Sunday, July 31, 2016

सेरोगेसी, कुंवारा हीरो और समाज

हेमंत पाल 

   महमूद के निर्देशन में 1974 में अमरलाल छबरिया में एक फिल्म बनाई थी 'कुंवारा बाप' जिसमें एक ऐसे बाप की परेशानियों को दर्शाया गया था, जो एक लावारिस बच्चे को पिता बनकर पालता है। महमूद जैसे कॉमेडियन ने लावारिस बच्चों के इस गंभीर विषय को उठाकर दर्शकों को झकझोर दिया था! वो तो फिल्म थी, लेकिन 'कुंवारा बाप' बनने का जीवंत कारनामा एक अभिनेता ने वास्तव में कर दिखाया! जीतेन्द्र के बेटे तुषार कपूर ने एक्टिंग में अपने पिता की तरह कोई झंडे तो नहीं गाड़े, पर वे 'कुंवारा बाप' जरूर बन गए। तुषार की उम्र करीब 40 साल है, उन्होंने अभी तक शादी नहीं की! लेकिन, तुषार कपूर आईवीएफ और सरोगेसी के ज़रिए एक बेटे के पिता बन गए। भारतीय संस्कृति में पिता के नाम से वंश को आगे बढ़ाने की जो परंपरा है, तुषार ने अपना वो दायित्व भी निभा दिया! उन्होंने सरोगेसी तकनीक से पिता बनने का फैसला निर्देशक प्रकाश झा की सलाह से किया! बॉलीवुड में सेरोगेसी से माता-पिता बनाना नई बात नहीं है! नया सिर्फ ये है कि तुषार ने बिना शादी के इस तकनीक से पिता बनने का साहस किया! मुद्दे की बात ये है कि हमारा रूढ़ीवादी समाज भी अब इस तरह के बदलाव को स्वीकारने लगा है। कुंवारेपन में बच्चे गोद लेकर तो सुष्मिता सेन, रवीना टंडन और प्रीती जिंटा समेत कई एक्ट्रेस माँ बन चुकी है। सुष्मिता को छोड़कर बाद में सभी ने शादी भी कर ली!  
  बॉलीवुड में इन दिनों सेरोगेसी का ट्रेंड सा चल रहा है। कई कपल्स सेरोगेसी से पेरेंट्स बनने की इच्छा पूरी कर रहे हैं। जानी-मानी डांस डायरेक्टर फराह खान ने 40 की उम्र में शिरीष कुंदर से शादी की! क्योंकि, इस उम्र में वे बच्चा कंसीव नहीं कर सकती थी। इसलिए फराह और शिरीष ने आईवीएफ ट्रीटमेंट की मदद ली और फराह को एक साथ तीन बच्चे पैदा हुए! सोहेल खान और उनकी पत्नी सीमा ने पहले बेटे जन्म के बाद और शादी के 10 साल होने पर सरोगेसी ट्रीटमेंट का फैसला किया। 2011 में दोनों एक बेटे के माता-पिता बनें। दो बच्चों के बाद शाहरूख ने तीसरे बच्चे के लिए आईवीएफ सरोगेसी अपनाई और तीसरे बच्चे के पेरेंट्स बने। आमिर खान पहली शादी रीना दत्त से हुई थी। रीना से आमिर के दो बच्चे हैं। रीना को तलाक देने के बाद आमिर ने किरण राव से शादी की! लेकिन, किरण की प्रेगनेंसी में कुछ परेशानी थी, इस कारण दोनों ने आईवीएफ सरोगेसी की मदद ली और 2011 में उनके यहाँ बेटे का जन्म हुआ!
  बॉलीवुड निर्देशक करण जौहर भी बिना शादी के पिता बनने जा रहे हैं! लेकिन, वे बच्चे को गोद लेकर पिता बनना चाहते हैं। सुष्मिता सेन ने तो तीन लड़कियां गोद ली और अभी तक शादी भी नहीं की! रवीना टंडन भी उन एक्ट्रेस में से एक हैं, जिसने शादी से पहले दो बेटियों को गोद लिया था। एक की शादी हो चुकी है और एक बच्चे की मां भी बन चुकी हैं। सलमान खान के पिता सलीम खान ने एक अनाथ बच्ची अर्पिता को गोद लेकर पाला, जिसकी शादी सलमान ने बड़ी धूमधाम से की थी! खबर ये भी है कि सलमान ने भी एक 6 महीने के अनाथ बच्चे को गोद लिया है। निर्देशक सुभाष घई ने भी एक बेसहारा बच्ची मेघना को सहारा दिया! मेघना के प्रति उनका लगाव इतना ज्यादा है कि उनके प्रोडक्शन हाउस और एक्टिंग स्कूल की देखभाल मेघना ही करती है। एक्टर मिथुन चक्रवर्ती के तीन बच्चे हैं, फिर भी उन्होंने एक बेटी गोद ली है। नीलम और समीर सोनी ने भी शादी के दो साल बाद एक बच्ची को गोद लिया! ये लिस्ट अभी अधूरी है, बॉलीवुड के कई और कपल्स इस विकल्प को अपनाने के लिए सामने आ सकते हैं।  
  हॉलीवुड में भी बच्चों को गोद लेकर पेरेंट्स बनने वालों की कमी नहीं है। एक्ट्रेस एंजेलिना जोली और उनके ब्वॉयफ्रेंड ब्रेड पिट अब तक तीन बच्चे गोद ले चुके हैं। उनके खुद के भी तीन बच्चे हैं। निकोल किडमैन ऑस्ट्रेलियाई एक्ट्रेस, सिंगर और फिल्म प्रोड्यूसर हैं। दो बार शादी कर चुकीं निकोल अपने पहले पति टॉम क्रूज के साथ दो बच्चों को गोद ले चुकी हैं। चार्लीज की पहचान अमेरिकी और अफ्रीकी एक्ट्रेस के रूप में है। कई हॉलीवुड फिल्मों में अपनी अदाओं का जादू चला चुकी चार्लीज ने अब तक शादी नहीं की, लेकिन उनका गोद लिया बेटा है जैक्सन थेरॉन। उन्होंने इस बेटे को 2012 में गोद लिया था। हॉलीवुड एक्ट्रेस और प्रोड्यूसर कैथरीन हीगल अपने पति के साथ मिलकर दो बच्चियों को गोद ले चुकी हैं। अमेरिकी एक्ट्रेस और सिंगर मिशेल मैरी फीफर शादी के पहले ही मां बन गई थीं। 1993 में डेविड ई केली से शादी करने से पहले उन्होंने क्लाउडिया रोज को गोद लिया था। मिशेल ने डेविड से दूसरी शादी की थी, जबकि उनकी पहली शादी 1988 में तलाक के साथ ख़त्म हो गई थी। हॉलीवुड के बाद अब बॉलीवुड में भी सेरोगेसी ट्रीटमेंट और गोद लेने का चलन बढ़ रहा है। लेकिन, तुषार कपूर ने जो किया वो एक नया कदम है! हमारे यहाँ हीरो को प्रेरणा मानकर उसके नक्शेकदम पर चलने का चलन भी है! अब देखना कि कितने लोग तुषार कपूर की तरह 'कुंवारा बाप' बनने का साहस कर पाते हैं!
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Saturday, July 30, 2016

