Saturday, February 27, 2021

सिनेमा के परदे के हाशिए पर दलित!

- हेमंत पाल

     हिंदी सिनेमा ने अपने सौ साल से ज्यादा लम्बे सफर में कई मुद्दों को छुआ। शुरू में धार्मिक कथाओं पर फ़िल्में बनी, फिर आजादी के संघर्ष को विषय बनाया गया। इसके बाद सामाजिक बदलाव और प्रेम कहानियों पर फ़िल्में बनाई जाने लगी। तात्कालिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी फ़िल्में बनी। वे पसंद की गई या नहीं, ये बात अलग है। पर, फ़िल्मकारों ने समाज के प्रति अपने दायित्व को दर्शाने की कोशिश जरूर की। लेकिन, फिर भी एक मुद्दा ऐसा है, जिससे फ़िल्मकार हमेशा बचते रहे, वो है दलितों से जुड़े विषय। हर साल 300 से ज्यादा फ़िल्में बनाने वाली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में दस फ़िल्में भी ऐसी नहीं हैं, जिनमें दलितों की वास्तविक पीड़ा को उबारा गया हो! 
     समाज में जब दशकों से इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर उथल-पुथल मची है, तो क्या कारण है कि फिल्मकार दलितों के हक से जुड़े सवालों से मुंह क्यों चुराते हैं! शुरू में ऐसा लगा था कि महात्मा गाँधी और उनके जैसे समाज  सुधारकों के कारण इस विषय को फिल्मकार आगे बढ़ाएंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि, ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा का हिस्सा नहीं होती और न सिनेमाघर में बैठे दर्शकों का मनोरंजन करती हैं। जब सिनेमा के परदे पर मनगढंत कहानियों का जमावड़ा है, तो फिल्म बनाने वालों को दलितों से जुड़े विषयों पर फिल्म बनाने में डर क्यों लगता है। समाज के इस दलित और पिछड़े वर्ग पर बनी फिल्मों की संख्या को जांचेंगे, तो आश्चर्य होगा कि दलित न सिर्फ़ जाति के वरीयता-क्रम से बल्कि सिनेमा से भी अछूत हैं। क्या ये माना जाए कि फिल्म इंडस्ट्री के सारे कथानक बाजार के बिकाऊ व्यवहार के साथ ही तय होते हैं!         आजादी से पहले 1936 में फ्रांज ऑस्टेन ने पहली बार 'अछूत कन्या' बनाकर दलितों के संवेदनशील मुद्दे को छुआ। फिल्म में ब्राह्मण लड़के का एक अछूत लड़की से प्रेम दिखाया गया था। तब माना गया था कि यह फिल्म महात्मा गांधी के अछूत उद्धार आंदोलन से प्रेरित है। इसके बरसों बाद 1959 में विमल राय ने भी 'सुजाता’ में एक अछूत लड़की और ब्राह्मण लड़के के बीच प्रेम का चित्रण किया! लेकिन, इन फिल्मों में जो सवाल उठाए, वे सामाजिक नहीं बल्कि निजी थे! फिल्म में दलित समाज के संघर्ष, उनकी पहचान से जुड़े सवाल का कोई जवाब नहीं था। ऐसा क्यों हुआ और इस विषय को बार-बार क्यों नहीं छुआ गया, ये अनुत्तरित ही है। 90 के दशक में जरूर दलितों से जुड़े मुद्दों पर सामाजिक चेतना जागी और इन्हीं सालों में दलितों और पिछड़ों का सामाजिक आंदोलन सड़क पर उतरा। इसके बावजूद फिल्मों में दलितों के संघर्ष और उनके अधिकार के मुद्दे गायब रहे। बैंडिट क्वीन, आरक्षण और 'मसान' जैसी फ़िल्में तो बनी, पर उनमें किरदार ही दलित दिखाई दिए, ज्वलंत मुद्दे नहीं दिखे। 
      फिर एक ऐसा दौर आया जब समानांतर सिनेमा उभरकर सामने आया। समानांतर यानी ग्लैमर से दूर ऐसा सिनेमा जो सीधे समाज से जुड़ा हो और गंभीर सवालों के जवाब ढूंढता हो! इस दौर में श्याम बैनेगल ने सामंतियों के हाथों दलितों के शोषित होने और फिर उनके विद्रोह की कहानियाँ गढ़ी! लेकिन,  अंकुर, दामूल और 'पार' जैसी फिल्मों में दलितों के सवाल फिल्म के मूल केंद्र में दिखाई नहीं दिए। इस सबसे लगता है, कि हिंदी फिल्में दलितों, वंचितों के संघर्ष और उनके सवालों से टकराने से बचती रही हैं। सौ साल से ज्यादा पुराने हिंदी फिल्म इतिहास में आश्चर्यजनक रूप से पहली बार अनुभव सिन्हा ने आयुष्मान खुराना के साथ 'आर्टिकिल-15' में समाज और सत्ता    से किए सवाल किए हैं। नायक से ज्यादा अच्छे ढंग से फिल्म में अन्य किरदार जातिगत और राजनीतिक सवाल उठाते हैं। 
     श्याम बेनेगल को कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। अपनी पहली फ़िल्म 'अंकुर' 1974 में बनाई थी। यह अछूत महिला और ब्राह्मण पुरुष के रिश्ते की कहानी थी। 1981 में सत्यजित राय ने 'सदगति' बनाई, जो उनकी दूसरी हिंदी फ़िल्म थी। ये प्रेमचंद की कहानी पर आधारित थी, जो नीची जाति के दुखी नाम के एक ऐसे आदमी के बारे में है, जो अपनी बेटी की शादी करवाना चाहता है और इसके लिए उसे ब्राह्मण की जरुरत है, जो घर आकर शुभ मुहूर्त निकाल सके। 1991 में बनी फिल्म 'दीक्षा' बॉलीवुड के बाहर की हिंदी फ़िल्म थी, जिसमें दलितों का ज़िक्र किया गया था। 1992 में इस फ़िल्म को हिंदी की सबसे अच्छी फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला। आशुतोष गोवारिकर की फिल्म 'लगान' गाँव की जिंदगी में गढ़ी हुई, व्यावसायिक कहानी थी। लेकिन, इस फिल्म में उन्होंने अछूतों को सवर्णों से बराबरी करने की अनुमति नहीं दी। गाँव का अछूत कचरा जब सकुचाकर मैदान से बाहर गई गेंद फेंकता है, तो वो घूम जाती है। फिल्म का नायक भुवन उस कचरा को अपनी टीम में लेना चाहता है, पर जब वह टीम के दूसरे सदस्यों को बताता है, तो वे खेलने से इंकार कर देते हैं। 1985 में बनी प्रकाश झा की 'दामूल' में गरीब दलितों का शोषण दिखाया गया था। इस फ़िल्म को पुरस्कार भी मिले। 2011 में उन्होंने दलितों से जोड़कर 'आरक्षण' बनाई। ऐसी ही एक फिल्म थी 1994 में बनी 'बैंडिट क्वीन' जो फूलन देवी पर केंद्रित थी। शेखर कपूर की इस फिल्म का कथानक दलितों पर नहीं था, पर माला सेन ने अपनी कहानी में इस समाज की पीड़ा को गंभीरता से दिखाया जरूर था।   
  सिनेमा की मुख्यधारा से अलग रहने वाले या यूँ कहिए कि समानांतर सिनेमा के पक्षधर निर्देशकों के सोच का तरीका कुछ अलग होता है। वे व्यावसायिक फ़िल्म निर्देशकों से ज़्यादा खुलकर सोचते हैं। उनके लिए फिल्म की व्यावसायिक सफलता ज्यादा मायने नहीं रखती। इसके बावजूद हिंदी सिनेमा में दलित समस्याओं पर बनी फिल्मों का अभाव है। जब वे सबकुछ दिखा सकते हैं, तो क्या कारण है, कि जाति के निषेध को तोड़ने की हिम्मत वे नहीं कर पाते। जबकि, अब महानगरों का नया दर्शक वर्ग समकालीन मुद्दों को परदे पर देखना चाहता है। इससे दलितों, पिछड़ों की अस्मिता के संघर्ष पर नई कहानियाँ गढ़ने का मौका मिलेगा और हिंदी सिनेमा की रचनात्मकता भी बढ़ेगी! दरअसल, हमारे देश के सिनेमा में सामाजिक जीवन के वास्तविक चित्रण का भारी अभाव है। इसका सबसे बड़ा कारण शायद यह है कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी सिनेमा के दर्शक समुदाय में शामिल नहीं हुआ! लेकिन, यह तब तक नहीं होगा, जब तक उनके हालात को सच्चाई के साथ नहीं दिखाया जाता।
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Friday, February 19, 2021

