं पहुंचा! सबके पास अपने बहाने थे! फिर भी आयोजन में जो भीड़ उमड़ी उसने 'पंडितजी' की लोकप्रियता का जलवा दिखा दिया।
 पहले कमलनाथ को इस अमृत महोत्सव मुख्य अतिथि बनाया गया था। लेकिन, वे नहीं आए! कहा गया कि कमलनाथ के न आने के पीछे इंदौर में कांग्रेस की गुटीय लड़ाई सबसे बड़ा कारण है। पंडितजी के समर्थक और अमृत महोत्सव के संयोजक सज्जनसिंह वर्मा के खिलाफ जो लॉबी काम कर रही है, उसने कमलनाथ को न आने देने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। बताते हैं कि कभी सज्जन वर्मा के नजदीक रहे पूर्व मंत्री हुकुमसिंह कराड़ा ने कमलनाथ को रोकने में प्रमुख भूमिका निभाई! जब कमलनाथ को लगा कि इंदौर में गुटीय राजनीति के समीकरण बिगड़ रहे हैं, तो वे पीछे हट गए। लेकिन, इस आयोजन में जिस तरह की भीड़ उमड़ी, उसने सज्जन वर्मा की धाक जमा दी! वे सोनकच्छ क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं, इसलिए उन्हें अभी तक उन्हें बाहरी नेता कहा जाता था। पर, पंडितजी के 'अमृत महोत्सव' की सफलता ने उन सबकी जुबान पर ताले डाल दिए। कमलनाथ या किसी और बड़े नेता के न आने से आयोजन की सफलता पर कोई फर्क नहीं पड़ा, पर कांग्रेस की एकजुटता का  मौका जरूर हाथ से निकल गया।
  इस अमृत महोत्सव में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश प्रभारी मोहन प्रकाश, पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और उनके पुराने साथी महेश जोशी मौजूद थे। जबकि, भाजपा से विक्रम वर्मा, सत्यनारायण सत्तन, रमेश मेंदोला, महेंद्र हार्डिया, कैलाश शर्मा भी पंडितजी से अपने निजी संबंधों के चलते दिखाई दिए। मोहन प्रकाश ने कहा कि शिव के अनेक रूप हैं। लेकिन, उनके साथ कृपा जुड़ जाए तो कृपाशंकर हो जाता है। यह उन्हीं की पुण्याई है कि जितने लोग हॉल के अंदर हैं, उससे ज्यादा बाहर भी खड़े हैं। वे शताब्दी वर्ष भी मनाएं यह शुभकामना है। उन्होंने कहा कि जिन संस्कारों से पंडितजी राजनीति करते थे वह समाप्त हो चुकी है, पर पंडितजी आप अलख जगाए रखो और एक बार फिर कांग्रेस को सत्ता में लाओ। लोगों के कान पकड़कर उनसे काम करवाओ।
 अपने राजनीतिक जीवन में पंडितजी की छवि हमेशा मस्तमौला नेता की रही! इंदौर की भाषा में कहा जाता है कि राजनीति में जो झांकी कभी 'पंडितजी' की थी, वो कभी किसी की नहीं हो सकती! कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण पर भी कभी सवाल खड़े नहीं हुए। सक्रिय राजनीति में उनके तेवर पार्टी के अन्य नेताओं से हमेशा अलग ही देखने को मिले! इतने पर भी कभी 'पंडितजी' कभी विवाद में नहीं पड़े! हां, उनसे जुड़े किस्सों की कमी भी कभी नहीं रही! जब वे चुनाव लड़े, विरोधियों ने उनपर जिंसी की एक मस्जिद से घडी चोरी का आरोप लगाकर माहौल गरमा दिया था। फिर भी मस्तमौला पंडितजी  बुरा नहीं माना! कहा जाता है कि राजनीति में किसी नेता को कितना माइक प्रेमी होना चाहिए, ये 'पंडितजी' से अच्छा किसी से नहीं सीखा जा सकता! आज भी वे जब किसी कार्यक्रम में जाते हैं, बोलने का मौका नहीं छोड़ते। उनकी भाषण शैली भी ऐसी है उसे गंभीरता के बजाए रस लेकर ही सुना जाता है। किन्तु, पार्टी के प्रति उनकी गंभीरता, समर्पण और निष्ठा पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगा! उनका पूरा राजनीतिक जीवन कांग्रेस के लिए राजनीतिक दुर्भावना से पर रहा।
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Friday, November 4, 2016

क्या मालवा, निमाड़ का सिमी नेटवर्क ध्वस्त हो गया?

