Sunday, July 30, 2017

फिल्म, सेंसर की कैंची और सरकार

- हेमंत पाल 

  इन दिनों फिल्मों से ज्यादा सेंसर बोर्ड कुछ ज्यादा ही चर्चा में रहने लगा है। जब भी कोई फिल्म बनकर सेंसर के सामने जाती है निर्माता, निर्देशक की धड़कनें बढ़ जाती है। क्योंकि, सेंसर किस सीन, संवाद और शब्द पर उंगली उठा दे कहा नहीं जा सकता! आपातकाल में तो सेंसर की सख्ती फिल्मकार देख चुके हैं। लेकिन, ताजा हालात में जिस तरह की सख्ती नजर आ रही है, वो समझ है। इंदू सरकार, जब हैरी मीट सेजल, लिपस्टिक अंडर माय बुर्का और अमर्त्य सेन पर बनी डाक्यूमेंट्री पर सेंसर का जो रुख रहा, वो दर्शकों को भी रास नहीं आ रहा! पंजाब की ड्रग समस्या पर बनी फिल्म 'उड़ता पंजाब' को लेकर सेंसर ने जो सख्ती दिखाई थी, उसे लेकर भी काफी विवाद हुआ! सवाल उठता है कि क्या आज के समाज में सेंसर का इतना दखल स्वीकार्य है?

   जब से पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बने, सेंसर की कैंची की धार कुछ ज्यादा ही तेज हो गई! ये भी देखा गया है कि हर फिल्म को लेकर बोर्ड नजरिया बदल जाता है। अब तो ये सवाल भी पूछा जाने लगा है कि क्या वाकई फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड की जरूरत बची है? जिस 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' फिल्म को मुंबई फिल्म महोत्सव में लिंग समानता के लिए 'ऑक्सफैम पुरस्कार' और टोक्यो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में 'स्पिरिट ऑफ एशिया' पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका हो, उसे सेंसर पास करने से इसलिए इंकार कर दे, कि यह फिल्म ‘महिला-केन्द्रित' है! जब ऐसा कुछ होता है तो शक की सुई वहीं ठहरती है जहाँ उम्मीद की जाती है।
   पहलाज निहलानी के अध्यक्ष बनने के बाद से इस तरह के विवाद कुछ ज्यादा ही उभरने लगे हैं। क्योंकि, उनके रवैये को मनमानी और तानाशाही से भरा माना जा रहा है। जबकि, निहलानी खुद भी जाने-माने फ़िल्मकार रहे हैं। उन्होंने ज्यादातर फार्मूला फ़िल्में ही बनाई है। उनकी फिल्मों में भी वो सब होता था, जिसे लेकर उन्हें आज आपत्ति है। उनको कभी गंभीर फिल्मकारों की गिनती में नहीं लिया जाता! लम्बे अरसे बाद मुमताज को 'आँधियां' से वे दोबारा परदे पर लाए थे। उस वक़्त मैंने भी उनके नजरिए को काफी करीब से देखा और समझा था। तब वे सिर्फ निर्देशक थे और उनका नजरिया भी दर्शकों के लिए फिल्म बनाने तक सीमित था। तब कहीं से नहीं लगा था कि उनके अंदर कोई ऐसा अड़ियल इंसान छुपा है, जो सिर्फ आदेशात्मक भाषा में बात करता हो! अपने नए रूप में वे सरकार के एजेंडे को लेकर जिस तरह गंभीरता बरतते रहे हैं, फिल्म इंडस्ट्रीज में उनके खिलाफ मोर्चा खुलता जा रहा है।    
  सरकार के प्रति उनकी आसक्ति और भक्तिभाव ने भी उनके सम्मान को घटाया है। एक फिल्म के संवाद से ‘मन की बात' शब्द को निकालने के लिए भी दबाव डाला गया। क्योंकि, ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नियमित रेडियो कार्यक्रम का नाम है? पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय फिल्मों में काम न करने देने के उनके बयान को भी अनुचित माना गया था। ये आरोप भी लगे हैं कि सेंसर बोर्ड का एजेंडा पूरी तरह भगवा हो चुका है। अमर्त्य सेन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री से गाय, हिंदुत्व, हिंदू और इंडिया जैसे शब्द हटाने के लिए दबाव डाला गया और उन्हें हटवा भी दिया। एक बांग्ला फिल्म के गाने ‘देख केमोन लागे’ में 'राधा' शब्द पर आपत्ति उठाई गई। जबकि, ये गाना एक लोकप्रिय लोकगीत पर आधारित था। इससे पहले अनिक दत्ता की फिल्म 'मेघनाद वध रहस्य' में 'रामराज्य' शब्द को सेंसर ने अनुचित माना था। लाख समझाने पर भी सेंसर बोर्ड नहीं माना और 'रामराज्य' शब्द हटाना ही पड़ा।
  बोर्ड के अध्यक्ष बनने के बाद निहलानी ने फिल्मों में 32 शब्दों के उपयोग पर ही आपत्ति उठाई थी। भारी विरोध के बाद इसमें से 16 शब्द हटाए गए। आज जबकि इंटरनेट की असीमित पहुँच के कारण सूचनाओं, विचारों, दृश्यों के साथ-साथ हर तरह की कला का निर्बाध संचार हो रहा है, सेंसर बोर्ड की उपयोगिता का कोई महत्व नहीं रह जाता। किसी फिल्मकार के रचे दृश्यों, संवादों और गीतों में काट-छांट करना उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने जैसा है। सेंसर बोर्ड का काम फिल्म के मुताबिक दर्शक वर्ग का आयु-समूह निर्धारित करना है, न कि अपने विचारों से फिल्म को दर्शकों के अनुरूप बनाना। लेकिन, अभी सेंसर बोर्ड यही कर रहा है!
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Friday, July 28, 2017