वक़्त के साथ खोया संगीत का माधुर्य!

- हेमंत पाल

     किसी भी फिल्म की सफलता में उसके गीत-संगीत की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार गीतों का माधुर्य ही दर्शकों को फिल्म देखने के लिए आकर्षित करता है। यही कारण है कि 50 और 60 के दशक की फिल्मों के साथ उनके संगीत को आजतक याद किया जाता है। क्योंकि, गीत-संगीत का माधुर्य कभी बनावटी नहीं होता! कालजयी गीतों को रचने से पहले गीतकार को फिल्म की सिचुएशन में डूबना पड़ता है, संगीतकार को उसमें मेहनत करना पड़ती है। क्योंकि, संगीत ऐसा सृजन है, जिसे धैर्य के साथ गढ़ा जाता है। कई दिनों की मेहनत के बाद एक गीत तैयार होता है। लेकिन, अब वो समय नहीं बचा! खाने में फास्ट फूड की तरह गीत भी रचे जाने लगे, जिनमें माधुर्य छोड़कर सब होता है! आज के संगीतकार नई पीढ़ी की पसंद की आड़ में कुछ भी परोसने से बाज नहीं आते! जबकि, ऐसा नहीं है। आज की नई पीढ़ी भी 60 और 70 के दशक के गीत ही सुनती दिखाई देती है। 
   एक दौर था जब राज कपूर, राजेंद्र कुमार, दिलीप कुमार, राजकुमार, शम्मी कपूर, विश्वजीत और जॉय मुखर्जी जैसे नायकों की फ़िल्में उनके गीतों की वजह से भी पसंद की गई! इसका कारण रहा कि इन्हें शंकर-जयकिशन, एसडी बर्मन, ओपी नैयर, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, मदन मोहन, उषा खन्ना जैसे संगीतकारों का साथ मिला। इस दौर में फिल्म का कथानक गीतों के साथ आगे बढ़ता था। लगता था कि गीतों को फिल्म के कहानी के साथ बुनकर लिखा गया हो! मुगले आजम, श्री 420 और 'मधुमती' को याद कीजिए, ये कुछ ऐसी ही फ़िल्में थीं, जिनकी कहानी और गीत दोनों एक-दूसरे में गुंथे हुए से लगते थे। इन फिल्मों के सभी गीतों का माधुर्य इतना कर्णप्रिय था, कि इन्हें हर दौर में पसंद किया गया! आज की फिल्मों में मुश्किल से किसी फिल्म के एक या दो गीत ही याद रखने लायक होते हैं। अब पहली बार बनी 'आशिकी' जैसी फ़िल्में भी नहीं आती, जिसका हर गाना हिट हुआ! 'आशिकी' दूसरी बार भी बनी, पर उसके गीत नहीं चले।       
   फिल्मी संगीत का असल दौर 40 और 50 का दशक था, जब विश्व युद्ध और उसके बाद देश के बंटवारे के बीच घिरे माहौल ने संगीत को प्रभावित किया। इस वक़्त में दो तरह के गीत रचे गए। एक थे रोमांस या विरह की पीड़ा वाले और दूसरे थे बंटवारे की पीड़ा की भावनाओं को व्यक्त करने वाले गीत। पंडित अमरनाथ के गीतों में भारतीय वाद्य ढोलक का जमकर उपयोग होने लगा! यह फिल्म संगीत का सुनहरा समय था। संगीत के साथ रिकॉर्डिंग और तकनीक ने जोर पकड़ा! देसी और विदेशी वाद्य यंत्रों का मेल दिखाई देने लगा। ढोलक को गिटार के साथ जोड़कर प्रयोग किए जाने लगे। इसी समय में लता मंगेशकर का उद्भव हुआ और उन्होंने नूरजहाँ के असर वाला गीत 'जिया बेकरार है आई बहार है' जैसा कालजयी गीत गाया। सचिनदेव बर्मन, नौशाद और शंकर जयकिशन के प्रयोग सामने आने लगे। देव आनंद और फिर गुरुदत्त की फिल्मों के गीतों में गिटार सुनाई देने लगा। 'प्यासा' के गीत 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए क्या है' और 'वक्त ने किया  सितम' जैसे गीतों की रचना में जितनी मेहनत की गई, उतना ही कर्णप्रिय संगीत भी रचा गया। 'मुगले आजम' में नौशाद ने संगीत वाद्यों का जिस तरह उपयोग किया, उससे उनकी संगीत की समझ की भव्यता सामने आई! 
    आजादी से पहले कई संगीतकार मुस्लिम घराने के थे और पुराने संगीत घरानों की जड़ों से जुड़े थे। उनके संगीत में उर्दू का प्रभाव दिखाई देता था। देश के आजाद होने के बाद लम्बे समय तक हिंदी फिल्म संगीत से उर्दू गायब सा हो गया था। लेकिन, पिछले कुछ सालों से फिर उर्दू शायरी और इस भाषा के सिद्धहस्त कलाकार सामने आए। राहत फतेहअली खान और शफकत अमानत अली जैसे गायकों के जुड़ने से संगीत में उर्दू भाषा का चलन बढ़ा है। ऐसे घरानों से संबंध रखने वाले कलाकारों की वजह से संगीत ने भी एक तरह की करवट ली। 
    सिनेमा के बीते दौर में फिल्मकारों को संगीत की अच्छी समझ होती थी! वे गीतों के बोल और संगीत की धुन से अंदाजा लगा लेते थे इन्हें लेकर दर्शकों/श्रोताओं की प्रतिक्रिया क्या होगी! लेकिन, अब व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता में माधुर्य वाले गीत गायब हो गए! गुलज़ार, इरशाद कामिल, जावेद अख्तर और स्वानंद किरकिरे जैसे कुछ गीतकारों को छोड़ दिया जाए, तो बाकी तो याद करने लायक भी नहीं हैं। बीते युग में सत्यजित रे और राज कपूर को संगीत की बहुत अच्छी समझ थी। इसके बाद सुभाष घई और जेपी दत्ता को भी इस लिस्ट में रखा  है, जिनकी फिल्मों के गीत याद रखने योग्य होते हैं। इसके बाद एक लम्बा दौर आया, जब फिल्मों से अच्छे गीत बिदा हो गए। लेकिन, संजय लीला भंसाली आज के दौर में अकेले ऐसे फ़िल्मकार हैं, जिन्हें सिनेमा की हर विधा में महारथ हांसिल है। उनकी फिल्म 'खामोशी' से लगाकर 'पद्मावत' तक के गीत-संगीत भुलाए नहीं जा सकते! संगीत को लेकर उनकी समझ इतनी अच्छी है कि 'रामलीला' से उन्होंने खुद अपनी फिल्मों का संगीत देना शुरू कर दिया। 'रामलीला' के बाद 'बाजीराव मस्तानी' में उनके संगीत को काफी सराहा गया। 
    फ़िल्मकार में यदि संगीत की पुख्ता समझ हो, तो वो किसी भी संगीतकार से अच्छा काम करवा सकता है। ऐसे ही एक फ़िल्मकार हैं, जेपी दत्ता जिनकी ज्यादातर फिल्मों का संगीत अन्नू मलिक ने दिया और उनके गीत खूब चले भी! जबकि, अन्नू मलिक का ट्रेक रिकॉर्ड इतना अच्छा नहीं है, कि उनके नाम पर मधुर गीतों की लिस्ट चस्पा हो! इसके बाद भी बॉर्डर, रिफ्यूजी, एलओसी और उमराव जान के लिए दत्ता ने अन्नू को निचोड़कर रख दिया और फिर जो गीत बने, अलग ही माधुर्य लिए थे। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि फिल्म संगीत के माधुर्य में संगीतकार के साथ-साथ निर्देशक की समझ भी जरुरी है। फिल्म के कथानक के साथ गीतों की जुगलबंदी बहुत जरुरी है।       
   फिल्म संगीत को गुलशन कुमार ने 90 के दौर में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे खुद न तो गीतकार थे और न फिल्मों में संगीत देते थे, पर वे सिनेमा में म्यूजिक बैंक का ऐसा कांसेप्ट सामने लाए थे, जिसने नए गीतकारों और संगीतकारों को मौका दिया। उन्होंने ऐसे दौर में मधुर गीतों को जिंदा रखा, जब फिल्म संगीत पटरी से उतरने लगा था। मिथुन चक्रवर्ती की डिस्को वाली फिल्मों से कानफोडू संगीत हावी होने लगा था। ऐसे में उन्होंने महेश भट्ट के साथ जोड़ी बनाकर कई ऐसी फ़िल्में बनाई, जिनके गीत याद किए गए। बहार आने तक, आशिकी, साजन, सड़क, दीवाना, दिल है कि मानता नहीं, हम हैं राही प्यार के जैसी संगीतमय फिल्में दीं। उन्होंने कई फ़िल्में तो सिर्फ गीतों के लिए बनाई! उनके बाद भी उनकी कंपनी तो है, पर उसमें से गीतों का माधुर्य गुम हो गया। बरसों से टी-सीरीज ने कोई संगीत से सजी फिल्म भी नहीं बनाई!  
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Sunday, February 14, 2021