बुंदेलखंड की कमाई से भरती है मध्यप्रदेश की तिजोरी


- हेमंत पाल 

  बुंदेलखंड अलग राज्य न बने, इसके लिए मध्यप्रदेश हर संभव कोशिश करता  रहा है। एक तर्क ये भी दिया जाता है कि बिना आर्थिक सम्पन्नता के कोई नया राज्य कैसे बन सकता है? उस राज्य का खर्च कैसे चलेगा? केंद्र से कर्ज लेकर कोई नया राज्य कब तक स्थापना खर्च चलाएगा? जबकि, बुंदेलखंड की आर्थिक सम्पन्नता किसी से छुपी नहीं है! मध्यप्रदेश के जिन छ: जिलों को पृथक बुंदेलखंड में शामिल किए जाने की मांग हो रही है, वे भी खनिज संपदा के मामले में धनी हैं। अकेले पन्ना जिले से केंद्र सरकार को 700 करोड़ रुपए और मध्यप्रदेश सरकार को करीब 1400 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है। पन्ना पिछले 5000 सालों से हीरा खदानों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां अब तक करीब 40 हजार कैरेट हीरा निकाला जा चुका है, जबकि अनुमान है कि 14 लाख कैरेट के भंडार अभी मौजूद हैं।
  बुंदेलखंड के तालाबों की मछलियां कोलकाता में खूब बिकती हैं। यहां के जंगलों में मिलने वाला तेंदूपत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो और दतिया जैसे पर्यटन स्थल सालभर लोगों को आकर्षित करते रहते हैं। बीना (सागर) में मध्यप्रदेश की संभवत: सबसे बड़ा उद्योग ‘तेल शोधक परियोजना’ तैयार है। इस पर करीब 6400 करोड़ रुपए व्यय हुए हैं। 60 लाख टन ली. क्षमता का यह तेल शोधक संयन्त्र भारत तथा ओमान सरकार के सहयोग से स्थापित हुआ है। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिलकर लगभग 1000 करोड़ रुपए का राजस्व सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन दुर्भाग्य इसका 10 फीसदी भी उस पर खर्च नहीं होता। यह ठीक वैसी स्थिति है जब छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश एक थे। छत्तीसगढ़ कमाता था और मध्यप्रदेश उसके हिस्से को डकारता था। अब मध्यप्रदेश नहीं चाहता कि बुंदेलखंड भी उससे मुंह मोड़ ले! यदि बुंदेलखंड अलग राज्य प्रांत बनता है, तो मध्यप्रदेश के हाथ से खजाना निकल जाएगा। कारखानों की बात छोड़ दी जाए, तो ज्यादातर खनिज संपदा का सरकार से ज्यादा माफिया दोहन कर रहा है। यह भी बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण है।
  सन 1950 में जब बुंदेलखंड में व्यापक सर्वेक्षण का कार्य हुआ तो इसके काफी अच्छे नतीजे देखने को मिले। ग्रेनाइट, सिलिका, गैरिक, गोरा पत्थर, बाक्साइट, चूना, डोलोमाइट, फास्फोराइट, जिप्सम, ग्लैकोनाइट, लौह अयस्क आदि खनिजों का प्रचुर भंडार मौजूद है। जबकि, कहा ये जाता है कि बुंदेलखंड खनिज रहित है। लम्बे समय तक लोगों की यही धारणा रही कि हीरा को छोड़कर बुंदेलखंड खनिज के मामले में बंजर है। वास्तविकता ये है कि ये धरती लोहा, सोना, चाँदी, शीशा, हीरा और पन्ना से समृद्ध है। यहां हिनौता, मझगवां तथा छतरपुर जनपद के अंगोर नामक स्थान में भी हीरा मिलने की संभावना व्यक्त की गई है। ये सच चौंका सकता है कि अभी तक बुंदेलखंड में 40 हजार कैरेट से ज्यादा  हीरा निकाला जा चुका है! अभी भी 14 लाख कैरेट हीरे के भंडारों खुदाई शेष है। कहा गया है कि हीरे की नई खोजी गई खदानों से भी इतना ही कच्चा हीरा मिल सकता हैं। नेशनल मिनरल डेवलमेन्ट कॉर्पोरेशन पन्ना द्वारा से 62 मीटर गहरी खुदाइ की जा चुकी है। जबकि, यहाँ छिछली खदानें बड़े भूखंड में फैली हैं। अकेले पन्ना में ही हीरे का वार्षिक उत्पादन 26 हजार कैरेट है! इससे राज्य सरकार को करोड़ों की रॉयल्टी सरकार को मिलती है। संभावित नई खदानों से आय वृद्धि की संभावना है।
   इसके अलावा यहाँ चूना पत्थर भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है। बुंदेलखंड में वास्तु पत्थर के अक्षय भंडार उपलब्ध हैं। बालू पत्थर आदिकाल से अपने रंगों, समान कणों, सुगम उपलब्धता तथा स्थायित्व के लिए उत्तर भारत में वास्तु पत्थर के रुप में प्रसिद्ध है। यहाँ मिलने वाला ग्रेनाइट पत्थर भी अपनी कठोरता, रंग, अक्षयता तथा खूबसूरती के कारण अलंकरण पत्थर के रुप में लोकप्रिय है। जर्मनी, जापान, इटली में इसकी भारी मांग है। निर्माण कार्यों में उपयोग होने वाली रेत के भी यहां असीम भंडार हैं। कांच उद्योग में प्रयोग होने वाली बालू के भंडार इतने हैं कि पूरे देश की 80% मांग यहीं से पूरी हो सकती है। अनेक स्थानों में सिलिका की मात्रा 99.2% तक है। क्राकरी निर्माण में प्रयुक्त गोरा पत्थर भी कई स्थानों में मिलता है। इसका प्रयोग मृत्तिका शिल्प तथा दुर्गलनीय ईटों के उद्योगों में भी होता है। इसके ज्ञात भंडारों का आकलन 43 लाख टन किया गया है। अन्य भंडारों का सर्वेक्षण अभी होना है। 70 किमी से अधिक लम्बी उत्तर-पूर्व और दक्षिण पश्चिम संरेखित स्फटिक शैल भित्तियों से इनका अनुवांशिक संबंध बताया जाता है। विंध्य पर्वत पर पाई जाने वाली चट्टानों के नाम उसके आसपास के स्थान के नामों से प्रसिद्ध है। जैसे माण्डेर का चूना का पत्थर, गन्नौर गढ़ की चीपें, रीवा और पन्ना के चूने का पत्थर, विजयगढ़ की चीपें आदि।
  बुंदेलखंड में पाए जाने वाले खनिजों में फास्फोराइट, गैरिक जिप्सम, ग्लैकोनाइट, लौह अयस्क, अल्प मूल्य रत्न हैं। संभावित खनिजों की सूची में तांबा, सीसा, निकिल, टिन, टंगस्टन, चांदी, सोना आदि हैं। बुंदेलखंड के एक बड़े भू-भाग चौरई में ग्रेनाइट चट्टानें पाई जाती हैं। यह चट्टानें अधिकतर रेडियोधर्मी यूरेनियत युक्त होती हैं। इसकी मात्रा 30 ग्राम प्रति टन तक हो सकती है। ललितपुर में हुए सर्वेक्षण के द्वारा इस संभावना को बल मिला है। यहाँ एल्युमिनियम  भंडारों को भी पता चला है। बांदा और आसपास के क्षेत्रों में एल्यूमीनियम अयस्क बॉक्साइट का पता चला है। अनुमान है कि ये भंडार प्रति वर्ष एक लाख टन एल्यूमीनियम उत्पादन की क्षमात वाले कारखाने को कम से कम 35 वर्षों तक अयस्क प्रदान कर सकता है। छतरपुर में चूने के पत्थर प्रचुर मात्रा में हैं। अन्य स्थानों में सर्वेक्षण जारी है। बांदा जनपद में झोंका भट्टी के उपयुक्त गालक श्रेणी के डोलोमाइट का आंकलित निकाय लगभग 60 करोड़ टन से अधिक है। मृतिका शिल्प की उपयुक्त सफेद चिकनी मिट्टी के वृहद भंडार हैं। जो 5 लाख टन से अधिक है। बांदा के लखनपुर इलाके में यह 2 लाख टन से अधिक है।
सोना है, हीरा भी और पत्थर भी!
  बुंदेलखंड में कई प्रकार के खनिज उपलब्ध हैं। चित्रकूट में बाक्साइट, झांसी, महोबा, ललितपुर में डायस्पोर, पायरोफाइलाइट, झांसी में सिलका सेंट, ग्रेनाइट, बांदा में पालिश, स्लेब और टायल इत्यादि खनिज मिलते हैं। बालू के भी बडे़ भंडार हैं। चित्रकूट के मानिकपुर में 84 लाख टन बाक्साइट उपलब्ध है। ललितपुर में लौह अयस्क जिसमें 30 प्रतिशत लोहा होता है भारी मात्रा में उपलब्ध है। झांसी के बड़ा गांव और मऊरानीपुर में अभ्रक पाया जाता है। बुंदेलखंड में सोना और चांदी भी मिलता है। ललितपुर की चट्टानों में प्रति एक टन खनिज में 2.78 ग्राम प्लेटियम, 2.2 ग्राम पैलेडियम, 7.74 ग्राम रेडियम और 3.4 ग्राम सोना तथा 3.61 ग्राम चांदी पाई जाती है। यहां की मिट्टी में और भी कई खनिज पाए जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बांदा जनपद के कालिंजर क्षेत्र में बागै नदी पर हीरे के संकेत मिले हैं। यहां किंबरलाइट द्वारा खोज जारी है। बुंदेलखंड विकास मंच महामंत्री श्री सिद्दीकी ने कहा है कि बुंदेलखंड में पाए जाने वाले खनिज तत्वों पर आधारित तमाम उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। अभी भी यहां सरकारी सूचनाओं के मुताबिक 253 खनिज आधारित उद्योग हैं। झांसी और महोबा में 84-84, ललितपुर में 23 और चित्रकूट में 30 उद्योेग हैं, जो काफी कम हैं।
   लौह अयस्क के भंडार मानिकपुर कर्वी, बेरवार, बेरार, ललितपुर में अनुमानतः 10 करोड़ टन खनिज हैं। इसमें 35 से 67 प्रतिशत लौह प्राप्त हैं जो स्पंज आयरन के लिए उपयोगी है। सोनरई (ललितपुर) में 400 मीटर से 1000 मीटर लम्बे तथा 1 से 3 मीटर मोटे ताम्र अयस्क भंडार हैं, जिनमें 0.5 प्रतिशत तांबा है। शीशे के बालू, बरगढ़ (कर्वी) में अनुमानतः 5 करोड़ टन है जो विभिन्न स्तरीय है। नरैनी (बांदा) में स्वर्ण की प्राप्ति 2 ग्राम प्रति टन है। बॉक्साइट भण्डार बांदा में 83 टन अनुमानित है। सीसा अयस्क, गैलिना टीकमगढ़ जिले के बंधा बहादुरपुर तथा दतिया में पाए जाते हैं। इसके लिए टीकमगढ़ जिले में ग्रेनाइट पॉलिशिंग का कारखाना लगाया जा सकता है। दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर जिले में पायरोंफायलाइट, पोतनी मिट्टी औद्योगिक दृष्टि से उपयोगी है। एस्बेस्ट्स तथा निकिल सागर में मौजूद है। लौह अयस्क टीकमगढ़, छतरपुर, सागर जिले में प्राप्त हैं। ताम्र अयस्क के भण्डार छतरपुर, बॉक्साइट के भंडार पन्ना, सागर तथा मणि पत्थर दतिया में हैं। इसके बाद भी कोई ये कहे कि बुंदेलखंड में आत्मनिर्भरता की संभावना नहीं है, तो ये भ्रम है या साजिश!
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Friday, July 29, 2016