- हेमंत पाल 

  भोपाल जेल से भागे सिमी के 8 गुर्गों का पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर देशभर में राजनीति चरम पर है। ये मुठभेड़ असली थी या नकली? उन्हें जिन्दा पकड़ना था, मारा क्यों गया? ऐसे कई सवालों से राजनीति गरमाई है। लेकिन, मालवा, निमाड़ के लिए ये सुकून भरी घटना है। पश्चिम मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में पिछले करीब 15 सालों से सिमी की गतिविधियां चल रही है। खंडवा से शुरू होकर सिमी ने खरगोन, इंदौर, धार और उज्जैन के ग्रामीण इलाकों में भी अपनी पकड़ बनाई! धार के भोजशाला मामले को भी अल्पसंख्यकों की आड़ में सिमी ने ही ज्यादा भड़काया! लेकिन, एक साथ 8 खूंखार आतंकवादियों के मारे जाने के बाद निश्चित रूप से सिमी की कमर टूटी है। किन्तु, अभी सबसे बड़ी चुनौती उन चेहरों को बेनकाब करना है जो सिमी के लिए स्लीपर-सेल के रूप में काम कर रहे हैं! क्योंकि, जब तक ये चेहरे सामने नहीं आएंगे, सिमी की जड़ों में मट्ठा नहीं डलेगा! उसके बाद ही दावा किया जा सकता है कि मालवा, निमाड़ से सिमी  नेटवर्क ध्वस्त हो गया!
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   सिमी (स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया) का जब भी जिक्र आता है, नजरें मालवा के 4-5 जिलों पर केंद्रित हो जाती है। खंडवा, इंदौर, उज्जैन और धार जिले में इस प्रतिबंधित संगठन की जड़ें काफी गहरी है। सिमी मालवा, निमाड़ को अपने लिए सबसे सुरक्षित इलाका समझता है इसकी बहुत सी वजह है। ये जिले प्रदेश के सीमावर्ती हैं, इसलिए यहाँ से भागने के रास्ते आसान हैं। इंदौर व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्र है इसलिए यहाँ बाहरी लोगों तादाद ज्यादा है। उनके बीच पहचान छुपाकर रहना आसान है। इन्हीं के बीच सिमी ने अपने मजबूत स्लीपर सेल बना लिए हैं। सांप्रदायिक अशांति फैलाने की कई कोशिशें भी पिछले कुछ दिनों में सिमी के सदस्यों ने की है।
  प्रदेश में खंडवा को सिमी की जन्मस्थली माना जाता है। लेकिन, कुछ सालों से ये इंदौर और धार जिले के पीथमपुर में सबसे ज्यादा सक्रिय देखे जा रहे हैं। धार के भोजशाला मामले में भी सिमी ने कई बार परदे के पीछे से सक्रियता दिखाई! पिछले साल धार जिले के कई इलाकों में बसंत पंचमी से पहले सांप्रदायिक तनाव भड़का था! पुलिस ने अधिकांश स्थानों पर पाया भी था कि इनमें स्थानीय लोग शामिल नहीं थे! यदि ऐसा था तो वे बाहरी लोग कौन थे, ये सवाल अनुत्तरित है? सिमी की मालवा और निमाड़ में मौजूदगी के कई बार सबूत मिले! अभी दशहरे के अगले दिन भी धार जिले समेत प्रदेश के कई इलाकों में तनाव भड़का था, जिसे समय रहते दबा तो दिया गया, पर इसके पीछे भी सिमी का हाथ होने की बात भी कही गई! सवाल उठता है कि आखिर प्रदेश के आधा दर्जन शहरों में एक जैसी घटनाएं क्यों घटी? इन सभी वारदातों में समानता होने के पीछे कोई न कोई कारण तो होगा ही!
     प्रदेश के मालवा, निमाड़ इलाके में सिमी की गतिविधियों के कई ठिकाने हैं। करीब 16 साल पहले महिदपुर के रहने वाले सफदर नागौरी ने इंदौर में युवाओं की रैली निकालकर अपनी ताकत दिखाने की पहली कोशिश की थी। इसमें 4 हज़ार से ज्यादा मुस्लिम युवा शामिल हुए थे। इस रैली में नागौरी ने भड़काऊ सांप्रदायिक भाषण दिया, तब उसके खिलाफ पहली बार मामला भी यहीं दर्ज हुआ था! लेकिन, इस रैली के बाद सिमी की गतिविधियां बढ़ी। उनके गोपनीय समर्थक और मददगार भी बढे! दायरा बढ़ा तो इंदौर, उज्जैन, धार, खंडवा और खरगोन में सिमी के स्लीपर सेल भी तैयार हुए! स्लीपर सेल का आशय उन सिमी समर्थकों से है, जो अपनी पहचान छुपाकर इस संगठन के लिए सक्रियता से काम करते हैं।