मोहब्बत से सराबोर रहा सिनेमा का परदा!

- हेमंत पाल

    फिल्मों के लिए प्रेम यानी मोहब्बत बेहद मुफीद विषय रहा है। ये जीवन का ऐसा कोमल अहसास हैं, जिसे कहीं से भी मोड़कर उसे कथानक का रूप दिया जा सकता है। गिनती की जाए तो अभी तक जितनी भी फ़िल्में बनी, उनमें सबसे ज्यादा फिल्मों के विषय मोहब्बत के आसपास ही घूमते रहे। फिल्मों के  शुरूआती समय में धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर फ़िल्में बनी, फिर आजादी के बाद संघर्ष को विषय बनाकर कहानियाँ गढ़ी गई। लेकिन, उसके बाद 60 के दशक से लम्बे समय तक अधिकांश फिल्मों का कथानक मोहब्बत ही रहा! सफल और असफल दोनों तरह की प्रेम कहानियों पर खूब फ़िल्में बनी और चली! राजाओं, महाराजाओं की मोहब्बत के किस्से भी दर्शकों को चाशनी चढ़ाकर परोसे गए! दरअसल, सिनेमा में  मोहब्बत ऐसा जीवंत और जज्बाती विषय है, जिसकी सफलता की गारंटी ज्यादा होती है। प्रेम कहानियों पर बनी फ़िल्में परदे पर नए चेहरों को परोसने का भी सुरक्षित और मजबूत आधार रहा है। सिनेमा का इतिहास बताता है कि परदे पर जब भी में नए कलाकारों को उतारने का मौका आया, सबसे अच्छा विषय प्रेम से सराबोर कहानियों को ही समझा गया। 
      जब से मानव जीवन की शुरुआत हुई, पुरूष के साथ औरत की जरूरत महसूस की गई! क्योंकि, बिना औरत के प्रेम और सृष्टि की रचना असंभव है। इतिहास में भी इस बात का जिक्र है कि कई बड़े युद्ध सिर्फ मोहब्बत की खातिर लड़े गए। कई सल्तनतें इसी मोहब्बत की भेंट चढ़ी! इसलिए प्यार के जज्बे से हिंदी फ़िल्में भी अलग नहीं रह सकीं। फिल्म का कथानक कितना नयापन लिए हो, उसका मोहब्बत से कोई वास्ता न हो, फिर भी उसमें कहीं न कहीं एक प्रेम कहानी जन्म जरूर पनपती है। क्योंकि, प्रेम जीवन की वो शाश्वत सच्चाई है, जिसे नकारा नहीं जा सकता! भारतीय दर्शक के जीवन में  मोहब्बत के अलग ही मायने हैं और वो इन्हीं भावनाओं को वो हर पल जीता है। उसे 'मुगले आजम' की सलीम और अनारकली का इश्क कामयाब न होना उतना ही सालता है जितना 'सदमा' में श्रीदेवी और कमल हासन का बिछड़ना! फिल्म बनाने वालों ने भी दर्शकों की इस कमजोरी को अच्छी तरह समझ लिया। फिल्मों के हर कथानक में एक लव स्टोरी इसलिए होती है, कि ये सबसे बिकाऊ तड़का जो होता है। 
   फिल्मों में प्रेमियों का मिलन का तरीका कई बार इतना जोरदार होता है, कि युवा दर्शक अपने प्रेम को भी उसी रूप में महसूस करके समाज और परिवार से विद्रोह तक कर देते हैं। इसके विपरीत जब फिल्मों में मोहब्बत की  दुखांत कहानियां जन्म लेती हैं और देवदास, एक दूजे के लिए, क़यामत से कयामत तक और 'सैराट' जैसी फ़िल्में बनती है, तो यही दर्शक ख़ुदकुशी तक कर लेते हैं। क्योंकि, प्यार ऐसा जज्बात है, जिसकी तलाश हर किसी को जीवनभर रहती है। उसका स्वरूप चाहे जैसा भी हो, किंतु सच्ची मोहब्बत प्यार हर किसी की चाहत होती है। वैसे तो सामान्य जिंदगी में भी प्रेम कथाओं की कमी नहीं होती, पर दर्शक फिल्मों के जरिए अपनी मोहब्बत के अधूरे सपनों को जीता है। मुगले आजम, देवदास, सोहनी महिवाल से लगाकर 'धड़क' तक ने प्रेम के जज्बात को दर्शकों के दिलों में बसाया और जगाया! प्रेम के बिना भारतीय सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट के युग से अधूरा है! इसका सबसे सशक्त उदाहरण है कि साहित्यकार शरद चंद्र की कालजयी रचना 'देवदास' जिस पर सबसे ज्यादा फ़िल्में बनीं और हमेशा ही पसंद भी की गई! न सिर्फ हिंदी में बल्कि बांग्ला, तमिल, तेलुगु, असमिया और भोजपुरी समेत कई भाषाओं में दस से ज्यादा बार इस फिल्म के रीमेक बनें। इसमें पहली बार बनी मूक फिल्म भी शामिल है। ऐसा इसलिए कि शरद चंद्र ने प्रेम का ऐसा त्रिकोण रचा, जिसमें दर्शक हर बार उलझता रहा!
    पहली बार परदे पर उतरने वाले कलाकारों के लिए भी प्रेम कथाएं सबसे ज्यादा बार सफलता का आधार बनी! जब भी किसी सितारे के बेटे या बेटी को दर्शकों के सामने उतारा गया, ऐसी पटकथा रची गई, जिसका मूल विषय प्रेम रहा! आमिर खान (कयामत से कयामत तक), सलमान खान-भाग्य श्री (मैंने प्यार किया), अजय देवगन (फूल और कांटे), ऋतिक रोशन-अमीषा पटेल (कहो न प्यार है), राहुल रॉय-अनु अग्रवाल (आशिकी), संजय दत्त (रॉकी), सनी देयोल-अमृता सिंह (बेताब), कमल हासन-रति अग्निहोत्री (एक दूजे के लिए), ऋषि कपूर-डिम्पल (बॉबी), ट्विंकल खन्ना-बॉबी देयोल (बरसात), कुमार गौरव-विजयता पंडित (लव स्टोरी), शाहिद कपूर-अमृता राव (इश्क विश्क), दीपिका पादुकोण (ओम शांति ओम), इमरान खान (जाने तू या जाने ना), रनबीर सिंह (बैंड बाजा बारात), रणवीर कपूर-सोनम कपूर (सांवरिया), अभय देओल (सोचा न था), आयुष्मान खुराना (विकी डोनर), आलिया भट्ट-सिद्धार्थ-वरुण (स्टूडेंट ऑफ द ईयर) और आयुष शर्मा (लवयात्री) आदि। बाद में इन्होंने रास्ते भी बदले, पर करियर के शुरूआती दौर में रिस्क लेने की हिम्मत नहीं की।    
    हिंदी सिनेमा में अमर प्रेम कथाओं की फेहरिस्त अंतहीन है। मुगले आजम, आवारा, कागज के फूल, प्यासा, साहिब बीवी और गुलाम, पाकीजा, कश्मीर की कली, आराधना, बॉबी, सिलसिला, देवदास, मैंने प्यार किया, कयामत से कयामत तक, एक दूजे के लिए, दिल है कि मानता नहीं, लव स्टोरी, साजन, दिल, उमराव जान, 1942 ए लव स्टोरी, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कुछ कुछ होता है, रंगीला, कल हो न हो और 'जब वी मेट' के बाद बॉलीवुड में नई पीढ़ी के प्रेम को दर्शाने के लिए भी कई प्रेम कहानियां रची गई! जिसमें रहना है तेरे दिल में, बचना ए हसीनों, सलाम नमस्ते, लव आजकल, ये जवानी है दीवानी, वेकअप सिड, अजब प्रेम की गजब कहानी, रॉक स्टार, बर्फी, टू स्टेट्स, आशिकी-टू, कॉकटेल, शुद्ध देसी रोमांस, तनु वेड्स मनु, मसान, तमाशा, ए दिल है मुश्किल, बरेली की बर्फी जैसी अनेकों फिल्में रही! आशय यह कि परदे पर मोहब्बत का ये सिलसिला न कभी रुका है न रुकेगा। 
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Saturday, February 6, 2021