प्याज पॉलिटिक्स में फंसी सरकार से ब्याज भी नहीं निकला

 - हेमंत पाल 

मध्यप्रदेश सरकार लगातार दूसरे साल भी प्याज में चोट खा गई। पिछले साल भी 6 रुपए किलो पर किसानों से प्याज खरीदकर आधा पौना बेचा और बाकी सड़ाकर फेंक दिया। इस साल भी वही कहानी दोहराई गई। इस बार 8 रुपए किलो खरीदा गया और 2 रुपए किलो बेचने की कोशिश की गई। दो-तिहाई प्याज ख़राब हो गया। विधानसभा में सरकार ने अनुपूरक बजट में मान भी लिया कि उसे 580 करोड़ का नुकसान हुआ है। सरकार से प्याज खरीदी का ब्याज तक नहीं निकल सका, वो भी किसी और की जेब में गया! इसके बाद भी सरकार मानने को तैयार नहीं कि उसके इस फैसले में कहीं खोट थी। सभी जानते हैं कि ये फैसला किसानों के हित में कम राजनीतिक ज्यादा था। क्योंकि, किसानों के गुस्से को ठंडा करने के लिए सरकार ने एक बार फिर वही गलती दोहराई, जो पिछले साल वह कर चुकी थी। प्याज पॉलिटिक्स का एक पहलू ये भी है इसमें कई अफसरों ने अपने हिस्से की चाँदी काटने का कोई मौका भी नहीं छोड़ा। लेकिन, ये सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि प्रदेश में जितनी भूमि पर प्याज नहीं उपजता, उससे ज्यादा प्याज सरकार ने खरीद कैसे लिया? 
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    मध्यप्रदेश में इन दिनों किसानों को बहलाने, पुचकारने और उन्हें अपने पक्ष में करने का दौर चल रहा है। मंदसौर कांड के बाद जिस तरह का घटनाक्रम हुआ, उससे सरकार को बेक फुट पर आने को मजबूर होना पड़ा था। कुछ हद तक कांग्रेस ने मैदान मारने कोशिश जरूर की थी। लेकिन, सरकार के लिए मुश्किल वाली बात थी कि सारी स्थितियाँ सरकार के विपरीत जा रही थीं। यही सब मैनेज करने के लिए मुख्यमंत्री ने किसानों से 8 रुपए किलो प्याज खरीदने का फैसला किया। लेकिन, इसी फैसले के कारण सरकार को प्याज के आँसू रोने को मजबूर होना पड़ा। पहले तो प्याज की फसल बंपर हुई। फिर किसानों ने उचित कीमत न मिलने को लेकर विरोध किया और सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। सरकार इतनी दबाव में आ गई कि आनन-फानन में किसानों से बाजार भाव से ऊंची कीमत पर प्याज खरीदने का फैसला कर लिया। लेकिन, यही प्याज मुसीबत बन गया और सरकार अपने फैसले को सही बताने पर आमादा है। सरकार के पास प्याज रखने के लिए जगह तक नहीं है! अब ये सरकारी प्याज बारिश में भीगकर सड़ रहा है। इस मुसीबत से निकलने के लिए सरकार ने दूसरे राज्यों को सस्ते में प्याज बेच दिया। 
    अपने फैसले को लेकर कहा गया कि ये किसान हितेषी फैसला है और जरुरत पड़ी तो आगे भी ऐसे फैसले किए जाएंगे। अपने फैसलों को लेकर सरकार का ऐसा जवाब स्पष्तः हठधर्मी ही कहा जाएगा। सरकार कुछ भी करने के लिए हमेशा स्वतंत्र होती है। उसके फैसलों पर कोई उंगली नहीं उठा सकता! लेकिन, जनता के 580 करोड़ रुपए बर्बाद करने लेकर सरकार यदि संतोषजनक जवाब देती तो बेहतर होता! किसानों के साथ वो उस जनता की भी सरकार है जो किसान नहीं हैं! वो उनके प्रति भी उतनी ही जवाबदेह है जितना किसानों प्रति! सिर्फ किसानों को संतुष्ट करने के लिए सरकार ने बाकी लोगों की नाराजी जरूर मोल ले ली!
   प्याज को लेकर सरकार ने लीपापोती वाले जो जवाब दिए हैं, वो लोगों के गले नहीं उतर रहे! प्याज की खरीदी में धांधली और उसके सड़ने के मामले में सरकार चारों तरफ से मुश्किलों में घिरी दिखाई दे रही है। लेकिन, सरकार बजाए पूरे प्रदेश के लोगों को अपने फैसले में साझेदार बनाने के हठधर्मी करती ज्यादा लगती है। किसानों के प्रति सभी की संवेदना है, ऐसे में किसानों के हित में प्याज खरीदी के फैसले को जनता और सरकार का फैसला कहा जाता अच्छा होता! लेकिन, यहाँ भी सरकार का गुरुर ही ज्यादा दिखाई दिया कि उसने जो किया ठीक किया है। इससे एक कदम आगे बढ़कर विधानसभा में ये तक कहा गया कि इस बार हमनें प्याज की खरीदी, वितरण और परिवहन की सुचारु व्यवस्था की! इसलिए सिर्फ 5 फीसदी प्याज ही खराब हुई है। जबकि, प्याज के बड़े व्यापारियों का कहना है कि प्याज को कितना भी बचाओ 30% प्याज तो ख़राब होती ही है। फिर सरकार के सिर्फ 5% ख़राब होने का आधार क्या है, ये स्पष्ट नहीं हुआ! जबकि, प्रदेशभर की मंडियों, गोदामों और सरकारी स्कूलों में प्याज के सड़ने की बदबू फैली हैं। 
  समर्थन मूल्य पर खरीदी गई प्याज प्रदेश की मंडियों में इतनी ज्यादा मात्रा में पहुंच गई कि मंडियों के चारों तरफ प्याज ही प्याज नजर आती रही। बंपर आवक से हालात इतने बेकाबू हो गए कि हर मंडी में प्याज सड़ रही है। प्याज रखने तक के लिए जगह नहीं है। इस सबसे मंडी से जुड़े अधिकारी तो परेशान है ही, मंडी में अनाज लेकर आने वाले किसान भी परेशान रहे। समर्थन मूल्य पर खरीदी गई ये प्याज व्यापारियों को औने-पौने दाम पर बेचे जाने की घटनाएं भी आम रही। मंडी वालों ने खड़े ट्रकों की दो रूपए से ढाई रूपए किलो तक में नीलामी कर दी! ये प्याज दिल्ली, महाराष्ट्र और हैदराबाद तक ले जाई गई! सबसे ज्यादा परेशानी बारिश के कारण भी हुई। बंद गोदाम में प्याज रखने से भी वो ख़राब हो जाती है और उसे जल्दी बाहर निकालना पड़ता है। जो प्याज खुले में रखी थी, वो बारिश से भीग गई और सड़ने की कगार पर आ गई। 
   प्याज की इतनी बम्पर आवक ने भी शंका के बीज बो दिए। क्योंकि, प्रदेश में जितने रकबे में प्याज की पैदावार होती है, मंडियों में पहुंचा प्याज उससे कहीं ज्यादा था! कृषि वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक प्रदेश में कृषि योग्य भूमि की अधिकतम क्षमता 50 लाख मीट्रिक टन अनाज उत्पादन की है। तो ये उत्पादन 84 लाख टन कैसे हो गया? ऐसे में 34 लाख टन कहां से आया? प्याज की बंपर फसल पर बहस छिड़ने का कारण भी यही था। क्योंकि, न तो इतनी अधिक बीज की बिक्री हुई और न इतना रकबा दर्शाया गया था। कृषि विभाग का अमला भी इस सबसे बेखबर रहा। कृषि मंत्री किसानों को उद्यानिकी फसल उगाने की बात कहते रहे। लेकिन, जब बम्पर फसल सामने आई तो किसान बिक्री को तरस गए। आशंका ये भी रही कि कहीं आसपास के राज्यों के किसान तो अपनी प्याज प्रदेश में नहीं बेच गए?  
  प्याज की खरीदी के बाद इसकी नीलामी की प्रक्रिया भी प्याज के छिलकों की तरह ही रही। देखा जाए तो ये नीलामी घोटालों की परतों में फंसी हुई है। प्याज से भरी पूरी रेल व्यापारियों को बहुत कम कीमत पर बेचने तक की ख़बरें सामने आई। इसके अलावा और भी कई मामले हैं जो प्याज की नीलामी को कटघरे में खड़ा करते हैं। इसे सरकार कैसे छुपाएगी? इस सबसे लगता है कि सरकार ने अभी तक सार्वजनिक आपूर्ति प्रणाली के अतीत से कोई सबक नहीं सीखा! नीलामी में उच्चतम बोली वाले व्यापारियों को ही प्याज देना थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इस पूरी प्रक्रिया की देखभाल करने वाले नौकरशाहों ने चंद व्यापारियों से सांठगांठ करके प्याज उनको देने में रूचि दिखाई! अधिकारियों ने इसी काम की कीमत ली कि वे नीलामी को इस ढंग से मैनेज करेंगे कि बोली यह 2.10 या 2.20 रुपए प्रति किलो से ऊपर न जा सके! कई बड़े व्यापारी जो प्याज से भरी रेलगाड़ी के लिए बोली लगाने को तैयार थे, उन्हें यह कहा गया कि पूरी ट्रेन के लिए बोली लगाने की अनुमति ही नहीं है। इस पूरे मामले में विपक्ष की मजबूरी है कि वो सरकार का विरोध भी नहीं कर सकती! क्योंकि, तब किसान उससे नाराज जाएंगे, फिर उन्हें मनाने का फार्मूला भी विपक्ष के पास नहीं है।   
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Wednesday, July 26, 2017