  इंदौर में सिमी की मौजूदगी और उनके समर्थकों का सबसे बड़ा सबूत पिछले साल 8 दिसम्बर को मिला था। उस दिन अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष कमलेश तिवारी द्वारा पैगंबर हजरत मोहम्मद पर दिए गए बयान के विरोध में इंदौर के मुस्लिम समाज को ज्ञापन देना था। रैली निकालने या रास्ता जाम करने की कोई सूचना नहीं थी। लेकिन, ईदगाह मैदान से युवक अचानक उग्र हो उठे और रीगल चौराहा पहुँच गए। पहले तो उन्होंने वाहनों को रोककर चौराहे की सारी सड़कें जाम कर दी। इसके बाद एक शो-रूम में तोड़फोड़ की और बाहर खड़े कई वाहनों के साथ तोड़फोड़ की! स्थिति इतनी ख़राब हो गई थी कि काबू पाने के लिए 10 थानों की फोर्स बुलाना पड़ी। उस दिन सुबह मुस्लिम समाज के लगभग 15 हजार लोग छोटी ग्वालटोली ईदगाह पर जमा हुए थे। यहां तकरीर के बाद उन्होंने हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के खिलाफ एसडीएम को ज्ञापन सौंपा।
  रैली के बाद रीगल चौराहा जाम करने का कोई प्लान नहीं था, पर भीड़ का एक हिस्सा अचानक रीगल तिराहे की ओर बढ़ा। सड़क पर इतने लोग जमा हो जाएंगे और इस तरह बवाल मचाएंगे इस बात का पुलिस प्रशासन को कोई अंदाजा नही था। लोगों की भीड़ जहां से निकली वहां चक्का जाम हो गया। यहां इन्होंने दुकानें बंद कराना शुरु कर दिया। इनका विरोध करने पर एक शो-रूम और कुछ गाड़ियों में तोड़फोड़ भी कर दी। छोटी ग्वालटोली इदगाह में इतनी भीड जमा हो गई थी कि समाज के लोग आसपास की बिल्डिंग की छत पर पहुंच गए। इसके बाद अबु रेहान फारुकी ने तकरीर की। बाद में पता चला कि इस भीड़ को भड़काने में सिमी के ही कुछ लोगों का हाथ था। देखा गया है कि सिमी की गतिविधियों पर नजर रखने को लेकर पुलिस की ख़ुफ़िया टीम अक्सर फेल हो जाती है।
 धार जिले का औद्योगिक क्षेत्र पीथमपुर सिमी का नया ठिकाना माना जा रहा है। इंदौर के नजदीक होने और औद्योगिक क्षेत्र होने से यहाँ सिमी विचारधारा वालों के लिए पहचान छुपाकर रहना आसान है। सिमी के सबसे सक्रिय सरगना सफदर नागौरी ने 2008 में इंदौर के निकट चोरल के जंगल में पीथमपुर के कमरुद्दीन के खेत में सिमी के लिए चार प्रशिक्षण कैंप लगाए थे। इसमें कई खूंखार आतंकवादी शामिल हुए थे। इन कैंपों के बाद ही इंदौर में नागौरी समेत 17 आतंकियों को पुलिस ने पकड़ा था। इनके पास से हथियार, कंप्यूटर, के अलावा तनाव फैलाने वाला आपत्तिजनक साहित्य भी बरामद हुआ था! इनके कब्जे से 60 से ज्यादा सिमकार्ड और गतिविधियों से जुड़े कागजात भी जब्त किए गए थे। इन्हें पीथमपुर और इन्दौर के माणिकबाग के नजदीक एक मकान से पकड़ा गया था। साथ में मकान मालिक हाजी गफ्फार, हाजी अबरार और मकान दिलवाने वाल अकरम को भी पकड़ा गया था। यहीं से खुलासा भी हुआ था कि सिमी का असल मकसद क्या है!
  पीथमपुर की सघन मजदूर बस्तियां और कई ग्रामीण इलाके पुलिस नजर में नहीं आते! यहाँ की औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले मजदूरों का सही रिकॉर्ड नहीं होने से भी पुलिस को परेशानी आती है। यहाँ काम करने वाले अधिकांश मजदूर बाहरी हैं, इसलिए पुलिस के लिए भी सबकी पहचान कर पाना आसान नहीं होता! मालवा और निमाड़ में सिमी की सक्रियता का एक कारण ये भी है कि ये इलाका सीमावर्ती है और यहाँ से महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान की सीमाएं ज्यादा दूर नहीं है! सारी माकूल परिस्थितियों के बावजूद भोपाल में हुई मुठभेड़ सिमी की जड़ों पर करार वार है। लेकिन, सवाल उठता है कि इसके बाद क्या सिमी के नेटवर्क पर असर पड़ेगा? इस पर नजर रखना ज्यादा जरुरी है। इसमें कोई राजनीति भी नहीं होना चाहिए! वोट बैंक लालच में सिमी के नेटवर्क और स्लीपर-सेल की अनदेखी की गई तो मालवा, निमाड़ एक बार फिर आतंक का अड्डा बन सकता है!
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Friday, October 28, 2016