फिल्म का अंत किसी को न बताएं!

- हेमंत पाल

     फिल्म के अंत को गोपनीय बनाए रखने की इस तरह की हिदायतें कुछ साल पहले तक सस्पेंस फिल्मों के आखिरी दृश्य में दर्शकों के लिए परदे पर लिखी दिखाई देती थी। इसलिए कि ऐसी फिल्मों के अंत में कुछ ऐसा होता था, जो देखने वालों को चौंकाता था। फिल्म का कथानक कुछ इस तरह रचा जाता था, कि दर्शक उसके आकर्षण में फंस जाते थे। वे कहानी के ट्विस्ट की असलियत देख नहीं पाते थे और जब राज खुलता तो ऐसा पात्र संदेहों से घिरा मिलता, जिस पर किसी की नजर नहीं जाती थी! सस्पेंस फिल्मों में चौंकाने वाला इस तरह के अंत का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ! बस, दर्शकों को ये हिदायत देना बंद कर दिया गया कि फिल्म का अंत किसी को न बताएं! ऐसी फ़िल्में सिर्फ कलाकारों के अभिनय से ही दर्शकों को नहीं बांधती, इनकी पटकथा लेखन और डायरेक्शन भी कुछ नयापन होता है। अब तक कई थ्रिलर फिल्में आई, लेकिन सभी दर्शकों को बांध नहीं पाई। याद वहीं रहती, जिन्होंने अपनी पटकथा और डायरेक्शन का जादू दिखाया। पुरानी फिल्मों में तीसरी मंजिल, ज्वेल थीफ, इत्तेफ़ाक़, गुमनाम और आज के दौर की ए वेडनस डे, बदला, हमराज़, 100 डेज के बाद आयुष्मान खुराना की फिल्म 'अंधाधुंन' और अजय देवगन की 'दृश्यम' ऐसी ही फ़िल्में हैं, जिनके क्लाइमैक्स ने दर्शकों को कुर्सी से खड़ा कर दिया था। 'अंधाधुन' ने तो एक नया ट्रेंड बना दिया। इसमें एक अंधे आदमी का किरदार काफी रहस्यमय था। फिल्म की कहानी इसी के आस-पास घूमती है। इस पूरी फिल्म में अच्छा-खासा सस्पेंस बनाकर रखा गया।
     सिर्फ हिंदी फ़िल्में ही नहीं, हॉलीवुड में भी सस्पेंस, थ्रिलर वाली फिल्‍मों को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। डायरेक्‍टर, प्रोड्यूसर और स्क्रिप्‍ट राइटर एल्‍फ्रेड हिचकाक तो हॉलीवुड के 'मास्‍टर ऑफ सस्‍पेंस' ही कहे जाते रहे हैं। फिल्म इतिहास के पन्ने पलते जाएं, तो हिंदी फिल्मों में मर्डर मिस्ट्री और सस्‍पेंस फिल्‍मों की शुरुआत का श्रेय विजय आनंद को जाता है। उन्होंने 'तीसरी मंजिल' और 'ज्वेल थीफ' उस दौर में बनाने की हिम्मत की, जब दर्शकों को ऐसी कहानियों का अंदाजा भी नहीं था। ऐसी फिल्मों में पैसा लगाना भी एक तरह ही जुआं ही था। पर, विजय आनंद ने दर्शकों पर अपना जादू चलाया और उनकी कई फ़िल्में पसंद की गईं। उन्होंने ऐसे कई प्रयोग किए, जो सस्पेंस से लबरेज थे।  
     सस्‍पेंस और थ्रिलर हमेशा ही दर्शकों का प्रिय विषय रहा है। उन्हें ऐसी सस्पेंस फ़िल्में ही ज्‍यादा पसंद आती है, जिसके अंत के बारे में उसका अनुमान गलत निकले! फिल्‍म के क्‍लाईमेक्‍स में ऐसा शख्स सामने आए, जिसका दर्शकों ने अनुमान भी नहीं लगाया हो! ऐसी ही फिल्‍में दर्शकों को बांधने वाली होती है। अभी तक ये फ़िल्में सीमित थीं, पर ओटीटी प्‍लेटफॉर्म आने के बाद लगने लगा कि दर्शक सस्पेंस, थ्रिलर और मर्डर मिस्‍ट्री ही देखना चाहता है। जबकि, ये तीनों ही अलग-अलग शैलियां हैं। थ्रिलर फिल्मों में एक्‍शन होता है, लेकिन सस्‍पेंस नहीं! उनमें सस्‍पेंस की घटनाएं होती है, जिनका राज धीरे-धीरे खुलता रहता है। सस्‍पेंस फिल्म में न तो रहस्‍य जरूरी है और न एक्शन! इनमे चौंकाने वाले सीन ज्यादा होते हैं, जो दर्शक को सोचने का मौका भी नहीं देते। 