जीत के टॉनिक के बाद भी कांग्रेस थकी और मायूस

   मध्यप्रदेश में कांग्रेस कहाँ है? जहाँ उसे होना चाहिए वहाँ से तो नदारद ही है। विधानसभा में विपक्ष की सशक्त भूमिका निभाने के बजाए कांग्रेस दुबकी सी लगती है? ताकतवर भाजपा के सामने छोटी-बड़ी कोई भी जीत कांग्रेस को उत्साहित नहीं करती? इतनी थकी और मायूस पार्टी कैसे चुनाव में मुकाबला कर पाएगी? ये वो सवाल हैं जो हर वो व्यक्ति पूछ रहा है, जो राजनीति की तासीर को समझता है! क्योंकि, प्रदेश में बारह साल के भाजपा शासन के दौरान कभी नहीं लगा कि विपक्ष के रूप के कांग्रेस कहीं मौजूद है! अभी तक जो कांग्रेस दिखाई दे रही है वो अपने आकाओं के नाम से बंटी पार्टी है! कहीं दिग्विजय कांग्रेस है, कहीं कमलनाथ के लोग तो कहीं ज्योतिरादित्य के दरबारी! जो बचे हैं, वो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव का बिल्ला लगाए घूम रहे हैं! जिस कांग्रेस को राजनीति के मोर्चे पर भाजपा के खिलाफ ख़म ठोंककर खड़ा होना था, वो प्रायोजित लड़ाई लड़ने में व्यस्त हैं! विपक्ष की जो भूमिका सामने आई वो मीडिया को दिखानेभर को है। 