वाह! ... व्हाट एन आईडिया सरजी!

- हेमंत पाल  

   उन्होंने कभी कमिश्नरी नहीं झाड़ी! ...बल्कि एक विचारक की मानिंद वे नई योजनाओं को आकार देने और जमीन पर लाने के लिए दौड़भाग करते नजर आए है। वे जानते है कि सरकारी तंत्र में रहते हुई भी तंत्र की बाधाओं का सामना कैसे करना है। उनसे पार कैसे पाना है। वे इंदौर संभाग के कमिश्नर हैं, पर एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह नई योजनाओं को ऐसे आकार दिया, जिसने हर किसी के दिल को छू लिया। संभाग में कमिश्नर की भूमिका समीक्षक की होती है। उसे अपने अधिकार क्षेत्र के जिलों में चल रही योजनाओं और कानून व्यवस्थाओं पर नजर रखना पड़ती है। 
  इंदौर कमिश्नर संजय दुबे ने पिछले करीब तीन सालों में इस मिथक को तोड़ दिया। जनहित को लेकर उन्होंने कई ऐसे अनूठे काम किए, जो भविष्य में मील के पत्थर बनेंगे। अंगदान, विद्यादान और अब भोजनदान जैसी योजनाएं संजय दुबे की ही देन है। अब वे नई योजना सामने ला रहे हैं, जो पैक्ड फूड प्रोडक्ट की मियाद खत्म होने से पहले उसका उपयोग किए जाने से जुडी है। सही मायने में कमिश्नर संजय दुबे की इस योजना को देखते हुए कहना ही पड़ा वाह क्या शानदार आईडिया है सरजी। 
  'सुबह सवेरे' से बात करते हुए उन्होंने बताया कि हर व्यक्ति समाज को कुछ न कुछ लौटाना चाहता है। लेकिन, उसे सही रास्ता नहीं मिलता। प्रशासन ने अब उसके सामने कई विकल्प रख दिए हैं। जिस कार्य में भी व्यक्ति अपना सेवाभाव दशार्ना चाहता है, दिखा सकता है। अपनी नई योजना के बारे में संजय दुबे ने बताया कि अंगदान, विद्यादान और भोजनदान के बाद अब वे ऐसे पैक्ड फूड को सस्ती कीमत पर उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहे हैं, जिसकी मियाद कुछ दिनों बाद खत्म होने वाली है। बड़ी-बड़ी दुकानों और शॉपिंग मॉल में कुछ पैक्ड फूड प्रोडक्ट ऐसे होते हैं, जिनकी मियाद कम होती है। यदि सामग्री बिकती नहीं तो मियाद खत्म होने के बाद निमार्ता कंपनी उन्हें बदलकर देती है। ऐसे में दुकानदार को तो नुकसान नहीं होता! लेकिन, निर्माता कंपनी पर दोहरी मार पड़ती है। उसे ये सामग्री नष्ट करना पड़ती है। संजय दुबे इसे राष्ट्रीय क्षति मानते हैं और भोजन की इस बर्बादी को बचाना चाहते हैं। उनका विचार है कि ऐसे पैक्ड फूड को मियाद खत्म होने से कुछ समय पहले ही कम कीमत पर बेचकर स्टॉक खत्म कर दिया जाए। इससे निमार्ता कंपनियों को भी नुकसान नहीं होगा और भोजन की बबार्दी भी बचेगी! अभी इस योजना का प्रारूप बन रहा है। 
कई योजनाओं के सूत्रधार 
  कमिश्नर संजय दुबे ने इंदौर में कई उल्लेखनीय काम किए हैं। उनकी योजनाओं को शहर में साकार रूप इसलिए भी मिला कि इस शहर के लोग सेवाभावी है। जब लोगों को लगा कि बाहर से आया कोई अफसर उनके शहर के लिए कुछ कर रहा है तो वे भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े हो गए। 'अंगदान' के मामले में कमिश्नर संजय दुबे की भूमिका और सजगता को देशभर में सराहा गया। ब्रेन-डेथ व्यक्ति के परिवार को शरीर के कुछ अंगों का प्रत्यारोपण करने के लिए राजी करना आसान नहीं होता! पर, उनका ये प्रयास सफल हुआ अभी तक 20 से ज्यादा बार अंग प्रत्यारोपण की योजनाएं सफल हो चुकी है। 'विद्यादान' भी ऐसी ही योजना है, जो शिक्षादान से जुडी है। इसमें उच्च शिक्षित युवाओं को प्रेरित किया जाता है कि वे सरकारी स्कूलों में बच्चों को अपनी सुविधा से कुछ देर पढ़ाएं। इसी श्रृंखला में एक योजना है 'भोजन दान।' इसमें इसमें विभिन्न आयोजनों में बचे हुए भोजन को जरूरतमंदों में बांटा जाता है। अब इस दिशा में एक नई पहल ये हुई कि शहर की कई बड़ी होटलों ने इसमें सहयोग शुरू कर दिया। इसके अलावा अब दान में मिले भोजन को संरक्षित करने के लिए व्यवस्थाएं भी मुहैया हो गई हैं। भोजन संरक्षण के लिए कोल्ड स्टोर भोजन इकट्ठा करने के लिए आहार वेन भी उपलब्ध हो गई है। 
भोजन की बर्बादी रोकी 
  कमिश्नर संजय दुबे बताते हैं अकसर देखा गया है कि विवाह समारोहों और ऐसे आयोजनों में भोज का आयोजन होता है। कई बार बचा भोजन फेंक दिया जाता है या मवेशियों को खिला दिया जाता है। जबकि, शहर में हजारों लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं। यही स्थिति होटलों के सामने में आती थी। फेंके गए भोजन के सड़ने से हानिकारक गैसें भी बनती हैं, जिससे पर्यावरण बिगड़ता है। ऐसे में इस भोजन को जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए माकूल व्यवस्था की गई। इसके लिए 'आहार-एप' बनाया गया था। अब इस 'एप' को उज्जैन और देवास से जोड़ा जा रहा है। इसके लिए 'राबिनहुड आर्मी' नाम से एक टोली बनी है, जो सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई करती हैं और भोजन लाकर जरूरतमंदों तक पहुंचाती हैं। अभी तक दान में मिले भोजन का निराकरण तत्काल करना पड़ता था, ताकि खराब होने से पहले उसका उपयोग हो जाए। लेकिन, अब भोजन के संरक्षण के इंतजाम कर लिए गए हैं। कमिश्नर ने बताया कि इंदौर प्रदेश का पहला जिला जहां खाने को संरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था की गई है।
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अब कोई बस कभी निसरपुर नहीं जाएगी!