   मिस्‍ट्री और सस्‍पेंस थ्रिलर फ़िल्में एक जैसी नहीं होती। दोनों का ट्रीटमेंट अला-अलग होता है। सस्‍पेंस फिल्मों में राज धीरे-धीरे खुलते हैं! पर, मिस्‍ट्री फिल्मों में सिर्फ एक राज होता है, जिस पर से फिल्म के अंत में परदा उठता है। इस तरह की फिल्मों की पटकथा का ताना-बाना किसी हत्या के इर्द-गिर्द बुना जाता है। पूरी कहानी अनजान हत्यारे की खोज पर आधारित होती है। संदेह के लिए कई पात्रों को निशाने पर रखा जाता है। हत्यारे को पकड़ने के लिए पुलिस जो भी चाल चलती है, वही फिल्म का आकर्षण होता है। कभी फिल्म के नायक, नायिका या सबसे शरीफ पात्र के भी कातिल होने की स्थितियाँ निर्मित की जाती है। यानी दर्शकों को बांधने और उनका ध्यान बांटने के लिए कई हथकंडे रचे जाते हैं। देखा जाए तो दर्शकों को वही सस्पेंस फ़िल्में ज्यादा पसंद आती है, जो उन्हें हर सीन में चौंका दें। तीसरी मंजिल, ज्वेल थीफ, क़त्ल के बाद 'गुप्त' ऐसी ही रोचक फिल्म थी।    
   रामगोपाल वर्मा की 'कौन' को बॉलीवुड की बेस्ट साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म कहा हैं। यह पूरी फिल्म घर में बंद एक लड़की (उर्मिला मातोंडकर) की कहानी है, जो अजनबी (मनोज बाजपेयी) से बचने की कोशिश में रहती है। लेकिन, फिल्म का क्लाईमैक्स दर्शकों के होश उड़ा देता है। इसी तरह की फिल्म 'फोबिया' भी थी, जिसमें राधिका आप्टे ने काम किया। यह फिल्म ऐसी लड़की की कहानी है, जो बाहर निकलने से डरती है और खुद को घर में बंद कर लेती है। उसका डर ही फिल्म का क्लाइमैक्स है। बॉबी देओल, काजोल और मनीषा कोइराला की 'गुप्त' बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फिल्म थी। इसमें अंत तक किसी का ध्यान नहीं जाता और खलनायिका काजोल निकलती है। विद्या बालन की 'कहानी' और 'कहानी-2' दोनों ही फ़िल्में दर्शकों को अंत तक कुर्सी से बांधकर रखती है। किसी को भी अंदाजा नहीं होता कि आखिरी में क्या होगा! फिल्म 'नैना' एक अंधी लड़की की कहानी थी, जिसकी आंखें ट्रांसप्लांट की जाती है। लेकिन, इसके बाद उसे अजीब सी चीज़ें दिखाई देने लगती है। 'बदला' को हाल के दौर की बड़ी मर्डर मिस्ट्री फिल्म माना जाता है! इसे अंत तक देखने के बाद ही समझ आता है कि आखिर फिल्म क्या चाहती है! ये पूरी फिल्म सस्पेंस से भरी है! कलाकारों का अभिनय भी हैरान करता है!
   आज की संस्पेंस फिल्मों में ‘दृश्‍यम’ सबसे अच्छा उदाहरण है। इसमें अपराधी सामने होता है, लेकिन न तो पुलिस उसे पकड़ पाती है और न दर्शकों को समझ आता है कि उसने ये सब किया कैसे होगा! इस फिल्‍म में कोई मारधाड़ नहीं है और न कोई रहस्‍य! हत्यारा सबके सामने होता है, किंतु अपनी चतुराई से बचता रहता है। कोई ठोस सबूत न होने से पुलिस भी अंत तक उस पर हाथ नहीं डाल पाती! इसमें सस्‍पेंस और इमोशन का ऐसा घालमेल किया गया है कि फिल्म देखने वाले भी हत्यारे के पक्ष में नजर आते हैं। वे भी नहीं चाहते कि अपराधी पकड़ा जाए! कानून, गुमनाम, मेरा साया, इत्तेफाक, धुंध, अपराधी कौन, कब क्‍यों और कहां, खिलाड़ी, गुप्‍त, वह कौन थी, डिक्‍टेटर व्‍योमकेश बक्‍शी, मनोरमा सिक्‍स फीट अंडर, भूल भुलैया, एक चालीस की लास्‍ट लोकल, बदला, जानी गद्दार, अगली, तलवार, अंधाधुन, क़त्ल, दृश्‍यम और 'कहानी' ऐसी ही फ़िल्में थीं, जिनका जादू दर्शकों पर जमकर चला। 
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Saturday, January 30, 2021

46 साल बाद भी खड़ी है 'दीवार!'