ऐसा 'दबंग' जो न खुद झुका, न किसी को झुकाया


मध्यप्रदेश के नए चीफ सेक्रेटरी : बसंत प्रताप सिंह

- हेमंत पाल 

 सलमान खान ने 'दबंग' में काम करके अपने नाम के आगे फ़िल्मी दबंग होने का तमगा भले लगा लिया हो! पर, नौकरशाही में असली दबंग बसंत प्रताप सिंह को ही माना जाता है। प्रदेश के अगले मुख्य सचिव नियुक्त किए गए श्री सिंह प्रदेश उन चंद नौकरशाहों में गिने जाते हैं, जिनकी दबंगता उनकी प्रशासनिक कार्यशैली में नजर आती है। इस महत्वपूर्ण पद के लिए उनका चुना जाना ही, उनकी सबसे बड़ी योग्यता है। 
बसंत प्रताप सिंह के साथ काम करने वाले कई अधिकारियों का मानना है कि जिसे भी उनके साथ काम करने का मौका मिला, वो उनका 'फैन' हो जाता है। इसलिए कि वे न तो किसी दबाव के आगे झुकते हैं और न किसी को झुकाने में उनका विश्वास है। लेकिन, सही का साथ देने में वे नियमों और प्रक्रियाओं को भी किनारे करने से नहीं चूकते! उनके पूर्व सहयोगी अफसर ऐसे कई प्रसंग याद करते हैं, जब बसंत प्रताप सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ इसलिए उनका साथ दिया कि उन्हें विश्वास था कि हम अपनी जगह सही हैं। 
   उन्हें नौकरशाही और सरकार के बीच सामंजस्य बैठाने के लिए जाना जाता है। शायद इसी कार्यक्षमता के कारण उन्हें ये सबसे बड़ा ओहदा मिला है। वे सरकार की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे उतरे, इसीलिए 1984 बैच के इस नौकरशाह का नाम तेजी से उभरकर सामने आया और नियुक्ति तक पहुंच! अब तक वे अपने हर कार्यकाल में श्रेष्ठ परफार्मेंस देते आए हैं। गृह विभाग में अपने कार्यकाल दौरान उन्होंने कई बड़े और सही फैसले लिए! श्री सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे अपने मातहत हर छोटे, बड़े अधिकारी से एक जैसा व्यवहार रखने के लिए जाने जाते हैं। सहजता, सौम्यता, ईमानदारी के साथ उनकी दबंगता के उनके कई किस्से मशहूर है। एक घटना जो माधवराव सिंधिया से जुडी है, सभी पुराने अधिकारियों को याद है! बताते हैं कि बसंत प्रताप सिंह को जब ग्वालियर में कलेक्टर पदस्थ किया तो वे सौजन्य भेंट के लिए सिंधिया मिलने पहुंचे! मिलने का समय तय था! लेकिन, अफसरों से मिलने का 'महाराज' का अपना अंदाज था। श्री सिंह तो समय पर 'महल' पहुँच गए, पर 'महाराज' बहुत देर तक नहीं आए! कुछ देर इंतजार करने के बाद बसंत प्रताप सिंह को वहां रुकना नागवार गुजरा तो वे लौट गए! इसे सिंधिया ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और श्री सिंह को ग्वालियर से हटना पड़ा!    
  इंदौर में कमिश्नर के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान बसंत प्रताप सिंह ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए! ऐसा ही एक निर्णय सहकारी गृह निर्माण संस्थाओं और भू-माफियाओं के बीच गठजोड़ उजागर करने वाला रहा! उनकी पहल पर ही कई सहकारी संस्थाओं के रिकॉर्ड खंगाले गए। इसी से सामने आया कि किस तरह सहकारी संस्थाओं ने कॉलोनियों की जमीन उनके सही धारकों बजाए जमीन के घोटालेबाजों को बेच दी! इस गठजोड़ ने कई संस्थाओं की असलियत सामने ला दी! इस मामले में आज भी कार्रवाई चल रही है। बसंत प्रताप सिंह की ही पहल से कई सही लोगों को भूखंड मिल सके हैं।        
  एक रिटायर्ड अधिकारी ने बताया कि बसंत प्रताप सिंह कभी किसी नेता के प्रभाव में आए हों, ऐसा कभी देखने में नहीं आया! यदि किसी नेता ने सही काम के लिए पहल की है, तो उसे टालते भी नहीं! लेकिन, दबाव में आकर काम करना बसंत प्रताप सिंह के स्वभाव में कभी नहीं रहा। राजनीति से जुड़े जो लोग श्री सिंह के इस स्वभाव और कार्यशैली से परिचित हैं, उनके काफी आत्मीय संबंध रहे हैं! जहाँ तक प्रशासनिक क्षमता की बात है, तो इसमें उनका कोई सानी नहीं! कई विपरीत परिस्थितियों में श्री सिंह ने अपनी जबरदस्त प्रशासनिक क्षमता दिखाई है। उनकी त्वरित निर्णय लेने की क्षमता का कई पुराने अधिकारियों ने उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यदि कोई मामला सही और स्पष्ट है, तो वे उसे कभी टालने या दोबारा विचार करने में समय नहीं गंवाते!   
  श्री सिंह के साथ अभी तक जिसने भी काम किया है, उनमें से अधिकांश अधिकारी इस बात के लिए भी उनकी प्रशंसा करते हैं कि बसंत प्रताप सिंह में जबरदस्त टीम-स्प्रीट भावना है। हमेशा ही उनकी कार्यशैली चलने की नहीं, दौड़ने और दौड़ाने की है। वे बहुत जल्द अपने सहयोगियों की कार्य क्षमता परख लेते हैं और उसी के अनुरूप उन्हें काम सौंपते हैं। लेकिन, काम में लापरवाही और कामचोरी वे पसंद नहीं करते! वे चमचागिरी बी पसंद करते! यही कारण है कि उनके साथ वही अधिकारी और कर्मचारी काम सके हैं, जो उनकी तरह तत्पर, सजग और ईमानदार होते हैं! 
  उत्तरप्रदेश की ग्रामीण ठाकुर पारिवारिक पृष्ठभूमि से सिविल सेवा में आए बसंत प्रताप सिंह पूरी तरह जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। उनकी पहचान खांटी ईमानदार अधिकारी के रूप में होती रही है। उनके पुराने सहयोगी बताते हैं कि वे प्रशासनिक रूप से सख्त होने के साथ कवि ह्रदय भी हैं। भाषा पर भी उनका बेहतरीन अधिकार है, जो उनके भाषण सुनने से ही पता चलता है। बसंत प्रताप सिंह कहते हैं कि मेरा गांव मेरे अंदर बसता है। इसलिए कि उनका बचपन गाँव में ही बीता। वे गाँव से आए हैं, इसलिए उनका गाँव के बारे में अलग ही सोच है। वे कहते हैं कि खाली वक़्त में मैं गाँव के विकास के बारे में सोचता हूं। प्रदेश सरकार की ग्रामीणों से संबंधित जितनी भी योजनाएं हैं, उनको क्रियान्वित करना मेरी प्राथमिकता होगी।  
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सरकार के सामने अब बिके सपनों को सच करने की चुनौती