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हेमंत पाल 
  तीन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की लगातार हार के बाद भाजपा ने जश्न मनाया था कि कांग्रेस अब ख़त्म हो गई! भाजपा के लिए ऐसा करना जरुरी था! क्योंकि, उसे अपनी ताकत का अहसास हो गया था! लेकिन, इसके बावजूद कभी नहीं लगा कि कांग्रेस ने जवाबी हमला करते हुए भाजपा को अपनी ताकत दिखाई हो! संख्यात्मक मान से कांग्रेस के पास विधायक कम हों, लेकिन मुद्दे उठाने में कांग्रेस हमेशा छुपती और बचती ही रही! जबकि, इतिहास गवाह है कि एक वक्त लोकसभा में दो सीटों पर पहुंचकर भी भाजपा ने विपक्ष की कमी महससू नहीं होने दी थी। सीधी सी बात है, संख्या के बग़ैर भी विपक्ष अपनी मौजूदगी का अहसास करा सकता है। पर, क्या मध्यप्रदेश में कांग्रेस ऐसा कुछ कर पा रही है? प्रदेश में कांग्रेस की विपक्ष की भूमिका को लेकर पार्टी हाईकमान की ईमानदार समीक्षा जरुरी है। क्योंकि, कांग्रेस न तो हार से मायूस होती है न जीत से उत्साहित! गुटबाजी में बंटी, चापलूस नेताओं से घिरी, हवाबाज और कॉर्पोरेट कल्चर वाले समझौतावादी नेताओं को जबतक कांग्रेस किनारे नहीं करेगी, उसके फिर खड़े होने की उम्मीद बहुत कम है! 
    कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक ट्वीट के जरिए अपनी पार्टी के प्रभारी प्रतिपक्ष नेता बाला बच्चन को सिंहस्थ में हुए घोटाले को विधानसभा में उठाने की सलाह दी! उन्होंने कहा कि कांग्रेस विधायक दल को सिंहस्थ में हुए भ्रष्टाचार को विधानसभा में मजबूती से उठाना चाहिए। इसका सीधा सा आशय यही है कि उनको इस मुद्दे पर कांग्रेस की दलीलें कमजोर पड़ने अंदेशा होगा! इस मामले पर विधानसभा में जो हंगामा भी हुआ! पर, दिग्विजय सिंह की सलाह का एक मतलब ये भी है कि विधानसभा में कांग्रेस कोई भी मुद्दा ईमानदारी से नहीं उठा रही है! ये सच भी है। ऐसे कई मामले हैं, जिन पर सरकार को कांग्रेस कटघरे में खड़ा कर सकती थी, पर नहीं कर सकी!
  मध्यप्रदेश के लोग कांग्रेस को मिटते देखना नहीं चाहते! बल्कि, सशक्त विपक्ष के रूप में सरकार के सामने खड़ा देखना चाहते है! क्योंकि, यदि वास्तव में जनता ऐसा चाहती तो जो 50-55 विधायक सदन में नजर आ रहे हैं, वो भी नहीं होते! ये मुश्किल भी नहीं था! लेकिन, लोगों ने कांग्रेस को जो जिम्मेदारी दी थी, उसमें वो फेल ही रही! लोग भी कांग्रेस की लगातार हारों से खुश नहीं थे! उन्हें लगा कि इससे भाजपा में उच्श्रृंखलता आ रही है! ये सच भी था! यही कारण है कि झाबुआ लोकसभा की जीत के बाद जनता ने उसे कुछ निकायों में जीत का टॉनिक दे दिया! ये सब 'मिशन-2018' में संभलने के लिए ही है! इसके बावजूद कांग्रेस की आत्ममुग्धता में कोई कमी नहीं आई! इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा कि विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता लंबे समय से बीमार है, पर उसकी जगह किसी और को ये दायित्व नहीं सौंपा जा रहा! ये अकेली गलती नहीं है! बीते सालों में कांग्रेस ने भाजपा को पनपने का पूरा मौका दिया है। अब यदि पार्टी को अपनी गलतियां सुधारना है तो उसे अपनी ग़लतियों पर खुलकर बात करनी होगी। ईमानदार और युवा और ईमानदार नेताओं को सत्ता पक्ष के सामने खड़ा करना होगा! निर्वाचित प्रतिनिधियों में जान डालना होगी कि वे जनता में भरोसा अर्जित करें!  
  कागजों पर पार्टी अपने आपको कितना भी ताकतवर बताए, लेकिन सतह पर कांग्रेस की जड़ता टूटती नहीं दिखती! उसके दावों में राजनीतिक ख़ालीपन है। अच्छे भविष्य की कोई संभावना दिखाई नहीं देती! पिछले 12 सालों में प्रदेश में कांग्रेस ने हर नेता को मौका दिया! कोई भी पार्टी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा! कांग्रेस ऊपर से लेकर नीचे तक थकी नज़र आ रही है। यह मीडिया में बनी धारणा है या हकीकत कुछ और है? कांग्रेस कई बार हारी, टूटी और धूल झाड़कर फिर खड़ी हुई! अब भी खड़ी हो सकती है। पर उसके लिए आत्म शक्ति जरुरी है। राजनीति को ग़ौर से देखने पर लगता है कि कांग्रेस में कई स्तरों पर असंतोष पनप रहा हैं। लेकिन, इस असंतोष को को ठंडा करने के कोई प्रयास नहीं हो रहे! वास्तव में आज हर दल कांग्रेस जैसा हो गया है। देश की राजनीतिक हकीकत कांग्रेस कल्चर ही है। आज का राजनीतिक भारत कांग्रेस से कहीं ज्यादा 'कांग्रेस युक्त भारत' है। भाजपा में कई सांसद और विधायक कांग्रेस से ही आए हैं। यही कारण है कि दोनों पार्टियों के बीच सामंजस्य का पुल बन गया!  
   कांग्रेस के नेताओं के लिए इससे शर्मनाक क्या हो सकता है कि विधानसभा में कांग्रेस के सारे विधायक वो नहीं कर सके जो मंत्री पद से हटाए गए भाजपा के बाबूलाल गौर ने एक झटके में कर दिया! उन्होंने निकाय चुनाव में भाजपा की हार को जनता का मत करार दिया! मिट्टी मिले के मामले में भी गौर ने बचाव करने के बजाए सरकार पर सड़ा हुआ गेहूं बांटने का आरोप लगाया। उन्होंने विधानसभा में भोपाल और इंदौर में मेट्रो ट्रेन को लेकर सवाल उठाया था। संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाने पर उन्होंने नगरीय प्रशासन मंत्री को घेर लिया और कहा था कि यदि वे नगरीय प्रशासन मंत्री होते तो अब तक इंदौर-भोपाल में मेट्रो चल जाती! बजट पर सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए गौर ने कहा कि सरकार कर्ज लेकर घी पी रही है। उन्होंने सरकार की फिजूल खर्ची पर भी तल्ख टिप्पणी की और कहा कि सरकार 16 करोड़ रुपए की गाड़ी खरीद रही है, जो जरूरी नहीं! उन्होंने अनुपूरक बजट के प्रावधानों को लेकर भी सवाल उठाए। कहा कि इस साल जितने बजट (लगभग 1 लाख 50 हजार करोड़ रु.) का प्रस्ताव सरकार लेकर आ रही है, उसके बराबर तो प्रदेश पर कर्ज हो गया। गौर ने कोई नई बात नहीं की! पर क्या इतनी ही तल्खी से ये सवाल कांग्रेस नहीं उठा सकती थी? दरअसल, मध्यप्रदेश में आज स्थिति ये है कि कांग्रेस को कांग्रेस से ही लड़ना पड़ रहा है। हाल में मिली जीत से उसके पास एक बार फिर नया होने का मौका आया है। यदि अभी भी पार्टी नहीं संभली, तो एक दिन उसे फिर यू-टर्न लेना पड़ेगा! हो सकता है पिछले तीन चुनावों की तरह 2018 भी कांग्रेस के लिए न हो! पर, यदि है तो उसे अभी से साबित करके दिखाना होगा!  
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Sunday, July 24, 2016