- हेमंत पाल 


   कुछ साल पहले हरसूद की डूब जिस तरह राजनीतिक मुद्दा बना था, अब निसरपुर भी उसी राह पर है। सरदार सरोवर बाँध के कारण धार और बड़वानी जिले के कुछ गांव पूरी तरह डूब जाएंगे। धार जिले का निसरपुर गाँव भी पूरी तरह डूबने वाला है। जैसे-जैसे बाँध में पानी बढ़ेगा, निसरपुर समेत कई गाँव का नामो-निशान ख़त्म हो जाएगा। इन गांव की बरसों पुरानी पहचान, संस्कृति और रिश्तों की डोर टूट जाएगी। अब कहीं से कोई बस कभी निसरपुर नहीं जाएगी। क्योंकि, यहाँ कोई जाने वाला ही नहीं होगा! लेकिन, इस बाँध के कारण डूब रहा ये गांव फिलहाल राजनीति का अखाडा जरूर बन गया। 
  सुप्रीन कोर्ट के आदेश के तहत प्रशासन को निसरपुर गांव 31 जुलाई तक खाली करवाना है। तात्पर्य यह कि गांव खाली करने की विनती नहीं करना, जबरदस्ती करना पड़े तो वो भी करना है। संभाग के मुखिया कमिश्नर ने संजय दुबे ने भी चेतावनी दे दी कि डूब प्रभावित लोगों को सरकार की तरफ से सभी मूलभूत सुविधाएं मुहैया करवाई जा रही है। आवास के साथ क्षतिपूर्ति का भी इंतजाम किया जा। प्रभावितों के लिए अस्थाई आवास और भोजन की भी व्यवस्था की गई है। यानी जीने के लिए जो चाहिए, वो दे तो रहे हैं ...  अब तो जाना ही होगा!
  सीधे शब्दों में सरकार ने चेतावनी दे दी कि 31 जुलाई तक मर्जी से नहीं हटे तो हटा दिए जाओगे! वास्तव में निसरपुर तो डूब का एक प्रतीक भर है। डूबने वाले गांवों की संख्या करीब 18 है। गांव में टवलई खुर्द, चिखलदा, गणपुर, गसवा, मलनगांव, परमाल, सोंडुल, धरमराय, सेमल्दा, वीरलाय, बिजासन, मोरटका, अंजड़, चैनपुरा, मेहगांव, नरवाये, गवला, शामिल हैं। इन गांवों में रहने वालों को अब सरकारी जबरदस्ती के कारण अस्थाई रूप से भवरिया, चंदनखेड़ी, मिर्जापुर, एकलवारा, बोरखेड़ी के राहत शिविरों में पनाह लेना पड़ेगी। सरदार सरोवर बांध को भरता हुए विकराल जल का प्लावन जब इन गाँवों की संस्कृति, सभ्यता, पहचान और रिश्तों की डोर को डुबो रहा होगा तब यहाँ के लोग सरकार से 80 हज़ार रुपए लेकर गाँव छोड़ चुके होंगे या सरकारी पनाहगारों में बसने को मजबूर होंगे। 
  सरकार का कहना है कि दो-तिहाई से ज्यादा लोग डूब प्रभावित इलाका खाली करने को तैयार हैं। करीब एक-तिहाई लोग नई जगह जाने के लिए राजी हो गए! लेकिन, क्या ये सौ फीसदी सही है कि लोग अपनी मर्जी से जाने को राजी हुए हैं? क्या उन्हें सरकारी डंडे से गाँव छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा? उन्हें सुविधाओं का लालच देकर डराया नहीं जा रहा है? क्या वास्तव में एक भी रहवासी है जो अपनी मर्जी से जाने को तैयार है? इन सारे सवालों के जवाब सरकार भी जानती है, प्रशासन भी और समझने वाले लोग भी! 
 ऐसे में निसरपुर इलाके के लोगों का दर्द राजनीति का अखाडा जरूर बन गया। सरकार भाजपा की है, इसलिए भाजपा के नेता सबकुछ समझते हुए भी चुप हैं। दरअसल, ये चुप्पी उनकी मज़बूरी भी है। जबकि, विपक्षी धर्म का निर्वहन कर रही कांग्रेस विस्थापितों के हक़ में मोर्चा खोलकर बैठी है। सरकार में अदालत का हवाला देकर प्रशासन को मोर्चे पर लगा दिया कि वो 31 जुलाई तक इलाका खाली करवाए! उधर, कांग्रेस ने आवाज बुलंद की है हम इलाका जबरन खाली नहीं होने देंगे! राजनीति करना है तो ये कांग्रेस की भी मज़बूरी है। लेकिन, इस सबसे उन 18-20 गांवों में बसने वालों का दर्द कम नहीं होगा। उनका कैलेंडर तो इस साल 31 जुलाई को ही खत्म हो रहा है। 
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कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं, भाजपा में असंतोष!