हेमंत पाल 

इंदौर में 'ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट' हो गई! दो दिन तक मध्यप्रदेश सरकार इन्वेस्टर्स के सामने पलक-पांवड़े बिछाए रही। लकदक इंतजामों के बीच देश और दुनिया के चार हज़ार से ज्यादा आमंत्रितों ने इसमें भाग लिया। 42 देशों के प्रतिनिधियों ने दो दिन तक मध्यप्रदेश सरकार की मेजबानी का लुत्फ़ उठाया। सभी ने सरकार की घोषणाओं को सुना, गुना और समझा! उद्योगपतियों ने भी अपने भविष्य के सपनों और सरकार की योजनाओं में सामंजस्य बैठाने की कोशिश की! मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राजनीतिक क्षमता को किनारे करके अपना सेल्समैनशिप वाला हुनर जमकर दिखाया। कुछ उद्योगपतियों ने नए निवेश की पहल भी की! लेकिन, वास्तव में इस समिट से प्रदेश को क्या हांसिल हुआ, ये सच अभी सामने आना बाकी है। वादे तो खूब किए गए, लेकिन उन वादों को अभी धरातल पर उतारना है! सरकार को अपनी क्षमताओं और वादों की सच्चाई साबित करना है और उद्योगपतियों को अपने इन्वेस्टमेंट की! मुख्यमंत्री के सामने उससे भी बड़ी चुनौती नौकरशाहों को उन सपनों को पूरा करने के लिए तैयार करना है, जो इन्वेस्टर्स को सरकार ने इन दो दिनों में दिखाए हैं। आखिर सरकार ने इन्वेस्टर्स को सुविधाओं के जो सपने बेचे हैं, उन्हें सच करने की चुनौती भी तो सरकार ही ही है! 
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   मध्यप्रदेश सरकार की क्षमताओं और सुविधाओं की इससे अच्छी मार्केटिंग शायद नहीं हो सकती थी, जो मुख्यमंत्री ने 'ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट' के दो दिनों में की! मेजबानी में कोई कमी नहीं थी। उद्योगपतियों को हाथों-हाथ लिया गया। इस पूरे इवेंट में कहीं सरकार नजर नहीं आ रही थी! सबकुछ ऐसा था, जो इवेंट कंपनियां करती है। मुख्यमंत्री तो किसी इवेंट कंपनी के सीईओ के रोल में थे! उद्योगों के लिए प्रदेश में जुटाई गई सुविधाओं को किसी प्रोडक्ट की तरह परोसा गया! यही स्थिति उनकी मेजबानी में भी दिखाई दी! सबकुछ पांच सितारा था। अपने स्वागत भाषण में ही मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया था कि वे दो दिन यहीं हैं, पूरे 24 घंटे! कोई भी इन्वेस्टर कभी भी मुझसे मिल सकता है। जब मुख्यमंत्री का नजरिया ये रहा, तो नौकरशाह भी अपनी अफसरी किनारे रखकर इन्वेस्टर्स के सामने नत मस्तक रहे! मेहमान इन्वेस्टर्स की सुविधाओं के अलावा उनकी प्लानिंग को भी तवज्जो दी गई! लेकिन, समिट के बाद सरकार और उनके नौकरशाहों का रवैया कैसा रहता है, असल मुद्दे की बात ये है! क्योंकि, पिछले अनुभव बताते हैं कि इन्वेस्टर्स के लिए खिड़की के बजाए दरवाजे खोलने की बात करने वाली सरकार बाद में रोशनदान तक बंद कर देती है। जो नौकरशाह समिट के दौरान उद्योगपतियों के सामने बिछे जा रहे थे, वो उनसे मिलने तक को तैयार नहीं होते!      
   इन्वेस्टर्स के सामने सरकार ने प्रदेश की जो छवि परोसी है, निश्चित ही वो अतिश्योक्ति तो है! कुछ बातें बढा-चढ़ाकर दिखाई गई! बात चाहे बिजली की उपलब्धता की हो या भरपूर पानी की, दोनों का सच किसी से छुपा नहीं है! खपत से ज्यादा बिजली उत्पादन का मुख्यमंत्री का दावा प्रदेश के लोगों के गले नहीं उतरता! यदि वास्तव में प्रदेश में इतनी बिजली होती तो गाँव में आज भी घन्टों बिजली गायब नहीं रहती! किसानों को खेतों को पानी देने के लिए रातभर जागना नहीं पड़ता! शहरों में बिजली की कटौती नहीं होती! यही स्थिति पानी को लेकर भी है! पानी को लेकर पीथमपुर के उद्योगों को 4 महीने तक किस तरह जूझना पड़ता है, ये वहां के उद्योगपतियों को भी पता है। इसलिए नए इन्वेस्टर्स इस सबसे अनजान होंगे, ये नहीं समझा जा सकता! जहाँ तक जमीन की उपलब्धता की बात है, इस प्रक्रिया को जितना आसान बताया गया, वैसा होगा नहीं! आज हर इन्वेस्टर्स को इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर के नजदीक जमीन चाहिए! क्योंकि, महानगरीय सुविधाओं को वे जानते हैं। इसमें भी उद्योगपतियों पहली पसंद इंदौर है! लेकिन, इंदौर के आसपास उन्हीं उद्योगपतियों को जमीन मिलती है, जो सरकार पर प्रभाव डालने में कामयाब हो जाते हैं। एकेवीएन के पास पीथमपुर में करीब 1200 एकड़ जमीन है। माचल, महू के पास खंडवा, उज्जैनी में 150-150 एकड़ के साथ ही धामनोद व धार के हातोद में 1200-1200 एकड़ जमीन है। लेकिन, ये उन्हीं को मिलेगी जिनके पास कोई बड़ा राजनीतिक प्रभाव होगा।  
   ज्यादा जमीन लेने के मामले में बाबा रामदेव इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जिनके 'पतंजलि' प्रोजेक्ट को जमीन देने के लिए सरकार बिछी-बिछी सी दिखी! रामदेव ने अपने भाषण में सरकार को एक तरह से धमका ही दिया! 'हमें सरकार ने 45 एकड़ जमीन दी है, इतने में तो हम कबड्डी खेलते हैं!' बाबा रामदेव की इस बात के अपने इशारे थे। 'ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट' के मंच से रामदेव ने यह बोलकर सुर्खियां बटोर ली। इसके बाद असर ये हुआ कि सरकार 'पतंजलि' को ज्यादा जमीन देने को तैयार हो गई!   रामदेव पीथमपुर में फूड प्रोसेसिंग यूनिट और आयुर्वेदिक दवा का प्लांट लगाना चाहते हैं। बाबा और उनके सहयोगी बालकृष्ण आवंटित जमीन देख भी चुके हैं। एकेवीएन ने तो जमीन खोजने का काम भी शुरू कर दिया। सवाल उठता है कि क्या ऐसा रवैया क्या सरकार सभी इन्वेस्टर्स के साथ रख सकेगी? 
  सरकार का ये इवेंट इस मायने में तो काफी हद तक सफल रहा कि इन्वेस्टर्स को मध्यप्रदेश में काफी संभावनाएं दिखाई दी! बिजली, पानी को लेकर सरकार के दावों में कुछ मिलावट हो सकती है! पर यहाँ उद्योगों के लिए माहौल काफी हद तक बेहतर है। यहाँ कानून व्यवस्था को लेकर कोई बड़ी समस्या नहीं है। जबकि, जहाँ औद्योगिक इलाका बसता है, वहां विघ्नसंतोषी पनपने लगते हैं! जिस यूनियनबाजी से उद्योगपति हमेशा परेशान रहते हैं, उस तरह की समस्या नहीं के बराबर है। मुख्यमंत्री ने भी अपने भाषण में भी उल्लेख किया कि 'चाहे जो मज़बूरी हो, हमारी मांगे पूरी हो!' जैसी समस्या मध्यप्रदेश में नहीं है। लेकिन, सबसे बड़ा मसला है कि समिट के दौरान जो सकारात्मकता मुख्यमंत्री के साथ नौकरशाहों ने दिखाई, क्या वो आगे भी नजर आएगी? इसमें संदेह बरक़रार है! क्योंकि, उधोगपतियों और इन्वेस्टर्स को सबसे ज्यादा जूझना ही अफसरशाही से पड़ता है!          
  ये पूरा आयोजन राजनीति से परे था, पर राजनीति से जुड़े सवाल तो फिर भी उठे! इन्वेस्टर्स समिट में पूर्व उद्योग मंत्री और फिलहाल भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की गैर मौजूदगी पर खुसुर-पुसुर भी हुई! इंदौर की प्रथम नागरिक महापौर मालिनी गौड़ को भी तवज्जो न देने पर उंगली उठाई गई! बात यहाँ तक उठी कि सीधे मुख्यमंत्री से सवाल किए गए! शिवराजसिंह चौहान ने भी दोनों नेताओं की वरिष्ठता और व्यस्तता को आयोजन से बड़ा बताते हुए, सवालों को किनारे करने की कोशिश की! फिर भी बात निकली थी, तो उसका दूर तलक तो जाना ही था! 
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Monday, October 24, 2016