घरों में अब नहीं गूंजते टाइटल सांग

- हेमंत पाल 
  टाइटल सांग किसी भी टीवी सीरियल की जान होते हैं। ये सांग किसी बड़े शोरूम की शो-विन्डो की तरह होते हैं, जिसे देखकर शोरूम की भव्यता का अंदाजा लगता है। वैसे ही जैसे किसी फिल्म का ट्रेलर या प्रोमो! लेकिन, आज शायद ही किसी सीरियल की शुरूआत टाइटल सांग होती हो! याद कीजिए 90 के दशक के सर्वाधिक सफल सीरियल 'महाभारत’ का शीर्षक गीत 'अथ श्री महाभारत कथा' आज भी कानों में गूंजता है। 'रामायण’ का टाइटल सांग' भी अद्भुत था 'महिमा दो अक्षर के नाम की’ के बोल और संगीत तो कानों में रस घोलते थे। रुडयार्ड किपलिंग की कहानी पर आधारित 90 के दशक के मशहूर सीरियल 'जंगल बुक' का टाइटल सांग 'जंगल जंगल बात चली है पता चला है ऐसे ...!' आज भी सबके ज़हन में ताज़ा होगा! ‘जंगल बुक’ के अलावा भी गुलज़ार ने गुजरे जमाने के कई यादगार सीरियलों के टाइटल गीत लिखे! ‘पोटली बाबा की’ का टाइटल सांग ‘घुंघर वाली झेनू वाली झुन्नू का बाबा, किस्सों का कहानियों का गीतों का झाबा’ भी बड़ी उम्र के दर्शकों को बचपन में ले जाता था!
    छोटे परदे पर किसी भी सीरियल का हिट होने का एक फार्मूला टाइटल सांग भी होता था। सांग हिट तो सीरियल भी हिट! टाइटल सांग के पीछे संगीतकार और लेखक की मेहनत भी नजर आती थी! इसमें पूरे सीरियल की कहानी छुपी होती थी। लेकिन, आजकल ये ट्रेंड लगभग खत्म सा हो गया! प्रतिस्पर्धा के चक्कर में एक सीरियल के ख़त्म होते ही सीधे दूसरा सीरियल ऐसे चालू कर दिया जाता है जैसे वही सीरियल चल रहा हो! प्रतिस्पर्धा के चक्कर में चैनल दर्शकों को रिमोट को हाथ लगाने का मौका भी नहीं देते! दरअसल,ये सब टीआरपी बढ़ाने का खेल है। इसी टीआरपी की भेंट टाइटल सांग भी चढ़ गए। बढ़ते विज्ञापन और चैनलों के दौर में हर चैनल चाहता है कि दर्शक उसी से बंधे रहें! पिछले कुछ सालो में धीरे-धीरे लगभग सभी मनोरंजन चैनलों ने सीरियलों के टाइटल सांग ख़त्म कर दिए! 
  टाइटल सांग से सजे सीरियलों का एक जमाना था, जब हर घर में दूरदर्शन का राज चलता था! आज की तरह निजी चैनलों का दबदबा नहीं था! दूरदर्शन के सीरियल ही पूरे परिवार की पसंद हुआ करते थे! लोग सीरियलों के टाइटल सांग फ़िल्मी गीतों की तरह गुनगुनाते रहते थे! उस दौर में जैसे ही सीरियल शुरू होता, हर घर से टाइटल सांग्स गूंजने लगते। आज ये सब सुनाई नहीं देते! क्योंकि, टाइटल सांग का समय भी कमर्शियल हो गया! सीरियल का टाइटल सांग उसके कथानक का ही एक हिस्सा होता है, जो सीरियल की छवि दर्शाता है। 1984 में बने सीरियल 'ये जो है जिंदगी' को जरा याद करो! ये मध्यमवर्गीय परिवार से जुड़े किरदारों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता था! इसके टाइटल सांग 'जिंदगी ये जो है जिंदगी, मिले और मिलते यहाँ अनमेल, सदियों से है यही खेल ...' को किशोर कुमार ने अपनी आवाज़ से सजाया था! इंडियन टेलीविज़न का पहला सोप ओपरा कहे जाने वाले 'हम लोग' के किरदारों के साथ तो आम दर्शकों ने अपने आपको समाहित ही कर लिया था। इसका टाइटल सांग 'कहीं तो है सपने और कहीं याद, कहीं तो है सारे कहीं फ़रियाद, पलछिन पलछिन तेरे मेरे जीवन की यही बुनियाद ...!' भी वो सबकुछ कह देता था, जो सीरियल का मूल कथ्य था! कुछ सीरियलों के टाइटल सांग तो ऐसे थे, जिनमें सिर्फ कोई शब्दजाल ही नहीं था, फिर भी वे लोकप्रिय हुए! आरके नारायण की कहानियों पर बने सीरियल 'मालगुडी डेज' का टाइटल सांग था 'तन्ना न तन्ना न न न … !' इसकी धुन इतनी मधुर थी कि याद आते ही आज भी कानों में गूंजने लगती है।
 जब टीवी के मनोरंजन संसार का बंटवारा हुआ और दूरदर्शन के मुकाबले में निजी चैनल उतरे तो शुरुआती दौर बहुत कुछ पुराने जैसा ही था! एकता कपूर के दो बड़े सोप ओपरा 'क्योंकि सास भी कभी बहुत थी' और 'कहानी घर घर की' ने महिलाओं को सबसे ज्यादा आकर्षित किया! दोनों ही सीरियलों के टाइटल सांग भी कर्णप्रिय थे! 'क्योंकि सास भी कभी बहुत थी' में तुलसी (स्मृति ईरानी) का घर का दरवाजा खोलते ही सांग शुरू होता था 'रिश्तों के भी रूप बदलते हैं ... नए नए सांचे में ढलते हैं!' जबकि, 'कहानी घर घर की' में 'रिश्तों की पूजा जहाँ हो, आदर बड़ों हो ... भीगे जो ममता का आँचल, आँसू बने गंगाजल' ठेठ पारिवारिक माहौल बना देते थे! लेकिन, पिछले कुछ सालों से तो सीरियलों के टाइटल सांग गायब ही हो गए! 90 सेकंड का वो वक़्त भी बिक गया! टाइटल सांग की जगह विज्ञापन दिखाए जाने लगे! सीधे शब्दों में कहें तो अब सीरियलों का वो दरवाजा ही बंद हो गया, जिसके खुलने के बाद दर्शक उस दुनिया में प्रवेश करते थे और उस काल्पनिक दुनिया में खो जाते थे!
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Friday, July 22, 2016