- हेमंत पाल 

    मध्यप्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे गरमाने लगी है। भाजपा ने अपनी हाल की कार्यसमिति की बैठक में 'अबकी बार दो सौ पार' का नारा देकर अपनी भावी योजना का खुलासा कर दिया। भाजपा ने 'मिशन 2018' के तहत विधानसभा चुनाव में 200 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य तय करके अपने आत्मविश्वास का भी खुलासा कर दिया। ये भी तय किया गया कि अगला चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। पार्टी ने ये भी बता दिया भाजपा अगला चुनाव किसानों को केंद्रित करते हुए लड़ेगी। इस बार भाजपा का फोकस किसान और जीएसटी होगा! क्योंकि, यही दो तात्कालिक मुद्दे हैं, जो सरकार को परेशानी में डाल सकते हैं। पार्टी को अंदेशा है कि कांग्रेस भी किसानों को सरकार के खिलाफ भड़काकर भाजपा का नुकसान करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी। पार्टी की कोशिश है कि वो किसानों का भरोसा जीतने की कोशिश करते हुए उन्हें अपने पाले में रखने की भरसक कोशिश करेगी।
   उधर, कांग्रेस राजनीति की तस्वीर भी कुछ हद तक स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। दिल्ली से चलने वाली हवाओं को पढ़ा जाए तो कांग्रेस अगले विधानसभा चुनाव में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को जोड़ी की तरह मैदान में उतारकर करेगी। लेकिन, दिग्विजय सिंह को भी रणनीतिक के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के आसार हैं। वरिष्ठता के चलते कमलनाथ की भूमिका प्रदेश के मुखिया की हो सकती है और मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा होंगे ज्योतिरादित्य सिंधिया! पार्टी के बड़े नेताओं की मानें तो मध्यप्रदेश में कमलनाथ और सिंधिया दोनों ही जिताऊ चेहरे हैं। पार्टी इनका पूरा इस्तेमाल करेगी। कांग्रेस का पूरा फोकस किसी भी हाल में चुनाव जीतने को लेकर है।
  चुनाव को लेकर भाजपा जितनी गंभीरता बरत रही है, उसके मुकाबले कांग्रेस की तैयारियां कमजोर जरूर नजर आ रही है। कांग्रेस ने चुनाव जीतने को लेकर कोई बड़ी तैयारी की होगी, ऐसा कहीं नजर नहीं आ रहा। क्योंकि, रणनीति तब बनेगी, जब चुनाव की कमान संभालने वाला तय हो जाए। अभी तो सारी कवायद इस बात पर है कि नेतृत्व कौन करेगा? तीन महारथियों के बीच जो उलझन है उसके चलते कोई भी समीकरण सही नहीं बैठ रहा! पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को फिलहाल तो संतुलन बनाए रखने के लिए ही सबसे ज्यादा जद्दोजहद करना पड़ रही है।
  इस बीच चुनाव की रणनीति बनाने के लिए चुनावी रणनीति के जानकार प्रशांत किशोर का नाम उछला है। ये भी सामने आया है कि प्रदेश में प्रशांत किशोर ने अपनी टीम जरिए सभी 230 सीटों के पर प्राथमिक सर्वे करके अपनी एक रिपोर्ट पार्टी को सौंप भी दी! इसमें नेताओं की लोकप्रियता के क्षेत्रवार और बूथवार आंकड़े हैं। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान सौंपने के पीछे भी प्रशांत किशोर का नाम लिया जा रहा है। रणनीतिकारों के मुताबिक प्रशांत किशोर ने अपने प्राथमिक सर्वे के नतीजे को गोपनीय रखते हुए पार्टी को स्पष्ट कर दिया था कि प्रदेश में सत्ता पाने के लिए सभी नेताओं गुटबाजी छोड़ना होगी! प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी जैसे नेताओं को गुट छोड़कर कांग्रेस के लिए गंभीर होना पड़ेगा, तभी कुछ हो सकता है। लेकिन, जब तक पार्टी के नेता खुद सामने आकर प्रतिद्वंदी पार्टी से मुकाबले में नहीं उतरेंगे, प्रशांत किशोर भी कुछ नहीं कर सकते! वैसे भी पार्टी का ये प्रयोग उत्तरप्रदेश में बुरी तरह फेल हो चुका है, फिर इस पर दांव लगाना समझ से परे है।    
   भाजपा के लिए एंटी-इनकम्बेंसी भी एक खतरा है। क्योंकि, स्थिति को जितना सकारात्मक समझा जा रहा है, उतनी है नहीं! यही कारण है कि लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद इस बार भाजपा में घबराहट कुछ ज्यादा है। किसानों की नाराजी, जीएसटी से उभरे हालात, बढ़ती महंगाई समेत कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो सरकार के खिलाफ जा सकते हैं। कांग्रेस सरकार के विरोध की इसी नाराजी को अपनी ताकत बनाकर मैदान संभालने के मूड में है। तय है कि इस बार प्रदेश में चुनावी मुकाबला काफी हद तक असमंजस से भरा होगा! आने वाले सवा सालों में क्या नई स्थिति बनती है, कह नहीं सकते! लेकिन, यदि भाजपा ने जीते हुए विधायकों के थोकबंद टिकट काटे तो उसे सबसे ज्यादा घर से उभरी नाराजी का ही सामना करना पड़ सकता है। इस नजरिये से देखा जाए तो कांग्रेस के पास खोने को ज्यादा कुछ नहीं है। जो भी नुकसान होगा भाजपा को ही ज्यादा होगा!