खलनायक नहीं तो कैसा नायक?

- हेमंत पाल 

   कभी किसी ने सोचा था कि एक दिन हिंदी फ़िल्मी दुनिया के दुर्दांत खलनायक प्राण को सिनेमा के प्रतिष्ठित सम्मान 'दादा साहेब फाल्के पुरस्कार' मिलेगा? ये बात अलग है कि उन्हें ये सम्मान चरित्र अभिनेता तौर पर दिया गया था। उल्लेखनीय बात ये है कि किसी कलाकार की कला को उसकी जिंदगी के 93वें साल इस सम्मान के लायक समझा गया! दरअसल, यहाँ प्राण का जिक्र इसलिए कि आखिर सिनेमा के परदे पर नायक का जन्म क्यों हुआ? क्यों नायक आदर्शवाद का प्रतीक होता है! सद्चरित्रता, अच्छाई, आत्मविश्वास, और पुरुषत्व उसमें कूट कूटकर भरा होता है। वो हर मुश्किल से जूझना और जीतना जानता है! कथानक में जो इन सभी गुणों के विपरीत होता है, वो है खलनायक! बरसों से हिंदी फिल्मों का कथानक इसी ताने-बाने के आसपास बुना जाता रहा है।
  खलनायक का चरित्र समय के साथ-साथ बदलता रहा! जैसा समय, वैसा खलनायक! फिल्मों में खलनायकी का इतिहास वर्ग संघर्ष से भी जुड़ा है। हिन्दी सिनेमा का शुरुआती वक़्त धार्मिक कथाओं का रहा! तब देवताओं और दानवों बीच अच्छाई और बुराई का संघर्ष होता था! लंबे समय तक दर्शक रामकथा, महाभारत और देवी-देवताओं से जुडी कथाओं का फ़िल्मी चित्रण देखते रहे! फिर परदे पर आया सामंतों, जमींदारों और साहूकारों से गरीब किसानों, मजदूरों और कर्जदारों की टकराहट का दौर! जिसमें नायक उभरकर सामने आया। उसके सामने खड़े थे क्रूर सामंत, जमींदार और साहूकार! नायक जितना सत्यवादी और आदर्श का प्रतीक था, खलनायक उतना ही जुल्मी, अय्याश और झूठा! कहने का आशय यह कि खलनायक  क्रूरता के सामने ही नायक को उभरने का मौका मिला! यदि खलनायक नहीं होता तो नायक की तुलना का कोई पैमाना भी नहीं होता!
    खलनायक वास्तव में समाज की शोषक शक्तियों का प्रतीक है। ये शक्तियां अलग-अलग समय में अपने रूप, रंग और तरीके बदलती आई! ग्रामीण पृष्ठभूमि में ये ताकतें सामंत और साहूकार थीं, तो शहरों में इनका रूप गुंडे, मवाली, चोर, बदमाश से लेकर तस्कर, माफिया, डॉन बन गया! पचास और साठ के दशक में जहाँ जमींदार और साहूकार की क्रूरता थी! वहीं सत्तर और अस्सी के दशक में उद्योगपतियों और कारोबारी खलनायक बने! अस्सी के दशक में जहाँ खलनायक चेहरे पर डॉन और माफिया सरगना का मुख़ौटा लगा था! वहीं नब्बे और उसके बाद के दशक में सुपर हीरो की तरह सुपर विलेन सामने आया!
  फिल्मकारों ने शायद नायक को आदर्श और सच्चा बताने के लिए उतने प्रयोग नहीं किए, जितना खलनायक झूठा और क्रूर दर्शाने के लिए! उसे विध्वंसक, बर्बादी के अड्डे का बादशाह, हिंसक और ख़ौफ़नाक बताने के लिए कई तरह के स्वांग रचे गए! 'शान' का कुलभूषण खरबंदा हो, 'मिस्टर इंडिया' का मोगाम्बो हो या फिर सर्वकालीन सुपर खलनायक 'शोले' का गब्बर सिंह! जब कम्प्यूटर का भी जमाना नहीं था, तब भी 'शान' में समंदर के बीच उसका आधुनिक अड्डा था! मोगाम्बो का तो अपना अलग ही अंदाज था! उसका चर्चित डायलॉग 'मोगाम्बो खुश हुआ' आज भी बोलचाल  शामिल है। जबकि, गब्बर की लोकप्रियता फिल्म नायकों से कहीं ज्यादा रही! अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और संजीव कुमार जैसे कलाकारों के होते हुए गब्बर सब पर भारी था! 'यहाँ से पचास-पचास कोस दूर तक, जब कोई बच्चा सोता नहीं है, तो माँ कहती है बेटा सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा!' इस एक डायलॉग में बहुत कुछ ऐसा था, जो तीन नायकों को बहुत पीछे छोड़ देता है। ये हिन्दी के मेनस्ट्रीम सिनेमा के भविष्य के खलनायकों के लिए भी इशारा था! खलनायक की बर्बरता में भी और शैतानी फितरतों में भी!
  फिल्मों में जिस तरह नायक का किरदार बदला, उसी तरह कथाकारों ने खलनायक में भी बदलाव किए! कई बार तो नायक ही खलनायक बन बैठा! कभी वो 'डर' का मनोरोगी बना! कभी 'रमन राघव' में सायकोपैथ किलर! 'धूम' सिरीज में तो खलनायक बनने को बड़े-बड़े नायक तरसते हैं। क्योंकि, जब नायकों को लगा कि खलनायकी में ज्यादा स्कोप है तो उन्होंने यही करने में बेहतरी समझी! ये वही दौर है, जिसकी शुरुआत में फिल्मों के दिग्गज नायकों में खलनायक बनने की हसरत बढ़ी! अमिताभ से शाहरुख खान और जॉन अब्राहम तक ने यही किया! शायद इसलिए कहा जाता है कि तीन घंटे की फिल्म में ढाई घंटे खलनायक के होते हैं!
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Thursday, October 20, 2016