छोटी हार में छुपे, भाजपा के लिए बड़े सबक


  मध्यप्रदेश में तीन स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत से ज्यादा चर्चा भाजपा की हार और उसके पीछे छुपे कारणों की है! इस छोटे चुनाव के नतीजों में छुपे बड़े संदेश और संकेत को पार्टी को समझना होगा! इन तीन चुनावों के नतीजों को पार्टी होने वाले शहडोल लोकसभा और नेपानगर विधानसभा के उपचुनाव के नजरिए से भी देख रही है। राजनीतिक नजरिए से प्रदेश में भाजपा के लिए तीनों निकाय चुनाव में हार खतरे की घंटी जैसा है। छह महीने पहले भी निकाय चुनावों में भाजपा ने मुंह की खाई थी। झाबुआ-रतलाम लोकसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा कि ये बड़ी हार है। इसलिए कि मुख्यमंत्री समेत कई बड़े नेता प्रचार में लगे रहे! अब इसे भाजपा गलत उम्मीदवारों का चयन कहे, तो ये हजम करने वाला बहाना नहीं है! कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव की एक सीट जिस कूटनीति से हांसिल की थी, उसके बाद इन तीन निकाय पर जीत का सिलसिला बरकरार होना पार्टी को उत्साह की खुराक मिलने जैसी बात है! 
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 - हेमंत पाल 
  मध्यप्रदेश में तीन स्थानीय निकायों के चुनाव के नतीजे राजनीतिक तौर पर ज्यादा अहमियत न रखते हों, मगर इन नतीजों ने भाजपा को मुसीबत में जरूर डाल दिया! तीनों निकाय चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की! 12 साल से प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह हार इसलिए भी बड़ी मानी जा रही है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत कई मंत्री चुनाव में सक्रिय थे! तीनों जगह जीत के मुगालते में भी थे! लेकिन, सतना जिले की मैहर, रायसेन की मंडीदीप और अशोकनगर की ईसागढ़ के निकाय चुनाव में भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी! कांग्रेस के मुकाबले भाजपा के पार्षद भी कम जीते! संभवतः ये पहली बार हुआ कि किसी चुनाव में भाजपा के हाथ बिल्कुल खाली रहे हों! जबकि, झाबुआ लोकसभा उपचुनाव के बाद इन चुनावों में जीत मिलने से कांग्रेस उत्साह बल्लियां लांघ रहा है! ये स्वाभाविक भी है! प्रदेश की जनता ने जिस पार्टी को तीन विधानसभा चुनाव में हाशिए पर रख दिया हो, उसके लिए इस तरह की छोटी-छोटी जीत ही संभलने के लिए काफी होती हैं! 
  बड़े चुनाव से जनता का नजरिया उतनी अच्छी तरह समझ में नहीं आता! छोटे चुनाव ही जनता की नब्ज का सही संकेत देती हैं! भाजपा ने इस हार को दिखावे के लिए हल्के में लिया हो, पर वास्तव में इन नतीजों की गंभीरता से पार्टी वाकिफ है। इसलिए कि तीनों निकाय प्रदेश के तीन इलाकों का मूड बताते हैं! मैहर से विंध्य-बुंदेलखंड, ईसागढ़ से ग्वालियर-चंबल और मंडीदीप से भोपाल-मध्यभारत के मिजाज का पता चलता है। प्रदेश के राजनीतिक भविष्य को भांपने के लिए भी ये चुनाव नतीजे बहुत कुछ कहते हैं! ये बात इसलिए कि भाजपा ने इन चुनावों में कांग्रेस के सामने प्रचार में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री, प्रदेश के पार्टी पदाधिकारियों अलावा कई मंत्री भी लगे थे। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि नतीजे इतना उलट जाएंगे! भाजपा इसे अपनी हार इस संदर्भ में मान रही है कि उम्मीदवारों का चयन ठीक नहीं हुआ! जबकि, कांग्रेस का निष्कर्ष है कि ये भाजपा सरकार की असफलता पर जनता का फैसला है!   
   भाजपा इन चुनाव को छोटा बताकर हार की अनदेखी नहीं कर सकती! चुनाव छोटे जरूर थे, मगर इससे संकेत मिलता है कि प्रदेश में भाजपा की जमीनी हकीकत बदल रही है। पार्टी की पकड़ में अब वो कसावट नहीं रही, जिसके दावे किए जाते हैं। इन नतीजों से अगले विधानसभा चुनाव को भांपना तो अभी जल्दबाजी होगी! मगर ये सरकार में बैठे नुमाइंदों को झकझोरने के लिए काफी है कि अब संभलने का वक़्त है! घोषणाओं से लोगों को ज्यादा दिन तक भरमाया नहीं जा सकता! लोग अब जमीन पर उन घोषणाओं की हकीकत देखना चाहते हैं! दरअसल, ये चुनाव भाजपा की पकड़ का ढीला पड़ने का इशारा तो हैं ही, सरकार को सजग होने की भी सलाह है। इन चुनाव से कांग्रेस का उत्साह भी दोगुना हुआ है। 
   प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने भी माना कि यह चुनाव छोटे जरूर थे, मगर इस जीत से पार्टी को नई ऊर्जा मिली है। इन नतीजों ने शिवराज सरकार को बता दिया कि लोग प्रतिक्रिया नहीं देते, इसका मतलब ये नहीं निकाला जाए कि वे सरकार के काम से खुश हैं! प्रदेश में लोग सूखे के बाद अतिवर्षा से परेशान हैं! किसानों को समय पर बीज और खाद नहीं मिल रहा, किसान आत्महत्या कर रहे हैं! लेकिन, सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं! घोषणाएं सुन-सुनकर जनता का धैर्य जवाब देने लगा है! ऐसे में जब भी जहाँ भी जनता को अपना 'मत' देने का अवसर मिलता है, वो सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का मौका नहीं छोड़ते! इन तीनों निकाय चुनाव को लेकर भाजपा बेहद गंभीर थी! क्योंकि, तीनों पर पहले भाजपा ही काबिज थी! प्रचार में मुख्यमंत्री समेत कई मंत्री और पार्टी पदाधिकारी लगे थे! किसी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी! जबकि, मुकाबले में सामने कड़ी कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता ने इन चुनाव में प्रचार नहीं किया! स्थानीय कार्यकर्ताओं पर ही सारा दारोमदार था, फिर भी कांग्रेस को जीत हांसिल हुई! कांग्रेस के नजरिए से इन निकाय चुनाव में बड़े कांग्रेसी नेताओं का प्रचार के लिए नहीं आना भी कूटनीतिक फैसला रहा! इससे स्थानीय स्तर पर गुटबाजी नहीं पनपी और भाजपा को घेरने मौका भी कांग्रेस को मिला! जब भी कांग्रेस के बड़े नेता छोटे चुनाव में सक्रिय हुए हैं, अधिकांश में कांग्रेस को हार का मुँह देखना पड़ा! बड़े नेताओं के आने से स्थानीय कार्यकर्ता बंट जाते हैं, जिससे उम्मीदवार को नुकसान होता है। इन चुनाव में मिली जीत से कांग्रेस को अरसे बाद खुश होने और नए सिरे से सँभलने का भी मौका मिला!
  एक साथ तीनों चुनावों में पर मिली हार से भाजपा के सभी बड़े नेता हतप्रभ है! प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का कहना है कि शायद उम्मीदवारों के चयन में उनकी पार्टी से कोई गलती हुई है। इसके साथ ही उनका कहना है कि निकाय चुनाव स्थानीय स्तर पर होते हैं, इसमें उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दों का महत्व होता है। इस तरह कि सफाई देना पार्टी अध्यक्ष की मज़बूरी भी है। क्योंकि, कोई भी बड़ा नेता अपनी पार्टी की हार को आसानी से पचा नहीं पाता, उसके पीछे कई कारण खोज लेता है, वही भाजपा अध्यक्ष ने भी किया! लेकिन, राजधानी के नजदीक मंडीदीप हारना भाजपा की पकड़ ढीली पड़ने का साफ़ इशारा है। अब भाजपा में इस करारी हार पर मंथन शुरू हो गया है। संघ ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया और पार्टी से जवाब माँगा है! शहडोल लोकसभा और नेपानगर विधानसभा के उपचुनाव जल्द होने की संभावना है। दोनों सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा था और यहाँ से जीते नेताओं का पिछले दिनों निधन हो गया था! इन निकाय चुनाव की हार का असर होने वाले इन चुनावों पर न पड़े, इसलिए पार्टी डैमेज कंट्रोल में लग गई है! 
     भाजपा अपनी इस हार को छोटा चुनाव, स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार के चयन में गलती बताकर ध्यान भटकाने की कोशिश जरूर कर रही है! पर, पार्टी को पता है कि इन नतीजों ने पार्टी को गंभीर सोच में डाल दिया है। अब शायद पार्टी उन सारे मुद्दों पर फिर से विचार करेगी, जो इस हार के लिए कहीं न कहीं कारण रहे होंगे! फिर चाहे वो दलित आरक्षण का मामला हो, मंत्रिमंडल के पुनर्गठन से उपजी नाराजी का, घोषणा के मुताबिक वादे पूरे न कर पाने का या फिर सरकारी स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाचार का! यदि पार्टी ने लोगों के मिजाज को भांपकर अपने आपको नहीं संभाला तो शहडोल और नेपानगर में झाबुआ दोहराने में देर नहीं लगेगी! उससे भी बड़ा मामला भाजपा कार्यकर्ताओं में बढ़ती नाराजी और उपेक्षा का है। खुलकर ये बात शायद कोई न करे, पर इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता बड़े नेताओं की उपेक्षा से नाखुश हैं! चुनाव के ये नतीजे उसी का संकेत हैं!     
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Wednesday, July 20, 2016

... कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी

स्मृति शेष : मुबारक बेगम 

- हेमंत पाल 
  कला और कलाकारों के प्रति सरकार का रवैया कैसा है, ये मुबारक बेगम की मौत ने सामने ला दिया! मुबारक बेगम की मौत ने एक बार फिर सरकार का संवेदनहीन रवैया सामने ला दिया। इससे पहले एके हंगल,  ललिता पंवार, टुनटुन और साधना भी ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने अपना आखरी समय अभाव में गुजारा और इस दुनिया से गुमनामी से बिदा हो गए। जो लोग इस चमकती दुनिया की जगमगाहट देखकर इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं, उन्हें इन लोगो का अंत भी देखना चाहिए! 
   एक वक्त अपनी आवाज से लाखों दिलों पर राज करने वाली पार्श्व गायिका मुबारक बेगम का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया! 80 साल की मुबारक बेगम कई दिनों से बीमार थीं। पिछले साल बेटी की मौत के बाद से वे सदमे में थीं!  लेकिन, मुबारक बेगम को गम से ज्यादा अभाव ने मार दिया! बेरोजगार बेटे के साथ रह रही इस पार्श्व गायिका के पास इलाज कराने तक के पैसे नहीं थे! उनको जो 800 रुपए पेंशन मिलती थी, वही एक सहारा था! महाराष्ट्र सरकार ने इलाज का खर्च उठाने का वादा किया, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं! प्रदेश के संस्कृति मंत्री के आश्वासन पर मुंबई के अंधेरी के एक अस्पताल में भर्ती मुबारक बेगम के परिवार से सांस्कृतिक विभाग के एक अधिकारी ने मुलाकात भी की और इलाज के लिए मदद का आश्वासन दिया! पर बताते हैं कि कोई मदद नहीं पहुंची! 2011 में जरूर महाराष्ट्र सरकार ने बदहाली और बीमारी से जूझ रहीं मुबारक बेगम को एक लाख रुपए की मदद दी थी! लेकिन, इसके बाद कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया! 
  1950 से 1970 के दशक में फिल्मों के कई गीतों एवं गजल गाने वाली इस बेगम सेहत काफी दिन से ख़राब थी! उन्होंने 1949 में आई फिल्म ‘आये’ के साथ अपने पार्श्व गायन की शुरूआत की थी! बेगम ने गीत ‘मोहे आने लगी अंगड़ाई आजा आजा’ और स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ ‘आओ चलें सखी वहां’ भी गाया! 50 से 60 के दशक में श्रेष्ठ संगीत निर्देशक एसडी बर्मन, शंकर जयकिशन एवं खय्याम के साथ बेगम ने कई फिल्मों के लिए गाया! इनमें 1963 की फिल्म 'हमराही' का लोकप्रिय गीत 'मुझको अपने गले लगा लो' भी शामिल है। मुबारक बेगम दुनिया को अलविदा कह चुकी हैं, लेकिन उनकी मखमली आवाज का जादू शायद ही कभी कम होगा। मुबारक बेग़म ने 50 से 60 के दशक में करीब 115 फिल्मों में 175 से ज्यादा गीत गाए! 
      मुबारक बेगम ने बिमल रॉय की ‘देवदास’ में ‘वो ना आएंगे पलटकर’ गाया था, जिसके संगीतकार बर्मन थे! बिमल रॉय ने 1958 में बनी ‘मधुमती में भी बेगम की आवाज का उपयोग किया। जिसमें उन्होंने ‘हम हाल-ए-दिल सुनाएंगे’ गीत सबसे ज्यादा पसंद किया गया। इस फिल्म के संगीतकार सलील चौधरी थे। तनुजा की फिल्म ‘हमारी याद आएगी’ का गीत ‘कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी’ को बेगम के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में गिना जाता है। आशा भौंसले के साथ गाया ‘हमें दम दईके’ और ‘नींद उड़ जाए तेरी’ भी उनके सदाबहार गीतों में शामिल हैं। 1980 में रिलीज हुई फिल्म ‘रामू तो दीवाना है’ में बेगम ने ‘सांवरिया तेरी याद में’ गीत गाया था, जो उनका आखरी गीत था। 
  लाखों दिलों पर राज करने वाली और बॉलीवुड को पहचान देने वाली इस गायिका को उनके अंतिम दिनों में किसी ने नहीं पूछा! न तो सरकार ने सुध ली और न बॉलीवुड ने! उन्होंने 23 साल तक फिल्म इंडस्ट्री में काम किया! सरकार ने मदद नहीं की, ये तो सभी जानते हैं, पर करोड़ों और अरबों का कारोबार करने वाले बॉलीवुड में क्या किसी में इतनी संवेदना नहीं कि इस वृद्ध पार्श्व गायिका का इलाज भी हो सके?
मुबारक बेगम के लोकप्रिय गीत 
- कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी (हमारी याद आएगी)
- मुझको अपने गले लगा लो (हमराही), 
- वह न आएंगे पलटकर (देवदास) 
- मुझको अपने गले लगा लो ऐ मेरे हमराही (हमराही)
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Tuesday, July 19, 2016