- हेमंत पाल

   फ़िल्मी दुनिया की यादगार फिल्मों की फेहरिस्त बनाई जाए, तो उसमें 'दीवार' को भूलाया नहीं सकता! ये एक ऐसी फिल्म थी, जिसने न सिर्फ अमिताभ बच्चन को एंग्री यंगमैन के किरदार में स्थापित किया, बल्कि उस छवि को आगे भी बढ़ाया। कई मामलों में ये एक ट्रेंड सेटर फिल्म भी थी। ये गुस्सैल, नास्तिक पर माँ के प्रति समर्पित ऐसे नायक की फिल्म थी, जिसमें हर कलाकार ने यादगार भूमिका निभाई थी। 'दीवार' सिनेमा की दुनिया की उन चुनिंदा फिल्मों में है, जो 46 साल बाद भी यादगार बनी हुई है। कहा जाता है कि अमिताभ के विजय वर्मा का किरदार उस समय के मुंबई माफिया सरगना हॉजी मस्तान के जीवन का नाटकीय रूपांतरण था। जबकि, इस फिल्म को 'गंगा जमुना' और 'मदर इंडिया' से प्रभावित भी बताया जाता है। यश चोपड़ा निर्देशित इस फिल्म ने 'शोले' के बाद सलीम-जावेद को पॉपुलर फिल्म लेखक बना दिया था। 'जंजीर' ने जिस अमिताभ को एंग्री यंगमैन की पहचान दी 'दीवार' उसकी अगली कड़ी थी। इसके बाद ये नायक की ऐसी पहचान बन गई, जिसे अमिताभ ने तीन दशक तक भुनाया। सलीम-जावेद की अधिकांश फिल्मों में नायक का पिता से विद्रोह नजर आता है ('त्रिशूल' की तरह) लेकिन 'दीवार' में नायक के साथ उन्होंने माँ से रिश्ते का एक मार्मिक पहलू भी जोड़ा था।  
   जिस दौर में 'दीवार' आई थी, तब भारतीय समाज बदलाव की स्थिति में था। रहन-सहन, सोच, सामाजिक परिवेश के साथ युवा महत्वाकांक्षा भी कुंचाल भर रही थी। आजादी के बाद की दूसरी पीढ़ी बड़ी हो गई थी और बदलाव के इस समय में युवाओं में एक आक्रोश पनप रहा था। इसका सबसे बड़ा चेहरा बनी अमिताभ की दो फ़िल्में। पहली थी 'जंजीर' जिसमें उसकी आँखों के सामने पिता की हत्या हो जाती है। यही गुस्सा उसके जहन में उबलता रहता है। फिल्म में अमिताभ एक पुलिस अधिकारी थे, जो सिस्टम का शिकार होता था। इसी श्रृंखला की दूसरी फिल्म बनी 'दीवार' जिसने पूरे सिस्टम ठेंगा बता दिया था। महानगरों में गुंडागर्दी और उसकी आड़ में तस्करी का धंधा पनप रहा था। इसी आक्रोश का चेहरा बने अमिताभ बच्चन। 
   फिल्म का बेहद सशक्त सीन था अमिताभ बच्चन की बाँह पर 'मेरा बाप चोर है' लिखना। एक मिल मजदूर यूनियन के नेता की ये भूमिका सत्येन कप्पू ने की थी, जिन्हें मालिकों ने षड्यंत्र से चोर साबित कर दिया जाता है। निरूपा रॉय ने दो बेटों को नैतिक मूल्यों के साथ संवारने वाली माँ जैसी सशक्त माँ का किरदार निभाया था। लेकिन, दोनों बेटे 'गंगा-जमुना' की तरह अलग-अलग रास्तों पर निकल पड़ते हैं। लेकिन, क्लाइमेक्स में निरूपा रॉय की छवि 'मदर इंडिया' की नरगिस जैसी माँ की भूमिका से मिलती-जुलती है! 
    'दीवार' में ऐसे कई ऐसे दृश्य थे, जो अपने समयकाल से काफी आगे थे। यही कारण है कि 46 साल बाद भी वे प्रासंगिकता लिए हैं। 1975 में जब ये फिल्म रिलीज हुई, तब ऐसा सोच भी नहीं गया था। अमिताभ बच्चन का घोर नास्तिक होना। माँ के साथ बचपन से मंदिर के अंदर नहीं जाना और बाहर खड़े रहना। छोटेपन में ही यह कहना कि वो भगवान को नहीं मानता, वो जो भी करेगा अपने दम पर करेगा। यह लड़का पॉलिश करके पैसा कमाता है, लेकिन पॉलिश कराने वाले एक सेठ के पैसे फैंककर देने पर उससे कहता है 'मैं फैंके हुए पैसे नहीं उठाता।' चार दशक पहले किसी फिल्म में ऐसे दृश्यों और नायक के इतने विद्रोही रुख के बारे में सोचा भी नहीं जाता था। क्योंकि, तब फिल्म का नायक एक सद्चरित्र और सामाजिक होता था। भगवान को मानता था और परिवार के प्रति अपने दायित्व समझता था। पर, 'दीवार' फिल्म का नायक उस दौर के सारे नायकीय गुणों से परे था। जबकि, फिल्म में नायक के नास्तिक होने के बावजूद उसका कुली के बिल्ला नंबर 786 के प्रति उसकी आस्था बनी रहती है। फिल्म के अंत में जब छोटा भाई उसे गोली मारता है, तो यही बिल्ला उसके हाथ से छिटक जाता है।     
   फिल्म में अमिताभ डॉकयार्ड के कुली की भूमिका में थे, जहां के मजदूरों से वहाँ के गुंडे हफ्ता वसूली करते थे। एक दिन ये गुस्सैल कुली उन बदमाशों से भिड़ जाता है। लेकिन, उससे पहले अमिताभ का एक डायलॉग उस भिड़ंत का संकेत देता है। वे साथ काम करने वाले रहीम चाचा से कहते भी हैं 'जो पच्चीस बरस में नहीं हुआ, वो अब होगा। अगले हफ्ते एक और कुली इन मवालियों को पैसे देने से इंकार करने वाला है।' जब ये हफ्ता वसूली करने वाले उसे ढूंढ़ रहे होते हैं, तब ये कुली उनके गोदाम में ही उनका इंतजार कर रहा होता है! ये वो दृश्य था, जिसे फिल्म में सबसे ज्यादा तालियाँ मिली थी। उस दृश्य में एक डायलॉग था 'पीटर तेरे आदमी मुझे बाहर ढूंढ रहे हैं और मैं तुम्हारा यहां इंतजार कर रहा हूं।' वे गोदाम का दरवाज़ा अंदर से बंद करके चाभी पीटर की तरफ फैंकते हुए कहते हैं 'ये चाभी अपनी जेब में रख ले, अब ये ताला मैं तेरी जेब से चाभी निकालकर ही खोलूंगा!' फिल्म के ये कुछ ऐसे दृश्य थे, जिन्होंने अमिताभ के नायकत्व को चिरस्थाई बना दिया था। 
     फिल्म का भाइयों के बीच का एक दृश्य भी यादगार है। इसमें स्मगलर बना बड़ा भाई आक्रोश में छोटे भाई से कहता है 'आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है, तुम्हारे पास क्या है? सामने खड़ा शशि कपूर धीमी आवाज़ में कहते हैं 'मेरे पास मां है।' छोटे भाई के इस जवाब से अमिताभ का सारा दंभ धराशाई हो जाता है। फिल्म के अंतिम दृश्य में नास्तिक नायक का मंदिर में माँ की गोद में दम तोड़ना भी दर्शक भूल नहीं पाए हैं। फिल्म के ये कुछ ऐसे दृश्य थे, जिन्होंने उसे कालजयी बनाया।  
  1975 के साल को हिंदी फिल्मों के कभी न भूलने वाले समयकाल के रूप में इसलिए भी गिना जाता है, कि इस साल में चार ऐसी फ़िल्में आई, जो कई मामलों में मील का पत्थर बनी! शोले, धर्मात्मा, जय संतोषी मां और 'दीवार' ने कमाई के मामले में भी रिकॉर्ड बनाया। उस साल तीन फिल्मों ने 'दीवार' से ज्यादा कमाई की। लेकिन, उससे भी 'दीवार' का जादू कम नहीं हुआ। सबसे कम लागत में बनी 'जय संतोषी माँ' ने ज्यादा ज्यादा कमाई की थी। जबकि, एक करोड़ रुपए 'दीवार' ने तब कमाए, जब टिकट दर डेढ़ से तीन रुपए हुआ करती थी। 'दीवार' ने 1976 में साल की 'बेस्ट मूवी' के ख़िताब के साथ छह फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते थे। सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता व सहअभिनेत्री को छोड़कर सभी अवॉर्ड 'दीवार' के खाते में गए थे। आज 46 साल बाद इस फिल्म के 12 में से 10 बड़े किरदार दुनिया में नहीं हैं। अमिताभ बच्चन के अलावा नीतू सिंह ही हैं, जिन्होंने इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई थी।   
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Saturday, January 23, 2021