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Sunday, July 23, 2017

साहित्य और सिनेमा का ये कैसा रिश्ता!

- हेमंत पाल 

  सिनेमा और साहित्य का कुछ अलग सा रिश्ता है। दोनों साथ होते हुए भी साथ नहीं हैं। क्योंकि, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, पर कोई भी इस सच को मानता नहीं! यही कारण है कि साहित्यिक कृतियों पर फ़िल्में बनाने के कई प्रयोग हुए हैं, पर ज्यादातर सफल नहीं हुए! जितना किसी साहित्यिक कृति को पसंद किया गया, उस पर बनी फ़िल्में उतनी सफल नहीं रहीं। कुछ ही फ़िल्में याद रखने लायक बन सकीं हैं। मशहूर कथाकार काशीनाथ सिंह की मशहूर कृति 'काशी का अस्सी' पर चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' बनाई, पर इस फिल्म का क्या हश्र हुआ सब जानते हैं। संवादों को लेकर फिल्म विवादों में फंसी, ठीक से रिलीज भी नहीं हो सकी और अब तो इस फिल्म का जिक्र भी नहीं होता! प्रेमचन्द के उपन्यास 'गोदान' पर इसी नाम से बनी फिल्म, फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी पर बनी 'तीसरी कसम', महाश्वेतादेवी की कहानी पर बनी 'रुदाली', विमल मित्र के उपन्यास पर बनी ‘साहब,बीवी और गुलाम’, टैगोर की कहानी ‘नष्टनीड़’ पर सत्यजीत राय की फिल्म ‘चारुलता’ जरूर ऐसी फ़िल्में थी, जो याद रखने योग्य है।
  वास्तव में इन दोनों विधाओं की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। साहित्य किसी दृश्य या घटना की जो व्याख्या या विश्लेषण करता है, हर पाठक के पास वही पहुँचता है। पाठकों के स्तर में अंतर के आधार पर उसका प्रभाव भी अलग-अलग होता है। जबकि, सिनेमा दृश्य माध्यम होता हैं। उसके पास व्याख्या और विश्लेषण की सुविधा बहुत कम होती है। साहित्य में जो व्याख्या उसके प्रभाव को बढ़ा देती है, उसी व्याख्या की कोशिश सिनेमा के असर को चौपट कर देती है। जो विवरण साहित्य की ताकत होता है, वही सिनेमा की कमज़ोरी बनकर सामने आता है। यही कारण है कि अधिकांश मशहूर साहित्यिक कृतियों फ़िल्मी प्रयोग असफल हुए हैं।
  आशय यह नहीं कि सिनेमा कि सम्प्रेषणीयता कम है। किन्तु, सिनेमा की भी अपनी कुछ ख़ास ताकत हैं, जो साहित्य के पास नहीं होती। फिल्मों में संगीत और दृश्य की ताकत सिनेमा को ऐसी क्षमता देती है जो उसे दूसरे और माध्यमों से अलग खड़ा करती है। ध्वनि और प्रकाश सिनेमा के कथानक की कई कमजोरियों ढांप देता है। जबकि, साहित्य के पास सिर्फ शब्दों की क्षमता होती है। लेखक को अपनी शब्द-क्षमता से ही कथानक को व्यक्त करना पड़ता है। यही कारण है कि कई बार अच्छे लेखक भी अपनी बात कहने में लड़खड़ा जाते हैं। सिनेमा के पास मौन की भाषा के इस्तेमाल की भी सुविधा होती है। लेकिन, मौन को व्यक्त करने के लिए साहित्य को बहुत से शब्द खर्चना पड़ते हैं। साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि पाठक पढ़ते हुए अपनी कल्पनाशक्ति से दृश्यचित्र बनाता है। जबकि, सिनेमा में दर्शक को डायरेक्टर की कल्पनाशक्ति देखता  पड़ती है। ऐसे में सिनेमा के दर्शक की अपनी कल्पनाशक्ति लुप्त हो जाती है। जरूरी नहीं कि डायरेक्टर की कल्पनाशक्ति और दर्शक की सोच की दिशा एक ही हो! इसलिए अधिकाँश साहित्य पर बनी फिल्म सफल नहीं हो पाती।
  साहित्य के पास सिनेमा के लिए अथाह भंडार है। उसके पास मनोभाव, दशा-दिशा, पात्रों, दृश्यों, वास्तुकला, परिवेश और भावनात्मक स्थितियों के दृश्यात्मक ब्यौरा होता हैं। शब्दों और संगीत के प्रभावों तक के विवरण साहित्य के पास मौज़ूद हैं। साहित्य ने तो सिनेमा को सहारा देने के लिए कई बार कथानक के रूप में खुद को बदला भी है। जब भी ज़रूरत हुई साहित्य ने खुले मन से सिनेमा का सहयोग किया। अब तो चेतन भगत जैसे लेखक पैदा हो गए जो सिनेमा के ही लेखक बन गए। चेतन अंग्रेजी के ऐसे लेखक हैं, जो अपना लेखन सिनेमा को जहन में रखकर करते हैं। उनकी कृतियों पर बनी फिल्मों को मिली सफलता ने उन्हें जहाँ खड़ा किया है, ये कहना मुश्किल है कि वे लेखक हैं या फ़िल्मी पटकथा के रचनाकार! अभी तक उनके 5 कृतियों पर फ़िल्में बन चुकी है। लेकिन, सभी सफल नहीं रही। दरअसल, साहित्य और सिनेमा का रिश्ता दो ऐसे पड़ोसियों जैसा रहा है, जो मोके-बेमौके ही मेलजोल रखते हैं। दोनो एक-दूसरे के काम भी आते हैं, लेकिन दोनों के बीच प्रेम है या नहीं, ये सुनिश्चित नहीं!
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Thursday, July 20, 2017