सिंधिया के पास नहीं है, कांग्रेस की संजीवनी


- हेमंत पाल 


   कांग्रेस ने इन दिनों फिर करवट ली! उसे लग रहा है कि प्रदेश में भाजपा के प्रति लोगों में नाराजी बढ़ रही है। इसका फ़ायदा 2018 के चुनाव में मिल सकता है। यही कारण है कि ढाई साल से सुप्त पड़ी कांग्रेस अपनी सलवटें दूर करने में लगी है! पार्टी के जो तारणहार प्रदेश कांग्रेस से बेखबर थे, वे फिर सक्रिय लगने लगे! उनकी जय जयकार करने वाले भी कड़क खादी में नजर आ रहे हैं! कांग्रेस के जिन दिग्गजों के पास कांग्रेस की कमान समझी जाती है, उनके बयान फिर अख़बारों में दिखने लगे! संगठन के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव खिलाफ फिर तलवारें भांजी जाने लगी है। पहले कमलनाथ को अरुण यादव जगह मुखिया बनाने की चर्चा सुनी जा रही थी, अब ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सुनाई देने लगा! फिलहाल दिग्विजय सिंह चर्चा बाहर हैं! सिंधिया ने तो पार्टी को चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा तक घोषित करने की सलाह दे डाली थी! लब्बोलुआब ये है कि सिंधिया ने भावी मुख्यमंत्री बनने का सपना पाल लिया है। जबकि, 2013 के विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया ही चुनाव अभियान समिति के मुखिया थे और कांग्रेस 58 सीटों पर सिमट गई थी! इस बार भी सिंधिया वो संजीवनी नहीं खोज कर ला सके, जो कांग्रेस नैया पार लगा दे!  
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  ग्वालियर-चंबल संभाग की कांग्रेस राजनीति सिंधिया घराने से काफी प्रभावित रही है। पहले माधवराव सिंधिया और उनके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया! माधवराव पार्टी की रीति-नीति में इतना ढल गए थे, कि कार्यकर्ताओं ने उनमें राजशाही की ठसक कभी महसूस नहीं की! जबकि, ज्योतिरादित्य में अभी वह दंभ मौजूद है। उनके आचार-विचार से लगाकर व्यवहार तक में! उनकी भाव भंगिमाओं से लगाकर बोलचाल तक में राजशाही नजर आती है। सामान्य व्यवहार में तो ये स्वीकार्य है, पर राजनीति में इस तरह का दंभ स्वाभिमानी नेताओं को रास नहीं आता! 2013 के चुनाव में भी ऐसे कई प्रसंग आए, जब ज्योतिरादित्य को लेकर कई कांग्रेस उम्मीदवारों में नाराजी उभरी! इस चुनाव के दौरान ज्योतिरादित्य को पार्टी ने चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी सौंपी थी! कई टिकट उनकी सलाह पर दिए गए! चुनाव रणनीति बनाने में उनका दखल रहा! लेकिन, नतीजा इसके अनुरूप नहीं रहा! कांग्रेस मात्र 58 सीटों पर सिमट गई! जबकि, प्रदेश का राजनीतिक माहौल कांग्रेस के लिए इतना ख़राब नहीं था कि इतनी कम सीटें आएं! पार्टी के इस तरह मात खाने का एक मात्र कारण यही था कि कांग्रेस ने भाजपा को अपना प्रतिद्वंदी नहीं मानकर उन्हें प्रतिद्वंदी माना था, जो 'सिंधिया गुट' के नहीं थे! दबे-छुपे सिंधिया पर कई उँगलियाँ उठी थी!
   मध्यप्रदेश कांग्रेस की एकता हमेशा ही संदिग्ध रही है। आपातकाल के बाद 1981 में जब अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री पद सौंपा गया था, तब भी विरोध हुआ था! पर, इस विरोध दबा दिया गया, क्योंकि पार्टी बड़ी मुश्किल से सत्ता में वापस लौटी थी! लेकिन, बाद में आदिवासी फैक्टर का ध्यान रखते हुए शिवभानुसिंह सोलंकी को उपमुख्यमंत्री बनाना ही पड़ा! यही स्थिति बाद में दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में जमुनादेवी के मामले में आई थी! उन्हें भी उपमुख्यमंत्री बनाकर संतुष्ट किया गया था! अब कांग्रेस दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के आसपास चक्कर लगाती नजर आती है। अरुण यादव प्रदेश अध्यक्ष जरूर हैं, पर उनके पास अपनी कोई लॉबी नहीं है! वे अपने खंडवा और खरगोन क्षेत्र के चंद छोटे नेताओं से ही घिरे रहते हैं! अजय सिंह और सुरेश पचौरी तो इस दौड़ में बहुत पीछे छूट गए। इसके अलावा कई ऐसे क्षत्रप भी हैं, जिनकी कोई आवाज नहीं, पर उन्हें लगता है कि कांग्रेस उनके दम पर जिंदा है।  