परदे की दुनिया में आस्था का मज़ाक

- हेमंत पाल

    लॉकडाउन के दौरान जब सिनेमाघर बंद हो गए और फिल्म के शौकीनों के पास कोई विकल्प नहीं बचा, तब ओटीटी प्लेटफॉर्म की डिमांड बढ़ी! लोगों ने वेब सीरीज देखना शुरू किया और इसके साथ ही इसकी खामियों पर भी नजर पड़ी। खुलेआम गालियों और अश्लील दृश्यों के अलावा वेब सीरीज की एक सबसे बड़ी खामी हिंदू देवी-देवताओं के प्रति निरर्थक टिप्पणियाँ और उनका मजाक उड़ाना भी है! 'तांडव' ऐसी ही एक वेब सीरीज है, जिसे लेकर लोगों का विरोध सामने आया। इस वेब सीरिज़ का नाम नृत्य के एक रूप 'तांडव' पर रखा, जो भगवान शिव समेत हिंदू देवताओं से जुड़ा है। आरोप है कि इस वेब सीरीज में भगवान शिव के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें भी कही गई! इस तरह का ये पहला मामला नहीं है। कुछ दिन पहले एक अन्य वेब सीरीज 'ए सूटेबल बॉय' पर भी मंदिर की पवित्रता भंग करने का आरोप लगा था। एक ही एपिसोड में कई बार मंदिर परिसर में चुंबन दृश्य फ़िल्माए गए। पटकथा के अनुसार मुस्लिम युवक को हिंदू महिला प्रेम करती है! लेकिन, सवाल उठता है कि सभी चुंबन दृश्य मंदिर परिसर में ही क्यों फिल्माए गए!  
    पहले फिल्मों में और अब वेब कंटेंट में हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करना एक शगल बन चुका है। फिल्मकारों को लगता है कि ऐसे विवाद उठेंगें तो दर्शक आकर्षित होंगे और फिल्म या वेब सीरीज चलेगी। सैफ अली खान ने चर्चित वेब सीरीज 'सेक्रेड गेम्स' में सरदार की भूमिका निभाई है। इसमें  सैफ का किरदार सरताज नाम का सरदार था, जो एक दृश्य में हाथ में पहनने वाला कड़ा निकालकर फेंक देते हैं, जिसे लेकर विवाद खड़ा हुआ था। अपहरण, गंगाजल और 'आरक्षण' जैसी हिट फिल्म बनाने वाले प्रकाश झा की वेब सीरीज 'आश्रम' को लेकर भी विवाद हुआ था। सीरीज में बॉबी देओल ने बाबा निरालापुर काशीपुर वाले का किरदार निभाया है। इस पर भी रोक लगाने की मांग उठी थी। 
   लॉकडाउन के बाद ओटीटी पर रिलीज हुई अक्षय कुमार की फिल्म 'लक्ष्मी' (जिसका नाम पहले 'लक्ष्मी बॉम्ब' था) को लेकर भी विरोध पनपा था। निर्माता ने सोचा होगा कि फिल्म के नाम के साथ 'बॉम्ब' लगाने से फिल्म हिट हो जाएगी। लेकिन, विरोध के कारण फ़िल्म का टाइटल बदलना पड़ा। यह तमिल में बनी फिल्म 'कांचना' का हिंदी रीमेक था। तमिल फिल्म में बुराई पर अच्छाई की जीत होने पर पार्श्व में गीता के श्लोक सुनाई देते हैं। जबकि, 'लक्ष्मी' में ऐसा कुछ नहीं है। देखा जाए तो रीमेक में 'कांचना' के वे सारे दृश्य नहीं फिल्माए गए, जहां हिंदू धर्म की अच्छाइयों को दर्शाया गया था। यही कारण रहा कि 'लक्ष्मी' एक हिंदू विरोधी फिल्म बनकर रह गई! इससे पहले विरोध होने पर संजय लीला भंसाली की फिल्म 'राम लीला' का नाम बदलकर 'गोलियों की रासलीला-रामलीला' रखा गया था। फिल्म में दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म का नाम सामने आने के बाद इतना विवाद हुआ कि निर्माता को फिल्म का नाम बदलना पड़ा। कई हिंदूवादी संगठनों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किए और सिनेमाघरों को नुकसान पहुँचाने की धमकी दी थी, इसके बाद ही फिल्म का नाम बदला गया। 
     सलमान खान के जीजा आयुष शर्मा की पहली फिल्म 'लवरात्रि' का नाम भी ‘लवयात्री’ किया गया था। इस फिल्म के नाम को लेकर भी आपत्ति आई थी। हिंदू संगठनों का आरोप था कि फिल्म के नाम से हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। ओटीटी पर रिलीज हुई फिल्म 'लूडो' को लेकर भी सवाल उठे। इस फिल्म में चार कहानियों को एक में पिरोया गया! लेकिन, आरोप है कि निर्देशक अनुराग बासु ने यहाँ भी अपनी हिंदू विरोधी सोच का तड़का लगाने का मौका नहीं छोड़ा। हिंदू धर्म और संस्कृति को निशाना बनाने के लिए उन्होंने पांडवों को गलत और कौरवों को सही करार दिया, वहीं ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूपों का भी उपहास बनाया। 
    आमिर खान की फिल्म 'पीके' को लेकर हिंदू संगठनों ने बहुत विरोध किया था। उनका कहना था कि फिल्म में हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया। फिल्म के ऐसे दृश्य हटाने की मांग भी उठी थी। इस फिल्म में एक पाखंडी संत को बहुत ज्यादा महिमा मंडित किया गया था! लेकिन, इतने विरोध और मामला अदालत तक जाने के बावजूद न तो फिल्म पर रोक लगी और न कोई दृश्य हटाया गया। उत्‍तराखंड में 2013 में आई प्राकृतिक आपदा की पृष्‍ठभूमि पर बनी फिल्‍म 'केदारनाथ' भी विवादों में रही। इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि इस फिल्म ने हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है। इस पर लव जिहाद को भी बढ़ावा देने का आरोप लगा था। फिल्म के टीजर में सुशांतसिंह राजपूत और सारा अली खान के बीच एक चुंबन दृश्य दिखाया गया। इसके पोस्टरों में टैगलाइन थी 'लव इज ए पिलग्रिमेज' जिस पर आपत्ति जताते हुए कहा गया था कि यह हिंदू धर्म पर हमला है। क्योंकि, केदारनाथ करोड़ों हिंदुओं की आस्था को व्यक्त करता है। 
    हिंदू आस्था के प्रति गंभीर विचार रखने वालों का कहना है, कि ऐसी फिल्में और वेब सीरीज दिखाकर हिंदुओं की धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाई जाती है। 'गोलियों की रासलीला : राम लीला' में राम की भूमिका को गलत तरीके से दर्शाया गया था। जोधा-अकबर में भी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और अकबर को सकारात्मक ढंग से दिखाया था। 'बाजीराव मस्तानी' में भी मस्तानी को सीधा दिखाया गया, लेकिन वास्तव में मस्तानी बेहद सख्त और राजा के हर फैसले में दखलंदाजी करने वाली थी। प्रियंका चोपड़ा ने हॉलीवुड में जो 'क्वांटिको' शो किया, उसमें भी हिंदू आतंकवाद की कहानी दिखाई गई है। इसमें पाकिस्तान को पीड़ित पक्ष दिखाया है। अगर सिनेमा को देश और समाज का आईना माना जाता है, तो समाज के हर धर्म का ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि वास्तव में फिल्मों में समाज का सही चेहरा दिखाया जाता है, तो परदे पर सभी धर्मो के बारे में दिखाना जाना जरुरी है। सिर्फ एक धर्म को निशाने पर रखकर दूसरे धर्मो को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा, तो इससे देश में बदलाव नहीं होगा बल्कि विवाद ही पनपेंगे। 
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Sunday, January 10, 2021

देवर-भाभी के रिश्तों का लम्बा दौर!