... न नेतागिरी जीती न हवाबाजी, जीती जनता!

पिपलियाहाना तालाब आंदोलन 


- हेमंत पाल

 पिपलियाहाना तालाब का स्वरूप बिगाड़कर वहाँ जिला कोर्ट की बिल्डिंग बनाने का काम तो बंद हो गया! इस फैसले का विरोध रंग लाया! दबाव के सामने सरकार को झुकना पड़ा! तालाब बच गया! अब इस आंदोलन का श्रेय लूटने वालों के बीच होड़ लग गई! सभी अपना झंडा ऊँचा रखने की कोशिश में हैं! भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेता दावे करने में पीछे नहीं हट रहे! लेकिन, सच्चाई ये है कि न भाजपा जीती, न कांग्रेस! जीती है जनता और जनता की तरफ से आवाज बुलंद करने वाले किशोर कोडवानी! बल्कि, कुछ सवालों ने तो भाजपा को ही कटघरे में खड़ा कर दिया!
 स्थानीय भाजपा विधायक महेंद्र हार्डिया और राऊ के कॉंग्रेसी विधायक जीतू पटवारी आमने-सामने हैं! सुमित्रा महाजन के समर्थक भी 'ताई' के झंडे उठाने में देर नहीं कर रहे! यहाँ तक कि सांवेर विधायक राजेश सोनकर और क्षेत्र क्रमांक-1 के विधायक सुदर्शन गुप्ता के समर्थक भी अपने 'भैया' का गुणगान करने में पीछे नहीं हैं! पर, कोई किशोर कोडवानी और स्थानीय जनता को श्रेय नहीं दे रहा, जिनकी वजह से तालाब का काम रुका! शहर का हर भाजपा नेता श्रेय का साफा बांधकर घूम रहा है! जबकि, वास्तव में ये जीत स्थानीय लोगों के अलावा आरटीआई कार्यकर्ता किशोर कोडवानी की है! जल सत्याग्रह उन्होंने ही शुरू किया और अंत तक तालाब से पैर नहीं निकाले! तालाब स्थल से निर्माण बंद होने के बाद अब काम रुकवाने का श्रेय लेने का काम शुरू हो गया। क्षेत्र के भाजपा विधायक महेंद्र हार्डिया के समर्थकों ने भी रातों-रात होर्डिंग लगवा दिए! उधर, कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी ने भी सरकार को झुकाने में खुद की उपलब्धि प्रचारित करना शुरू कर दिया! उनके फोटो वाले होर्डिंगों से पूरा इलाका अटा पड़ा है।
  देखा जाए तो वास्तव में ये जीत भाजपा नेताओं को छोड़कर सभी की है। क्योंकि, प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार हो, उसी पार्टी के नेता विपक्ष जैसी भूमिका निभाएं, ये बात किसी के गले नहीं उतर रही! आखिर इस जिला कोर्ट की बिल्डिंग बनवाने में किसका इंट्रेस्ट था, ये सवाल बार-बार उठ रहा है! क्या कारण था कि इंदौर के सभी भाजपा नेताओं को एक मुद्दे पर सरकार के सामने विरोध में आना पड़ा? सारा शहर एक पाले में था और सरकार सामने! सरकार झुकी, ये सही है! पर, आखिर सरकार भी जिद पर क्यों अड़ी? आंदोलन खत्म होने के बाद भी ये सवाल तो जिंदा हैं और आगे भी रहेंगे!      
  पिपलियाहाना तालाब महेंद्र हार्डिया के क्षेत्र में है। इसलिए सबसे पहले विरोध भी उनकी तरफ से उठा! हार्डिया के एक नजदीकी नेता और आईडीए संचालक राजेश उदावत ने तो करीब 5 साल पहले तत्कालीन कलेक्टर विवेक अग्रवाल के सामने भी इस तरह की किसी कार्रवाई का विरोध किया था! लेकिन, जमीन पर जिला कोर्ट का काम  शुरू होने के बाद लम्बे समय तक कोई भाजपा नेता तालाब बचाने आगे नहीं आया! सांसद होते हुए भी सुमित्रा महाजन ने शुरू में आंदोलन करने वालों का साथ नहीं दिया! जब देखा कि मामला काफी बढ़ चुका है, तब उन्होंने मुख्यमंत्री से बात की! इस बीच राऊ के कॉंग्रेसी विधायक जीतू पटवारी ने भी तालाब बचाने के लिए मुहिम चलाई! जैसा कि वे हमेशा करते आए हैं। इसके बाद ही भाजपा के सभी नेता सड़क पर आए। सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने इस मुद्दे को बहुत गंभीरता ही उठाया! इसी का नतीजा था कि सरकार झुकना पड़ा! उन्होंने जल सत्याग्रह भी किया और मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद भी डटे रहे! उनका तर्क भी सही था कि सरकारी दफ्तरों में सिर्फ कागज चलता है! जब तक पीडब्ल्यूडी का पत्र नहीं देखूंगा यहाँ से नहीं हटूंगा! बाद में अफसरों के समझाने के बाद ही वे सशर्त जल सत्याग्रह ख़त्म करने को राजी हुए!
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