  अगले विधानसभा चुनाव लेकर पार्टी में फिर हलचल होने लगी है। क्योंकि, प्रदेश अध्यक्ष बदला जाना तय माना जा रहा है! अरुण यादव के बाद जिसे प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बनाया जाएगा, वही नेता चुनाव भी कराएगा! यही भांपकर कांग्रेस के नेता रणनीति बनाने में लग गए हैं! दिग्विजय सिंह इस सबके बीच खामोश हैं! क्योंकि, उन्हें पता है कि मतदाताओं के बीच उनकी छवि अभी चुनाव जिताने वाली नहीं है। लेकिन, प्रदेश में सबसे बड़ी कांग्रेस लॉबी उन्हीं के पास है। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सबसे ताकतवर नाम कमलनाथ का उभरा है! दिग्विजय सिंह की तरफ से इस नाम की काट करने की कोशिश नहीं की गई, तो माना गया कि इसमें कहीं न कहीं उनकी सहमति है। यही कारण है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने नाम का पत्ता फैंककर कमलनाथ काटने की कोशिश की! ज्योतिरादित्य मुख्यमंत्री बनने का सपना जहन में रखकर पार्टी में प्राण फूंकने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, असलियत ये है कि पार्टी के इन्हीं नेताओं की कूटनीति के कारण प्रदेश में कांग्रेस की यह दुर्गति हुई है।
  सिंधिया आज खुद को कांग्रेस का सर्वमान्य नेता बताने कोशिश कर रहे हों, पर 2013 के चुनाव में उन्हीं पर कांग्रेस के कई नेताओं को हरवाने के आरोप लग चुके हैं। सेंवढ़ा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े घनश्याम सिंह ने सिंधिया पर सीधा आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने निजी सचिव को भेजकर उन्हें हरवाया! इसलिए कि घनश्याम सिंह ने सिंधिया का पाला छोड़कर दिग्विजय सिंह का दामन पकड़ लिया था। घनश्याम सिंह भी राजघराने से आते हैं पर उनमें दंभ नहीं है। अपने व्यवहार के कारण वे लोकप्रिय हैं! लेकिन, सिंधिया की कूटनीति का शिकार होकर चुनाव हार गए! कुछ ऐसी ही कहानी धार से कांग्रेस के उम्मीदवार रहे बालमुकुंद गौतम के साथ भी रही! समाजसेवा कारण क्षेत्र में लोकप्रिय गौतम को हराने के लिए कांग्रेस की सिंधिया लॉबी सक्रिय थी! बदनावर से अपने ख़ास राजवर्धनसिंह 'दत्तीगांव' को जिताने और गौतम को हरवाने के लिए सिंधिया गुट ने हर तरफ से पूरा जोर लगा दिया था! हश्र ये हुआ कि दत्तीगांव भी जीत नहीं सके! लहार से विधायक रहे गोविंद सिंह और ज्योतिरादित्य के बीच तनातनी के किस्से कांग्रेस की राजनीति में चटखारे ले लेकर सुनाए जाते हैं! सिंधिया के सलाहकार गोविंद सिंह पर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं और उन्हें पार्टी से बाहर करने की मांग तक कर रहे हैं। मुद्दे की बात ये है कि सिंधिया घराने की ठाकुरों से कभी नहीं बनी! ये परंपरागत दुश्मनी बरसों पुरानी है, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं! लेकिन, ये अब राजनीति में हथियार  इस्तेमाल होने लगी!
   ये प्रसंग इसलिए उठा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश में कांग्रेस के तारणहार बनना चाहते हैं। मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब पालकर वे प्रदेश अध्यक्ष बनने कोशिश में हैं। लेकिन, क्या सिंधिया प्रदेश की कांग्रेस राजनीति में इतने लोकप्रिय हैं कि मतदाता उनपर भरोसा करेंगे? न तो उनके पास दिग्विजय सिंह की तरह कार्यकर्ताओं और समर्थकों की लॉबी है और न वो सहजता, जिसकी राजनीति में जरुरत महसूस की जाती है! ठाकुरों से दूरी बनाने की आदत और 'महाराज' कहलाने की उनकी ठसक उनके रास्ते की सबसे बड़ी अड़चन है। 2013 में उनको आगे करके चुनाव लड़कर कांग्रेस ने देख भी लिया कि मतदाताओं की नजर में उनकी हैसियत क्या है? दोबारा यदि पार्टी ने ये गलती की, तो फिर कांग्रेस  बिखरने से कोई रोक नहीं पाएगा!
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