- हेमंत पाल 

  भाभी ऐसा रिश्ता है, जिसे भारतीय समाज में उतना ही सम्मान मिला है जितना माँ को! पौराणिक काल में सीता जैसी भाभी हुई, तो स्वातंत्रय काल में दुर्गा भाभी ने अपने देवरों के साथ मातृवत व्यवहार कर इस रिश्ते की गरिमा को बढाया। वैसे तो देवर-भाभी के बीच बेटे और माँ की तरह संबंध रहता है। लेकिन, उत्तर और पूर्वी भारत में देवर-भाभी के रिश्तों में मीठी नोंकझोक भी देखी जाती है। देवर-भाभी के इसी खट्टे-मीठे रिश्तों को फिल्मों और टीवी सीरियल्स में भी जमकर भुनाया। कभी इस विषय पर दर्शकों को हंसाया, रूलाया और गुदगुदाया तो कभी साजिशों का भी दौर चला!
   जब मनोरंजन जगत में छोटे परदे का आगाज नहीं हुआ था, तब फिल्मों में भाभी का महिमा मंडन कुछ ज्यादा ही हुआ! 1957 में एवीएम ने 'भाभी' शीर्षक से फिल्म बनाई, जिसमें बलराज साहनी, नंदा, पंढरीबाई, ओमप्रकाश और जगदीप की प्रमुख भूमिका थी। फिल्म में भाइयों के बीच संपत्ति के बंटवारे और देवर-भाभी के बीच स्नेह की चाशनी का तड़का था। फिल्म को आंसुओं में भिगोकर 'चली चली रे पतंग मेरी चली रे' और 'चल उड़ जा रे पंछी' के अलावा 'टाई लगाके माना बन गए जनाब हीरो' जैसे चुहलबाजी वाले गीतों के साथ प्रस्तुत की गई थी। उसके बाद 1961 में आई 'भाभी की चूड़ियाँ' भी लगभग इसी फार्मूले का नया ट्रीटमेंट था। इसमें भी बलराज साहनी की मुख्य भूमिका थी। इस फिल्म में देवर-भाभी की भूमिका में शैलेष कुमार और मीनाकुमारी ने दर्शकों को आँसुओं में भिगोकर साथ बाॅक्स ऑफिस पर पैसा बटोरा था। इस फिल्म में सुधीर फडके और पंडित नरेन्द्र शर्मा की रचना 'ज्योति कलश छलके' आज भी उतना ही लोकप्रिय है।
   हिन्दी फिल्मों की भाभियों में निरूपा राय, श्यामा, जयश्री टी, इंद्राणी मुखर्जी ,शशिकला, रेणुका शहाणे ने बडे पर्दे को रोशन किया, तो मीना कुमारी , शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी और रेखा जैसी नायिकाओं ने भी समय-समय पर भाभी बनकर दर्शकों का मनोरंजन किया। छठे दशक से लेकर नौंवें दशक तक देवर-भाभी को लेकर कभी पूरी फिल्में बनी, तो कई फिल्मों में इस रिश्ते को उपकथा बनाकर कहानी को आगे बढाया गया। छठे और सातवें दशक में पारिवारिक फिल्मों में भाभियों का किरदार लम्बा चला। नायक के बड़े भाई की पत्नी जो नायक से पुत्रवत प्रेम करती है। जबकि, उनके पति किसी दूसरी महिला या कोठे वाली के चक्कर में पड़कर भाभी को आँसू बहाने पर मजबूर करते हैं। ऐसे में तो देवर अपनी भाभी को सुख दिलाने के चक्कर में खुद अपनी जिंदगी बरबाद कर लेता है। फिल्म की आखिरी रील में भाभी का त्याग और देवर की कोशिशें रंग लाती और फिल्म की शुरूआत से रुआंसे हुए दर्शक हंसते-हंसते घर रवाना होते थे। देवानंद की 'लव मैरिज' और शम्मी कपूर की 'जानवर' ऐसी ही फिल्में थी। राजश्री ने भी अपनी फिल्मों में देवर-भाभी के रिश्ते को गहराई तक भुनाया। 'नदिया के पार' और उनके नए संस्करण 'हम आपके हैं कौन' के अलावा राजश्री की कई फ़िल्में हैं, जिनमें भाभी की भूमिका को ऊंचाई दी गई।    
   इस विषय पर दूसरे तरह की फिल्मों में देवर-भाभी के निश्च्छल प्रेम को अवैध संबंध बताकर कभी नायक के भाई तो कभी नायिका को नाराज करने का प्रयोग किया जाता रहा। 'शरारत' में मीना कुमारी और किशोर कुमार के पवित्र रिश्ते में दरार पैदा करके राजकुमार के दिल में गलत फहमी पैदा की गई थी। 'घराना' और 'घूँघट' में राजेन्द्र कुमार अपनी भाभी से स्नेह कर अपनी प्रेमिका के दिल में गलतफहमी पैदा करवा देते है। लेकिन, इन फिल्मों का अंत अकसर सुखांत ही होता था। हिन्दी फिल्मों ने भाभियों को जितना सम्मान दिया, छोटे पर्दे पर एकता कपूर जैसी निर्माताओं ने 'भाभी' का उतना ही सत्यानाश किया! उनके सीरियलों की भाभियां तितलियों की तरह होती हैं, जो हर समय दांत पीसते हुए ही डायलाॅग बोलती है। कॉमेडी सीरियल 'भाभीजी घर पर हैं' की भाभियां तो पड़ौसी देवरों को सेड्यूस कर छिछोरी हरकतें किया करती हैे। 
   ऐसा नहीं कि सभी हिन्दी फिल्मों की भाभियां अपने देवरों पर प्यार उंडेलती ही दिखाई देती है। जयश्री टी, श्यामा, बिंदु और शशिकला जैसी भाभियों ने भाईयों के बीच दीवार खड़ी करके नायक को घर से बाहर का रास्ता दिखाने का भी काम किया है। लेकिन, पति या बेटे-बेटी के बीमार होने पर या 'दो रास्ते' की तरह पति से थप्पड खाकर ये भाभियाँ भी फिल्म के अंत तक सुधर जाती है। भाभी से इस तरह प्रताड़ित होने वाले देवरों में जितेन्द्र, ऋषि कपूर, गोविंदा और राजेश खन्ना को महारथ हांसिल थी ,ये रील दर रील भाभी मां का राग अलाप कर दर्शकों की आंखें नम कर फिल्मों को सफल बना देते थे।
   देवर -भाभी के पवित्र रिश्तों पर बनी अब तक की फिल्मों में राजेन्द्रसिंह बेदी के उपन्यास 'एक चादर मैली सी' सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है। यह पंजाब की ऐसी रूढ़ीवादी परंपरा को दिखाती है, जिसमें बड़े भाई की मौत के बाद भाभी को उसके देवर से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता था। 'एक चादर मैली सी' में बड़े भाई के मरने के बाद रानो को उसके देवर मंगल से चादर ओढ़ाने के लिए कहा जाता है, जिसे भाभी ने अपने बेटे की तरह पाला था। पहली बार गीताबाली ने 'रानो' नाम से इस फिल्म को बनाया गया, जिसमें राजेश खन्ना को प्रमुख भूमिका दी गई थी। लेकिन, बाद में धर्मेन्द्र को लेकर यह फिल्म बनाई गई। फिल्म लगभग पूरी भी हो गई थी। इसी बीच गीताबाली का निधन हो गया। फिल्म ने राजेन्द्रसिंह बेदी और शम्मी कपूर को इतना दुखी कर दिया कि बेदी ने गीताबाली की चिता पर ही फिल्म की पटकथा को जला दिया और शम्मीकपूर ने फिल्म की सारी निगेटिव को भी आग के हवाले कर दिया था। बाद में 1986 में सुखवंत ढड्डा ने हेमामालिनी, ऋषिकपूर और पूनम ढिल्लो को लेकर 'एक चादर मैली सी' का निर्माण किया था। लेकिन, फ़िल्मी दुनिया में अनिल कपूर और श्री देवी की वास्तविक देवर-भाभी की जोड़ी भी थी, जिसने कई फिल्मों में नायक-नायिका के किरदार निभाए! लेकिन, परदे से इतर अनिल कपूर अपनी भाभी को पूरा सम्मान देते थे। 
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