कांग्रेस की कछुवा चाल के सामने भाजपा का लांग जम्प


- हेमंत पाल 

        मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव को अभी सवा साल से ज्यादा वक़्त बचा है। कांग्रेस की तो नींद नहीं टूटी, पर भाजपा ने कमर कसकर तैयारी कर ली! कांग्रेस ने तो अभी तक तय नहीं किया कि उसके चुनावी रथ का सारथी कौन होगा, पर भाजपा ने अपनी चुनावी सेना के लिए जवानों का चुनना शुरू कर दिया। पुराने जवानों में कौन बचेगा और कौन हटेगा, इसकी रणनीति बन गई! पार्टी की गंभीरता इसी बात से नजर आती है कि उसने सभी 165 विधायकों को निशाने पर लिया है। उधर, आरएसएस और सरकार ने भी अपने विधायकों के कामकाज, जनता में छवि और अगला चुनाव जीतने की संभावनाओं की रिपोर्ट बनवा ली। इसके अलावा इंटेलीजेंस भी विधायकों की अपने स्तर पर छानबीन कर रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा खतरा ये है कि जिसे हटाया जाएगा वो पार्टी का कितना नुकसान करेगा! इसे कांग्रेस की चुनावी कछुवा चाल के सामने भाजपा का लांग जम्प ही माना जाएगा। उधर, मुकाबले में उतरने वाली कांग्रेस अभी उहापोह में ही है कि क्या किया जाए? पिछले चुनाव में उसके खाते में कुल जमा 58 विधायक आए थे, उसमें भी 2 कम हो गए। विधानसभा में ये संख्या कैसे बढ़ेगी, ये रणनीति बनाने वाले ही अभी तय नहीं हो पाए हैं।     

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   वर्तमान विधानसभा की 230 सीटों में से भाजपा के 165 विधायक हैं। जबकि, कांग्रेस के 56, बसपा के 4 सदस्य हैं और 3 निर्दलीय हैं। विधानसभा में अभी 2 सीटें खाली हैं। भारतीय जनता पार्टी के जानकारों के मुताबिक गोपनीय रिपोर्ट में 66 सीटों पर पार्टी को नुकसान होने का खतरा है। क्योंकि, यहाँ जनाधार घटने के संकेत हैं। 66 में से 8 सीटें ऐसी हैं जहाँ से चुने गए विधायक मंत्री पद पर हैं। लेकिन, पार्टी की नजर में ऐसी 100 सीटें हैं, जहाँ उम्मीदवारों को बदले जाने का फैसला किया जा सकता है। ये विचार इसलिए बनता दिखाई दे रहा है कि जनता एक ही नेता से ऊब भी जाती है। इसलिए बेहतर हो कि उसमें समय रहते बदलाव किया जाए! दिल्ली महानगर निगम के चुनाव में भाजपा ने अपने सभी उम्मीदवार बदलकर जो प्रयोग किया था, वो बहुत सफल रहा था। अब पार्टी यही प्रयोग विधानसभा चुनाव में करने जा रही है। ज्यादा से ज्यादा नए चेहरों पर दांव लगाने का विचार बन रहा है।   
   इस बार प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा विधानसभा चुनाव को लेकर ज्यादा ही गंभीर है। पार्टी नहीं चाहती कि उसकी जरा सी गलती चौथी बार सरकार बनाने की राह में अड़चन बने! यही कारण है कि विधानसभा में बहुमत पाने के लिए सारे फॉर्मूले आजमाए जा रहे हैं। सबसे बड़ी फांस है, ऐसे विधायकों से मुक्ति पाना जिनके जीतने के आसार कम हैं। क्योंकि, ऐसे विधायकों को टिकट न देने से उनके विद्रोह का भी खतरा है। भाजपा विधायकों ने अपने कार्यकाल के दौरान जनता से कैसे रिश्ते बनाए, ये सच ही उनका अगला चुनाव लड़ने का आधार बनेगा! विधायकों का कामकाज, जनता से उनकी नजदीकी, क्षेत्र के सामाजिक संगठनों की उनके बारे में राय और पार्टी कार्यकताओं के विचार भी विधायकों के पक्ष में माहौल बनाएंगे! सीधी सी बात ये कि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर वही चुनाव लड़ेगा, जिसके जीतने की संभावना सौ फीसदी होगी! सरकार और पार्टी दोनों ही इस बार कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है। क्योंकि, इस बार उसके सामने एंटी-इनकम्बेंसी का खतरा भी मंडरा रहा है। पार्टी ने अभी करीब 60 से ज्यादा सीटें ऐसी खोजी है जहाँ भाजपा की हालत बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती।  
   पिछले 6 महीनों में भाजपा ने अपने विधायकों को लेकर जो खोजबीन करवाई है, उसके नतीजे संतोषजनक नहीं आए! इसलिए पार्टी चिंता में है। ऐसी कई सीटें हैं, जहाँ कि जनता अपने विधायकों के समर्थन में दिखाई नहीं दे रही। चुनाव जीतने के बाद तो कुछ विधायकों ने अपनी जनप्रतिनिधि वाली इमेज ही खो दी! जनता के बीच उनकी छवि ऐसे नेता कि बन गई, जिनके पास मिलने का समय नहीं है। भाजपा के गोपनीय सर्वे ने ऐसे कई विधायकों के सामने खतरा खड़ा कर दिया है। वर्तमान कार्यकाल के साढ़े तीन साल निश्चिंतता से गुजारने के बाद ये विधायक समझ नहीं पा रहे हैं कि बचे वक़्त में कैसे खुद को टिकट पाने के लायक साबित करें? 
   भाजपा के कुछ नेताओं की बातों पर भरोसा किया जाए, तो पार्टी अगले साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हीं नेताओं पर दांव लगाएगी, जो उसके चुनाव चिन्ह पर जीत सकेगा! इस बार पार्टी ने विधायकों के क्षेत्र में उनकी छवि जांचने के अलावा विधानसभा में भी उनके प्रदर्शन को परखा है। सदन में उनकी उपस्थिति, क्षेत्र को लेकर उठाए जाने वाले सवाल और इस सबसे जनता में बनने वाली उनकी छवि को भी आँका गया। जिन क्षेत्रों में उपचुनाव हुए हैं, वहां इन विधायकों की भूमिका कैसी रही, इस पर भी ध्यान दिया गया है। ये वो मानक हैं, जो अगले चुनाव में किसी विधायक को फिर से टिकट दिलाने या उससे छीने जाने का आधार बनेंगे।   
  पार्टी और सरकार द्वारा करवाए गए इन सर्वे से जो निष्कर्ष निकला है उसने पार्टी को चिंतित तो कर दिया, पर वक़्त रहते संभलने का मौका भी दिया है। क्योंकि, अभी विधानसभा चुनाव में इतना समय है कि हालात को संभाला जा सकता है। अब पार्टी हर सीट पर तीन संभावित उम्मीदवारों का पैनल बनाकर सही उम्मीदवार चुनेगी! ऐसे में कहा नहीं जा सकता कि कौन बचेगा और कौन कटेगा! अबकि बार पार्टी उम्मीदवार की उम्र को भी टिकट का आधार बनाने के मूड में है। यदि 70 साल की उम्र होने पर दो मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है, तो इसी उम्र का कोई नेता विधानसभा का चुनाव कैसे लड़ सकता है! 
  उधर, कांग्रेस ने अभी तक पार्टी स्तर पर चुनाव के लिए कोई रणनीति बनाई होगी, ऐसे आसार कहीं नजर नहीं आ रहे! क्योंकि, रणनीति तो तब बनेगी, जब प्रदेश की कमान संभालने वाला तय होगा! अभी सारी कवायद इसी बात पर टिकी है कि कमान कौन संभाले? इसलिए कि पार्टी तीन महारथियों के बीच ऐसी उलझी हुई है कि कोई भी समीकरण सटीक नहीं बैठ रहा! ऐसे में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को संतुलन बनाए रखने की जद्दोजहद करना पड़ रही है। इस बीच चुनाव की रणनीति बनाने के लिए प्रशांत किशोर का नाम भी उछला है। ये भी सामने आया है कि प्रदेश में प्रशांत किशोर ने अपनी टीम जरिए सभी 230 सीटों के पर प्राथमिक सर्वे करके अपनी एक रिपोर्ट पार्टी को सौंप भी दी! इसमें नेताओं की लोकप्रियता के क्षेत्रवार और बूथवार आंकड़े हैं। 
  पार्टी के रणनीतिकारों के मुताबिक प्रशांत किशोर ने अपने प्राथमिक सर्वे के नतीजे को गोपनीय रखते हुए पार्टी को स्पष्ट कर दिया था कि प्रदेश में सत्ता पाने के लिए सभी नेताओं गुटबाजी छोड़ना होगी! प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी जैसे नेताओं को गुट छोड़कर कांग्रेस के लिए गंभीर होना पड़ेगा, तभी कुछ हो सकता है। लेकिन, जब तक पार्टी के नेता खुद सामने आकर प्रतिद्वंदी पार्टी से मुकाबले में नहीं उतरेंगे, प्रशांत किशोर भी कुछ नहीं कर सकता! वैसे भी पार्टी का ये प्रयोग उत्तरप्रदेश में बुरी तरह फेल हो चुका है।     
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